बुधवार, 4 जनवरी 2017

दंगल के बीच फंसी साइकिल

पिता-पुत्र के बीच छिड़े ‘दंगल’ में बेचारी साइकिल की सत्या पिट गई है। साइकिल यह निर्णय नहीं ले पा रही कि किस रास्ते चले? जिस रास्ते साइकिल चलने की कोशिश किया करती है, कोई न कोई बंदा आके उसकी ‘हवा’ निकाल जाता है। निरंतर हवा निकाले जाते रहते, साइकिल के पहियों में इत्ते ‘छेद’ हो लिए हैं कि वो यह समझ ही नहीं पा रही कि सांस कहां से लें और कहां छोड़ें।

बीते पच्चीस सालों से साइकिल अथक इत्ते नेताओं का बोझ अकेले ढो रही थी। कहीं कोई परेशानी नहीं थी। आदत पड़ गई थी न उसे। नेताजी गद्दी पर बैठते थे तो बाकी नेता यहां-वहां लटके-अटके रहते थे। समाजवादी साइकिल ‘समाजवाद’ का परचम पूरे उत्तर प्रदेश में ‘ठसक’ के साथ लहरा रही थी। आखिर साइकिल तो साइकिल ही है। जैसे- इंसान एक उम्र के बाद ‘शिथिल’ पड़ने लगता है, वैसे ही स्थिति में साइकिल भी आ ली। कब तलक इत्ते बड़े-बड़े नेताओं का बोझा अकेले ढोती? धीरे-धीरे कर साइकिल ‘चरमराने’ लगी। तरह-तरह की आवाजें निकालने लगी। किंतु बड़े नेता लोगों ने न उसकी आवाज, न पीड़ा पर ध्यान दिया। सब के सब साइकिल पर यों लदे बैठे रहे मानो उनकी ‘बपौती’ हो।

फिर एक दिन ऐसा भी आया कि उसी साइकिल पर एक ‘युवा तुर्क’ आनकर बैठ गया। युवा तुर्क ने साइकिल पर बैठते ही धीरे-धीरे कर कथित वरिष्ठों को उतारना शुरू किया। जित्ते भी पिछल्लू साइकिल के दाएं-बाएं लटके-अटके पड़े थे सबको ‘तगड़ा ब्रेक’ मार एक साथ ‘लुढ़का’ डाला। हालांकि कथित वरिष्ठ युवा तुर्क से नाराज तो बहुत हुए पर शिकायत क्या करते? सो, सीधा नेताजी कने चले गए अपना दुखड़ा रोने। आलम यह है, इस वक्त नेताजी भी इस कंडिशन में नहीं कि उनका दुखड़ा सुन थोड़ी-बहुत सांत्वना दे सकें। क्योंकि उनकी खुद की साइकिल को युवा तुर्क ने सीधा टक्कर दे मार दी है। हाल-फिलहाल दोनों के बीच झगड़ा राजनीतिक सत्ता बचाने से कहीं बड़ा समाजवादी साइकिल के चिन्ह को हथियाना है।

उत्तर प्रदेश में पिता-पुत्र के मध्य चल रही ये नूरा-कुश्ती बेचारी साइकिल पर भारी पड़ती जा रही है। बेजबान साइकिल अपना दर्द भी तो किसी से बयां नहीं कर सकती सो भीतर ही भीतर जंग खाए जा रही है। कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा उसने कि एक दिन ऐसे विकट टाइप झगड़े भी देखने-झेलने को मिलेंगे। पार्टी में अब कोई भी ‘साइकिलवादी’ नहीं है या तो पितावादी हैं या फिर पुत्रवादी।

यों भी, पारिवारवादी पार्टियों के बीच राजनीतिक झगड़े इसी टाइप के हुआ करते हैं। पर हमें-आपको क्या? हमारा-आपका ‘इंटरटेंनमेंट’ तो ‘मुफत’ हो ही रहा है न। इस झगड़े में अपना दिल क्यों दुखाना? सत्ताएं भला कब जनता की परवाह किया करती हैं, जो हम-आप करें। दूर से बैठे-बैठे ड्रामा देखते रहिए। यहां तो हर रोज ड्रामे का रंग-ढंग बदल रहा है। कभी पिता पुत्र पर हावी तो कभी पुत्र पिता पर।

हां, थोड़ी चिंता साइकिल की जरूर है। उम्मीद है, साइकिल अपने तईं चलने का रास्ता निकाल ही लेगी। भला साइकिल को कौन-सी सड़क या रास्ता या इंसान चलने से रोक पाया है कभी। है कि नहीं...।

2 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत सुन्दर ।

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’प्रकाश पर्व की शुभकामनाओं सहित ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...