रविवार, 22 जनवरी 2017

चुनावी दंगल में मनोरंजन का तड़का

दौरे-गुजिश्ता में चुनाव ‘लोकतंत्र का उत्सव’ सरीखे हुआ करते थे, लेकिन अब ‘दंगल’ सरीखे हैं। इस दंगल में एक से बढ़कर एक तगड़ा पहलवान अपने ‘पहलवानी दांव-पेच’ के साथ तैयार रहता है, विरोधी को ‘धोबी-पछाड़’ देने के लिए। चुनावी-दंगल के बीच सिर्फ ‘जीत’ या ‘हार’ ही मायने रखती है, बाकी कुछ और नहीं। यानी, ‘जो जीता वही सिंकदर’।

चुनावों के दौरान राजनीति बड़े ‘दिलचस्प’ मोड़ पर आ जाती है। किसी नेता का कोई भरोसा नहीं रहता कि वो कब ‘बेपेंदी के लोटे’ की तरह किस पार्टी में लुढ़क लेगा। हालांकि राजनीति में नेताओं की इस पार्टी से उस पार्टी में लुढ़का-लुढ़काई आजीवन चलती रहती है मगर चुनावों के वक्त खासा बढ़ जाती है। जो नेता अभी अपनी पार्टी की ‘बढ़ाई’ कर रहा था, हो सकता है, अगले ही पल वो किसी दूसरी पार्टी में जाकर अपनी पूर्व पार्टी की ‘बुराई’ करने लग जाए। ‘लव’ और ‘वार’ की तरह राजनीति में भी सबकुछ ‘जायज’ होता है। यहां कोई किसी का ‘सगा-संबंधी’ नहीं होता। न बाप, न बेटा, न चाचा, न मामा, न फूफा, न मौसा, न दोस्त, न अंकल, न अंटी, न भाभी, न मौसी, न ताई। सारा का सारा खेल राजनीति, राजनीति और राजनीति की बिसात पर मोहरे यहां-वहां बैठने-बैठाने का ही चलता रहता है।

अच्छा, चुनावी मौसम में ये दंगल अगर न हो तो सबकुछ फीका-फीका टाइप लगे। ऐसे चुनाव भी भला किस काम के कि बिना शोर-शराबा हुए, बिना आया राम, गया राम हुए, बिना धन-बल की जोर-आजमाइश हुए संपन्न हो गए। अरे, ‘दंगल’ फिल्म में तो आपको सिर्फ दो-ढाई घंटे का ही ‘एंटरटेनमेंट’ देखने को मिला होगा, चुनावी राजनीति में तो 24x7 एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट ही है।

खैर, मैं ऐसा कतई नहीं मान सकता कि देश के नेताओं को अपनी जनता की फिकर नहीं रहती। अगर फिकर नहीं रही होती तो वे न राजनीति में आते न चुनाव लड़ते। अरे, नेता लोग तो दिन के चौबीस में से तेईस घंटे जनता के वास्ते ही जीते-मरते हैं! चुनाव के दौरान तो सबसे अधिक ‘चिंता’ उन्हें जनता के सामाजिक एवं आर्थिक स्तर में सुधार की रहती है! अगर चिंता नहीं रही होती तो क्या प्रधानमंत्रीजी पूरे पचास दिन देश को लाइनों में खड़ा करवाते? फिर भी, कहने वालों के मुंह पर टेप तो नहीं चिपका सकते न। आखिर हम एक लोकतांत्रिक देश हैं। लोकतांत्रिक देश में चुनावी सभाओं में नेताओं द्वारा कुछ-कुछ ‘जुमलेबाजियां’ तो होती ही हैं। ये न हों तो जनता उनके प्रति ‘आकर्षित’ कैसे होगी? दरअसल, किस्म-किस्म की चुनावी जुमलेबाजियां ही नेताओं को राजनीति और जनता के बीच सालों-साल टिकाए रखा करती हैं। वैसे, एक खरी बात बोलूं- राजनीति में ईमानदारी भी एक प्रकार की जुमलेबाजी ही है। क्या समझे...।

ऐसा देखकर लगता तो नहीं कि नोटबंदी की मार चुनावी दंगल के बीच ‘खलनायक’ टाइप साबित होगी। चुनावों में दो ही चीजें हमेशा खास होती हैं; एक- नोट और दूसरा- ज़बान। हमारे नेताओं कने दोनों की ही कोई कमी नहीं। हां, थोड़ा-बहुत नोट पर जरूर लगाम लग जाए पर ज़बान टनाटन चलती रहेगी। चुनावी दंगल में असली खेल तो ज़बान का ही है। नेता की जबान जित्ती लंबी होगी, खेल में मजा भी उत्ता ही आएगा।

एक-दूसरे से लड़ने-भिड़ने को तैयार बैठे नेता, उम्मीद है, ‘दंगल’ फिल्म से भी कहीं बेहतर हमारा ‘मनोरंजन’ कर पाएंगे। जो पार्टी चुनावों में और जनता के बीच ‘धांसू’ टाइप ‘गणित’ बैठा लेगी, बाजी मार ले जाएगी। बाकी जिन्हें चुनावी दंगल का विश्लेषण करना है अपने हिसाब-किताब से करें। अपन तो फिलहाल इस ‘दंगल’ का लुत्फ उठाने में मस्त हैं।

1 टिप्पणी:

विकास नैनवाल ने कहा…

सटीक चिकोटी काटी है।