रविवार, 29 जनवरी 2017

कौन डरता है बजट से

हालांकि मैं कॉमर्स का स्टूडेंट जरूर रहा लेकिन मुझे न कभी कॉमर्स पल्ले पड़ी, न अर्थशास्त्र, न ही बजट। कॉमर्स का इस्तेमाल मैंने केवल पास हो जाने भर के लिए ही किया। इसमें न कभी गंभीरता दिखाई, न दिलचस्पी। वो क्या है, मेरी कोशिश हमेशा से अपनी अक्ल को पढ़ाई के बोझ से मुक्त करने में ही रही। सो, उत्ती पढ़ाई की जित्ती से खाने-कमाने भर का काम चल जाए। जो अधिक पढ़ लिए उन्हें उनकी पढ़ाई बहुत-बहुत मुबारक। मैं कम पढ़ा-लिखा होने में ही मस्त हूं।
ठीक ऐसी ही स्थिति मेरे तईं बजट की रही है। सच बोलूं, बजट की महिमा आज तलक मुझे कभी समझ नहीं आई। घंटे-दो घंटे खड़े होकर वित्तमंत्रीजी क्या कह-बोल जाते हैं, जोर देने के बाद भी मेरी खोपड़ी में नहीं घुस पाता। मेरे तईं बजट की सीधी-सी परिभाषा है- जो बढ़ गया, जो घट गया, जो चुनावी झुनझुना बन गया बस यही बजट है। आम जनता का बजट से लेना-देना कित्ता है, कित्ता नहीं; ये सब अर्थशास्त्री टाइप ज्ञानी जानें। मगर हां इसमें ज्यादातर हित कॉरपोरेट घराने वालों के ही निहित होते हैं।
आपने देखा भी होगा, बजट पर सबसे पहले प्रतिक्रिया कॉरपोरेट तंत्र वालों की ही आती है। वो ही सबसे पहले जुटते हैं अपने-अपने जोड़-घटाने में। एक बेचारा सेंसेक्स है, जो बजट वाले दिन खामखां ही बलि का बकरा बन जाता है। बजट मन-मुताबिक आता है तो झुम पड़ता है। नहीं तो अपने चाहने वालों को ऐसी धोबी पछाड़ देता है कि बेचारों के सालों-साल अपने पिछवाड़ों को सहलाने में ही निकल जाते हैं। मतलब- करे कोई, भरे कोई।
बजट आने के बाद मुझ जैसे लेखक के घर का सीन (बाकियों का मुझे नहीं मालूम) यथावत रहता है। न दिमाग पर किसी खरचे के बढ़ने का लोड, न घटने की खुशी। एकदम नॉरमल टाइप। मुझे पता है, मैंने अपने घर का बजट ‘वित्तमंत्री’ के कहने से नहीं, अपनी ‘होम-मंत्री’ के कहने से बनाना है। कहां कित्ता खरच करना है। किसे कित्ता देना है। अपनी पॉकेट में कित्ता रखना है। बच्चों, नाते-रिश्तेदारों, कपड़ों-लत्तों, किचन आदि-इत्यादि के साथ कैसा फाइनेंशियल व्यवहार रखना है; सारा दरोमदार होम-मंत्री पर ही रहता है। तो प्यारे, बजट चाहे ‘करेला’ टाइप आए या ‘मलाईदार’ अपनी सेहत पर कोई फरक न पड़ना।
अच्छा, मैंने तमाम ऐसे लोग देखे हैं जो बजट आने के हफ्ते-दस दिन तक इत्ता टेंशन में रहते हैं मानो उनके बोर्ड एग्जाम का रिजल्ट आया हो। जाने क्या-क्या खुरपेच बजट के भीतर-बाहर करते रहते हैं। टीवी चैनलों पर रात-दिन लंबी-लंबी बहसें चलती रहती हैं। गुलाबी अखबार पढ़ने वाले- भले ही अपने घर का बजट सेट न कर पाते हों- हमें ज्ञान ऐसे देते हैं मानो हमारे गुरु हों। खासकर, अर्थशास्त्रियों की तो बाछें ही खिल जाती हैं। बजट बेला में ऐसा प्रतीत होता है मानो ईश्वर ने आज के दिन उनके दिमाग में अतिरिक्त ज्ञान फिट कर दिया हो। तब तो मोहल्ले का छोटा-मोटा अर्थशास्त्री भी खुद को ऐसे प्रोजेक्ट करता है जैसे अगला बजट का ज्योतिषी हो।
किंतु बजट के इस शोर-शराबे से मैं खुद दूर और मुक्त ही रखता हूं। क्योंकि जिस गली जाना नहीं, वहां की कन्या से भला क्या दिल लगाना। मूड को लाइट रखिए। चाहे बजट आए या शेर; आपकी बला से। बजट के जोड़-घटाने में खोपड़ी खपाके भला कौन-सी वित्तमंत्रालय में नौकरी मिल जानी है। मेरे घर का बजट (बजट आने से पहले और आने के बाद) एकदम टनाटन रहता है।
हां, वित्तमंत्री महोदय से अपनी इत्ती गुजारिश अवश्य है कि कभी समय निकालकर बजट में हम लेखकों पर भी कुछ ध्यान दे लें। बजट में कुछ ‘लाभकारी गणित’ हम लेखकों के लिए भी सेट करें। अखबारों-पत्रिकाओं को निर्देश दें, लेखकों को पारिश्रमिक बढ़ाकर दिया करें। आखिर हम लेखक अपनी-अपनी कीमती खोपड़ी खरच करते हैं, लेख आदि को लिखने में। मुफत की दुकानदारी अब हमने न होने वाली। बाकी आप वित्तमंत्री हैं जैसा उचित लगे, करें।
तो प्यारे, बजट एक ‘तिलिस्मी तहखाना’ है, इसके आजू-बाजू जाने से बचें। अपनी खोपड़ी की ऊर्जा को बचाकर रखें। अगर सब बजट के लाभ-हानि जानने-समझने में खरच कर दी, तो आगे रिचार्ज कराने में घणी मुसीबत आ सकती है। शेष आपकी मर्जी।

गुरुवार, 26 जनवरी 2017

गणतंत्र दिवस बनाम सेल दिवस

गणतंत्र दिवस पर हम शहीदों को तो याद करते ही हैं। साथ-साथ इस दिन लगने वाली ‘सेल’ का फायदा उठाना भी हम नहीं भूलते। अब गणतंत्र और सेल एक-दूसरे के पूरक टाइप बन गए हैं। जब भी गणतंत्र दिवस आने को होता है, अखबारों के पहले पन्ने सेल-डिस्काउंट-ऑफर्स के विज्ञापनों से भर जाते हैं। ग्राहकों को ऐसे-ऐसे ऑफर्स दिए जाते हैं, एक बार को तो वो भूल ही जाता है कि आज ‘गणतंत्र दिवस’ है या ‘सेल दिवस’!

एक गणतंत्र दिवस ही नहीं लगभग सारे दिवसों का यही हाल है। बाजार हर दिवस को भुनाना जानता है। आप चाहें या न चाहें दिवसों पर ऑफर्स या सेल की लॉलीपॉप आपको मिलनी ही मिलनी है। विडंबना देखिए, बच्चों को भी अब गणतंत्र दिवस कम, किस्म-किस्म के ऑफर्स ज्यादा ध्यान रहते हैं। ऑन-लाइन बाजार ने सबको अपना दीवाना बना दिया है। खरीददारी के लिए आपको यहां-वहां बाजार में धक्के खाने की जरूरत नहीं, अब बाजार आपके फोन की टच-स्क्रीन पर खुद-ब-खुद हाजिर है। न मोल-भाव, न हील-हुज्जत सस्ते पर सस्ते की लूट मची है।

मैंने बहुतों को देखा है कि वे 26 जनवरी का इंतजार अपने गणतंत्र को शान से मनाने के लिए नहीं बल्कि इस दिन मिलने वाले ऑफर्स का लाभ उठाने के लिए करते हैं। सेल के लिए यों पगलाए रहते हैं मानो आज के बाद लाइफ में यह कभी मिलेगी ही नहीं। छुट्टी और ऑन-लाइन परचेचिंग ही उनकी प्राथमिकता में रहती है।

ऑन-लाइन स्टोर्स की देखा-दाखी यही हाल अब हमारे शहरों के बाजारों का हो गया है। वे भी अब गणतंत्र दिवस वाले दिन तैयार रहते हैं अपनी सेल और ऑफर्स से ग्राहकों को पटाने के लिए। गणतंत्र दिवस पर हर कोई बेचने और डिस्काउंट का लाभ उठाने में ही लगा रहता है। मुझे नहीं लगता कि शायद कोई भी इस दिन किसी महान क्रांतिकारी या शहीद की फोटो भी खरीदता होगा। विडंबना देखिए, इसका ध्यान न ऑन-लाइन स्टोर्स रखते हैं न आम बाजार वाले। ऑफर्स और सेल की दीवानगी या तो मोबाइल फोन में दिखाती या फिर कपड़ों-लत्तों में।

गणतंत्र... कैसा गणतंत्र, कहां का गणतंत्र? गणतंत्र के मायने अब बाजार और वहां मिलने वाले किस्म-किस्म के ऑफर्स हैं। गणतंत्र दिवस एक दिन की रस्म-अदायगी है जो छुट्टी और डिस्कांउट का लाभ उठाकर मना ली जाती है।

लोग भी कैसे-कैसे अहमक हैं, अपने परिचितों को फलां-फलां ऑन-लाइन स्टोर्स पर लगी सेल या महा-सेल बताने के लिए तो फोन करेंगे किंतु बातचीत में एक बार भी गणतंत्र दिवस की एक-दूसरे को शुभकामनाएं नहीं देंगे। भला क्यों देने लगे शुभकामनाएं, उनके तईं सेल-ऑफर्स-डिस्काउंट अहम हैं या गणतंत्र दिवस। गणतंत्र दिवस तो सरकारों-नेताओं-स्कूलों के जिम्मे है, वे ही उसकी रस्मों को निभाएं। ऑन-लाइन सेल में तीन हजार की चीज उन्हें दो हजार में मिल गई, उनका तो हो गया गणतंत्र दिवस।

सारा खेल बाजार का है। बाजार हम पर इस कदर हावी हो चुका है कि वो अपने ऑफर्स की च्वाइस के अतिरिक्त हमें कुछ सोचने का मौका ही नहीं देता। उसके तईं चीज को बेचना महत्त्वपूर्ण है। फिर चाहे वो गणतंत्र दिवस हो या स्वतंत्रता दिवस या फिर कनागत ही क्यों न हो। हर कहीं वो खुद को बेचने की जुगाड़ सेट कर ही लेता है।

जहां सेल, वहां भीड़। हम अब इसी रास्ते पर चल रहे हैं। बाजार में खरीद-बेच की होड़ लगी है चाहे दिवस कोई-सा भी क्यों न हो।

तो प्यारे, गणतंत्र दिवस पर ज्यादा सेंटी-वेंटी होने की जरूरत नहीं। सीधा किसी ऑन-लाइन स्टोर की वेब साइट पर जाओ। वहां विकट सेल लगी है। अपने तईं कुछ खरीदो। छुट्टी का आनंद लो। शाम को किसी महंगे रेस्त्रां में डिनर एन्जॉय करो। बाकी गणतंत्र दिवस का क्या है, उसे तो हर साल ही आना है। लेकिन ऑफर्स का लाभ लेने में कहीं कोई ‘कोताही’ नहीं होनी चाहिए। समझे न...।

मंगलवार, 24 जनवरी 2017

दिलचस्प चुनावी घोषणापत्र

चुनावी घोषणपत्रों को भले ही आप-हम ‘जुमलेबाजी की किताब’ मानें लेकिन ये होते बड़े ‘दिलचस्प’ हैं। घोषणपत्रों का हिसाब ‘जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि’ टाइप होता है। राजनीतिक दल जित्ते किस्म के वायदे जनता से कर सकते हैं; सब के सब घोषणापत्रों में घुसेड़ देते हैं। साथ-साथ उनके बीच यह हिरस भी रहती है कि उसका घोषणापत्र मेरे घोषणापत्र से ‘उजला’ कैसे?

अगर एक ही दल के पिछले घोषणापत्रों से वर्तमान घोषणापत्र को मिलाया जाए तो उनमें तारीख और साल के अतिरिक्त खास कुछ बदला हुआ नहीं मिलेगा। लगभग सारे वायदे एक जैसे रहते हैं। वो पांच साल पहले भी गरीब और गरीबी को दूर कर रहे थे, आगे भी करेंगे। वो पांच साल पहले भी बेरोजगारों को रोजगार दिलवा रहे थे, आगे भी दिलवाएंगे। वो पांच साल पहले भी गांव-देहातों में बिजली-पानी ला रहे थे, आगे भी लाएंगे। वो पांच साल भी सड़कें-पुल-हस्पताल बनवा रहे थे, आगे भी बनवाएंगे। वो पांच साल पहले भी आरक्षण के हमदर्द थे, आगे भी रहेंगे। वो साल पहले भी महिलाओं को सुरक्षा दे रहे थे, आगे भी देते रहेंगे। वो पांच साल पहले भी शिक्षा पर फोकसड थे, आगे भी रहेंगे। वो पांच साल पहले भी जाति-धर्म से ऊपर उठने को कह रहे थे, आगे भी उठते रहेंगे। आदि-आदि।

हां, इधर घोषणापत्रों में ‘डिजिटल’ शब्द और जुड़ गया है। अब लगभग सारे राजनीतिक दल जनता को ‘डिजिटल-क्रांति’ में ले आना चाहते हैं। हर एक की जेब में ‘ई-वॉलेट’ वाला ‘स्मार्ट-फोन’ हो। हर कोई डेबिट-क्रेडिट कार्ड धारक हो। हर कोई पेमेंट एप यूज करता हो। घर में ‘दाल’ चाहे गले न गले किंतु लैपटॉप और स्मार्टफोन जरूर मिलना चाहिए। इधर जब से चीजों को ‘मुफ्त’ बांटने का रिवाज चला है, संभव है, आगे भी डिजिटल टाइप चीजें मुफ्त ही बांटी जाएंगी।

हालांकि राजनीतिक दल ऐसा कहते जरूर हैं कि इस बार का घोषणापत्र हमने बड़ी मेहनत से तैयार किया है। हर वर्ग, हर मुद्दे का खूब ध्यान रखा है। यकीन मानिए, अगर हमारी सरकार बनती है तो घोषणापत्र में दर्ज प्रत्येक वायदों को हर कीमत पर निभाया जाएगा। जनता भी भोली-भाली है। मान जाती है। एक मौका और दे देती है। लेकिन चुनावी वायदे तो चुनावी ही होते हैं। अपने ‘अच्छे दिनों’ का जनता इंतजार करती रह जाती है मगर अच्छे दिन आ नेता और पार्टी के जाते हैं।

जुमलेबाजियों में यों ही साल-दर-साल निकलते चले जाते हैं। सरकारें आती हैं। चली जाती हैं। घोषणापत्रों में दर्ज वायदे हर बार ‘चमकीला आवरण’ धारण किए होते हैं। नेता लोग जब अपने आपस में किए वायदों को पूरा नहीं कर पाते तो घोषणापत्रों के वायदों को क्या खाक पूरा करेंगे। इत्ते पर भी घोषणापत्रों को पढ़ने में आता बड़ा मजा है। ये एक प्रकार से ‘दिलचस्प उपन्यास’ टाइप होते हैं। कि पढ़ते जाओ, पढ़ते जाओ पर मन न भरे।

कभी-कभी तो मेरा दिल भी करता है इस लेखन-वेखन को छोड़ पार्टियों के घोषणापत्रों को लिखने का काम ले लूं। इन्हें बनाने में दिमाग तो नहीं खपाना पड़ेगा। एक सेट फॉरमेट में बस कुछ नए जुमलों (आइ मीन वायदों) को चिपकाना भर होता है। और हो गया घोषणापत्र तैयार। फिर बड़ी पार्टी से जुड़े रहने का रूतबा ही अलग है। यहां तो पूरी जिंदगी कलम तोड़के भी कुछ खास हासिल न होना। घर-बिरादरी में ‘शान’ अलग होगी कि अगला फलां-फलां पॉलीटिकल पार्टी का घोषणापत्र सेट करता है।

काश! ये चुनावी बेला हर साल आया करे, इस बहाने पार्टियों के ‘दिलचस्प घोषणापत्र’ तो पढ़ने को मिल जाया करेंगे।

रविवार, 22 जनवरी 2017

चुनावी दंगल में मनोरंजन का तड़का

दौरे-गुजिश्ता में चुनाव ‘लोकतंत्र का उत्सव’ सरीखे हुआ करते थे, लेकिन अब ‘दंगल’ सरीखे हैं। इस दंगल में एक से बढ़कर एक तगड़ा पहलवान अपने ‘पहलवानी दांव-पेच’ के साथ तैयार रहता है, विरोधी को ‘धोबी-पछाड़’ देने के लिए। चुनावी-दंगल के बीच सिर्फ ‘जीत’ या ‘हार’ ही मायने रखती है, बाकी कुछ और नहीं। यानी, ‘जो जीता वही सिंकदर’।

चुनावों के दौरान राजनीति बड़े ‘दिलचस्प’ मोड़ पर आ जाती है। किसी नेता का कोई भरोसा नहीं रहता कि वो कब ‘बेपेंदी के लोटे’ की तरह किस पार्टी में लुढ़क लेगा। हालांकि राजनीति में नेताओं की इस पार्टी से उस पार्टी में लुढ़का-लुढ़काई आजीवन चलती रहती है मगर चुनावों के वक्त खासा बढ़ जाती है। जो नेता अभी अपनी पार्टी की ‘बढ़ाई’ कर रहा था, हो सकता है, अगले ही पल वो किसी दूसरी पार्टी में जाकर अपनी पूर्व पार्टी की ‘बुराई’ करने लग जाए। ‘लव’ और ‘वार’ की तरह राजनीति में भी सबकुछ ‘जायज’ होता है। यहां कोई किसी का ‘सगा-संबंधी’ नहीं होता। न बाप, न बेटा, न चाचा, न मामा, न फूफा, न मौसा, न दोस्त, न अंकल, न अंटी, न भाभी, न मौसी, न ताई। सारा का सारा खेल राजनीति, राजनीति और राजनीति की बिसात पर मोहरे यहां-वहां बैठने-बैठाने का ही चलता रहता है।

अच्छा, चुनावी मौसम में ये दंगल अगर न हो तो सबकुछ फीका-फीका टाइप लगे। ऐसे चुनाव भी भला किस काम के कि बिना शोर-शराबा हुए, बिना आया राम, गया राम हुए, बिना धन-बल की जोर-आजमाइश हुए संपन्न हो गए। अरे, ‘दंगल’ फिल्म में तो आपको सिर्फ दो-ढाई घंटे का ही ‘एंटरटेनमेंट’ देखने को मिला होगा, चुनावी राजनीति में तो 24x7 एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट ही है।

खैर, मैं ऐसा कतई नहीं मान सकता कि देश के नेताओं को अपनी जनता की फिकर नहीं रहती। अगर फिकर नहीं रही होती तो वे न राजनीति में आते न चुनाव लड़ते। अरे, नेता लोग तो दिन के चौबीस में से तेईस घंटे जनता के वास्ते ही जीते-मरते हैं! चुनाव के दौरान तो सबसे अधिक ‘चिंता’ उन्हें जनता के सामाजिक एवं आर्थिक स्तर में सुधार की रहती है! अगर चिंता नहीं रही होती तो क्या प्रधानमंत्रीजी पूरे पचास दिन देश को लाइनों में खड़ा करवाते? फिर भी, कहने वालों के मुंह पर टेप तो नहीं चिपका सकते न। आखिर हम एक लोकतांत्रिक देश हैं। लोकतांत्रिक देश में चुनावी सभाओं में नेताओं द्वारा कुछ-कुछ ‘जुमलेबाजियां’ तो होती ही हैं। ये न हों तो जनता उनके प्रति ‘आकर्षित’ कैसे होगी? दरअसल, किस्म-किस्म की चुनावी जुमलेबाजियां ही नेताओं को राजनीति और जनता के बीच सालों-साल टिकाए रखा करती हैं। वैसे, एक खरी बात बोलूं- राजनीति में ईमानदारी भी एक प्रकार की जुमलेबाजी ही है। क्या समझे...।

ऐसा देखकर लगता तो नहीं कि नोटबंदी की मार चुनावी दंगल के बीच ‘खलनायक’ टाइप साबित होगी। चुनावों में दो ही चीजें हमेशा खास होती हैं; एक- नोट और दूसरा- ज़बान। हमारे नेताओं कने दोनों की ही कोई कमी नहीं। हां, थोड़ा-बहुत नोट पर जरूर लगाम लग जाए पर ज़बान टनाटन चलती रहेगी। चुनावी दंगल में असली खेल तो ज़बान का ही है। नेता की जबान जित्ती लंबी होगी, खेल में मजा भी उत्ता ही आएगा।

एक-दूसरे से लड़ने-भिड़ने को तैयार बैठे नेता, उम्मीद है, ‘दंगल’ फिल्म से भी कहीं बेहतर हमारा ‘मनोरंजन’ कर पाएंगे। जो पार्टी चुनावों में और जनता के बीच ‘धांसू’ टाइप ‘गणित’ बैठा लेगी, बाजी मार ले जाएगी। बाकी जिन्हें चुनावी दंगल का विश्लेषण करना है अपने हिसाब-किताब से करें। अपन तो फिलहाल इस ‘दंगल’ का लुत्फ उठाने में मस्त हैं।

गुरुवार, 19 जनवरी 2017

मार्केट और किताबें

पुस्तक मेला- खासकर लेखकों के- बड़े काम का होता है। उनके बीच यह ‘पिकनिक स्पॉट’ की भूमिका निभाता है। जहां किस्म-किस्म के लेखक एक-दूसरे से मिलते-जुलते हैं। अपनी किताबों की ‘मार्केटिंग’ करते हैं। किताबों का विमोचन करवाते हैं। किताबों पर चर्चा-बहस, विवाद-संवाद होता है। इसी मेले में लेखक अपने पाठकों से और पाठक अपने लेखकों से सीधा इन्टरेक्ट कर पाते हैं। जिन लेखकों की किताबें पुस्तक मेला में बुक-स्टॉल पर सज-धजकर बिकने के लिए तैयार रहती हैं, उनका दिल अंदर से खासा प्रफुल्लित रहता है। जाहिर-सी बात है, किताब बिकेगी तो कमाई होगी। कमाई से रॉयल्टी आएगी। रॉयल्टी से आगे के खर्चे निपटाए जाएंगे।

आत्म-संतुष्टि के तईं सिर्फ किताब का लिखना ही जरूरी नहीं, उसका मार्केट में आना और बिकना भी उत्ता ही जरूरी है। किताब जब तक बिकेगी नहीं तब तक न लेखक को लिखने में और न प्रकाशक को छापने में ही मजा आएगा। अपनी गांठ से पैसा खर्च कर पाठक भी थोड़ा जिम्मेदारी लेगा उसे पढ़ने की। किताब का पढ़ा जाना अत्यंत जरूरी है। वरना फिर किस काम की किताब और किस काम के लेखक-प्रकाशक।
आजकल जमाना ‘प्योर मार्केटिंग’ का है। मार्केट में हर चीज केवल मार्केटिंग के दम पर ही बिक और टिक पाती है। जहां मार्केटिंग के टेक्ट्स कमजोर होते हैं, वहां चीजें खुद-ब-खुद चलन से बाहर हो लेती हैं। ठीक ऐसा ही सीन किताबों का है। पुस्तक मेला का मुख्य उद्देश्य किताबों की सेल और मार्केटिंग से ही जुड़ा होता है। इत्ते बड़े मैदान में, इत्ते लेखक-प्रकाशक, इत्ती किताबों के साथ कोई पानी-पूरी खाने या कोल-ड्रिंक पीने नहीं आते, उनका ऐम किताबों की मार्केटिंग और सेल से ही जुड़ा होता है। सही भी है, लेखक को स्थापति करने में पाठक के साथ-साथ मार्केट भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

अगर आपके माल में दम है तो पाठक न केवल हंसकर बल्कि उल्टे पांव चलकर आपकी किताब खरीदने बुक-स्टॉल पर आएगा। समाज और पाठक वर्ग के बीच लेखक की महत्ता उसकी किताब की बिक्री से ही तय होती है। वो जमाने अब लद गए कि लेखक किताबों पर किताबें लिख-लिखकर अपना घर भरे जा रहा है। दिलों के साथ अब लोगों के घर भी बेहद संकुचित हो लिए हैं। दो-चार व्यक्तियों से ज्यादा की जगह बच ही नहीं पाती रहने को।

वैसे, कोई माने या न माने- अंगरेजी के मुकाबले हिंदी का लेखक अपनी किताब की मार्केटिंग के प्रति थोड़ा ‘पिछड़ा’ टाइप रहता है। जित्ती तेजी से अंगरेजी का लेखक मार्केट को कब्जा लेता है, उत्ता हिंदी का लेखक नहीं कर पाता। हां, हिंदी लेखन में लेखकों की जो यंग जनरेशन आ रही है, उसने जरूर अपने वास्ते मार्केट में जगह बनाई है। खासकर, वे अब लिख ही मार्केट के हिसाब से रहे हैं।

अपना तो साफ मानना है कि लेखक को अगर समाज और पाठक के मध्य टिके रहना है तो उसे मार्केट के अनुरूप अपने लेखन ढालना ही होगा। वक्त की डिमांड यही है।

इसीलिए लेखकों के लिए पुस्तक मेला जरूरी है ताकि वे अपनी किताबों का प्रचार-प्रसार कर सकें। अपनी किताब की मार्केटिंग में क्या हर्ज, कैसी शर्म? यों भी, सोशल मीडिया ने लेखकों और पाठकों को मार्केट के बहुत करीब ला दिया है।

यह पुस्तक मेला तो फिर भी साल में एक बार लगता है जबकि ऑन-लाइन मेला तो चलता ही रहता है। ऑन-लाइन मेले से आप किसी भी लेखक की किताब अच्छे-खासे डिस्काउंट के साथ घर बैठे मांगवा सकते हैं। साथ-साथ किंडल या ई-बुक पर पढ़ भी सकते हैं। वाकई लेखन, लेखक और पढ़ने-पढ़ाने, लिखने-लिखाने की दुनिया एकदम बदल चुकी है। अब यह निर्भर हम पर है कि हम उसके हिसाब से खुद को कित्ता बदल पाते हैं।

किताबों का मेला यों ही चलता रहेगा। लेखकगण आपस में मिलते-जुलते रहेंगे। वाद-संवाद होते रहेंगे। किताबें बेची-खरीदी जाती रहेंगी। लेखक इस दुनिया को अपनी निगाह से देख यों ही लिखता रहेगा। मार्केट में धूम मचाए रहेगा।

मंगलवार, 17 जनवरी 2017

साइकल, पार्टी, झंडा, बत्ती सब गया हाथ से

पॉलिटिक्स केवल ‘दांव-पेच’ का खेल है। दांव सही निशाने पर लग गया तो ‘जीत’, चूक गए तो ‘हार’। इन दांव-पेच में न सगे को बख्शा जाता है न पराए को। इत्ते खेल-तमाशे के बाद भी यहां इस बात की कोई गारंटी न रहती कि कौन नेता अपनी पार्टी में या बाहर कित्ते लंबे समय तक टिका रह पाएगा। लंबी रेस का घोड़ा यहां कोई नहीं होता। सत्ताएं राजी से नहीं, दांव-पेच से ही हासिल की जाती हैं।

ताजा-ताजा उदाहरण हमारे सामने है। कल तक पिताजी का पार्टी और साइकल दोनों पर एकाधिकार था, चुनाव आयोग के एक फैसले के बाद, पिताजी कने न पार्टी रही, न साइकल और न ही पुत्र। एक झटके में पुत्र ने पिताजी को साइकल से उतार पैदल कर डाला। हालांकि पिताजी का मान-सम्मान रखने के वास्ते पुत्र अब भी उन्हें ही आगे रखे हुए है। लेकिन प्यारे ये पॉलिटिक्स है पॉलिटिक्स... यहां परिवार से लेकर जनता तक सबकुछ साधने के लिए खुद को ‘मुलायम’ रखना ही पड़ता है।

फैसले से पिताजी खासा खफा हैं। भीतर ही भीतर भन्नाए हुए हैं। भन्नाहट में तीखा टाइप का एक बयान भी दे डाला है। मगर समस्या तो यही सबसे बड़ी है कि करें तो करें क्या...। जिस साइकल पर बैठ कभी उनकी तूती समूचे प्रदेश में बोला करती थी, आज वो गद्दी भी पराई हो ली है। यहां तक कि साइकल के पिछले लगे कैरियर तक पर अब उनका कोई हक न रहा। न झंडा अपना रहा, न लाल-नीली बत्ती। पिताजी अब केवल मार्गदर्शक की भूमिका में हैं।

एक न एक दिन तो यह होना ही था। सत्ता की चाबी जब ताकतवर के हाथों में आ जाती फिर वो वहां लगे हर ताले को आसानी खोल-बंद कर सकता है। यहां भी यही हुआ। पिताजी अपनी जिद पर डटे रहे। पुत्र ने तगड़ा दांव खेल एक झटके में बाजी पलट डाली। अमां, मिनट की छोड़िए पॉलिटिक्स में तो क्षणभर में समीकरण बदल जाते हैं। कल तक सारे विधायक, मंत्री, नेता पिताजी के खैरखा थे, आज पुत्र के हैं। इसे ही कहते हैं- उगते सूरज को सलाम।

पूरे ड्रामे का पटाक्षेप खासा दिलचस्प रहा। साइकल- पुत्र की सरपरती में- प्रदेश में कित्ती आगे तलक खींच पाएगी, देखेंगे ‘हम लोग’।

शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

गांधी, चरखा, खादी और कैलेंडर

यकायक गांधी का चरखा, खादी और कैलेंडर तीनों ही खासी चर्चा में आ गए हैं। मुझे नहीं मालूम इन तीन मुद्दों पर जमीन पर कहीं कोई बहस या चर्चा हो रही है या नहीं लेकिन फेसबुक पर लोग आपस में गुथम-गुथा हैं। जैसाकि होता आया है, परस्पर दो धड़े बना लिए गए हैं। एक गांधी का पक्षधर है तो दूसरा विरोधी। दोनों तरफ से लंबी-लंबी छोड़ी जा रही है। बहस-चर्चा के बीच में- बहाने-बे-बहाने- गोडसे भी आ जाया करता है। फिर तो देश-प्रेम या राष्ट्रभक्ति के क्या कहने। कुछ गोडसे का नाम भर सुन भीतर तलक सुलगे जा रहे हैं तो कुछ खुद को जस्टिफाई करने में मद-मस्त हैं।

लगे हाथ, खबरिया चैनलस भी बहती गंगा में मुंह-हाथ धोने निकल पड़े हैं। गांधी के चरखे और कैलेंडर को खूब समय दिया जा रहा है। बहस के वास्ते एकाध दलों के नेताओं और जाने-माने बुद्धिजीवियों को भी बैठा लिया गया है ताकि कुछ दिनों के लिए मुद्दा हवा में यों ही तैरता रहे। हालांकि बहस में गंभीरता जैसा कुछ नहीं है लेकिन विरोध-विरोध खेलने या ज़बान हिलाने में किसी का क्या जाता है।

वैसे, इन सब कथित गांधी-प्रेमियों या विरोधियों से अगर पूछकर देखा जाए कि आप स्वयं गांधी या गांधीवाद को कित्ता अपने जीवन-आचरण में उतारे हुए हैं या चरखे से आजकल क्या कात रहे हैं या खादी के कित्ते कपड़े आपके कने हैं, तो गारंटी है, सब के सब अपनी चिकनी बगलें झांकने लग जाएंगे। गांधी के कैलेंडर पर प्रधानमंत्री की तस्वीर होने का दुखड़ा रोया जा रहा है, उसमें गांधी के क्या-क्या संदेश टंगे हैं, गारंटी है, बतला नहीं पाएंगे। लेकिन विरोध करना है तो करना है। जित्ता एरोगेंटली विरोध की तलवारें फेसबुक पर भांजी जा सकती हैं, शायद कहीं और नहीं।

अच्छा, क्या हुआ जो प्रधानमंत्री ने गांधी का चरखा चला लिया? चरखे पर गांधी का कॉपीराइट है क्या? चरखा तो कोई भी चला सकता है। चाहे प्रधानमंत्री हो या मुख्यमंत्री। या फिर अमेरिका का राष्ट्रपति हो या जापान का प्रधानमंत्री। या फिर आम नागरिक ही क्यों न हो। ऐसे ही कैलेंडर का भी है। अमां, कैलेंडर पर तो हर महीने, हर साल तारीखें-तस्वीरें बदलती रहती हैं। तो क्या उन्हें भी नहीं बदलना चाहिए? चूंकि फेसबुक पर- किसी न किसी बहाने- हंगामा खड़ा करना ही जब विशेष मकसद हो तो फिर कोई क्या कर लेगा?

दुनिया और तकनीक में इत्ता बदलाव आने के बाद भी हम रहे ढपोरशंखी के ढपोरशंखी ही। दाढ़ी में जरा-सा सफेद बाल दिखा नहीं कि लगे चिंता जतलाने। अमां, जरा ठंडे दिमाग से सोचकर देखो-उम्र के साथ क्या दाढ़ी के बाल सफेद न होंगे?

आलम यह है कि फेसबुक से लेकर बुद्धिजीवियों के बौद्धिक गलियारों तक गांधी-गांधी तो सब करते रहते हैं किंतु गांधी होना कोई नहीं चाहता। न कोई गांधी की सादगी को अपनाना चाहता है न लाठी थामना चाहता है न एक वस्त्र में जिंदगी गुजारना चाहता है न चरखा चलाना चाहता पर गांधी भक्त सभी हैं। क्या गजब मजाक है।

किया भी क्या जा सकता है, जब हमें मजा ही प्रतीकों के साथ हिलगे रहने में आता है। पता नहीं हम गांधी, चरखा, खादी, कैलेंडर से आगे क्यों बढ़ना नहीं चाहते? अरे, होशियारी तो यह होनी चाहिए कि गांधी ने जहां छोड़ा था, वहां से हम शुरू कर आगे तलक ले जाएं। लेकिन यहां तो भक्तगण प्रतीकों के इर्द-गर्द चक्कर काटने को ही सबसे बड़ा सुख समझते हैं। बहुत हुआ तो फेसबुक पर तीखी बहस-चर्चा कर इतिश्री कर ली। हो गई खानापूर्ति।

तो जनाब यों ही फंसे रहिए बोसीदा टाइप बहसों-चर्चेओं में। फिर दोष फेसबुक को क्यों देते हैं कि यहां सिवाय भाषाई दंगल से कुछ नहीं चलता।

गुरुवार, 12 जनवरी 2017

फेसबुक और कविता

मेरे एक कवि मित्र हैं। फेसबुक पर अपना अकाउंट रखते हैं। मित्र-सूची में पुरुषों से ज्यादा महिलाओं को रखना पसंद करते हैं। फेसबुक के स्टेटट पर कम ‘इन-बॉक्स’में ही अधिक नजर आते हैं। दिनभर में जित्ती कविताएं लिखते हैं, पढ़वाने के तईं इन-बॉक्स करते रहते हैं। चूंकि मैं कविताएं कम ही पढ़ता हूं इस नाते उन्हें मुझसे अधिक ‘शिकायत’रहती है। फेसबुक की दुनिया के बाहर जब भी मिलाते हैं बस एक ही शिकायत करते हैं- ‘क्या आपको मेरी लिखीं कविताएं पसंद नहीं आतीं? इसीलिए आप उत्तर नहीं देते, है न?‘ मेरा भी जवाब हर बार की तरह एक ही रहता है- ‘नहीं.. नहीं.. हुजूर ऐसा कतई नहीं है। दरअसल, मेरे भेजा कविताओं की संवेदनशीलता आत्मसात नहीं कर पाता। इसीलिए मैं न केवल आपकी बल्कि किसी की भी कविताएं नहीं पढ़ता।‘कवि मित्र अपना-सा मुंह लेके बेहद बेरूखी के साथ विदा ले लेते हैं।

वैसे बताता चलूं, कवि मित्र काफी रसिक प्रवृति के भी हैं। अक्सर बताते रहते हैं कि उन्होंने फलां कविता जब फलां महिला मित्र के इन-बॉक्स में डाली तो वे उसे पढ़कर कित्ता खुश हुईं। उन्होंने ही एक दफा बताया था कि एक महिला मित्र ने उनकी कविताओं से प्रभावित होकर उन्हें कालिदास और मुक्तिबोध से भी बड़ा एवं आगे का कवि घोषित कर दिया था! यों भी, फेसबुक पर कविता लिखने वाला हर कवि खुद को मुक्तिबोध या शमशेर से नीचे का कवि तो कतई नहीं मानता।

कभी-कभी मुझे लगता है अगर फेसबुक न होता तो हमारे समय के कवि अपनी कविताओं के साथ क्या कर रहे होते? वो तो भला हो फेसबुक और उसमें स्थापित इन-बॉक्स का कि उसने हर फेसबुकिए को कवि का दर्जे सोशल मीडिया पर दिलवा दिया। फेसबुक पर जित्ती मात्रा में कवि हैं लगभग उत्ती ही मात्रा में कवित्रियां भी।

साथ-साथ शेरो-शायरी की महफिलें भी यहां खूब जमी करती हैं।

खैर। ऐसा नहीं है कि मेरे कवि मित्र ही मेरे इन-बॉक्स में घुसकर मुझे कविताएं पढ़वाने का शौक रखते हैं। ऐसे हर रोज कित्ते ही लिंक मुझे अपने इन-बॉक्स में चिपके हुए मिल जाते हैं, जहां कविताओं को पढ़ने की अपील की जाती है। एकाध हो तो चलो पढ़कर तारीफ कर भी दी जाए किंतु यहां तो नोट जमा करने वालों की तरह लाइन पे लाइप लगी रहती है। कई बड़े दिल वाले कवियों-कवित्रियां ने तो मुझे- मेरे द्वारा कविताएं न पढ़ने के लिए- ‘अ-मित्र’या ‘ब्लॉक’तक कर दिया है। हालांकि दिल तो नहीं करता उनका दिल दुखाने का पर क्या करूं कविता मुझसे पढ़ी ही नहीं जाती। जब भी कविता पढ़ने की कोशिश किया करता हूं दिलो-दिमाग में डरावने टाइप ख्याल आने लगते हैं। सो, बीच में ही पढ़ना छोड़ देता हूं।

लेकिन इत्ता स्पष्ट कर दूं कि न मैं कविता का विरोधी हूं न कवि का।

वैसे, एकाध दफा कविता लिखने की कोशिश फेसबुक पर मैं भी कर चुका हूं। मगर बात बनी नहीं। कविता लिखकर जब एक महिला मित्र को इन-बॉक्स की तो वे इत्ता भड़क उठीं, इत्ता भड़क उठीं बस फायर-बिग्रेड बुलाने भर की देरी रह गई थी। तमाम किस्म की माफियां मांगकर मैंने उन्हें ‘शांत’ किया। तब से कसम खा ली कि न फेसबुक पर, न कागज पर कभी कविता नहीं लिखूंगा।

फिर भी, फेसबुक पर कवियों एवं कविताओं का ‘ग्राफ’निरंतर बढ़ता ही जा चला रहा है। फेसबुक का ‘इन-बॉक्स’इसमें बेहद ‘क्रांतिकारी भूमिका’निभा रहा है। ज्यादातर प्रेम-कविताओं की जुगलबंदी इन्हीं इन-बॉक्सों में चला करती है। शायद इसीलिए फेसबुक, इन-बॉक्स और कविता एक-दूसरे के पूरक टाइप बन बैठे हैं। जिसे जरा भी लिखना आता हो वो कुछ नहीं तो फेसबुक पर कविता लिखकर ही अपने दिल के अरमान पूरे कर सकता है। कम से कम दिल में यह हसरत तो न रह जाएगी कि हाय! मैं कवि नहीं बन सका।

बुधवार, 4 जनवरी 2017

दंगल के बीच फंसी साइकिल

पिता-पुत्र के बीच छिड़े ‘दंगल’ में बेचारी साइकिल की सत्या पिट गई है। साइकिल यह निर्णय नहीं ले पा रही कि किस रास्ते चले? जिस रास्ते साइकिल चलने की कोशिश किया करती है, कोई न कोई बंदा आके उसकी ‘हवा’ निकाल जाता है। निरंतर हवा निकाले जाते रहते, साइकिल के पहियों में इत्ते ‘छेद’ हो लिए हैं कि वो यह समझ ही नहीं पा रही कि सांस कहां से लें और कहां छोड़ें।

बीते पच्चीस सालों से साइकिल अथक इत्ते नेताओं का बोझ अकेले ढो रही थी। कहीं कोई परेशानी नहीं थी। आदत पड़ गई थी न उसे। नेताजी गद्दी पर बैठते थे तो बाकी नेता यहां-वहां लटके-अटके रहते थे। समाजवादी साइकिल ‘समाजवाद’ का परचम पूरे उत्तर प्रदेश में ‘ठसक’ के साथ लहरा रही थी। आखिर साइकिल तो साइकिल ही है। जैसे- इंसान एक उम्र के बाद ‘शिथिल’ पड़ने लगता है, वैसे ही स्थिति में साइकिल भी आ ली। कब तलक इत्ते बड़े-बड़े नेताओं का बोझा अकेले ढोती? धीरे-धीरे कर साइकिल ‘चरमराने’ लगी। तरह-तरह की आवाजें निकालने लगी। किंतु बड़े नेता लोगों ने न उसकी आवाज, न पीड़ा पर ध्यान दिया। सब के सब साइकिल पर यों लदे बैठे रहे मानो उनकी ‘बपौती’ हो।

फिर एक दिन ऐसा भी आया कि उसी साइकिल पर एक ‘युवा तुर्क’ आनकर बैठ गया। युवा तुर्क ने साइकिल पर बैठते ही धीरे-धीरे कर कथित वरिष्ठों को उतारना शुरू किया। जित्ते भी पिछल्लू साइकिल के दाएं-बाएं लटके-अटके पड़े थे सबको ‘तगड़ा ब्रेक’ मार एक साथ ‘लुढ़का’ डाला। हालांकि कथित वरिष्ठ युवा तुर्क से नाराज तो बहुत हुए पर शिकायत क्या करते? सो, सीधा नेताजी कने चले गए अपना दुखड़ा रोने। आलम यह है, इस वक्त नेताजी भी इस कंडिशन में नहीं कि उनका दुखड़ा सुन थोड़ी-बहुत सांत्वना दे सकें। क्योंकि उनकी खुद की साइकिल को युवा तुर्क ने सीधा टक्कर दे मार दी है। हाल-फिलहाल दोनों के बीच झगड़ा राजनीतिक सत्ता बचाने से कहीं बड़ा समाजवादी साइकिल के चिन्ह को हथियाना है।

उत्तर प्रदेश में पिता-पुत्र के मध्य चल रही ये नूरा-कुश्ती बेचारी साइकिल पर भारी पड़ती जा रही है। बेजबान साइकिल अपना दर्द भी तो किसी से बयां नहीं कर सकती सो भीतर ही भीतर जंग खाए जा रही है। कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा उसने कि एक दिन ऐसे विकट टाइप झगड़े भी देखने-झेलने को मिलेंगे। पार्टी में अब कोई भी ‘साइकिलवादी’ नहीं है या तो पितावादी हैं या फिर पुत्रवादी।

यों भी, पारिवारवादी पार्टियों के बीच राजनीतिक झगड़े इसी टाइप के हुआ करते हैं। पर हमें-आपको क्या? हमारा-आपका ‘इंटरटेंनमेंट’ तो ‘मुफत’ हो ही रहा है न। इस झगड़े में अपना दिल क्यों दुखाना? सत्ताएं भला कब जनता की परवाह किया करती हैं, जो हम-आप करें। दूर से बैठे-बैठे ड्रामा देखते रहिए। यहां तो हर रोज ड्रामे का रंग-ढंग बदल रहा है। कभी पिता पुत्र पर हावी तो कभी पुत्र पिता पर।

हां, थोड़ी चिंता साइकिल की जरूर है। उम्मीद है, साइकिल अपने तईं चलने का रास्ता निकाल ही लेगी। भला साइकिल को कौन-सी सड़क या रास्ता या इंसान चलने से रोक पाया है कभी। है कि नहीं...।