मंगलवार, 7 फ़रवरी 2017

शव और सेल्फियां

डिसक्लेमर- यह किस्सा नितांत काल्पनिक है। अतः रत्तीभर भी दिल पे न लिया जाए।

तो प्यारे, किस्सा कुछ यों है। हमारे पड़ोस में रहने वाले एक सज्जन अचानक से स्वर्ग सिधार गए। बतला दूं, सज्जन हर काम अचानक से ही किया करते थे। अचानक से ही हमारे घर आ धमकते थे। अचानक से ही कहीं भी चल पड़ते थे। अचानक से उन्हें सर्दी-गर्मी का एहसास होने लगता था। अचानक से ही खाते थे। अचानक से ही पीते थे। अचानक से ही सोते थे। अचानक से ही जागते थे। और तो और (जैसाकि उन्होंने एक दफा बताया) अचानक से ही उनकी शादी और बच्चे भी हुए थे।

मतलब- उन सज्जन की पूरी जिंदगी ही अचानक-अचानक किस्म के किस्सों से भरी पड़ी थी। इसीलिए अचानक से ही वो हमारे बीच से खर्च भी हो लिए।

मुझे उनके इस तरह अचानक से चले जाने का जरा भी ‘अफसोस’ नहीं हुआ। मुझे मालूम था कि एक दिन को वो यों ही अचानक से चले जाएंगे। वैसे, अचानक से मौत आने का लुत्फ अलग ही होता है। एक दम चुप-चाप बिना किसी को बताए, परेशान किए पतली गली से निकल लेना। यह क्या कि भयंकर बीमार होकर, घिसट-घिसटकर मरे भी तो क्या मरे। खुद तो परेशान हुए ही, दूसरों को उससे ज्यादा किया।

सज्जन चूंकि भरे-पूरे परिवार के मालिक थे अतः उनके अचानक से चले जाने पर घर में ज्यादा चीख-पुकार सुनाई न दी। घर वाले हल्की-फुल्की हंसी-ठिठोली टाइप मूड में लग-दिख रहे थे। पड़ोसी होने के नाते अपनी शोक संवेदनाएं व्यक्त करने मैं भी उनके घर गया। जहां उनके शव को रखा गया था, वहां का नजारा ही डिफरेंट था। घर-परिवार वाले और नाते-रिश्तेदार एक-एक कर सज्जन के शव के साथ सेल्फियां लेने में लगे हुए थे। सेल्फियां लेते वक्त किसी के चेहरे पर मुस्कुराहट थी। कोई विकटरी का चिन्ह बनाए हुआ था। किसी ने अपनी सीधी उंगली को उनकी तरफ इंडिकेट कर रखा था। एक मियां तो ऐसे भी दिखे, जो अपने नए-नवेले स्मार्टफोन से पहली सेल्फी सज्जन के शव के साथ ले रहे थे।

ये सब देखकर मुझे थोड़ा अटपटा-सा लगा तो बाजू में खड़े उनके परिवारिक सदस्य से पूछा। महोदय- ‘शव के साथ किस्म-किस्म की सेल्फियां आप लोग ले रहे हैं, यह तो बड़ा शर्मनाक है।‘ वे बोले- ‘शर्मनाक कैसा भाईसाब। आजकल हर चीज ऑन-रिकार्ड होनी चाहिए। हम हमारे अंकल के साथ सेल्फियां इसीलिए ले रहे हैं ताकि प्रमाण साथ रहे। आगे किसी किस्म का परिवार में कोई झगड़ा-शगड़ा न हो।‘ मैंने बीच में टोकते हुए कहा- ‘किंतु ये सब करने की क्या जरूरत है? आखिर डेथ-सर्टिफिकेट तो नगर निगम से मिलेगा ही न।‘ वो बोले- ‘हां, वो तो मिलेगा ही। चूंकि सब लोगों की इच्छा थी कि उनके शव के साथ और शव-यात्रा की सेल्फियां ली जाएं तो हम सब ले रहे हैं। सेल्फी लेना तो आजकल का ट्रेंड है भाईसाब। सब चलता है। आप एंवई दिल पे लोड ले रहे हैं।‘

इससे पहले मैं उससे कुछ और कह पाता वो यह कहते हुए चला गया- ‘अभी हम सब को अंकल की शव-यात्रा के साथ भी सेल्फियां लेनी हैं। आइए, आइए आप भी आइए न। पड़ोसी होने के नाते एक सेल्फी आपके साथ भी बनती है।‘

न.. न.. मैंने दूर से ही हाथ जोड़कर मना कर दिया। और मन में सोचने लगा- वाकई जमाना कित्ता बदल लिया है। अभी सेल्फियां खुद तक सीमित थीं, अब शव-यात्रा के साथ भी ली जा रही हैं। तभी मुझे टि्वटर पर देखी उस सेल्फी का ध्यान हो गया, जिसमें एक बंदा संडास में बैठा अपनी सेल्फी ले रहा था। वाह रे, सेल्फी-संपन्न युग।

1 टिप्पणी:

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’बाबा आम्टे को याद करते हुए - ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...