शुक्रवार, 31 मार्च 2017

सोशल मीडिया के मूर्ख

यों, दुनिया में मूर्खों की कमी नहीं। सबसे अधिक मूर्ख अब सोशल मीडिया पर ही पाए जाने लगे हैं। सोशल मीडिया पर पाए जाने वाले मूर्खों की अजब ही कहानियां है। ये मूर्ख यहां या तो एक-दूसरे से लड़ते-भिड़ते रहते हैं या फिर लाइक-कमेंट की आस में ‘दुबले’ होते रहते हैं। किसी का खुद पर न किसी और पर कोई जोर नहीं रहता। हर मूर्ख अपनी मूर्खता के साथ स्वतंत्र है।

चूंकि मैं स्वयं सोशल मीडिया का एक ‘मूर्ख’ हूं इस नाते मेरी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि मैं अपनी मूर्खता में कहीं कोई कमी नहीं आने दूं। अपनी मूर्खता को ‘रेलिवेंट’ बनाए रखने की खातिर मैं यहां हर वो हरकत करना पसंद करता हूं जो ‘वायरल’ बने। किसी भी बात या मुद्दे का वायरल होना सोशल मीडिया में सेलिब्रिटी टाइप होने की फीलिंग देता है। मूर्खताएं यहां बहुत तेजी से वायरल होती हैं। सीधा-साधा या बौद्धिक किस्म का ज्ञान अगर यहां दे रहे हैं तो आप नितांत फालतू हैं। आप पर कोई ध्यान नहीं देगा। हां, आप में अगर अपनी मूर्खताओं के दम पर दूसरे को अटरेक्ट करने का माआदा है तो आप हिट हैं। ऊल-जलूल मूर्खताओं की वजह से ही यहां फॉलोइंग बढ़ने में जरा देर नहीं लगती।

यहां किसी से कैसे भी भिड़ने के लिए आप स्वतंत्र हैं। भिड़ने के लिए इज्जत कोई मसला नहीं। अगर इज्जत की ही फिकर करनी है तो घर की चारदीवारी से बेहतर दूसरी कोई जगह नहीं। मैं तो जब से सोशल मीडिया पर आया हूं अपनी इज्जत को घर के एक कोने की खूंटी पर टांग दिया है। केवल मूर्खता को ही अपना हथियार बनाया हुआ है। आदत ऐसी पड़ चुकी है कि मूर्खता अब अपनी-सी लगती है। जिस दिन कोई मूर्खतापूर्ण स्टेटस न अपडेट कर लूं बात बनती ही नहीं।

कहने में शर्म कैसी कि सोशल मीडिया हम मूर्खों का ‘डिजिटल गहना’ है।

फिर भी, यहां कुछ ऐसे लोग हैं जो खुद को मूर्ख कहने से कतराते हैं। आग-बबूला हो उठते हैं। तमाम प्रकार की नैतिकताओं की दुहाईयां देने लग जाते हैं। लेकिन इससे होगा क्या? न लोग आपको मूर्ख कहना बंद करेंगे न मानना। एडजस्ट करके चलने में ही भलाई है। वरना खुदा मालिक।

न सिर्फ सोशल मीडिया बल्कि आम जिंदगी में भी मूर्खता का अपना एक चार्म है। मूर्खता बेफिकरी टाइप होती है। मूर्ख अपनी मूर्खताओं को ज्यादा से ज्यादा एंन्जॉय किया करते हैं। दुनिया भर की तमाम समस्याओं के बीच अगर कुछ पल के लिए हम मूर्ख हो भी लें तो क्या हर्ज है? मूर्खताओं के साथ जिंदगी ज्यादा हसीन लगती है। वरना, यों रोते रहने का क्या है, रोते रहिए। किसे फिकर?

सोशल मीडिया का प्लेटफॉर्म खुद को दिमागी तौर पर हल्का रखने के लिए है नाकि बौद्धिकता झाड़ने के लिए। बौद्धिकता के लिए यहां तमाम जगहें हैं। जरूरत से अधिक बौद्धिकता दिलो-दिमाग के लिए हानिकारक है। हां, मूर्खताओं में आनंद ही आनंद है।


इसीलिए मुझे सोशल मीडिया के मूर्ख पसंद हैं। मूर्खता का अपना मजा है। जरा एक दफा आप भी मूर्ख बनकर तो देखिए हुजूर।

बुधवार, 22 मार्च 2017

क्योंकि हर एक रोमियो लफंगा नहीं होता

न केवल मेरे मोहल्ले बल्कि समूचे उत्तर प्रदेश के रोमियों पर ‘विकट संकट’ आन खड़ा हुआ है। एंटी रोमियो स्कावॉयड बन जाने से उनकी इज्जत पर ‘तगड़ा हमला’ हुआ है। बेचारे अब न खुलकर लड़कियों के स्कूल-कॉलेजों के आसपास टहलकदमी कर सकते हैं न अपनी महबूबा को बाइक पर बैठा कोचिंग छोड़ने जा सकते हैं। यहां तक कि लौंडेनुमा लड़कों को अपनी शर्ट का बटन बंद करके और हेयर स्टाइल को करीने से रखना होगा। नहीं तो कोई भी पुलिस वाला उन्हें पकड़कर बीच सड़क मुर्गा बनाने में कतई गुरेज नहीं करेगा।

रोड साइड रोमियों के प्रति इतने सख्त कानून से मैं बेहद खफा और आहत हूं। तमाम रोमियों के दिलों पर क्या और कैसी गुजर रही होगी बहुत अच्छे से समझ सकता हूं। क्योंकि मैं स्वयं अपने स्कूल-कॉलेज के दिनों में रोमियो रहा हूं। शादी हो जाने के बाद से अब अपनी पत्नी का रोमियो हूं। रोमियोगीरी की जो आवारा टाइप भावनाएं मन में होती है, उन्हें मैंने अभी भी नहीं छोड़ा है। लेकिन हालिया स्थिति को देख-जानकर मुझे अपनी रोमियोगीरी पर पुनः विचार करना पड़ सकता है।

ऐसा सरकार या आम लोगों का सोचना है कि रोमियो सड़कछाप मजनू या लफंगे होते हैं। आती-जाती लड़कियों को छेड़ते या फब्तियां कसते हैं। हां, उनमें से कुछ ऐसी ‘लंफगताऊ प्रवृति’ के हो सकते हैं (इससे इंकार नहीं करता) किंतु एक ही हल से सारे रोमियों को हांक देना भी ठीक नहीं।

मुझे ही देख लीजिए। मेरे जैसे संवेदनशील एवं शालीन रोमियों बहुत कम मिलेंगे। मैं अपनी रोमियोगीरी के प्रति बचपन से ही समर्पित रहा हूं। पड़ोसियों की जली-कटी को सुनने से लेकर पुलिसिया डंडा खाने के बाद भी मैंने रोमियोपंती नहीं छोड़ी। बैठे-ठाले पत्नी भी अक्सर कह देती है कि मैंने इतने टाइप के रोमियो देखे मगर तुम्हारी बात ही कुछ और है।

वही कि ‘एक मछली सारे तलाब को गंदा कर देती है’ की तर्ज पर सारे रोमियो को एक जैसा ही मान लिया गया है। जबकि यह रोमियो बिरादरी पर ज्यादती टाइप है। क्योंकि हर एक रोमियो लफंगा नहीं होता।


मेरी उत्तर प्रदेश सरकार से विनम्र गुजारिश है कि वो एंटी रोमियो स्कावॉयड के बारे में पुर्नविचार करे। लफंगे रोमियो पर बेशक सख्त रहे मगर हम जैसे संवेदनशील रोमियो को बख्शे। इतने जुल्म न ढहाए।

मंगलवार, 21 मार्च 2017

शरारतें जरूरी हैं

मुझमें और शरारत में छत्तीस का आंकड़ा बचपन से रहा है। बताते हैं- जब मैं पैदा हुआ था तब गोदी में आने के बहाने मैंने नर्स को डाइरेक्ट तमाचा जड़ दिया था। बस तभी से मुझे शरारती टाइप बच्चा माना जाने लगा। बचपना गुजर जाने के बाद जवानी आ जाने पर भी मैंने अपनी शरारतों को नहीं छोड़ा। जैसे- चोली दामन के साथ रहा करती है, वैसे ही मेरी शरारतें भी मेरे साथ रहीं। बल्कि शादी हो जाने के बाद तो और ज्यादा बढ़ गईं।

किंतु पत्नी को मेरी शरारतों पर कतई गुस्सा नहीं आता। बल्कि वो तो खुश होती है कि उसे मुझ जैसा प्योर शरारती पति मिला।

मेरा निजी तौर पर मानना रहा है कि व्यक्ति को जीवन में थोड़ा-बहुत शरारती अवश्य होना ही चाहिए। बिना शरारतों के जीवन बड़ा बोरिंग और बोगस टाइप जान पड़ता है। ऐसी लाइफ के भी भला क्या मायने जहां शरारतें न हों। दिल को ताउम्र बच्चा ही बनाए रखना चाहिए ताकि वैचारिक या धार्मिक बड़प्पन हम पर हावी ही न हो। जरा-बहुत सीरियसनेस चलती है लेकिन ज्यादा लोड लेने का नहीं।

शरारतों का आलम यह है कि मौका मिलने पर अब भी मोहल्ले के बच्चों के साथ सड़क पर सौ का नोट डाल डोरी बांधकर खींचना या सड़क पर चलते-फिरते बंदे के पीछे भौपूं बजाना या गिल्ली-डंडा खेलते वक्त गिल्ली से पड़ोसियों की खिड़कियों के कांच तोड़ना या कत्ते की दुम में लड़ी बांधकर छोड़ना या भीषण गर्मी में बच्चों के साथ रामगंगा में डूबकी लगाकर उनके साथ खेलना नहीं भूलता। अमां, यही तो असली जिंदगी है। हम तो अपने बड़प्पन में अपना बचपना और शरारतें लगभग बिसरा ही चुके हैं। मगर मेरी हरदम कोशिश यही रहती है कि अपनी ऊल-जलूल शरारतें कभी न छोड़ू। चाहे कोई कुछ भी कहता रहे।

मिस्टर बीन से अक्सर मैं शरारतें करने की प्रेरणा लेता रहता हूं। उन्हें देखकर लगता है कि बंदा ऐसा ही होना चाहिए फुल-टू मस्ती और शरारतखोर। हर बात, हर एक्ट में शरारत। चाहे मिस्टर बीन हों या चार्ली चैप्लिन इनकी शरारतें हमें हर पल गुदगुदाती हैं। जिंदगी के औने-पौने गम या बोझ को कम कर जाती हैं। अगर शरारतें न हों तो बचपन से जवान तक का रास्ता बड़ी ही मुश्किल से कटे।

व्यक्ति अगर इतना ही शरारत-पसंद हो जाए तो फिर जात-बिरादरी, धर्म-संप्रदाय, ऊंच-नीच, काले-गोरे आदि के मसले चुटकियों में न निपट जाएं। नहीं क्या...?

शुक्रवार, 17 मार्च 2017

वामपंथी मित्र से एक मुलाकात

मेरे एक वामपंथी मित्र हैं। पेशे और स्वभाव दोनों में केवल वामपंथ को ही जीते हैं। वामपंथ के अतिरिक्त पूरी दुनिया उन्हें नश्वर और पूंजीवादी टाइप नजर आती है। भीतर से लेकर बाहर तक लाल वस्त्र पहनते हैं। पैरों में लाल चप्पल और सिर में लाल तेल लगाते हैं। खाने में या तो लाल टमाटर खाते हैं या फिर लाल मिर्च। लाल रंग के अलावा न तो वे किसी रंग को पहचानते हैं न महत्त्व देते।

निरंतर डिजिटल होते समय में आज भी हाथ से ही लेख लिखते हैं। हालांकि छपते-छपाते कहीं नहीं हैं लेकिन मन में जिद है कि एक दिन पूरी दुनिया को वामपंथ के रंग में रंगकर रहेंगे। हां, बताता चलूं, वामपंथी मित्र के बच्चे अमेरिका में सैटिलिड हैं। जब-तब अपने बच्चों से एप्पल के आइ-फोन पर बातें करते रहते हैं। मित्र के फेसबुक और टि्वटर एकाउंट भी हैं। लेकिन वहां भी उन्होंने अपनी दीवारें लाल रंग से पोत रखी हैं।

अभी चुनाव परिणाम आने के बाद वामपंथ मित्र सब्जी मंडी में लाल टमाटर खरीदते हुए मिल गए। दुआ-सलाम हुई। एक-दूसरे के हाल-चाल जानें। मित्र थोड़ा ‘परेशान मूड’ में दिखे। मैंने पूछा- ‘क्या हुआ? परेशान से नजर आ रहे हैं? घर-परिवार में सब खैरियत तो है न?’ मुझे रोड से थोड़ा साइड में ले जाकर कहने लगे- ‘यार, बहुत बुरा। बहुत ही बुरा हुआ।‘ मैंने पुनः पूछा- ‘बुरा? क्या बुरा हुआ?’ बोले- ‘हम (वामपंथी पार्टी) उत्तर प्रदेश में फिर ‘जीरो’ साबित हुए। भाजपा-सपा-कांग्रेस की जाने दीजिए हम तो बसपा के करीब तक भी न पहुंच पाए। सारी उम्मीदें पानी में मिल गईं। कॉरपोरेट पूंजीवाद फिर जीत गया।‘

मैंने बेहद कूलता के साथ उनसे कहा- ‘तो क्या हुआ? ये तो होना ही था। राजनीति की जाने दीजिए वामपंथ तो समाज और लोगों के बीच से भी ‘खारिज’ हो चुका है। नई पीढ़ी तो वामपंथ की ए बी सी डी तक नहीं जानती। वामपंथियों की हार पर भला कैसा प्रलाप?’

मेरी बात सुनकर मित्र थोड़ा भुनभुनाए- ‘बहुत ही गलत धारणा है आपके मन में वामपंथ को लेकर। आपको पता होना चाहिए, वामपंथी विचारधारा दुनिया की समस्त धाराओं में सबसे श्रेष्ठ और प्रोग्रेसिव है। आप जैसे जड़-बुद्धि लोगों ने ही हमारे वामपंथ को हर जगह ‘बदनाम’ किया हुआ है। आप खोखले पूंजीवादी हैं।‘

मित्र की ‘पीड़ा’ को मैं समझ सकता था। हारा हुआ वामपंथी अक्सर ऐसा ही बर्ताव करता है। दिमाग पर ज्यादा लोड लेने का नहीं। फिर भी मैंने अपने वामपंथी मित्र को समझाते हुए कहा- ‘देखिए जनाब, आप मुझे कह कुछ भी लीजिए लेकिन हकीकत यही है कि पूरी दुनिया में वामपंथ को ‘कोने में सरका’ दिया गया है। वाम विचारधारा पूरी तरह से ‘इरेलीवेंट’ पड़ चुकी है। और, ये सब आप लोगों की ‘यथास्थितिवादी सोच’ के कारण ही है। जब तलक आप मार्केट, अमेरिका, तकनीक को गरियाते रहेंगे, आप यों ही हाशिए पर धकेले जाते रहेंगे। स्वीकार कर लीजिए, वामपंथियों की नाक टूट चुकी है।‘

लेकिन मित्र मेरा एक भी तथ्य स्वीकार करने की स्थिति में नहीं थे। अब उनका मुझे गरियाना और अधिक बढ़ गया था। आखिर, खीझकर उन्होंने मुझे ‘राष्ट्रवादी’ घोषित कर ही दिया।

यों भी, मित्रों की बातों का ‘बुरा’ मानने का शौक मुझे नहीं है। सो, अपने वाम-मित्र के कहे का बुरा भी मैंने नहीं माना। कौन-सा बुरा मान लेने से वो या मैं अपने विचारों में बदल जाते।

फिर भी, जाते-जाते मित्र यह सलाह देना नहीं भूले कि मुझे वामपंथी विचारधारा को अभी और पढ़ने-जानने की जरूरत है। अपने दिमाग को खोलने की जरूरत है। कॉरपोरेट राजनीतिक पूंजीवाद को समझने की जरूरत है।

फिलहाल, मित्र की सलाहें सर-आंखों पर।

बुधवार, 15 मार्च 2017

व्यंग्य में सरोकार

मैंने इस मसले पर तमाम लोगों से बात की। बीवी से लेकर गर्लफ्रेंड तक की राय ली। सभी छंटे हुए वरिष्ठ व्यंग्यकारों को पढ़ा-सुना। फेसबुक-टि्वटर तक छान मारा। किंतु व्यंग्य में सरोकार का तड़का कैसे डाला जाए- यह बताने को कोई राजी नहीं। अरे, मैं तो उस बंदे को रिश्वत तक देने को तैयार हूं, जो मुझे व्यंग्य में सरोकार पैदा करने का ज्ञान दे सके। मगर अफसोस कोई आगे नहीं आ रहा। सब कन्नी काट रहे हैं।

तो क्या मैं मान लूं, व्यंग्य में सरोकार होते ही नहीं? या व्यंग्य में सरोकारनुमी हवा का जो लोग झंडा बुलंद करते रहते हैं, ‘ठरकी’ टाइप हैं?

कुछ तो जरूर है। अब तक मैंने इतने व्यंग्य खींच लिए मुझे ध्यान नहीं पड़ता कि किसी व्यंग्य में मैंने सरोकार का राग छेड़ा हो। या किसी ने मुझे- आपके टूथपेस्ट में नमक है- की तर्ज बोला हो- आपके व्यंग्य में सरोकार हैं? फिर भी, पता नहीं क्यों कुछ लोग व्यंग्य में सरोकार का हल्ला रात-दिन फेसबुक पर मचाते रहते हैं। जबकि बेचारा सरोकार व्यंग्य में अपने होने न होने पर कभी दुख या एतराज नहीं जताता।

आजकल के जमाने में लोग रिश्तों में परस्पर सरोकार की बात नहीं करते फिर भला व्यंग्य में सरोकार पर क्यों अपना दिमाग खपाएंगे? आज हर आदमी तो व्यस्त है अपनी रोजी-रोटी की जुगाड़ में। अगर वो यों ही यहां-वहां सरोकार ढूंढता फिरेगा तब तो चला लिया उसने अपना घर-परिवार। दफ्तर में बॉस की हड़काई और घर में बीवी की आंख-दिखाई के आगे न ‘सरोकार का भूत’ दो सेकेंड में उतर कर ‘उड़न-छू’ हो लेता है। दुनिया इतनी जटिल हो चुकी है, यहां न बेटे को मां-बाप के, न चचा को भतीजे के, न भाई को बहन के सरोकार से खास कोई मतलब नहीं रहता। सब अपनी-अपनी लाइफ में अपनी तरह से बिजी हैं। फिर काहे का और कौन-सा सरोकार?

चलिए, व्यंग्य में सरोकार को जाने दीजिए, कविता-कहानी-उपन्यास में कौन-सा सरोकार अब नजर आ रहा है। बदलते वक्त के साथ लेखकों की ‘सरोकारी प्राथमिकताएं’ बदल गई हैं। कभी किसी जमाने में हुआ करते थे सरोकारी टाइप लेखक-साहित्यकार। अब तो लेखक का सारा सरोकार अखबारों-पत्रिकाओं में छपने, प्रकाशक से किताब छपवाने, सम्मान-पुरस्कार पाने में ही अधिक जुड़ा रहता है। बुरा न मानिएगा, यही हकीकत है। इधर, लेखक लोग जब से फेसबुक पर सक्रिय हुए हैं, तब से सारे सरोकार ‘पोस्टनुमा’ हो गए हैं। मन में कोई सरोकार आते ही झट से फेसबुक पर पोस्ट हो जाता है।

इसीलिए तो मैं व्यंग्य में सरोकार होने न होने के चक्करों में ज्यादा नहीं पड़ता। व्यंग्य में सरोकार घुसेड़ कर मुझे कविता-कहानी वालों की दुकानें थोड़े न बंद करनी हैं। व्यंग्य तो खुद में इतना बड़ा सरोकार है कि अच्छे-अच्छे लेखक-साहित्यकार उसके आगे पानी भरते नजर आते हैं। फिर जबरन क्यों व्यंग्य में सरोकार की पैरवी की जाए?

व्यंग्य में जितना ‘कूल’ रहेंगे, उतना ही ‘आनंद’ आएगा। व्यंग्य पर एंवई किस्म-किस्म की भावनाओं-गहराईयों का बोझा लाद देंगे तो उसे बड़ी तकलीफ होगी। यहां इंसान की लाइफ में दर्दे-ओ-गम पहले ही क्या कम हैं, जो उसका असर व्यंग्य में भी बनाए रखा जाए। व्यंग्य बड़ी ही ‘ग्लैमरस’ और ‘मस्त’ विधा है, क्यों न इसे ऐसे ही बना रहने दिया जाए।


सरोकारों का अगर इतना ही शौक है तो कविता लिखिए, कहानी लिखिए, उपन्यास लिखिए, आत्मकथा लिखिए, डायरी लिखिए। पर व्यंग्य को सरोकार टाइप बहसों से दूर ही रखिए। इसी में व्यंग्य और व्यंग्यकार दोनों की भलाई है। जय श्रीराम।

गुरुवार, 9 मार्च 2017

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागिन डांस

आजकल ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ हर किसी की खूब जोर मार रही है। सोशल मीडिया पर तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ‘नागिन डांस’ टाइप ही चल रहा है। जिसे देखो वो अपने गले में तख्ती लटकाए झूमे पड़ा है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के गाने पर। स्टेप कहीं के कहीं पड़ रहे हैं तब भी मन में जिद्द है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नागिन डांस पर थिरके ही मानेंगे। चूंकि मुझे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नागिन डांस करना नहीं आता इसीलिए मैं दूर खड़ा सबको नाचते देखने का आनंद ले रहा हूं। इसी में मेरी भलाई भी है।

कमाल देखिए, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नागिन डांस करने वे लोग भी कूद पड़े हैं, जिन्हें अब तलक मैंने अपनी पत्नियों के आगे ही ‘फैमली डांस’ करते देखा-पाया है। पत्नियों के आगे ‘भीगी बिल्ली’ बने रहने वाले वीर पुरुष हमें सीख दे रहे हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को हर हाल में बचाना ही होगा। जबकि घर में ये लोग अपनी पत्नी के बेलन से खुद के सिरों न बचा पाते हों पर सोशल मीडिया पर लेक्चर यों दे रहे हैं मानो- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के एकमात्र ठेकेदार ये ही हों।

इत्ते लोगों को एक साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नागिन डांस करते देख मन ही मन थोड़ा घबरा भी जाता हूं। घबरा कर दिमाग पर लोड लेने लग जाता हूं कि देश-समाज में ऐसी क्या ‘अनहोनी घटनाएं’ घट गईं जो कथित क्रांतिवीर यहां-वहां गुस्साए-गुस्साए घुम रहे हैं। ऐसा भयानक प्रचार कर रहे हैं मानो देश-समाज में हर किसी की जुबान पर ताले ठोक दिए गए हों। कोई विकट विपत्ति टाइप आन खड़ी हो। विपत्ति से निपटने की खातिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अंड-वंड-शंड नागिन डांस किए जा रहे हैं। अगर नागिन डांस करने का इत्ता ही शौक है तो अपने मोहल्ले या रिश्तेदारों की शादियों में क्यों नहीं करते? वहां ऐसे बूत बने खड़े हो जाते हैं जैसे डांस के मामले में कतई ‘लल्ला’ हों।

एकाध दफा सोशल मीडिया पर मुझसे भी कहा गया कि मैं भी उनके साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वाले नागिन डांस में शामिल हो जाऊं। मगर मैंने यह कहते हुए मना कर दिया- मुझे जित्ता डांस करना होता है अपनी पत्नी के आगे कर लेता हूं। फिर यहां-वहां डांस करने की मुझसे ‘हिम्मत’ ही नहीं बचती। मेरी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पत्नी से शुरू होकर पत्नी पर ही खत्म हो जाती है। फिर भला मैं क्यों दूसरों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लफड़े में पड़ूं? अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को आप संभालें।

सच बातऊं तो देश-समाज के बीच अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरा-वतरा कुछ है नहीं। ये सब सोशल मीडिया पर बैठे चंद ठलुए प्रगतिशीलों के बनाए शोशे हैं, जिन्हें वे अपनी सुविधाओं या कुंठाओं की खातिर उछाले पड़े हैं। जरा ठंडे दिमाग से सोचकर देखिए, अभिव्यक्ति की जित्ती स्वतंत्रता हमारे देश में है उत्ती कहीं और है क्या?

खैर, मुझे क्या। मुझे तो उनका नागिन डांस देखने में फुल-टू आनंद आ रहा है। मैं चाहता भी यही हूं कि वे सोशल मीडिया पर यों ही नाच-नाचकर हम सब का ‘मनोरंजन’ करते रहें।

बुधवार, 8 मार्च 2017

छिपकली को बदनाम करने की साजिश

एंवई सब मिलकर बिचारी छिपकली को ‘बदनाम’ करे पड़े हैं। इसमें छिपकली का क्या ‘दोष’? छिपकली को क्या मालूम कि वो एक ऊंची कंपनी के फ्रेंच फ्राइज में ‘शहादत’ देने जा रही है। छिपकली अपने नेचर में कतई ‘स्वतंत्र’ होती है। बेरोक-टोक कहीं भी आ-जा सकती है। कहीं भी गिर या निकल सकती है। वो भला इंसान को क्या डराएगी, इंसान खुद उसका नाम सुनते ही पसीने-पसीने हो जाता है।

सोशल मीडिया पर तो छिपकली को ‘वायरल’ कर दिया गया है। बतौर ‘खलनायक’ छिपकली को प्रस्तुत किया जा रहा है। कहीं यह भी लिखा देखा था कि फ्रेंच फ्राइज में छिपकली मिलने से पूरा परिवार ‘दहशत’ में हैं! लो कल्लो बात। दहशत में आने का क्या मतलब? मरी छिपकली ने परिवार वालों को कोई ‘धमकी’ थोड़े न दी थी, जो परिवार दहशत में आ गया। एक तो बिचारी को जान से हाथ धोना पड़ा, ऊपर से बदनामी मिली सो अलग।

सारी लगती तो उस कंपनी के शेफ की है, जिसने बिना देखे-जाने फ्रेंच फ्राइज के साथ छिपकली को भी तल दिया। शेफ मासूम छिपकली की हत्या का दोष है। मेरे विचार में तो इस मामले की सीबीआइ जांच बनती है। कित्ती तकलीफ हुई होगी बिचारी छिपकली को तले जाते वक्त। लेकिन हम इंसानों को छिपकली के दर्द-ओ-गम से क्या वास्ता, हम तो उसे सोशल मीडिया पर वायरल करने में व्यस्त हैं।

दरअसल, छिपकली के प्रति हमारी धारणाएं काफी गलत हैं। नब्बे परसेंट लोग उसे ‘घृणा’ की नजर से ही देखते हैं। बाथरुम से लेकर बैडरुम तक में उसकी आवाजाही पर गाहे-बगाहे रोक-टोक लगाते रहते हैं। छिपकली को देख यों चिल्लाते हैं मानो घर के भीतर कोई शेर-चीता घुस आया हो। जबकि छिपकली मूलतः बेहद शांत जीव है। न कभी किसी से कुछ कहती है, न किसी को डराती-धमकाती। शांत-सी दीवार पर चिपकी रहती है। पूर्णता धर्मनिरपेक्ष होती है। जातिवाद में रत्तीभर यकीन नहीं रखती।

मैंने छिपकली को कभी किसी से खाना मांगते नहीं देखा। अपना खाना वो स्वयं अपनी मेहनत के बल पर जुटाती है। फिर भी बदनाम है। घर-परिवारों के बीच छिपकली की हैसियत कॉकरोज टाइप ही है। न जाने हम लोग छिपकली और कॉकरोज से इत्ता भय क्यों खाते हैं? जबकि सच तो यह है कि इंसान से डरवाना और खतरनाक इस धरती पर कोई नहीं।

कुर्बान हुई छिपकली के प्रति मेरे मन में बेहद इज्जत है। बिना किसी कारण उसे काल के गाल में समा जाना पड़ा। कसूरवार था कोई, जिम्मेदार बिचारी छिपकली को ठहराया जा रहा है। मेरा सख्त मानना है कि छिपकली समुदाय को इस मौत (अन्याय) के खिलाफ जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन करना चाहिए। सरकार को नींद से जगाना चाहिए। आखिर ऐसे कब तलक छिपकलियां इंसानों के खाने में अपनी शहादत देती फिरेंगी? इत्ती बदनामियां भी ठीक नहीं छिपकली समुदाय के लिए।

साथ-साथ छिपकली समुदाय की तरफ से मेरी भी अपील है कि दोषी को सख्त से सख्त सजा मिले।

सोमवार, 6 मार्च 2017

मरने पर लाइक!

फेसबुक पर लाइक के मसले तगड़े हैं। आए-दिन अखबारों में छपने वाली रपटें बताती रही हैं कि लाइक की चाह में लोग ‘डिप्रेशन’ तक का शिकार होने लगे हैं। लोगों में अपने काम एवं नींद के प्रति इत्ता उत्साह देखने में न आता, जित्ता एक लाइक को लेकर रहता है। लाइक पाना मानो उनकी जिंदगी का अहम मकसद बन गया हो! यों भी, सोशल मीडिया में सबसे ज्यादा लाइक पाने वाले को ‘सम्मान’ और कम लाइक पाने वाले को ‘हिकारत’ भरी निगाहों से देखा जाता है। पार्टियों में भी लोग एक-दूसरे का हालचाल बाद में पहलेफेसबुक की फलां- फलां पोस्ट या फोटू पर मिले लाइक का हिसाब पूछते हैं।

लाइक की दीवानगी के बीच एक बात मैंने अनेकों बार नोट की है कि लोग किसी के मरने की खबर को भी लाइक करे बिना नहीं रह पाते। ऊपर से कमाल ये, फलां व्यक्ति के मरने की खबर देने वाला बंदा अगर अपने स्टेटस में यह भी लिख दे- कृपया, इस स्टेटस को लाइक न करें- तब भी लोग लाइक करे बिना नहीं मानते। बल्कि मैंने तो मरने की खबर पर ही 500-700 लाइक आते देखे हैं। वाह! क्या बात है- सोशल मीडिया में लोग मरने को खबर को भी उत्ता ही ‘पसंद’ करते हैं जित्ता किसी के ‘पैदा’ होने को!

अक्सर मुझे लगता है कि लाइक की चाह हमारे दिलो-दिमाग के सभी दरवाजे एकदम बंद करके रखती है। लाइक करने वाले को केवल लाइक पर चटका लगाने से मतलब होता है- फिर खबर चाहे कैसी भी क्यों न हो। बाकी चोट-फेंट, बुखार-दस्त आदि के स्टेटसों पर लाइक ठोकना आम बात है। शायद तब तलक रोटी हलक से नीचे न उतरती होगी, जब तलक बंदा या बंदी अपने बीमार होने की खबर फेसबुक पर पोस्ट न कर दे।

मरना धरती पर भले ही शोक-संवदेना की खबर माना जाता हो किंतु फेसबुक पर यह ‘लाइक का औजार’ है। अगला किसी के मरने की खबर यह समझकर पोस्ट करता होगा कि इस बहाने दस-पचास लोगों को पता चल जाएगा पर मरने की खबर को ही फेसबुकिए लाइक कर बैठेंगे, सोचिए क्या गुजरती होगी उसके दिल पर। यानी, सोशल मीडिया के लोग किसी के जाने पर प्रसन्न होते हैं, शायद इसीलिए लाइक पे लाइक ठोके जाते हैं।

मरने वाला चाहे स्वर्ग में जाए या नरक में यमराज की निगाह में ‘सम्मानित’ व्यक्ति ही होता होगा! भई, सम्मानित क्यों न होगा; आखिर इत्ते सारे लाइक पाने के बाद स्वर्ग या नरक में आया है। समस्त देवतागण उसका सम्मान फूल-मालाओं के साथ किया करते होंगे। मन ही मन खुद को ‘कोसते’ जरूर होंगे कि हाय! हमारे जमाने में फेसबुक क्यों न हुआ। मरने पर कुछ लाइक हमें भी मिल जाते।

सोशल मीडिया में संवदेनशीलता अब दूर की कौड़ी है। यहां समस्त हाव-भाव या तो लाइक से जुड़े होते हैं या कमेंट से। खुश हैं तो लाइक कीजिए। गम है तो लाइक कीजिए। बीमार हैं तो लाइक कीजिए। घूम-घाम रहे हैं तो लाइक कीजिए। मानो- पूरी दुनिया एक लाइक पर आनकर टिक गई है।

फेसबुक पर अगर हम ‘छींक’ या ‘खंखार’ भी दे तो भी मन में तमन्ना कुछ लाइकस पाने की ही रहती है। मैंने तो मात्र ‘हाय’ पर ही ढेरों लाइकस यहां पड़े देखे हैं।

तो प्यारे किसी के मरने की खबर पर यों संजीदा होनी की आवश्यकता नहीं बस ‘लाइक’ कीजिए और काम पर चलिए। फेसबुक की आवाम का यही दस्तुर है।

रविवार, 5 मार्च 2017

मार्केटिंग का फंडा

उस रोज मेरे मोबाइल पर एक कॉल आई। कॉल चूंकि अनजान नंबर से थी, सो मैंने रिसिव नहीं की। दस मिनट बाद उसी नंबर से पुनः कॉल आई। मैंने यह सोचकर रिसिव कर ली कि शायद किसी अखबार के संपादक का फोन रहा, मुझसे कुछ लिखवा हो।

कॉल रिसिव करते ही, उधर से बंदा बोलता है। सर, ‘मैं फलां मार्केटिंग कंपनी का सेल्स-मैनेजर बोल रहा हूं। क्या आपके दो मिनट ले सकता हूं?’ उस वक्त मैं भी थोड़ा खाली था, तो कह दिया, ‘दो क्या दो घंटे ले ले। लोग फोन पर गर्लफ्रैंड से दो घंटे बात करने में जाया कर देते हैं, तुम मेरे दो मिनट लेके कौन-सा खुद या मुझ पर एहसास कर दोगे?’

बंदा फोन पर तुरंत सवाल दागता है- ‘सर, आप टूथपेस्ट कौन-सा यूज करते हो?’ मैंने बता दिया। फिर उसने पूछा- ‘सर, आप बाथसोप कौन-सा यूज करते हो?’ यह भी बता दिया। फिर पूछा- ‘सर, आप टी किस कंपनी की लेते हो?’ यह भी बता डाला। फिर पूछता है, ‘सर- आपका रंग काला है या गोरा?’ अब तो मेरे माथे की सटक ली। मैंने कर्रा होकर उसे डंटा- ‘क्या बे, मेरे रंग से तुम्हारा क्या लेना-देना?’ वो बोला, ‘सर, किरपिया, बुरा न मानें, हमें अपने कस्टमर्स से ऐसा पूछना पड़ता है। प्लीज बताएं।‘ मैंने खुद को हल्का करते हुए कहा- ‘न ज्यादा काला, न ज्यादा गोरा। सामान्य।‘ उसने थैंक्स कहते हुए बोलना जारी रखा।

‘सर, हमारी कंपनी जेनटस के ‘ब्यूटी-प्रॉडेक्टस’ बनाती है। खासकर, फेस-क्रीम। कोले को गोरा कर देती है। नॉमर्ल क्लर वालों को नेचुरल क्लर में ले आती है। मैंने कहा- ‘अच्छा। लेकिन यार मुझे तो किसी फेस-क्रीम की रिकॉयरमेंट नहीं। मैं मेरे सामान्य क्लर से साथ खुश हूं।‘ मुझे बीच में टोकते हुए मार्केटिंग मैनेजर बोला- ‘नहीं सर, ऐसा न कहें कि फेस-क्रीम की जरूरत नहीं। फेस का गुड-लुकिंग होना समय की डिमांड है। सुंदर लगने-दिखने का क्रेज आजकल जेनटस में भी लेडिज के मुकाबले अधिक बढ़ गया है। आप एक बार हमारी कंपनी की फेस-क्रीम यूज करके तो देखें। न केवल भाभीजी बल्कि आपके आस-पास की लेडिज भी आप पर ‘क्रश’ करने लेगेंगी। गारंटी हमारी है।‘

बंदा अपने मार्केटिंग स्टाइल से मुझे लगातार रिझाए चला जा रहा था। अब मेरा मन भी धीरे-धीरे कर उसके ब्यूटी-प्रॉडेक्ट की तरफ खींच-सा रहा था। खासकर, उसकी क्रश वाली बात को सुनकर। अगर फेस-क्रीम लगाने से ऐसा हो जाता है तो क्या दिक्कत है थोड़ा-बहुत फ्लर्ट कर लेने में। लाइफ में थोड़ा चेंज तो मांगता है न। मैंने भी बंदे से कह ही दिया- ‘मैं तुम्हारा प्रॉडेक्ट खरीदने को एर्गी हूं, शर्त केवल इत्ती है पैसा फेस पर चेंज दिख लेने के बाद ही मिलेगा।‘ इत्ता सुन मार्केटिंग मैनेजर राजी भी हो गया। तुरंत बोला- ‘सर, पैसा देने की टेंशन न लें। आप हमारे प्रॉडेक्ट को यूज करें बस। खुद भी यूज करें और अपने फ्रैंड्स को भी यूज करवाएं। अगर आप अपने दो-चार फ्रैंड्स को हमारा प्रॉडेक्ट खरीदवा देते हैं तो हम इसे आपके लिए बिल्कुल ‘फ्री’ कर देंगे। बल्कि अपना मैंबर भी बना लेंगे। मतलब- हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा।‘

इत्ता सुन मन ही मन लड्डू टाइप फूटने लगे। यह धंधा बढ़िया है। खुद मुफ्त में यूज करो, दूसरों से पैसा लो। वाह! मार्केटिंग के टेक्ट्स भी निराले हैं प्यारे। लेखन से कहीं बढ़िया तो मार्केटिंग का धंधा है। शुरू की थोड़ी मेहनत लाइफ बना डालती है। आजकल जमाना ही प्योर सेल्स का। आपमें बेचने का हुजूर होना चाहिए फिर तो कुछ भी बेच डालो।

फिलहाल, ‘फेस-क्रीम’ मंगवा ली है। खुद पर यूज बाद में करूंगा पहले अपने दोस्तों को बेच पैसा सीधा कर लूं। यू नो, सिंपल मार्केटिंग!