गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

सेंसेक्स को बजट समझ आ गया

मुझे कभी इस बात की चिंता नहीं रही कि बजट मुझे समझ आया कि नहीं। बजट दरअसल चीज ही ऐसी है, जो समझ में तो किसी के नहीं आता फिर भी लोग पब्लिक में जतलाते ऐसे हैं कि वित्तमंत्री के बाद अगर बजट किसी को समझ आया तो वे ही हैं। किंतु मैं ऐसा ‘शो-ऑफ’ करना पसंद नहीं करता। मेरा बजट से उत्ता ही नाता रहता है, जित्ता नमक का पानी से। केवल मोटी-मोटी बातें ही दिमाग में रखता हूं बाकी किनारे कर देता हूं। यों भी, बजट को समझकर या ना-समझकर कौन-सा मुझे वित्तमंत्रालय में नौकरी मिल जानी है।

हां, मुझे इस बात की घणी प्रसन्नता है कि सेंसेक्स को पूरा बजट समझ आ गया। खुशी के मारे ऐसा झूमा, ऐसा झूमा कि चार सौ अंकों के पार निकल गया। मंदड़ियों को एक ही झटके में चारों खाने चित्त कर डाला। बेचारे न घर के रहे, न घाट के। अक्सर देखा यही है कि बजट के दौरान सबसे अधिक कूदा-फांदी मंदड़िए ही किया करते हैं। पूरा जोर इनका इस बात पर रहता है कि सेंसेक्स बजट को न समझ पाए और घड़ाम से गिरा जाए। अपने चहाने वालों को डूबा जाए। स्टॉक मार्केट में अंधेरा छा जाए। बाजार मंदी की गर्त में चला जाए। बहुत, बहुत ही शातिर होते हैं स्टॉक मार्केट के मंदड़िए।

लेकिन कुछ भी कहिए, इस दफा सेंसेक्स ने न केवल मेरी बल्कि वित्तमंत्री के साथ-साथ इकोनॉमी की भी इज्जत रख ली। सरपट-सरपट ऐसा दौड़ा कि पीछे मुड़कर ही नहीं देखा। आखिरकार, बुल ने बियर के गले में घंटी बांध ही दी।

अब तो यह भी सुनाई में आने लगा है कि आगे आने वाले महीने सेंसेक्स की बढ़ोत्तरी के ही हैं। होने चाहिए भी। बेचारा एक तरफा गिर-गिरकर दुबला भी तो कित्ता हो गया था। बजट ने सेंसेक्स की सेहत में फिर से एक नई स्फूर्ति पैदा कर दी है। बहुत मुश्किल है मंदड़ियों के हाथ अब सेंसेक्स की लगाम आ पाना। सेंसेक्स तो छुट्टा सांड है, एक दफा जिस रास्ते पर दौड़ गया फिर इत्ती आसानी से वापस नहीं लौटता।

नोटबंदी के बाद वित्तमंत्री ने बजट में जो गुलाबी राहत दी, उससे आम आदमी के साथ-साथ सेंसेक्स भी खासा सुकून में है। इस गुलाबी राहत का आंकलन अर्थशास्त्री या विपक्ष अपने हिसाब से चाहे जैसा करे, उससे कोई फरक पड़ने वाला नहीं। इतिहास गवाह है, विपक्ष को बजट न पहले कभी समझ आया न अब समझ आएगा। प्रत्येक विपक्षी को बजट किसान, गरीब, दलित विरोधी ही नजर आता है। उनके कथन पर अपना दिमाग काहे खोटी करना।

इकोनॉमी को बूस्ट सेंसेक्स के दम पर ही मिलता है। सेंसेक्स की चाल मस्त रहती है तो बाजार में भी खुशियों का आलम बना रहता है। अपना सेंसेक्स तो हमेशा से ही इकोनॉमी को मजबूत करने के पक्ष में रहा है मगर कुछ मंदड़िए टाइप लोग पीछे से उसकी टांग खींच लेते हैं तो बेचारा घड़ाम हो लेता है। वरना, सेंसेक्स हर आमो-खास का हितैषी है। इस बजट में बढ़कर उसने अपनी बात को सिद्ध किया भी।

बाकी जिन्हें बजट, इकोनॉमी और सेंसेक्स को लेकर निगेटिव मिस्ट-कॉट करनी हैं, खूब तबीयत से करें। इससे फरक न कोई इकोनॉमी पर पड़ना है, न सेंसेक्स पर। सेंसेक्स के अच्छे दिन आ चुके हैं। अब उसे आगे की तरफ दौड़ते जाना है। अजी, इकोनॉमी को गुलाबी रंग देने का पूरा दारोमदार जो है उस पर।

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