बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

गधे सुखी हैं

कृश्न चंदर गधे की वापसी में लिखते हैं- ‘इंसानों की दुनिया में वही लोग प्रसन्न रह सकते हैं, जो गधे बनकर रहें।‘

वाकई। गधे बनकर रहने का ‘सुख’ क्या है, यह कोई मुझसे पूछे। मैं अपने खानदान का एक मात्र गधा हूं, जिसे स्कूल से लेकर परिवार तक हमेशा गधा ही कहा-माना जाता रहा है। किंतु खुद के गधा होने का ‘बुरा’मैंने कभी नहीं माना। बुरा मानके किसी का मैं बिगाड़ भी क्या लेता? जबकि मुझे यह अच्छे से मालूम है कि जो मुझे गधा कह या पुकार रहा है, वो कौन-सा बुद्धिजीवियों का खुदा है!

बुद्धिजीवि बनकर रहने में तो तब भी तमाम तरह के खतरे हैं मगर गधा बने रहने में रत्तीभर खतरा नहीं। गधा बुद्धि और बुद्धिजीविता दोनों से पूर्णता मुक्त रहता है। जैसाकि मैं हूं।

गधा धरती का सबसे ‘शांत’ जीव है। न ज्यादा किसी से मतलब रखता है, न किन्हीं सामाजिक-राजनीतिक पचड़ों में पड़कर अपना दिमाग खोटी करता है। वो या तो अपने मालिक का बोझा ढोने में बिजी रहता है या फिर कहीं हरी-भरी घास चरता हुआ मिल जाता है। बहुत हुआ तो बीच-बीच में कुछ ढेंचू-ढेंचू... टाइप कर लेता है, वो भी अपनी खुशी का इजहार करने के वास्ते। मैंने गधे के चेहरे पर कभी झुंझलाहट या तीखापन नहीं देखा। बेहद कूलता के साथ अपनी जिंदगी काटता है गधा।

फिर भी पता नहीं क्यों कुछ लोगों को खुद के गधा कहे या बोले जाने पर एतराज टाइप रहता है। गधा नाम सुनते ही उनके मुंह पर ‘लालपन’ आ जाता है। मरने-मारने को दौड़ पड़ते हैं। कोर्ट-कचहरी तक की नौबत आ जाती है। लेकिन दिमाग को ठंडा रख यह सोचने की जहमत कोई नहीं फरमाता कि किसी के गधा कह देने भर से वे गधा हो थोड़े न जाएगा। अरे भई, गधा तो प्रतीकात्मक संकेत है किसी की उतारने का। गधा तो पूरे विश्व में एक ही रहेगा, जिसे ऊपर वाले ने गधा बनाया है। गधा इंसानों द्वारा खुद के गधा कहने जाने का बुरा नहीं मानता फिर इंसान क्यों मान बैठता है? शायद यही फर्क है, इंसान और गधे के बीच।

चुनावी सभाओं में तो आजकल नेता लोग आपस में खूब गधा-गधा खेल रहे हैं। जबकि गधे का दूर-दूर तलक राजनीति और नेता से कोई मतलब नहीं फिर भी बेचारों को बीच में घुसेड़े ले रहे हैं। यों, अपने खिलाफ ‘मिथ्या-प्रचार’ का बुरा तो गधों को खूब लग रहा होगा पर बेचारे कहें किससे? बगावत कर नहीं सकते दाना-पानी का संकट खड़ा हो सकता है। इसीलिए गधों ने ‘मौन’ रहना ही उचित समझा। एंवई, नेताओं के लफड़े में पड़कर गधा समाज क्यों अपना कीमती वक्त बर्बाद करे। जब वे गधे हैं तो गधे ही रहेंगे। इंसान तो बन नहीं जाएंगे।

आजकल इंसान भी कौन-सा इंसान रहा है। कभी-कभी तो गधों की श्रेणी से भी आगे निकल जाता है। गधे तो फिर भी अपने गधेपन पर रश्क करते हैं, इंसान ने तो इंसानियत को ही बेच डाला है।

यही वजह है कि मैंने आज तलक कभी खुद के गधा होने या पुकारे जाने पर ‘अफसोस’ नहीं जताया है। बैठे-ठाले पत्नी भी ताना मार देते है कि मैं गधे टाइप का लेखक हूं। प्रतिकार इसलिए नहीं करता कहीं घर से बेदखल न कर दिया जाऊं। गधा बने रहकर इस दुनिया का मजा लें। बाकी आदर्श टाइप जिंदगी में कुछ न धरा है पियारे।

2 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

मैंने आज तलक कभी खुद के गधा होने या पुकारे जाने पर ‘अफसोस’ नहीं जताया है। :) :)

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’शिव का देवत्व और ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...