मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

दुमदार बुद्धिजीवि

मेरे पड़ोस में एक ‘दुमदार बुद्धिजीवि’ रहते हैं! नहीं.. नहीं..उनकी सचमूच की ‘दुम’ नहीं है। हैं वो हमारी-आपकी तरह ही सामान्य इंसान। दुमदार उन्हें इसलिए कह रहा हूं क्योंकि वे हर वक्त मुझे यह एहसास करवाते रहते हैं कि उनकी बुद्धिजीविता उनकी दुम (विचारधारा) में बसा करती है। यों, मोहल्ले में उनका किसी से भी दुआ-सलाम नहीं है सिवाय मेरे। उन्हें ऐसा लगता है, चूंकि मैं अखबारों में लिखता हूं, इस नाते मैं भी उन्हीं की तरह बुद्धिजीवि हूं और मेरी भी दुम है!

जबकि हकीकत यह है कि मैं न बुद्धिजीवि हूं। न मेरी कोई दुम (विचारधारा) है। न ही मैं किसी टाइप के बुद्धिजीवि से दूर-पास का रिश्ता रखना पसंद करता हूं। बुद्धिजीवियों से मैं उत्ता ही घबराता हूं, जित्ता इंसान सांप से। मोहल्ले में आते-जाते जब भी वो मेरे सामने पड़ते हैं, कोशिश यही रहती है, उनसे हट-बचकर निकला जाए। किंतु हर दफा किस्मत भी कहां साथ देती है।

अभी दो-चार रोज पहले वे हमारे घर आ धमके। घर आए पड़ोसी को यों टरकराना भी अच्छा नहीं लगा सो उनके साथ बैठक जमानी पड़ी। साहित्य-राजनीति-समाज आदि से जुड़े मुद्दों पर आपस में खूब लंबी-लंबी खींची।

पहला सवाल उन्होंने मुझ पर यह दागा कि मैं किस विचाधारा को मानता हूं? जिज्ञासावश मैंने उनसे पूछ लिया- ‘विचारधारा...? यह क्या बला होती है भला?’ चेहरे पर गंभीरता का भाव लाते हुए बुद्धिजीवि महोदय बोले- ‘अरे, आप विचारधारा नहीं जानते? ‘विचारधारा’ तो बुद्धिजीवियों की ‘दुम’ समान होती है। जैसे- मेरी है। मैं बिना दुम (विचारधारा) के न कुछ सोच सकता हूं न लिख सकता। लेखन की बुनियाद विचारधारा पर ही टिकी होती है।‘

बुद्धिजीवि महोदय से बात करते वक्त मैं थोड़ा ‘नर्वस’ था। पहली दफा किसी दुमदार बुद्धिजीवि का सामना कर रहा था न। उस पर विचारधारा पर बहस...! ये तो मेरे सिर के ऊपर से ही जा रही थी। थोड़ा हिम्मत का दामन थामने हुए मैंने उनसे कहा- ‘महोदय, यह सच है कि मैं लेखक हूं। लिखता हूं। किंतु किसी दुम (विचारधारा) का गुलाम नहीं हूं। मैं लेखन में ‘बे-दुम’ ही रहना चाहता हूं। वैचारिक प्रतिबद्धता को साथ लेकर चलना तो आप जैसे ऊंचे दुमदार बुद्धिजीवियों का काम है। मैं खुद को इस लायक नहीं मानता।‘

इत्ता सब सुनने के बाद बुद्धिजीवि महोदय लंबी सांस भीतर खींचते हुए बोले- ‘आपकी मर्जी...। लेकिन बिना दुम (विचारधारा) के आप न लेखन, न साहित्य में ज्यादा टिक नहीं पाएंगे। लेखन विचारवानों-विचारशीलों की दुनिया है। यहां बे-दुमों का कोई काम नहीं। मैं हैरान हूं कि आप बिना विचारधारा के लिख कैसे लेते हैं?’

मैंने भी दो-टुक लहजे में उनसे कह दिया- ‘लेखन में न मुझे करियर बनाना है न सम्मान-पुरस्कार हासिल करना। गाड़ी जब तलक चल रही है, चलने दे रहा हूं। मैं मेरे लेखन के साथ खुश हूं। लिखता मैं इसलिए हूं ताकि कुछ खरचा-पानी निकल सके। बाकी लेखन में विचारधारा, गंभीरता, वैचारिकता, सहजता, कथ्य, सौंदर्य आदि-आदि को जीवित रखना तो आप जैसे दुमदार बुद्धिजीवियों का काम है।‘

बुद्धिजीवि महोदय के चेहरे पर मुझसे घोर असहमति के भाव साफ नजर आ रहे थे। वो तो उनका बस नहीं चल पा रहा था, नहीं तो मेरे खिलाफ उसी वक्त ‘फतवा’ जारी कर देते। फिर भी, अपने गुस्साई अंदाज में उन्होंने मुझसे कह ही दिया- ‘आप लेखक हैं नहीं। आपको विचारधारा से ज्यादा प्रिय पारिश्रमिक है। अतः मेरी आपसे कतई नहीं बन सकती। मैंने बहुत बड़ी गलती की जो आपसे मिलने आपके घर चला आया।‘

बिना नमस्कार किए हुए ही दुमदार बुद्धिजीवि अपनी दुम को संभाले मेरे घर से रुखस्त हो लिए। और मैं पुनः डट गया, एक बे-वैचारिक टाइप व्यंग्य खींचने में।

1 टिप्पणी:

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