गुरुवार, 19 जनवरी 2017

मार्केट और किताबें

पुस्तक मेला- खासकर लेखकों के- बड़े काम का होता है। उनके बीच यह ‘पिकनिक स्पॉट’ की भूमिका निभाता है। जहां किस्म-किस्म के लेखक एक-दूसरे से मिलते-जुलते हैं। अपनी किताबों की ‘मार्केटिंग’ करते हैं। किताबों का विमोचन करवाते हैं। किताबों पर चर्चा-बहस, विवाद-संवाद होता है। इसी मेले में लेखक अपने पाठकों से और पाठक अपने लेखकों से सीधा इन्टरेक्ट कर पाते हैं। जिन लेखकों की किताबें पुस्तक मेला में बुक-स्टॉल पर सज-धजकर बिकने के लिए तैयार रहती हैं, उनका दिल अंदर से खासा प्रफुल्लित रहता है। जाहिर-सी बात है, किताब बिकेगी तो कमाई होगी। कमाई से रॉयल्टी आएगी। रॉयल्टी से आगे के खर्चे निपटाए जाएंगे।

आत्म-संतुष्टि के तईं सिर्फ किताब का लिखना ही जरूरी नहीं, उसका मार्केट में आना और बिकना भी उत्ता ही जरूरी है। किताब जब तक बिकेगी नहीं तब तक न लेखक को लिखने में और न प्रकाशक को छापने में ही मजा आएगा। अपनी गांठ से पैसा खर्च कर पाठक भी थोड़ा जिम्मेदारी लेगा उसे पढ़ने की। किताब का पढ़ा जाना अत्यंत जरूरी है। वरना फिर किस काम की किताब और किस काम के लेखक-प्रकाशक।
आजकल जमाना ‘प्योर मार्केटिंग’ का है। मार्केट में हर चीज केवल मार्केटिंग के दम पर ही बिक और टिक पाती है। जहां मार्केटिंग के टेक्ट्स कमजोर होते हैं, वहां चीजें खुद-ब-खुद चलन से बाहर हो लेती हैं। ठीक ऐसा ही सीन किताबों का है। पुस्तक मेला का मुख्य उद्देश्य किताबों की सेल और मार्केटिंग से ही जुड़ा होता है। इत्ते बड़े मैदान में, इत्ते लेखक-प्रकाशक, इत्ती किताबों के साथ कोई पानी-पूरी खाने या कोल-ड्रिंक पीने नहीं आते, उनका ऐम किताबों की मार्केटिंग और सेल से ही जुड़ा होता है। सही भी है, लेखक को स्थापति करने में पाठक के साथ-साथ मार्केट भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

अगर आपके माल में दम है तो पाठक न केवल हंसकर बल्कि उल्टे पांव चलकर आपकी किताब खरीदने बुक-स्टॉल पर आएगा। समाज और पाठक वर्ग के बीच लेखक की महत्ता उसकी किताब की बिक्री से ही तय होती है। वो जमाने अब लद गए कि लेखक किताबों पर किताबें लिख-लिखकर अपना घर भरे जा रहा है। दिलों के साथ अब लोगों के घर भी बेहद संकुचित हो लिए हैं। दो-चार व्यक्तियों से ज्यादा की जगह बच ही नहीं पाती रहने को।

वैसे, कोई माने या न माने- अंगरेजी के मुकाबले हिंदी का लेखक अपनी किताब की मार्केटिंग के प्रति थोड़ा ‘पिछड़ा’ टाइप रहता है। जित्ती तेजी से अंगरेजी का लेखक मार्केट को कब्जा लेता है, उत्ता हिंदी का लेखक नहीं कर पाता। हां, हिंदी लेखन में लेखकों की जो यंग जनरेशन आ रही है, उसने जरूर अपने वास्ते मार्केट में जगह बनाई है। खासकर, वे अब लिख ही मार्केट के हिसाब से रहे हैं।

अपना तो साफ मानना है कि लेखक को अगर समाज और पाठक के मध्य टिके रहना है तो उसे मार्केट के अनुरूप अपने लेखन ढालना ही होगा। वक्त की डिमांड यही है।

इसीलिए लेखकों के लिए पुस्तक मेला जरूरी है ताकि वे अपनी किताबों का प्रचार-प्रसार कर सकें। अपनी किताब की मार्केटिंग में क्या हर्ज, कैसी शर्म? यों भी, सोशल मीडिया ने लेखकों और पाठकों को मार्केट के बहुत करीब ला दिया है।

यह पुस्तक मेला तो फिर भी साल में एक बार लगता है जबकि ऑन-लाइन मेला तो चलता ही रहता है। ऑन-लाइन मेले से आप किसी भी लेखक की किताब अच्छे-खासे डिस्काउंट के साथ घर बैठे मांगवा सकते हैं। साथ-साथ किंडल या ई-बुक पर पढ़ भी सकते हैं। वाकई लेखन, लेखक और पढ़ने-पढ़ाने, लिखने-लिखाने की दुनिया एकदम बदल चुकी है। अब यह निर्भर हम पर है कि हम उसके हिसाब से खुद को कित्ता बदल पाते हैं।

किताबों का मेला यों ही चलता रहेगा। लेखकगण आपस में मिलते-जुलते रहेंगे। वाद-संवाद होते रहेंगे। किताबें बेची-खरीदी जाती रहेंगी। लेखक इस दुनिया को अपनी निगाह से देख यों ही लिखता रहेगा। मार्केट में धूम मचाए रहेगा।

1 टिप्पणी:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "टूटी सड़क के सबक - ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !