शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

गांधी, चरखा, खादी और कैलेंडर

यकायक गांधी का चरखा, खादी और कैलेंडर तीनों ही खासी चर्चा में आ गए हैं। मुझे नहीं मालूम इन तीन मुद्दों पर जमीन पर कहीं कोई बहस या चर्चा हो रही है या नहीं लेकिन फेसबुक पर लोग आपस में गुथम-गुथा हैं। जैसाकि होता आया है, परस्पर दो धड़े बना लिए गए हैं। एक गांधी का पक्षधर है तो दूसरा विरोधी। दोनों तरफ से लंबी-लंबी छोड़ी जा रही है। बहस-चर्चा के बीच में- बहाने-बे-बहाने- गोडसे भी आ जाया करता है। फिर तो देश-प्रेम या राष्ट्रभक्ति के क्या कहने। कुछ गोडसे का नाम भर सुन भीतर तलक सुलगे जा रहे हैं तो कुछ खुद को जस्टिफाई करने में मद-मस्त हैं।

लगे हाथ, खबरिया चैनलस भी बहती गंगा में मुंह-हाथ धोने निकल पड़े हैं। गांधी के चरखे और कैलेंडर को खूब समय दिया जा रहा है। बहस के वास्ते एकाध दलों के नेताओं और जाने-माने बुद्धिजीवियों को भी बैठा लिया गया है ताकि कुछ दिनों के लिए मुद्दा हवा में यों ही तैरता रहे। हालांकि बहस में गंभीरता जैसा कुछ नहीं है लेकिन विरोध-विरोध खेलने या ज़बान हिलाने में किसी का क्या जाता है।

वैसे, इन सब कथित गांधी-प्रेमियों या विरोधियों से अगर पूछकर देखा जाए कि आप स्वयं गांधी या गांधीवाद को कित्ता अपने जीवन-आचरण में उतारे हुए हैं या चरखे से आजकल क्या कात रहे हैं या खादी के कित्ते कपड़े आपके कने हैं, तो गारंटी है, सब के सब अपनी चिकनी बगलें झांकने लग जाएंगे। गांधी के कैलेंडर पर प्रधानमंत्री की तस्वीर होने का दुखड़ा रोया जा रहा है, उसमें गांधी के क्या-क्या संदेश टंगे हैं, गारंटी है, बतला नहीं पाएंगे। लेकिन विरोध करना है तो करना है। जित्ता एरोगेंटली विरोध की तलवारें फेसबुक पर भांजी जा सकती हैं, शायद कहीं और नहीं।

अच्छा, क्या हुआ जो प्रधानमंत्री ने गांधी का चरखा चला लिया? चरखे पर गांधी का कॉपीराइट है क्या? चरखा तो कोई भी चला सकता है। चाहे प्रधानमंत्री हो या मुख्यमंत्री। या फिर अमेरिका का राष्ट्रपति हो या जापान का प्रधानमंत्री। या फिर आम नागरिक ही क्यों न हो। ऐसे ही कैलेंडर का भी है। अमां, कैलेंडर पर तो हर महीने, हर साल तारीखें-तस्वीरें बदलती रहती हैं। तो क्या उन्हें भी नहीं बदलना चाहिए? चूंकि फेसबुक पर- किसी न किसी बहाने- हंगामा खड़ा करना ही जब विशेष मकसद हो तो फिर कोई क्या कर लेगा?

दुनिया और तकनीक में इत्ता बदलाव आने के बाद भी हम रहे ढपोरशंखी के ढपोरशंखी ही। दाढ़ी में जरा-सा सफेद बाल दिखा नहीं कि लगे चिंता जतलाने। अमां, जरा ठंडे दिमाग से सोचकर देखो-उम्र के साथ क्या दाढ़ी के बाल सफेद न होंगे?

आलम यह है कि फेसबुक से लेकर बुद्धिजीवियों के बौद्धिक गलियारों तक गांधी-गांधी तो सब करते रहते हैं किंतु गांधी होना कोई नहीं चाहता। न कोई गांधी की सादगी को अपनाना चाहता है न लाठी थामना चाहता है न एक वस्त्र में जिंदगी गुजारना चाहता है न चरखा चलाना चाहता पर गांधी भक्त सभी हैं। क्या गजब मजाक है।

किया भी क्या जा सकता है, जब हमें मजा ही प्रतीकों के साथ हिलगे रहने में आता है। पता नहीं हम गांधी, चरखा, खादी, कैलेंडर से आगे क्यों बढ़ना नहीं चाहते? अरे, होशियारी तो यह होनी चाहिए कि गांधी ने जहां छोड़ा था, वहां से हम शुरू कर आगे तलक ले जाएं। लेकिन यहां तो भक्तगण प्रतीकों के इर्द-गर्द चक्कर काटने को ही सबसे बड़ा सुख समझते हैं। बहुत हुआ तो फेसबुक पर तीखी बहस-चर्चा कर इतिश्री कर ली। हो गई खानापूर्ति।

तो जनाब यों ही फंसे रहिए बोसीदा टाइप बहसों-चर्चेओं में। फिर दोष फेसबुक को क्यों देते हैं कि यहां सिवाय भाषाई दंगल से कुछ नहीं चलता।

2 टिप्‍पणियां:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "ब्लॉग बुलेटिन - ये है दिल्ली मेरी जान “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

गिरिजा कुलश्रेष्ठ ने कहा…

मुद्दा चाहे जो भी हो , बस हम तो सिर्फ विरोध करेंगे....