गुरुवार, 12 जनवरी 2017

फेसबुक और कविता

मेरे एक कवि मित्र हैं। फेसबुक पर अपना अकाउंट रखते हैं। मित्र-सूची में पुरुषों से ज्यादा महिलाओं को रखना पसंद करते हैं। फेसबुक के स्टेटट पर कम ‘इन-बॉक्स’में ही अधिक नजर आते हैं। दिनभर में जित्ती कविताएं लिखते हैं, पढ़वाने के तईं इन-बॉक्स करते रहते हैं। चूंकि मैं कविताएं कम ही पढ़ता हूं इस नाते उन्हें मुझसे अधिक ‘शिकायत’रहती है। फेसबुक की दुनिया के बाहर जब भी मिलाते हैं बस एक ही शिकायत करते हैं- ‘क्या आपको मेरी लिखीं कविताएं पसंद नहीं आतीं? इसीलिए आप उत्तर नहीं देते, है न?‘ मेरा भी जवाब हर बार की तरह एक ही रहता है- ‘नहीं.. नहीं.. हुजूर ऐसा कतई नहीं है। दरअसल, मेरे भेजा कविताओं की संवेदनशीलता आत्मसात नहीं कर पाता। इसीलिए मैं न केवल आपकी बल्कि किसी की भी कविताएं नहीं पढ़ता।‘कवि मित्र अपना-सा मुंह लेके बेहद बेरूखी के साथ विदा ले लेते हैं।

वैसे बताता चलूं, कवि मित्र काफी रसिक प्रवृति के भी हैं। अक्सर बताते रहते हैं कि उन्होंने फलां कविता जब फलां महिला मित्र के इन-बॉक्स में डाली तो वे उसे पढ़कर कित्ता खुश हुईं। उन्होंने ही एक दफा बताया था कि एक महिला मित्र ने उनकी कविताओं से प्रभावित होकर उन्हें कालिदास और मुक्तिबोध से भी बड़ा एवं आगे का कवि घोषित कर दिया था! यों भी, फेसबुक पर कविता लिखने वाला हर कवि खुद को मुक्तिबोध या शमशेर से नीचे का कवि तो कतई नहीं मानता।

कभी-कभी मुझे लगता है अगर फेसबुक न होता तो हमारे समय के कवि अपनी कविताओं के साथ क्या कर रहे होते? वो तो भला हो फेसबुक और उसमें स्थापित इन-बॉक्स का कि उसने हर फेसबुकिए को कवि का दर्जे सोशल मीडिया पर दिलवा दिया। फेसबुक पर जित्ती मात्रा में कवि हैं लगभग उत्ती ही मात्रा में कवित्रियां भी।

साथ-साथ शेरो-शायरी की महफिलें भी यहां खूब जमी करती हैं।

खैर। ऐसा नहीं है कि मेरे कवि मित्र ही मेरे इन-बॉक्स में घुसकर मुझे कविताएं पढ़वाने का शौक रखते हैं। ऐसे हर रोज कित्ते ही लिंक मुझे अपने इन-बॉक्स में चिपके हुए मिल जाते हैं, जहां कविताओं को पढ़ने की अपील की जाती है। एकाध हो तो चलो पढ़कर तारीफ कर भी दी जाए किंतु यहां तो नोट जमा करने वालों की तरह लाइन पे लाइप लगी रहती है। कई बड़े दिल वाले कवियों-कवित्रियां ने तो मुझे- मेरे द्वारा कविताएं न पढ़ने के लिए- ‘अ-मित्र’या ‘ब्लॉक’तक कर दिया है। हालांकि दिल तो नहीं करता उनका दिल दुखाने का पर क्या करूं कविता मुझसे पढ़ी ही नहीं जाती। जब भी कविता पढ़ने की कोशिश किया करता हूं दिलो-दिमाग में डरावने टाइप ख्याल आने लगते हैं। सो, बीच में ही पढ़ना छोड़ देता हूं।

लेकिन इत्ता स्पष्ट कर दूं कि न मैं कविता का विरोधी हूं न कवि का।

वैसे, एकाध दफा कविता लिखने की कोशिश फेसबुक पर मैं भी कर चुका हूं। मगर बात बनी नहीं। कविता लिखकर जब एक महिला मित्र को इन-बॉक्स की तो वे इत्ता भड़क उठीं, इत्ता भड़क उठीं बस फायर-बिग्रेड बुलाने भर की देरी रह गई थी। तमाम किस्म की माफियां मांगकर मैंने उन्हें ‘शांत’ किया। तब से कसम खा ली कि न फेसबुक पर, न कागज पर कभी कविता नहीं लिखूंगा।

फिर भी, फेसबुक पर कवियों एवं कविताओं का ‘ग्राफ’निरंतर बढ़ता ही जा चला रहा है। फेसबुक का ‘इन-बॉक्स’इसमें बेहद ‘क्रांतिकारी भूमिका’निभा रहा है। ज्यादातर प्रेम-कविताओं की जुगलबंदी इन्हीं इन-बॉक्सों में चला करती है। शायद इसीलिए फेसबुक, इन-बॉक्स और कविता एक-दूसरे के पूरक टाइप बन बैठे हैं। जिसे जरा भी लिखना आता हो वो कुछ नहीं तो फेसबुक पर कविता लिखकर ही अपने दिल के अरमान पूरे कर सकता है। कम से कम दिल में यह हसरत तो न रह जाएगी कि हाय! मैं कवि नहीं बन सका।

2 टिप्‍पणियां:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "प्रथम भारतीय अंतरिक्ष यात्री - राकेश शर्मा - ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

कविता का क्या -कोई लिख डाले .