सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

लाठी के वीर और वैलेंटाइन डे

बातें चाहे कित्ती ही क्यों न बना लें पर दुनियां-जहां में चलती लाठी के वीरों की ही है। लाठी के वीरों से आम तो क्या खास भी ‘कंपता’ है। उचित दूरी बनाकर रहता है। न उनका साया खुद पर, न खुद का साया उन पर पड़ने देता है। लाठी के वीरों का क्या भरोसा कब में अपना ‘ब्रहमास्त्र’ चल दें। उनके ब्रहमास्त्र को झेलने वाला पानी तक न मांगता।

अक्सर देखा है, वैलेंटाइन डे के आस-पास लाठी के वीरों की सक्रियता सड़कों-चौराहों, पार्कों-रेस्त्रां, स्कूल-कॉलेजों में खासा बढ़ जाती है। लाठी थामे तैयार रहते हैं देश की सभ्यता-संस्कृति से खिलवाड़ करने वाले तत्वों से निपटने के लिए। उनमें कुछ वीर ऐसे भी होते हैं, जो वैलेंटाइन-समर्थकों को सरेआम मुर्गा बनाने में पीछे नहीं हटते। दो मिनट में इश्क-प्यार-मोहब्बत का भूत उतारने का माआदा रखते हैं। मजाल है, कोई उनकी प्यारी संस्कृति का अपमान कर जाए।

इसीलिए तो मैं वैलेंटाइन वाले दिन घर से ही नहीं निकलता। घर में रहकर ही अपनी पत्नी संग वैलेंटाइन डे मनाने की कोशिश करता हूं। हालांकि पत्नी ‘जिद्द’ यही रहती है कि हम वैलेंटाइन बाहर कहीं रेस्त्रां-पार्क में बैठकर ‘सेलिब्रेट’ करें। कुछ तुम अपने दिल की, कुछ मैं अपने दिल की कहूं। यों, कहने-सुनने में ही पूरा दिन तमाम हो जाए। मगर मैं पत्नी को साफ मना कर देता हूं कि नहीं, वैलेंटाइन बाहर नहीं केवल घर में ही मनेगा। क्योंकि मुझमें अभी इत्ता ‘साहस’ नहीं आ पाया है कि मैं सरेआम लाठी के वीरों से लड़-भिड़ सकूं। इसी मसले पर हम पति-पत्नी के बीच बहस चलती रहती है और वैलेंटाइन डे ‘हंगामा डे’ सरीखा बन जाता है।

कोई नहीं। मुझे अपने वैलेंटाइन डे का हंगामा डे बनने का अफसोस नहीं। कम से कम ‘पीठ’ और ‘खोपड़ी’ तो ‘सुरक्षित’ हैं। वैलेंटाइन का क्या है, कभी भी मना लो। पर उस खास दिन बाहर जाने से बचो।

अच्छा, हमारे लाठी के वीर भी खूब हैं। इन्हें अपनी कथित सभ्यता-संस्कृति की याद ठीक वैलेंटाइन डे वाले दिन ही आती है। इस दिन उनका सांस्कृतिक प्रेम इत्ता जागता है इत्ता जागता है कि वैलेंटाइन डे को उन्होंने ‘मातृ-पितृ दिवस’ ही घोषित कर डाला है। प्रेम दोनों ही जगह कॉमन है बस प्रतिबिम्ब बदले हुए हैं। लाठी के वीरों को यह कौन समझाए कि यार, डंडे के दम पर अगर प्रेम को रोका जा सकता तो यहां न हीर-रांझा हुए होते, न शीरीं-फरहाद, न रोमियो-जूलियट, न राधा-कृष्ण। पर लाठियां कहां प्रेम की परिभाषाओं को समझ पाई हैं।

जब से हमारा दखल ‘सोशल नेटवर्किंग’ के बीच बढ़ा है, तब से हम हर दिवस-त्यौहार को ऑन-लाइन या डिजिटली मनाना अधिक पसंद करने लगे हैं। वैलेंटाइन के दीवानों ने भी अब इसी रास्ते को चुन लिया है। वे अब पार्कों या रेस्त्रां आदि में अपने प्यार का इजहार करने के बजाय सीधा वाट्सएप करते हैं। चिट्ठी-पत्री, ग्रिटिंग-कार्ड के जमाने अब हवा हुए। न इधर-उधर मिलने का झंझट न खुलेआम वीरों की लाठियां खाने का रगड़ा। सिंपल वाट्सएप पर प्रपोज करो। उत्तर आया तो सही, नहीं तो कोई और देखेंगे। इश्क अब ‘इंसटेंट-कॉफी’ की तरह हो लिया है। तुरंत तैयार। तुरंत खत्म।

ऑन-लाइन या डिजिटल इश्क पर तो लाठी के वीर पहरे नहीं बैठा सकते न। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हर पल जाने कित्ती प्रेम कहानियां चलती और खत्म होती रहती हैं। कोई हिसाब नहीं।

दूसरों को सभ्यता-संस्कृति की नसीहतें देने वाले लाठी के वीर खुद कौन-सा दूध के धुले टाइप होते हैं। बल्कि वैलेंटाइन-समर्थकों से कहीं ज्यादा रंगीन-तबियत होते हैं। हां, यह बात और है कि वे मुंह में राम, बगल में छुरी रखें पर भीतर की बातें कहां छुपती हैं भला।

इश्क चीज ही ऐसी है प्यारे कि दिल मचले बिना मानता ही नहीं। हर तमन्ना का रास्ता दिल से होकर ही गुजरता है। लाठीबाज भी अपने दिल के हाथों मजबूर रहते हैं। इस हकीकत को वे स्वीकार करें या न करें किंतु ‘अंतिम सत्य’ यही है।

चलिए। खैर। लाठी के वीर कोशिशें कित्ती ही कर लें पर वैलेंटाइन की कशिश को प्रेमियों के दिलों से जुदा कभी न कर पाएंगे। लाठियां थक जाएंगी मगर इश्क की दास्तानें कभी खत्म न होंगी।

हैप्पी वैलेंटाइन डे।

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