गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

काश! रेनकोट वाला ज्ञान महीने भर पहले मिला होता

ज्ञान लेने या देने के मामले में मैं जरा ‘चूजी’ हूं। एंवई, हर किसी से न ज्ञान लेता हूं, न देता है। आज के डिजिटल युग में लोग ज्ञानियों की शरण में न जाकर सीधा गूगल करना ज्यादा पसंद करते हैं। सही भी है। अपना ज्ञान, अपना रिस्क।

लेकिन संसद में प्रधानमंत्रीजी से ‘रेनकोट’ वाला जो ज्ञान मिला, उसे पाकर मैं ‘अभिभूत’ हूं। हालांकि उनका ‘तंज’ कहीं और था मगर ‘फायदा’ मुझे हुआ। काश! यह ज्ञान महीने भर पहले मिल जाता तो मुझे इत्ती विकट ठंड में नाहते वक्त इत्ता ठिठुरना तो नहीं पड़ता। सीधा रेनकोट पहनकर ही न नाहता। नहाने के पीछे न हर रोज पत्नी से कहा-सुनी होती। न ही ऑफिस वाले मुझे मेरे न नहाने के पीछे ताने देते।

मगर ज्ञान और इश्क किसी के चाहने या न चाहने से भला कब मिले हैं? कोई नहीं, देर से ही मिला पर मिला तो, अब इस ज्ञान को मैं ‘ताउम्र’ अपने पास रखूंगा।

न केवल सर्दियों में बल्कि गर्मियों में भी रेनकोट में नहाने का कॉनसेप्ट है बढ़िया। ये तो हींग लगे न फिटकरी रंग जोखा वाली कहावत को चरितार्थ सा करता है। मुझ जैसे विकट ‘न’ नहाने के चोरों के तईं यह किसी ‘वरदान’ से कम नहीं। यों भी, सर्दियों में बिना कपड़ों के नहाना शरीर की ‘बेइज्जती’ टाइप करना ही है। मेरा बचपन से यही मानना रहा है कि नहाने से कुछ नहीं होता। इससे केवल शरीर के ऊपरी हिस्से का मैल ही साफ होता है, जो मैल शरीर के भीतर भरा पड़ा है वो यथावत रहता है।

दुनिया का ऐसा कोई साबुन या पानी नहीं बना जिससे इंसान के भीरती मैल को नहाकर साफ-सुधरा किया जा सके। नहाना महज एक ‘भ्रम’ है। इसी भ्रम को जिंदा रखने की खातिर हम सदियों से बेचारे शरीर को जाड़ा-गर्मी-बरसात में ‘कष्ट’ देते चले आ रहे हैं। शर्मनाक।

पर अब और नहीं। अब से मैंने तय किया है कि मैं चाहे मौसम कैसा भी क्यों न हो सिर्फ और सिर्फ रेनकोट पहनकर ही नाहूंगा। अब चाहे पत्नी से पंगा हो या ऑफिस वाले बातें बनाएं।
इत्ता लाभकारी ज्ञान बड़े सौभाग्य से मिला करता है।

जब हम बरसातों में रेटकोट पहनकर न भीगने का ‘सुख’ उठा सकते हैं तो नहाने वक्त इस सुख को ले लेने में भला क्या ‘बुराई’ है? क्यों...?

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