मंगलवार, 24 जनवरी 2017

दिलचस्प चुनावी घोषणापत्र

चुनावी घोषणपत्रों को भले ही आप-हम ‘जुमलेबाजी की किताब’ मानें लेकिन ये होते बड़े ‘दिलचस्प’ हैं। घोषणपत्रों का हिसाब ‘जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि’ टाइप होता है। राजनीतिक दल जित्ते किस्म के वायदे जनता से कर सकते हैं; सब के सब घोषणापत्रों में घुसेड़ देते हैं। साथ-साथ उनके बीच यह हिरस भी रहती है कि उसका घोषणापत्र मेरे घोषणापत्र से ‘उजला’ कैसे?

अगर एक ही दल के पिछले घोषणापत्रों से वर्तमान घोषणापत्र को मिलाया जाए तो उनमें तारीख और साल के अतिरिक्त खास कुछ बदला हुआ नहीं मिलेगा। लगभग सारे वायदे एक जैसे रहते हैं। वो पांच साल पहले भी गरीब और गरीबी को दूर कर रहे थे, आगे भी करेंगे। वो पांच साल पहले भी बेरोजगारों को रोजगार दिलवा रहे थे, आगे भी दिलवाएंगे। वो पांच साल पहले भी गांव-देहातों में बिजली-पानी ला रहे थे, आगे भी लाएंगे। वो पांच साल भी सड़कें-पुल-हस्पताल बनवा रहे थे, आगे भी बनवाएंगे। वो पांच साल पहले भी आरक्षण के हमदर्द थे, आगे भी रहेंगे। वो साल पहले भी महिलाओं को सुरक्षा दे रहे थे, आगे भी देते रहेंगे। वो पांच साल पहले भी शिक्षा पर फोकसड थे, आगे भी रहेंगे। वो पांच साल पहले भी जाति-धर्म से ऊपर उठने को कह रहे थे, आगे भी उठते रहेंगे। आदि-आदि।

हां, इधर घोषणापत्रों में ‘डिजिटल’ शब्द और जुड़ गया है। अब लगभग सारे राजनीतिक दल जनता को ‘डिजिटल-क्रांति’ में ले आना चाहते हैं। हर एक की जेब में ‘ई-वॉलेट’ वाला ‘स्मार्ट-फोन’ हो। हर कोई डेबिट-क्रेडिट कार्ड धारक हो। हर कोई पेमेंट एप यूज करता हो। घर में ‘दाल’ चाहे गले न गले किंतु लैपटॉप और स्मार्टफोन जरूर मिलना चाहिए। इधर जब से चीजों को ‘मुफ्त’ बांटने का रिवाज चला है, संभव है, आगे भी डिजिटल टाइप चीजें मुफ्त ही बांटी जाएंगी।

हालांकि राजनीतिक दल ऐसा कहते जरूर हैं कि इस बार का घोषणापत्र हमने बड़ी मेहनत से तैयार किया है। हर वर्ग, हर मुद्दे का खूब ध्यान रखा है। यकीन मानिए, अगर हमारी सरकार बनती है तो घोषणापत्र में दर्ज प्रत्येक वायदों को हर कीमत पर निभाया जाएगा। जनता भी भोली-भाली है। मान जाती है। एक मौका और दे देती है। लेकिन चुनावी वायदे तो चुनावी ही होते हैं। अपने ‘अच्छे दिनों’ का जनता इंतजार करती रह जाती है मगर अच्छे दिन आ नेता और पार्टी के जाते हैं।

जुमलेबाजियों में यों ही साल-दर-साल निकलते चले जाते हैं। सरकारें आती हैं। चली जाती हैं। घोषणापत्रों में दर्ज वायदे हर बार ‘चमकीला आवरण’ धारण किए होते हैं। नेता लोग जब अपने आपस में किए वायदों को पूरा नहीं कर पाते तो घोषणापत्रों के वायदों को क्या खाक पूरा करेंगे। इत्ते पर भी घोषणापत्रों को पढ़ने में आता बड़ा मजा है। ये एक प्रकार से ‘दिलचस्प उपन्यास’ टाइप होते हैं। कि पढ़ते जाओ, पढ़ते जाओ पर मन न भरे।

कभी-कभी तो मेरा दिल भी करता है इस लेखन-वेखन को छोड़ पार्टियों के घोषणापत्रों को लिखने का काम ले लूं। इन्हें बनाने में दिमाग तो नहीं खपाना पड़ेगा। एक सेट फॉरमेट में बस कुछ नए जुमलों (आइ मीन वायदों) को चिपकाना भर होता है। और हो गया घोषणापत्र तैयार। फिर बड़ी पार्टी से जुड़े रहने का रूतबा ही अलग है। यहां तो पूरी जिंदगी कलम तोड़के भी कुछ खास हासिल न होना। घर-बिरादरी में ‘शान’ अलग होगी कि अगला फलां-फलां पॉलीटिकल पार्टी का घोषणापत्र सेट करता है।

काश! ये चुनावी बेला हर साल आया करे, इस बहाने पार्टियों के ‘दिलचस्प घोषणापत्र’ तो पढ़ने को मिल जाया करेंगे।

2 टिप्‍पणियां:

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन - राष्ट्रीय मतदाता दिवस और राष्ट्रपति का सन्देश में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

इनकी मोटी खाल पर किसी चीज़ का भी असर नहीं होता