रविवार, 29 जनवरी 2017

कौन डरता है बजट से

हालांकि मैं कॉमर्स का स्टूडेंट जरूर रहा लेकिन मुझे न कभी कॉमर्स पल्ले पड़ी, न अर्थशास्त्र, न ही बजट। कॉमर्स का इस्तेमाल मैंने केवल पास हो जाने भर के लिए ही किया। इसमें न कभी गंभीरता दिखाई, न दिलचस्पी। वो क्या है, मेरी कोशिश हमेशा से अपनी अक्ल को पढ़ाई के बोझ से मुक्त करने में ही रही। सो, उत्ती पढ़ाई की जित्ती से खाने-कमाने भर का काम चल जाए। जो अधिक पढ़ लिए उन्हें उनकी पढ़ाई बहुत-बहुत मुबारक। मैं कम पढ़ा-लिखा होने में ही मस्त हूं।
ठीक ऐसी ही स्थिति मेरे तईं बजट की रही है। सच बोलूं, बजट की महिमा आज तलक मुझे कभी समझ नहीं आई। घंटे-दो घंटे खड़े होकर वित्तमंत्रीजी क्या कह-बोल जाते हैं, जोर देने के बाद भी मेरी खोपड़ी में नहीं घुस पाता। मेरे तईं बजट की सीधी-सी परिभाषा है- जो बढ़ गया, जो घट गया, जो चुनावी झुनझुना बन गया बस यही बजट है। आम जनता का बजट से लेना-देना कित्ता है, कित्ता नहीं; ये सब अर्थशास्त्री टाइप ज्ञानी जानें। मगर हां इसमें ज्यादातर हित कॉरपोरेट घराने वालों के ही निहित होते हैं।
आपने देखा भी होगा, बजट पर सबसे पहले प्रतिक्रिया कॉरपोरेट तंत्र वालों की ही आती है। वो ही सबसे पहले जुटते हैं अपने-अपने जोड़-घटाने में। एक बेचारा सेंसेक्स है, जो बजट वाले दिन खामखां ही बलि का बकरा बन जाता है। बजट मन-मुताबिक आता है तो झुम पड़ता है। नहीं तो अपने चाहने वालों को ऐसी धोबी पछाड़ देता है कि बेचारों के सालों-साल अपने पिछवाड़ों को सहलाने में ही निकल जाते हैं। मतलब- करे कोई, भरे कोई।
बजट आने के बाद मुझ जैसे लेखक के घर का सीन (बाकियों का मुझे नहीं मालूम) यथावत रहता है। न दिमाग पर किसी खरचे के बढ़ने का लोड, न घटने की खुशी। एकदम नॉरमल टाइप। मुझे पता है, मैंने अपने घर का बजट ‘वित्तमंत्री’ के कहने से नहीं, अपनी ‘होम-मंत्री’ के कहने से बनाना है। कहां कित्ता खरच करना है। किसे कित्ता देना है। अपनी पॉकेट में कित्ता रखना है। बच्चों, नाते-रिश्तेदारों, कपड़ों-लत्तों, किचन आदि-इत्यादि के साथ कैसा फाइनेंशियल व्यवहार रखना है; सारा दरोमदार होम-मंत्री पर ही रहता है। तो प्यारे, बजट चाहे ‘करेला’ टाइप आए या ‘मलाईदार’ अपनी सेहत पर कोई फरक न पड़ना।
अच्छा, मैंने तमाम ऐसे लोग देखे हैं जो बजट आने के हफ्ते-दस दिन तक इत्ता टेंशन में रहते हैं मानो उनके बोर्ड एग्जाम का रिजल्ट आया हो। जाने क्या-क्या खुरपेच बजट के भीतर-बाहर करते रहते हैं। टीवी चैनलों पर रात-दिन लंबी-लंबी बहसें चलती रहती हैं। गुलाबी अखबार पढ़ने वाले- भले ही अपने घर का बजट सेट न कर पाते हों- हमें ज्ञान ऐसे देते हैं मानो हमारे गुरु हों। खासकर, अर्थशास्त्रियों की तो बाछें ही खिल जाती हैं। बजट बेला में ऐसा प्रतीत होता है मानो ईश्वर ने आज के दिन उनके दिमाग में अतिरिक्त ज्ञान फिट कर दिया हो। तब तो मोहल्ले का छोटा-मोटा अर्थशास्त्री भी खुद को ऐसे प्रोजेक्ट करता है जैसे अगला बजट का ज्योतिषी हो।
किंतु बजट के इस शोर-शराबे से मैं खुद दूर और मुक्त ही रखता हूं। क्योंकि जिस गली जाना नहीं, वहां की कन्या से भला क्या दिल लगाना। मूड को लाइट रखिए। चाहे बजट आए या शेर; आपकी बला से। बजट के जोड़-घटाने में खोपड़ी खपाके भला कौन-सी वित्तमंत्रालय में नौकरी मिल जानी है। मेरे घर का बजट (बजट आने से पहले और आने के बाद) एकदम टनाटन रहता है।
हां, वित्तमंत्री महोदय से अपनी इत्ती गुजारिश अवश्य है कि कभी समय निकालकर बजट में हम लेखकों पर भी कुछ ध्यान दे लें। बजट में कुछ ‘लाभकारी गणित’ हम लेखकों के लिए भी सेट करें। अखबारों-पत्रिकाओं को निर्देश दें, लेखकों को पारिश्रमिक बढ़ाकर दिया करें। आखिर हम लेखक अपनी-अपनी कीमती खोपड़ी खरच करते हैं, लेख आदि को लिखने में। मुफत की दुकानदारी अब हमने न होने वाली। बाकी आप वित्तमंत्री हैं जैसा उचित लगे, करें।
तो प्यारे, बजट एक ‘तिलिस्मी तहखाना’ है, इसके आजू-बाजू जाने से बचें। अपनी खोपड़ी की ऊर्जा को बचाकर रखें। अगर सब बजट के लाभ-हानि जानने-समझने में खरच कर दी, तो आगे रिचार्ज कराने में घणी मुसीबत आ सकती है। शेष आपकी मर्जी।

कोई टिप्पणी नहीं: