गुरुवार, 15 जून 2017

अगले जन्म मुझे भूत ही कीजियो

भूत मुझे बेहद पसंद हैं। बचपन से आकर्षित करते रहे हैं। भूतिया फिल्में देखना। भूतों पर आधारित किस्से-कहानियां सुनना। भूतिया जगहों पर जाना। बड़ा आनंद आता है इन सब में मुझे।

अक्सर खुद को मैं इसलिए भी गरियाता हूं कि मैंने मनुष्य-रूप में जन्म क्यों लिया? भूत क्यों नहीं बना? भूत के रूप में जन्म लिया होता तो इंसानी-दुनिया के दंद-फंद से दूर कितना खुशहाल होता। इंसानों के बीच रहने का दिल नहीं करता अब। बड़े लफड़े हैं इंसानी लाइफ में। हर वक्त जाति-धर्म-राजनीति की चीख-पुकार। आपस में मन-मुटाव। पैसे की अंधी दौड़। नौकरी-चाकरी के बेइंतहा झंझट।

मगर भूतिया दुनिया इससे एकदम अलग है। वहां सब एक समान हैं। न उनकी अधिक तमन्नाएं हैं, न आपस में अधिकारों की जंग।

सबसे दिलचस्प यह है कि भूतों के बीच न कोई बुद्धिजीवि है, न नेता, न समाजसुधारक। सब अपने मन के राजा हैं। मैंने कभी उन्हें विचारों या धर्मनिरपेक्षता के मसलों पर लड़ते-झगड़ते नहीं देखा। खुद इतना ताकतवर होते हुए भी, उनके मध्य कभी जुबानी या हाथ-पैरों का दंगल नहीं छिड़ता। जबकि इंसान अपनी ही बिरादरी वालों से इतना खार खाया रहता है कि कुछ पूछिए मत।

हम इंसानों को ऐसा लगता है कि भूत हमें डराते हैं। हमें मारते या हमारा शोषण करते हैं। जबकि ऐसा कुछ नहीं है। भूत अपने स्वभाव में बेहद ‘शांतिप्रिय’ होते हैं। उनका उद्देश्य हमेशा- न कहूं से दोस्ती न कहू से बैर वाला होता है। चूंकि हम इंसान हर वक्त एक तरह के ‘भय’ में जीते रहते हैं इसीलिए हम भूतों से डरते हैं। कुछ की तो भूत का नाम सुनते ही पैंट गीली हो लेती है।
इंसान बहुत ही डरा हुआ प्राणी है इसीलिए भूतों के नाम से घबराता है।

लेकिन मैं अगले जन्म में भूत बनने की ही तमन्ना रखता हूं। भूतों जैसा जीवन जीना चाहता हूं। खुद भूत बनके इंसान के भय को अपनी अपनी ‘अदृश्य आंखों’ से देखना चाहता हूं। और यह साबित करना चाहता हूं कि भूत भी उम्दा व्यंग्यकार होता है। मैं यह बात दावे के साथ कह सकता हूं कि व्यंग्य का जितना मसाला भूतों के पास रहता है, उतना इंसानों के पास भी नहीं।

तो हे! ईश्वर, ऐ! खुद अगले जन्म मुझे भूत ही कीजियो।

शनिवार, 20 मई 2017

व्यंग्य और क्लीवेज

जितना पसंद मुझे व्यंग्य लिखना है, उतना ही क्लीवेज देखना भी। कभी-कभी तो मुझे व्यंग्य और क्लीवेज एक-दूसरे के पूरक नजर आते हैं। उत्मुक्तता और उत्तेजना दोनों में एक समान होती है। जैसे- व्यंग्यकार को व्यंग्य लिखे बिना चैन नहीं पड़ता, वैसे ही हीरोईनों को क्लीवेज दिखाए (अपवादों को जाने दें) ‘संतुष्टि’ नहीं मिलती। फिल्मों में क्लीवेज दिखाना कितना कहानी की डिमांड होती है और कितना फसाना यह तो मैं नहीं जानता मगर हां ‘शो-ऑफ’ के लायक अगर कुछ है तो देखने-दिखाने में क्या हर्ज? यह तो निर्भर सामने वाले की ‘मानसिकता’ पर करता है कि वो क्लीवेज को ‘जस्ट एंटरटेनमेंट’ एन्जवॉय करता है या फिर सभ्यता-संस्कृति के मूल्यों पर खतरा।

अक्सर हैरानी होती है मुझे कि इतना आधुनिक और डिजिटल होते जाने के बाद भी हमें क्लीवेज पर बात या चर्चा करना बड़ा भद्दा टाइप लगता है। मानो कोई पाप-शाप कर रहे हों। किसी देसी-विदेशी हीरोईन की क्लीवेज को देखते ही जबान से ‘वाह! क्या कमाल क्लीवेज है’ अगर निकल जाए तो अगला इतनी ‘असभ्य नजरों’ से हमें देखता है मानो हम उसकी शर्ट के बटन खोलने की हिमाकत कर रहे हों। अरे भाई अगर कोई सुंदर क्लीवेज नजर आई और तारीफ कर दी तो इसमें इतना बिफर पड़ने की क्या जरूरत है? अमां, जब खूबसूरत चेहरे की तारीफ की जा सकती है तो मदमस्त क्लीवेज की क्यों नहीं? क्या क्लीवेज इंसान के शरीर से बाहर का पार्ट होती है?

ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब हीरोईन दीपिका पादुकोण ने लोगों की यह कहकर कि ‘मेरी क्लीवेज, मेरी मर्जी’ कैसे बोलती बंद कर दी थी। दीपिका को अपनी क्लीवेज पर गर्व है तो उस गर्व की तारीफ करने में क्या जाता है? तारीफें इंसान को हरदम कुछ नया करने के लिए प्रेरित करती हैं।

क्लीवेज की एक झलक ही इंसान को इतना ‘तृप्ति’ कर सकती है, जितना कि संपूर्ण देह-दर्शन नहीं। उसी प्रकार, व्यंग्य के भीतर छिपे छोटे-गहरे पंच भी एक प्रकार से व्यंग्य की क्लीवेज ही होते हैं। जो काम पूरा व्यंग्य नहीं कर सकता वो पंच कर जाते हैं। वनलाइनर इन्हीं पंच को और ग्लैमरस बनाने के काम आते हैं। व्यंग्य का बाहरी और भीतरी ग्लैमर पंच और वनलाइनर से ही तो निखरता-संवरता है। व्यंग्यकार के पास अगर अपने व्यंग्य के ग्लैमर को साधने का हुनर है फिर तो बल्ले-बल्ले...।

व्यंग्य में क्लीवेज का जिक्र हालांकि शुचितावादियों को अटपटा टाइप जरूर लगेगा, लगने दो। जब तक लगेगा नहीं तब तक वे अपने परंपरावादी दायरों से बाहर निकलेंगे नहीं। सच तो यही है कि बिना पंच (क्लीवेज) का इस्तेमाल किए व्यंग्य रचा ही नहीं सकता। पंच और वनलाइनर का मिक्सचर ही व्यंग्य को ‘हॉट’ बनाता है। एंवई, ‘ठंडे व्यंग्य’ लिखने का अब कोई मतलब न रहा प्यारे। व्यंग्य का जमाना बहुत बदल गया है। ‘माइक्रो-व्यंग्य’ ही आजकल चलन में है। कम शब्द, ज्यादा आनंद।


मेरी तो कोशिश यही रहती है कि मैं अपने हर व्यंग्य में क्लीवेज (पंच) की खूबसूरती बनाए रखूं। ताकि पढ़ने वाले को ‘रस’ मिले। जरूरी है, पढ़ने और लिखने वाले के दिल का जवान रहना, तभी तो व्यंग्य और क्लीवेज की मस्तियां तन में आनंद बरकरार रखेंगी।

गुरुवार, 18 मई 2017

अपने ही फैलाए वायरस से डरता इंसान

सच पूछो तो मुझे वायरस का डर नहीं। हंसी तो मुझे इस बात पर आ रही है कि इंसान अपने ही फैलाए वायरस से खुद डर रहा है। जगह-जगह चेतावनियां देता फिर रहा है कि रेन्समवेयर वायरस से बच कर रहें। ऐसी-वैसी कोई फाइल या इ-मेल न खोलें। जरा-कुछ खतरा दिखे तो तुरंत अपना कंप्यूटर बंद कर दें। हां, फिरौती के लिए मांगी गई रकम तो बिल्कुल भी न दें।

अचानक से इतना डर, इतना भय क्यों और किसलिए? रेन्समवेयर वायरस भगवान का नहीं इंसानों का बनाया एवं फैलाया हुआ है। इसका उद्देश्य भगवान को नहीं केवल इंसानों को नुकसान पहुंचाना है। उंगुली को टेढ़ा कर पैसा वसूलना है। यह सब तिकड़मबाजियां तो इंसान ने ही इंसान को सिखाई-पढ़ाई-बताई हैं। फिर इनसे क्या घबराना?

इंसान खुद को चाहे कितना ही ‘बलशाली’ प्राणी क्यों न कह ले लेकिन होता वो बहुत ‘डरपोक’ टाइप है। खुल्ला कहूं तो जानवरों से भी ज्यादा डरपोक। गीदड़-भभकी का जानवर फिर भी मुकाबला कर लेते हैं किंतु इंसान तो तुरंत इतना दूर भाग जाता है लंगूर को देखकर बंदर।

बताइए, एक वायरस से पूरी दुनिया डरी पड़ी है। कमाल देखिए, इतना आधुनिक और टेक्नो-फ्रैंडली होने के बावजूद वायरस का कोई तोड़ उसके पास नहीं। बैंक, एटीएम, मेल आदि-इत्यादि बंद करवा रखे हैं, कहीं रेन्समवेयर सबकी लंका न लगा दे। हालांकि कई जगह लगा भी चुका है। तो भी क्या...?

अमां, यह कोई पहला या अनोखा वायरस नहीं जो इतना विकट होकर फैला है। इससे पहले भी कई तरह के वायरस हमारे सिस्टम को तबाह कर चुके हैं। वे सब भी इंसानों के ही फैलाए हुए थे। ब्राह्मांड से नहीं उतरे थे। किन्हीं देवताओं या राक्षसों ने उन्हें नहीं बनाया था। तिस पर भी हम हार गए। अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार कर पड़ोसी से कह रहे हैं- भाई, जरा दवा लगा दे। दवा लगते ही थोड़ी-बहुत राहत जैसे ही मिलती है इंसान अपने दर्द को भूलाकर दूसरे किसी बड़े हमले का इंतजार करता हुआ मिलता है। दोबारा हमला होते ही फिर वही रटी-रटाई चिंताएं-सावधानियां हवाओं में दौड़ने लगती हैं।

इन किस्म-किस्म के वायरसों पर अधिक चिंता करने की जरूरत नहीं। ये होते रहे हैं। होते रहेंगे। जिम्मेवार ठहरा कर दोष चाहे किसी भी देश को दे लीजिए मगर इंसान अपनी ‘काली फितरत’ को कभी नहीं छोड़ने वाला। निरंतर आधुनिक या डिजिटल होकर वो किसी न किसी तरीके से खुद को ही नुकान पहुंचा रहा है। कभी वायरस फैला कर। कभी वेबसाइट हैक कर। कभी एटीएम से बेलेंस उड़ा कर। कभी डाटा करप्ट कर।

लुत्फ तो यह है कि इंसान ही इंसान के इजाद किए गए तोड़ को नहीं भेद पा रहा। तमाम सवाधानियों-चिंताओं के बीच खुद भी उलझा रहता है। दूसरों को भी उलझाए रखता है।

आज नहीं तो कल रेन्समवेयर का खतरा टल ही जाएगा। लेकिन इस बात का क्या भरोसा कि अगला फैलने वाला वायरस इससे भी ज्यादा स्ट्रौंग न होगा?

बुधवार, 17 मई 2017

चिप-कांडः इंसानी खोपड़ी का जवाब नहीं

पिछले कई दिनों से अखबार और खबरिया चैनल ‘चिप-मय’ दिख रहे हैं। तेल के खेल में प्रयोग की जानी वाली ‘चिप’ की खबरें खोद-खोद कर छापी-दिखाई जा रही हैं। लोग कभी चिप को तो कभी तेल मालिकों को ‘कोस’ रहे हैं। चिप-कांड ने न केवल सरकार बल्कि चिप-धारकों की नींद भी हराम कर रखी है। क्या तो तेल वाले, क्या तो मोबाइल वाले हर कोई चिपों के लेकर ऐसे ‘डरे-सहमे’ हुए हैं मानो यह कोई ‘चरस-गांजा’ टाइप हो।

कुछ भी कहिए पर ‘दाद’ देनी पड़ेगी इंसानी खोपड़ी की। जाने कहां-कहां से कैसे-कैसे धांसू आइडिया दिमाग में ले आते हैं। पर्दे के पीछे सारा खेल खुल्लम-खुल्ला चलता रहता है। भनक कहीं जाके तब लग पाती है, जब अच्छा-खासा माल पिट लिया जाता है। इंसानी (करतबी) खोपड़ी के आगे कंप्यूटर तो क्या कैलक्युलेटर तक फेल है।

कस्टमर की जेब का गेम चिप के सहारे बजाने का आइडिया जिस भी बंदे का रहा हो मगर था ‘नायाब’। अभी तलक तो हमने चिप का ज्यादा से ज्यादा यूज मोबाइल में या किसी डिजिटल मशीन के भीतर ही देखा-सुना था। लेकिन चिप के सहारे तेल का खेल भी खेला जा सकता है, यह वाक्या पहली दफा ही सामने आया।

कुछ गलत नहीं कहते अगर यह कहते हैं कि कुछ भी हो सकता है। ऐसे तिकड़मी और घोर-जुगाड़ू मसलों को देख-सुनकर तो यह बात और भी ‘बलबती’ हो जाती है। पूरी दुनिया में इंसानी दिमाग से तेज और बेहतर कोई चीज दौड़ ही नहीं सकती। घपलों-घोटालों के मामलों में तो खासकर। देखिए न, पेट्रोल पंप मालिक बड़ी तत्परता के साथ चिप-कांड करते रहे। न इसकी भनक ग्राहक को कभी लगने दी, न सरकार को। और जब चिप का राज खुला तो ऐसे-ऐसे किस्से सामने आए कि दांतों तले उंगुली भी दबा लो तो भी उंगुली को कोई फरक न पड़े।

चिप बनाने वालों ने कभी सपने में भी न सोचा होगा कि एक नन्हा-सा आइटम इतना बड़ा कांड कर सकता है। डाइरेक्ट दिल पर न लीजिएगा लेकिन प्रधानमंत्रीजी के ‘डिजिटल’ और ‘न्यू इंडिया’ के सपने को ढंग से ऊंचाईयों पर ये लोग ही ले जा रहे हैं। इंसानी दिमाग इतने फितुरों से भरा पड़ा है कि कब कहां क्या खेल खेल जाए कुछ नहीं पाता। कोड पूछकर बैंक खाते से रुपये साफ करने के किस्से तो अब चोरी-चकारियों की तरह आम हो चले हैं। शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता हो जब फ्रॉड द्वारा किसी बंदे के लुटने की खबर अखबार में न छपती हो। ठग-विद्या में इंसानी खोपड़ी महारत हासिल कर चुकी है। महारत।

आलम यह है कि यहां जिसे ‘ठलुआ’ समझो वो एक दिन बड़ा कांड करने वाला निकलता है। उसके कांड के किस्से जब अखबारों में छपते हैं, तब कहीं जाकर यह एहसास होता है कि दिमाग का असल इस्तेमाल तो ठलुए ही कर रहे हैं। चिप कांड भी कुछ-कुछ ऐसा ही है। सारा खेल खेल लिए जाने के बाद सरकार और अधिकारी नींद से जाग रहे हैं। वाह!

आगे चिप कांड वालों का तेल पुलिस या प्रशासन कैसे निकालेंगे यह बाद की बात रही फिलहाल तो उनकी खोपड़ी की चपलता पर रश्क कीजिए और अपनी कटी जेबों पर आंसू बहाइए।

काहे के गरीब मुल्क

वो तो एंवई लोग छोड़ते रहते हैं कि इंडिया गरीब मुल्क है। जबकि ऐसा कतई नहीं है। इंडिया राजा-महाराजाओं के जमाने में भी ‘सोने की चिड़िया’ था, अब भी है। फर्क सिर्फ इतना आया है कि अभी सोने की चिड़िया को चंद बड़े लोगों ने हैक कर रखा है। पर कोई नहीं…। कभी-कभी छोटे लोग भी सोने की चिड़िया का लुत्फ अपनी सुविधानुसार ले लेते हैं। किंतु गरीब वे भी नहीं है।

आम लाइफ में किसी आम आदमी को गरीब कह दो तो अगला यों ‘भड़क’ उठता है मानो कोई ‘अश्लील’ टाइप गाली दे डाली हो। गरीब शब्द और गरीबी की परिभाषाएं किताबों या फिर वाम विचारकों के मुंह से सुनने में ही अच्छी लगती हैं। जबकि असल जिंदगी में गरीब तो वे भी नहीं होते।

मैं तो यह कहता हूं कि हम अपने को गरीब माने ही क्यों? जिस देश में बाहुबली-2 एक हजार करोड़ कमा और जस्टिन बीबर का शो सौ करोड़ कूट ले जाए भला वहां की जनता गरीब कैसे हो सकती है? वे तो गरीब शब्द के आस-पास भी कहीं नहीं ठहरते।

सुना कि तीन से लेकर पचहत्तर हजार रुपये तक का टिकट बिका था बीबर के लाइव शो का। क्या सेलिब्रिटी, क्या नॉन-सेलिब्रिटी हर वर्ग का बंदा-बंदी बीबर को देखने-सुनने को बेताब था। विदेशियों के प्रति हमारी बेताबी का आलम तो पूछिए ही मत। किसी ट्यूरिस्ट प्लेस या फिर जहां विदेशी लोग इकठ्ठा हों आम भारतीय जब तलक उनके साथ एकाध फोटू या सेल्फी नहीं ले लेता, उसके हलक से रोटी का गस्सा ही नहीं उतरता। तो बीबर के शो में अगर भारतीयों में पचहत्तर हजार का टिकट खरीद भी लिया तो कौन-सा गुनाह कर दिया?

हां, यह बात अलग है कि बीबर केवल ‘लिप सिंग’ कर हमें ‘मूर्ख’ बनाकर चला गया पर विदेशियों से मूर्ख बनने में हमें ज्यादा आनंद आता है न। अच्छा, कुछ होड़ भी होती है हममें कि अगर सामने वाला बाहुबली या बीबर देखने जा रहा है तो अगला घर पर कैसे रह सकता है। नोट को जेब में पड़े-पड़े सड़ना नहीं चाहिए। बाहुबली या बीबर के बहाने बढ़ने वाली आय से ही तो पता चलता है कि हम अब गरीब टाइप मुल्क नहीं रहे।

सरकार की कोशिश भी यही है कि न्यू इंडिया का हर बाशिंदा टेक्निकली-इकॉनोमिकली संपन्न हो। डिजिटल और कैशलेस होते इंडिया की तरफ बढ़ते हमारे कदम गरीबी से मुक्ति की ही तो पहल है। देश तो नोटबंदी के वक्त भी गरीब नहीं हुआ था। कहीं न कहीं से किसी न किसी के पास से लाखों-करोड़ों रुपये मिलने की खबरें आ ही जाती थीं। जिन्हें नोटबंदी के दिनों में लाइनों में खड़े होने से दिक्कत थी वे बाहुबली और बीबर के लिए बिना किसी तकलीफ खड़े रहे। ये है न्यू इंडिया।

वाम विचारकों को अब अपना पुराना राग छोड़ देना चाहिए। उनका रात-दिन गरीबी-गरीबी चिल्लाना अब काम नहीं आना। मुल्क को गरीब कहने से पहले एक दफा उन्हें बाहुबली-2 और बीबर के आंकड़ों को भी देख ले ना चाहिए।

बाहुबली-2 की अपार कामयाबी के बाद से मैंने तो खुद को गरीब कहना-मानना ही बंद कर दिया है। मैं तो फख्र के साथ कहता हूं कि मैं उस मुल्क का बाशिंदा हूं जहां की जनता ने बाहुबली-2 को एक हजार करोड़ की कमाई करवाई है। फिर काहे के गरीब मुल्क?

सोमवार, 8 मई 2017

थोड़ी सी जो पी ली है

हालांकि चीते को पीते कभी देखा तो नहीं मगर एक ऐड में दिखाया गया था कि चीता भी पीता है। यों, पीने पर किसी के ‘रोक-टोक’ नहीं। इंसान हो या जानवर कभी भी, कहीं भी, कैसे भी पी सकता है। बहुत से तो पीने को अपना ‘लोकतांत्रिक अधिकार’ मानते हैं। हां, यह बात अलग है कि पीने के बाद वे खुद ‘होश’ में नहीं रहते। लेकिन पीना जरूरी है। ऐसी उनकी ‘दिली-मान्यता’ है।

ऐसा सुना है, इंसान या तो दर्द गलत करने या फिर खुशी को सेलिब्रेट करने के लिए पीता है। उसकी तासीर ही कुछ ऐसी है कि हलक से नीचे जाते है पूरी दुनिया रंगीन टाइप नजर आने लगती है। चलो, इंसान की पीने-पिलाने की दिलचस्पी तो समझ आती है लेकिन चूहों को उस रंगीन पानी में ऐसा क्या खासा नजर आया जो- बिना हिचकी लिए- पूरी नौ लाख लीटर अकेले ही गटक गए। क्या इंसान के साथ-साथ चूहे भी मदिरा-प्रेमी हैं? हां, हो भी सकते हैं। दुनिया में किसी इंसान या जानवर का कोई भरोसा नहीं कब किस तरह का शौक पाल ले। शौक बड़ी चीज है।

वैसे, वैज्ञानिकों के लिए चूहों का इतनी मात्रा में शराब गटकना बड़ा शोध का विषय बन सकता है। पीने के बाद उनका व्यवहार खुद के या अपने साथियों के प्रति कैसा रहा? पीने के बाद वे कितना लुढ़के, कितना संभले, किस टाइप की शायरी उनके मुंह से निकली? हां, कौन सा वाला ब्रांड उन्हें सबसे ज्यादा पसंद आया।

पीने के मामले में अब कोई यह नहीं कह सकता कि चूहे इंसानों से कमतर हैं। इस नाते शराब की डिमांड देश में और अधिक बढ़ जानी चाहिए। फिर भी, पता नहीं क्यों कुछ राज्य शराब-बंदी पर इतना जोर दे रहे हैं। गम को गलत करने का इससे बेहतर साधन कोई नहीं हो सकता। यह बात बिहार के चूहों ने साबित भी कर दी है।

अब तो उस दिन का इंतजार है मुझे जब इंसान और चूहे साथ बैठकर जाम छलकाएंगे। क्या उम्दा जुगलबंदी होगी दोनों के बीच। कभी इंसान चूहे को तो कभी चूहा इंसान को पैग बनाकर देगा। बीच-बीच में दोनों के बीच थोड़ी-बहुत तू तू मैं मैं भी हो जाया करेगी।

पीने की इतनी सामर्थ्य चूहों में होगी किसी से सोचा भी न था। फिर भी, चूहों ने नौ लाख लीटर शराब गटक कर ठीक ही किया। शराब के बेकार चले जाने से तो बेहतर यही रहा कि किसी के काम ही आ गई। भले ही चूहों के आई। भलाई में किसी की क्या जाता है।

मगर चूहों के पीने पर हंगामा खड़ा होना गलत है। उनके जरा से पेट में थोड़ी सी ही तो गई होगी। थोड़ी सी पी लेने में क्या जाता है। शौक बड़ी चीज है। बना रहना चाहिए। बाकी कहने वाले तो जाने क्या-क्या कहते रहते हैं।

गुरुवार, 4 मई 2017

बाहुबली सेंसेक्स

आज जिधर भी निगाह उठाकर देख लीजिए, सबसे अधिक चर्चे कटप्पा के बाहुबली को मारने के ही मिलेंगे। हालांकि बाहुबली-2 सिनेमा घरों तक पहुंच चुकी है। लोगों ने देख भी ली है। लोग देख भी रहे हैं। किंतु यह सवाल अब भी वहीं का वहीं है कि कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा? लुत्फ देखिए, बाहुबली मरा फिल्म में है, ‘चिंतित’ पूरा समाज है।

लेकिन कटप्पा-बाहुबली के इस रहस्यमयी द्वंद्व बीच एक बेमिसाल खबर ऐसी भी रही जिस पर किसी का ध्यान ‘न’ के बराबर ही गया। अभी चंद रोज पहले ही हमारा सेंसेक्स तीस हजारी हुआ। दलाल पथ ‘झूम’ उठा। अर्थव्यवस्था को ‘बूस्ट-अप’ मिला। व्यापार चैनलों पर ‘उत्सव’ टाइप माहौल रहा। निवेशकों के दिल अपार खुशियों से गद-गद हो गए। किंतु समाज और सोशल मीडिया सेंसेक्स की इस ‘आला उपलब्धि’ को यों ‘इग्नोर’ किए रहा जैसे- वाम सोच वाले राष्ट्रवादियों को किए रहते हैं। जिस लोकतांत्रिक और समावेशी व्यवस्था पर अक्सर हम लंबे-चौड़े लेक्चर देते हैं, सेंसेक्स के संदर्भ में बहुत ही ‘उदासीनता’ का माहौल रहा।

सेंसेक्स का तीस हजारी होना कोई छोटी-मोटी खबर या उपलब्धि नहीं। यहां तक पहुंचने में सेंसेक्स ने न जाने कितने आड़े-तिरछे पड़ावों को पार किया। कितने ही लोगों की जली-कटी सुनी। मंदड़ियों के घातक नक्कों को सीधे जिगर पर झेला। कितने ही भीषण करेक्शनों की मार झेली, फिर-फिर साहस के साथ उठ खड़ा हुआ। किंतु हमारे समाज ने उसकी तीस हजारी कामयाबी पर ‘लड्डू’ खिलाना तो छोड़िए उसे ‘बधाईयां’ तक न दीं।

समाज की सेंसेक्स के प्रति इस ‘एग्नोरेंस’ से मैं बेहद ‘आहत’ हूं। हर उस व्यक्ति की ‘कड़ी निंदा’ करता हूं जिसने सेंसेक्स को यों ‘उपेक्षित’ रख छोड़ा।

प्रायः मैंने देखा-सुना है कि लोग सेंसेक्स को ‘गुलाबी अर्थव्यवस्था’ का प्रतीक मानते हैं। कहते हैं, सेंसेक्स एलिट वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है वनिस्पत निम्न या मध्य वर्ग के। लोगों की सेंसेक्स के प्रति ये धारणा बहुत गलत है। सेंसेक्स हमारी अर्थव्यवस्था का ‘टर्निंग प्वाइंट’ है। सेंसेक्स बढ़ता है तो देश की इकॉनोमी में सुधार होता है। जीडीपी में निखार आता है। दूसरे मुल्कों के बीच देश की आन-वान-शान बढ़ती है। भारत कृषि-प्रधान मुल्क होने के साथ सेंसेक्स-प्रधान भी है, न भूलें। तीस हजारी होने के बाद से तो उसकी जिम्मेदारियां और भी बढ़ जाती हैं।

सबसे खास बात। सेंसेक्स ने कभी किसी का ‘अहित’ नहीं चाहा। हां, ज्यादा मुनाफा कमाने के लालच में लोग खुद ही अपना अहित कर बैठे तो उसे लिए भला सेंसेक्स क्यों दोषी हो? सेंसेक्स ने कभी किसी निवेशक से सट्टा करने को नहीं कहा। निवेशक अगर खुद ही सट्टा करने लग जाए तो भला सेंसेक्स क्या करे? देखो जी, सेंसेक्स तो समंदर है, यहां जितना डालेंगे उतना उसमें समाता चला जाएगा। अपनी चादर के अनुसार पैर तो आपको फैलाने हैं।

मतलबपरस्ती हम पर इतना हावी रहती है कि हम अपनों को तो जीत या कामयाबी की बधाईयां दिन-रात देते रहते हैं किंतु सेंसेक्स के एचीवमेंट पर मौन साधे हुए हैं। कटप्पा-बहुबली-आइपीएल की खुमारी जरा बाहर निकलिए हुजूर और सेंसेक्स को उसके तीस हजारी होने की शुभकामनाएं दीजिए ताकि उसे भी लगे कि लोग उसे भी ‘प्यार’ करते हैं।

बुधवार, 3 मई 2017

अब दिमाग से सोचना बंद

जब से अखबार में खबर पढ़ी है कि फेसबुक ‘ब्रेन सेंसिंग तकनीक’ पर काम कर रहा है। मतलब, हमारा दिमाग जो सोचेगा, वही हमारी फेसबुक वॉल पर उतरता चला जाएगा। तब से मैंने दिमाग से सोचना ही बंद कर दिया है! दिमाग को खोपड़ी से अलग कर एक कोठरी में ताला-बंद कर दिया है। न सांप होगा, न लाठी टूटेगी।

दिमाग है कुछ भी सोच सकता है। किसी का कोई जोर थोड़े न रहता है उस पर। पता चला फेसबुक खोले बैठा हूं, आ गई दिमाग में कोई ऐसी-वैसी बात, तुरंत उतर गई मेरी फेसबुक वॉल पर। तब सोच सकते हैं क्या होगा मेरा? ऐसी-वैसी बात पर कब तक किस-किस को यह सफाई देता फिरूंगा कि इस सोच के लिए मैं नहीं दिमाग दोषी है। कौन मानेगा भला?

यों, फेसबुक पर बवाल पहले ही क्या कम हैं, जो अब यह ब्रेन सेंसिंग तकनीक गजब ढहाएगी। न जाने जुकरबर्ग के भेजे में कैसी-कैसी वाहियात तकनीकें घर करती रहती हैं। पहले ‘डिस्लाइक’ के बटन को लेकर अच्छा-खासा रायता फैला था। यहां तो ‘लाइक’ न देने पर लोग राशन-पानी लेकर सिर पर सवार हो लेते हैं। कहीं अगर डिस्लाइक का बटन आ जाता तो खुद जाने क्या-क्या, कैसे-कैसे हंगामें कट रहे होते फेसबुक के प्लेटफॉर्म पर।

चलो बोलकर लिखने वाला स्टेटस तो समझ आता है, जिसे बाद में हम अपने अनुसार एडिट भी कर सकते हैं। किंतु ब्रेन सेंसिंग तकनीक तो पूरी बावल-ए-जान है। क्या जुकरबर्ग को मालूम नहीं कि मनुष्य दिल से कहीं ज्यादा अपने दिमाग का गुलाम है। दिमाग अच्छा भी सोच सकता है। बुरा भी। यों भी, हर किसी का दिमाग न ओशो की तरह गहराई लिए होता है, न कबीर की तरह सच्चाई लिए। कुछ के दिमाग तो शक्ति कपूर से भी कहीं अधिक अश्लीलताएं लिए होते हैं। उनका क्या होगा?

दिमाग कोई बच्चा थोड़े है कि आंखें दिखाईं और मान गया। दिमाग प्रत्येक सोच के बंधन से मुक्त होता है। चाहे तो शोध करवा के देख लीजिए, मनुष्य के दिमाग में कायदे की बातें कम, बे-कायदे की ही अधिक आती हैं। ये सब फेसबुक पर सीधा जब आने लग जाएगा फिर तो जाने कितनों को लेने के देने पड़ जाएंगे।

जुकरबर्ग तुम स्वयं एक पति हो। जरा उन लाखों पतियों पर तो रहम फरमाओ जो दिन में कितनी ही दफा अपनी पत्नी के अतिरिक्त अपनी पड़ोसन, अपने ऑफिस की कॉलिग, अपनी पक्की दोस्ती आदि-इत्यादि के बार में दिमाग में जाने क्या-क्या सोच लेते हैं। उनके दिमाग की वो सोच कहीं उनके फेसबुक स्टेटस पर जाहिर होने लग गई और उनकी पत्नियों ने पढ़ ली फिर खुद ही अनुमान लगा सकते हो, उन बेचारे पतियों का क्या हश्र होगा। कहीं के नहीं रहेंगे वे। अपने दिमाग का पाप भुगतेंगे वे बेचारे। यह ब्रेन सेंसिंग तकनीक तो उन पतियों के लिए किसी ‘अभिशाप’ से कम नहीं प्यारे जुकरबर्ग। क्यों हम पतियों की बसी-बसाई दुनिया को अपनी बेतुकी तकनीक के बल पर ऊजाड़ देना चाहते हो।


मेरे विचार में न केवल जुकरबर्ग बल्कि फेसबुक को भी अपनी ब्रेन सेंसिंग तकनीक पर पुर्नविचार जरूर करना चाहिए। या फिर पतियों को ही फेसबुक से अपना नाता तोड़ लेना चाहिए। अपने दिमाग पर भला किसका जोर चला है आज तक।

मंगलवार, 2 मई 2017

ऐसा हारे कि चारों खाने चित्त

वे हार गए। बहुत ही बुरी तरह से हारे। ऐसा हारे की चारों खाने चित्त हुए पड़े हैं। ईमानदारी धरा पर धरी की धरी रह गई। न केवल टोपियां उछलीं बल्कि झाड़ू तक जब्त हो गई। ये सब उनकी आंखों के सामने होता रहा। अफसोस, न वे ईंट से ईंट ही बजा पाए न ईवीएम के कथित झूठ को जनता के सामने ला पाए। अति-अहंकार के मद में डूबा उनका सत्ता का गुरूर जनता ने क्षण भर में मिट्टी में मिला दिया।

इसीलिए तो कहा गया है कि राजनीति या सत्ता के प्लेटफॉर्म पर सबसे जीता जा सकता है किंतु जनता से नहीं। जनता हमेशा ही माई-बाप होती है। कब किसको किस तरह से धूल चटवा दे कुछ नहीं पता।

ईमानदारी को संभाल पना हर किसी के बूते का नहीं होता। मैंने बड़े अच्छों-अच्छों को अपनी कथित ईमानदारियों से डोलते हुए देखा है। उनकी ईमानदारियां हाथी के दांत सरीखी होती हैं- बाहर से दिखाने की कुछ, अंदर से खाने की कुछ। ईमानदार की जीभ पर एक दफा जब सत्ता का स्वाद चढ़ जाता है न तब वो खुद के प्रति भी निष्पक्ष नहीं रह पाता। ऐंठ और अहंकार की खुमारी उसे दीवाना बनाए रखती है। यों, दीवानगी बुरी बात नहीं लेकिन जब आपे से बाहर हो जाए तो खतरा-ए-जान है।

कमाल देखिए, इतना हारने के बाद उनकी ऐंठ अभी भी गई नहीं। ईवीएम की खलनायकी अब भी उनके दिमाग में चलहकदमी कर रही है। हारने वाला अपनी हार को कहीं न कहीं तो डिफेंड करेगा ही न। सो, वे भी कर रहे हैं। मगर इससे अब हासिल कुछ नहीं होना। हां, पछतावा होता तो बात समझ में भी आती। लेकिन, यहां तो पछतावे का कोई सीन ही दूर-दूर तक नजर नहीं आता।

उन्हें आड़े-तिरछे बयान देते वक्त इतिहास के पन्ने अवश्य ही पलट लेने चाहिए थे। ऐसे तमाम राजा-महाराजा, तोपची-धुरंधर आए और चले गए। जिन्होंने कभी दूसरों की ईंट से ईंट बजाने की कोशिशें की अंततः वहीं ईंटें खुद उन्हीं के जा लगीं। ईंटों में कोई समझ-बूझ तो होती नहीं। जहां जिस दिशा में फेंक दी जाती हैं, वहीं जा लगती हैं। राजनीति हो या समान्य जीवन जैसे को तैसा होते देर ही कितनी लगती है।

राजनीति एक ऐसी शै है, जहां ईमानदारी से कहीं ज्यादा जरूरी धैर्य और जबान होती है। जिसके पास न धैर्य है न जबान, उसकी गाड़ी राजनीति में ज्यादा लंबी चल नहीं पाती। जनता एक दिन उसे खारिज कर ही देती है। जैसे- उन्हें कर दिया गया। अब न वे घर के रहे, न घाट के। मगर उन्हें ये समझ में आए तब न।

लुत्फ देखिए, ईंटें भी वहीं हैं। ईवीएम भी वहीं हैं। अगर कुछ नहीं है तो वे। क्योंकि उनका अहंकार उनकी लुटिया डुबो चुका है।

सोमवार, 1 मई 2017

हवाई चप्पल के प्रति मेरा प्रेम

मुझे चप्पलों- विशेषकर ‘हवाई चप्पल’- से बेहद लगाव है। हवाई चप्पल न केवल मेरी जिंदगी बल्कि मेरे लेखन का भी ‘आईना’ है। एक ऐसा आईना जिसमें बैठे-ठाले मैं अपनी सूरत निहारता रहता हूं। जितना ‘सुकून’ मुझे हवाई चप्पल पहनकर मिलता है, उतना ब्रांडेड जूते पहनकर भी नहीं।

हवाई चप्पल में गजब की आत्मीयता होती है। न इसमें वर्ग भेद है, न वर्ण भेद। धर्मनिरपेक्षता की सबसे मजबूत निशानी हवाई चप्पल ही है। हवाई चप्पल के पैरों में आते ही सिर के ऊपर से ‘एलिटता का भाव’ तुरंत ‘उड़नछू’ हो लेता है। इसका जमीनी एहसास अमीर को भी उतना ही मुतमइंन किए रहता है जितना गरीब को। मैं तो अक्सर ही हवाई चप्पल पहनकर बड़ी-बड़ी पार्टियों में यों ही चला जाता हूं। मजाल है, वहां मौजूद किसी भी शख्स ने मेरी चप्पलों के स्टेटस पर सवाल उठाया हो। बल्कि कई दफा तो लोगों ने मुझसे डिमांड की है कि मैं उन्हें भी हवाई चप्पल लाकर दूं। क्या है की वे अब भीषण एलिटता की निशानी जूतों को पहन-पहनकर उकता चुके हैं।

दूसरों की जाने दीजिए, पिछले दिनों स्वयं प्रधानमंत्रीजी ने हवाई चप्पल की वकालत यह कहकर की थी कि मैं चाहता हूं, हवाई चप्पल पहनने वाला भी हवाई जहाज में सफर करे। बिल्कुल करे। क्या हर्ज है। बल्कि मैं तो कहता हूं, हवाई जहाज की ‘शान’ सिर्फ और सिर्फ हवाई चप्पल पहनने वाले की बढ़ा सकते हैं। क्योंकि जितना ‘सादगी’ का भाव उनके भीतर रहता है, उतना ब्रांडेड जूते पहनने वाले के पास भी नहीं।

ब्रांडेड जूते के मुकाबले हवाई चप्पल खासा हल्की होती है। इससे हवाई जहाज पर पड़ने वाला ‘अतिरिक्त जूतों का भार’ कम होगा। हवाई जहाज का तल खुलकर सांस ले सकेगा। पैर बार-बार जूते पहनने-उतारने की कवायद से मुक्ति पा सकेंगे। मोजों के बंधन से मुक्ति मिलेगी। पैरों को खुलापन महसूस होने के साथ-साथ खुली हवा में रहने का भी आनंद मिलेगा। कितना हसीन नजारा होगा कि एक ही हवाई जहाज में सभी यात्रियों के पैरों में देसी हवाई चप्पल इठला रही होगी।

चूंकि मैं रैगूलर हवाई चप्पल पहनने का आदि हूं। इस बाबत यह बात गारंटी के साथ कह सकता हूं कि जितना ‘कंफर्ट’ हवाई चप्पल में है उतना किसी में नहीं। हवाई चप्पल अपने स्वभाव में जितनी चंचल होती है उतनी ही चपल भी। स्लिम इतनी की जीरो फिगर वाले भी देखकर जल उठें। बताने वाले बताते हैं कि हवाई चप्पल की मार का तोड़ बड़े-बड़े पहलवानों के पास भी नहीं।
हवाई चप्पल का अटूट प्रेमी होने के नाते मुझे अफसोस है कि पिछले दिनों बेचारी चप्पल को काफी ‘बेइज्जती’ का सामना करना पड़ा। वो भी एक बदमिजाज मंत्रीजी के रूखे व्यवहार के कारण। मंत्रीजी ने तो चप्पल को ‘खलनायक’ बना ही डाला था, वो तो प्रधानमंत्रीजी ने हवाई चप्पल की अहमियत समझाकर इसकी ‘इज्जत’ को बचा लिया।

चाहे आप कितनी ही ऊंची से ऊंची कंपनी के ब्रांडेड जूते-सैंडल पहन लें लेकिन जो बात हवाई चप्पल में है वो किसी में नहीं। हवाई चप्पल हमारे पैरों की शान है। इसका स्थान तो कोई ले ही नहीं सकता।


अभी तो मैं पार्टियों या दफ्तर में ही हवाई चप्पल पहनकर जाया करता हूं। अब से मैं न केवल हवाई सफर बल्कि साहित्यिक गोष्ठियों-आयोजनों में भी हवाई चप्पल ही पहनकर जाया करूंगा। वचन देता हूं, हवाई चप्पल की ‘रेलिवेंसी’ को कभी मरने नहीं दूंगा। प्योर देसीपन का सुख हवाई चप्पल में ही है।

शुक्रवार, 31 मार्च 2017

सोशल मीडिया के मूर्ख

यों, दुनिया में मूर्खों की कमी नहीं। सबसे अधिक मूर्ख अब सोशल मीडिया पर ही पाए जाने लगे हैं। सोशल मीडिया पर पाए जाने वाले मूर्खों की अजब ही कहानियां है। ये मूर्ख यहां या तो एक-दूसरे से लड़ते-भिड़ते रहते हैं या फिर लाइक-कमेंट की आस में ‘दुबले’ होते रहते हैं। किसी का खुद पर न किसी और पर कोई जोर नहीं रहता। हर मूर्ख अपनी मूर्खता के साथ स्वतंत्र है।

चूंकि मैं स्वयं सोशल मीडिया का एक ‘मूर्ख’ हूं इस नाते मेरी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि मैं अपनी मूर्खता में कहीं कोई कमी नहीं आने दूं। अपनी मूर्खता को ‘रेलिवेंट’ बनाए रखने की खातिर मैं यहां हर वो हरकत करना पसंद करता हूं जो ‘वायरल’ बने। किसी भी बात या मुद्दे का वायरल होना सोशल मीडिया में सेलिब्रिटी टाइप होने की फीलिंग देता है। मूर्खताएं यहां बहुत तेजी से वायरल होती हैं। सीधा-साधा या बौद्धिक किस्म का ज्ञान अगर यहां दे रहे हैं तो आप नितांत फालतू हैं। आप पर कोई ध्यान नहीं देगा। हां, आप में अगर अपनी मूर्खताओं के दम पर दूसरे को अटरेक्ट करने का माआदा है तो आप हिट हैं। ऊल-जलूल मूर्खताओं की वजह से ही यहां फॉलोइंग बढ़ने में जरा देर नहीं लगती।

यहां किसी से कैसे भी भिड़ने के लिए आप स्वतंत्र हैं। भिड़ने के लिए इज्जत कोई मसला नहीं। अगर इज्जत की ही फिकर करनी है तो घर की चारदीवारी से बेहतर दूसरी कोई जगह नहीं। मैं तो जब से सोशल मीडिया पर आया हूं अपनी इज्जत को घर के एक कोने की खूंटी पर टांग दिया है। केवल मूर्खता को ही अपना हथियार बनाया हुआ है। आदत ऐसी पड़ चुकी है कि मूर्खता अब अपनी-सी लगती है। जिस दिन कोई मूर्खतापूर्ण स्टेटस न अपडेट कर लूं बात बनती ही नहीं।

कहने में शर्म कैसी कि सोशल मीडिया हम मूर्खों का ‘डिजिटल गहना’ है।

फिर भी, यहां कुछ ऐसे लोग हैं जो खुद को मूर्ख कहने से कतराते हैं। आग-बबूला हो उठते हैं। तमाम प्रकार की नैतिकताओं की दुहाईयां देने लग जाते हैं। लेकिन इससे होगा क्या? न लोग आपको मूर्ख कहना बंद करेंगे न मानना। एडजस्ट करके चलने में ही भलाई है। वरना खुदा मालिक।

न सिर्फ सोशल मीडिया बल्कि आम जिंदगी में भी मूर्खता का अपना एक चार्म है। मूर्खता बेफिकरी टाइप होती है। मूर्ख अपनी मूर्खताओं को ज्यादा से ज्यादा एंन्जॉय किया करते हैं। दुनिया भर की तमाम समस्याओं के बीच अगर कुछ पल के लिए हम मूर्ख हो भी लें तो क्या हर्ज है? मूर्खताओं के साथ जिंदगी ज्यादा हसीन लगती है। वरना, यों रोते रहने का क्या है, रोते रहिए। किसे फिकर?

सोशल मीडिया का प्लेटफॉर्म खुद को दिमागी तौर पर हल्का रखने के लिए है नाकि बौद्धिकता झाड़ने के लिए। बौद्धिकता के लिए यहां तमाम जगहें हैं। जरूरत से अधिक बौद्धिकता दिलो-दिमाग के लिए हानिकारक है। हां, मूर्खताओं में आनंद ही आनंद है।


इसीलिए मुझे सोशल मीडिया के मूर्ख पसंद हैं। मूर्खता का अपना मजा है। जरा एक दफा आप भी मूर्ख बनकर तो देखिए हुजूर।

बुधवार, 22 मार्च 2017

क्योंकि हर एक रोमियो लफंगा नहीं होता

न केवल मेरे मोहल्ले बल्कि समूचे उत्तर प्रदेश के रोमियों पर ‘विकट संकट’ आन खड़ा हुआ है। एंटी रोमियो स्कावॉयड बन जाने से उनकी इज्जत पर ‘तगड़ा हमला’ हुआ है। बेचारे अब न खुलकर लड़कियों के स्कूल-कॉलेजों के आसपास टहलकदमी कर सकते हैं न अपनी महबूबा को बाइक पर बैठा कोचिंग छोड़ने जा सकते हैं। यहां तक कि लौंडेनुमा लड़कों को अपनी शर्ट का बटन बंद करके और हेयर स्टाइल को करीने से रखना होगा। नहीं तो कोई भी पुलिस वाला उन्हें पकड़कर बीच सड़क मुर्गा बनाने में कतई गुरेज नहीं करेगा।

रोड साइड रोमियों के प्रति इतने सख्त कानून से मैं बेहद खफा और आहत हूं। तमाम रोमियों के दिलों पर क्या और कैसी गुजर रही होगी बहुत अच्छे से समझ सकता हूं। क्योंकि मैं स्वयं अपने स्कूल-कॉलेज के दिनों में रोमियो रहा हूं। शादी हो जाने के बाद से अब अपनी पत्नी का रोमियो हूं। रोमियोगीरी की जो आवारा टाइप भावनाएं मन में होती है, उन्हें मैंने अभी भी नहीं छोड़ा है। लेकिन हालिया स्थिति को देख-जानकर मुझे अपनी रोमियोगीरी पर पुनः विचार करना पड़ सकता है।

ऐसा सरकार या आम लोगों का सोचना है कि रोमियो सड़कछाप मजनू या लफंगे होते हैं। आती-जाती लड़कियों को छेड़ते या फब्तियां कसते हैं। हां, उनमें से कुछ ऐसी ‘लंफगताऊ प्रवृति’ के हो सकते हैं (इससे इंकार नहीं करता) किंतु एक ही हल से सारे रोमियों को हांक देना भी ठीक नहीं।

मुझे ही देख लीजिए। मेरे जैसे संवेदनशील एवं शालीन रोमियों बहुत कम मिलेंगे। मैं अपनी रोमियोगीरी के प्रति बचपन से ही समर्पित रहा हूं। पड़ोसियों की जली-कटी को सुनने से लेकर पुलिसिया डंडा खाने के बाद भी मैंने रोमियोपंती नहीं छोड़ी। बैठे-ठाले पत्नी भी अक्सर कह देती है कि मैंने इतने टाइप के रोमियो देखे मगर तुम्हारी बात ही कुछ और है।

वही कि ‘एक मछली सारे तलाब को गंदा कर देती है’ की तर्ज पर सारे रोमियो को एक जैसा ही मान लिया गया है। जबकि यह रोमियो बिरादरी पर ज्यादती टाइप है। क्योंकि हर एक रोमियो लफंगा नहीं होता।


मेरी उत्तर प्रदेश सरकार से विनम्र गुजारिश है कि वो एंटी रोमियो स्कावॉयड के बारे में पुर्नविचार करे। लफंगे रोमियो पर बेशक सख्त रहे मगर हम जैसे संवेदनशील रोमियो को बख्शे। इतने जुल्म न ढहाए।

मंगलवार, 21 मार्च 2017

शरारतें जरूरी हैं

मुझमें और शरारत में छत्तीस का आंकड़ा बचपन से रहा है। बताते हैं- जब मैं पैदा हुआ था तब गोदी में आने के बहाने मैंने नर्स को डाइरेक्ट तमाचा जड़ दिया था। बस तभी से मुझे शरारती टाइप बच्चा माना जाने लगा। बचपना गुजर जाने के बाद जवानी आ जाने पर भी मैंने अपनी शरारतों को नहीं छोड़ा। जैसे- चोली दामन के साथ रहा करती है, वैसे ही मेरी शरारतें भी मेरे साथ रहीं। बल्कि शादी हो जाने के बाद तो और ज्यादा बढ़ गईं।

किंतु पत्नी को मेरी शरारतों पर कतई गुस्सा नहीं आता। बल्कि वो तो खुश होती है कि उसे मुझ जैसा प्योर शरारती पति मिला।

मेरा निजी तौर पर मानना रहा है कि व्यक्ति को जीवन में थोड़ा-बहुत शरारती अवश्य होना ही चाहिए। बिना शरारतों के जीवन बड़ा बोरिंग और बोगस टाइप जान पड़ता है। ऐसी लाइफ के भी भला क्या मायने जहां शरारतें न हों। दिल को ताउम्र बच्चा ही बनाए रखना चाहिए ताकि वैचारिक या धार्मिक बड़प्पन हम पर हावी ही न हो। जरा-बहुत सीरियसनेस चलती है लेकिन ज्यादा लोड लेने का नहीं।

शरारतों का आलम यह है कि मौका मिलने पर अब भी मोहल्ले के बच्चों के साथ सड़क पर सौ का नोट डाल डोरी बांधकर खींचना या सड़क पर चलते-फिरते बंदे के पीछे भौपूं बजाना या गिल्ली-डंडा खेलते वक्त गिल्ली से पड़ोसियों की खिड़कियों के कांच तोड़ना या कत्ते की दुम में लड़ी बांधकर छोड़ना या भीषण गर्मी में बच्चों के साथ रामगंगा में डूबकी लगाकर उनके साथ खेलना नहीं भूलता। अमां, यही तो असली जिंदगी है। हम तो अपने बड़प्पन में अपना बचपना और शरारतें लगभग बिसरा ही चुके हैं। मगर मेरी हरदम कोशिश यही रहती है कि अपनी ऊल-जलूल शरारतें कभी न छोड़ू। चाहे कोई कुछ भी कहता रहे।

मिस्टर बीन से अक्सर मैं शरारतें करने की प्रेरणा लेता रहता हूं। उन्हें देखकर लगता है कि बंदा ऐसा ही होना चाहिए फुल-टू मस्ती और शरारतखोर। हर बात, हर एक्ट में शरारत। चाहे मिस्टर बीन हों या चार्ली चैप्लिन इनकी शरारतें हमें हर पल गुदगुदाती हैं। जिंदगी के औने-पौने गम या बोझ को कम कर जाती हैं। अगर शरारतें न हों तो बचपन से जवान तक का रास्ता बड़ी ही मुश्किल से कटे।

व्यक्ति अगर इतना ही शरारत-पसंद हो जाए तो फिर जात-बिरादरी, धर्म-संप्रदाय, ऊंच-नीच, काले-गोरे आदि के मसले चुटकियों में न निपट जाएं। नहीं क्या...?

शुक्रवार, 17 मार्च 2017

वामपंथी मित्र से एक मुलाकात

मेरे एक वामपंथी मित्र हैं। पेशे और स्वभाव दोनों में केवल वामपंथ को ही जीते हैं। वामपंथ के अतिरिक्त पूरी दुनिया उन्हें नश्वर और पूंजीवादी टाइप नजर आती है। भीतर से लेकर बाहर तक लाल वस्त्र पहनते हैं। पैरों में लाल चप्पल और सिर में लाल तेल लगाते हैं। खाने में या तो लाल टमाटर खाते हैं या फिर लाल मिर्च। लाल रंग के अलावा न तो वे किसी रंग को पहचानते हैं न महत्त्व देते।

निरंतर डिजिटल होते समय में आज भी हाथ से ही लेख लिखते हैं। हालांकि छपते-छपाते कहीं नहीं हैं लेकिन मन में जिद है कि एक दिन पूरी दुनिया को वामपंथ के रंग में रंगकर रहेंगे। हां, बताता चलूं, वामपंथी मित्र के बच्चे अमेरिका में सैटिलिड हैं। जब-तब अपने बच्चों से एप्पल के आइ-फोन पर बातें करते रहते हैं। मित्र के फेसबुक और टि्वटर एकाउंट भी हैं। लेकिन वहां भी उन्होंने अपनी दीवारें लाल रंग से पोत रखी हैं।

अभी चुनाव परिणाम आने के बाद वामपंथ मित्र सब्जी मंडी में लाल टमाटर खरीदते हुए मिल गए। दुआ-सलाम हुई। एक-दूसरे के हाल-चाल जानें। मित्र थोड़ा ‘परेशान मूड’ में दिखे। मैंने पूछा- ‘क्या हुआ? परेशान से नजर आ रहे हैं? घर-परिवार में सब खैरियत तो है न?’ मुझे रोड से थोड़ा साइड में ले जाकर कहने लगे- ‘यार, बहुत बुरा। बहुत ही बुरा हुआ।‘ मैंने पुनः पूछा- ‘बुरा? क्या बुरा हुआ?’ बोले- ‘हम (वामपंथी पार्टी) उत्तर प्रदेश में फिर ‘जीरो’ साबित हुए। भाजपा-सपा-कांग्रेस की जाने दीजिए हम तो बसपा के करीब तक भी न पहुंच पाए। सारी उम्मीदें पानी में मिल गईं। कॉरपोरेट पूंजीवाद फिर जीत गया।‘

मैंने बेहद कूलता के साथ उनसे कहा- ‘तो क्या हुआ? ये तो होना ही था। राजनीति की जाने दीजिए वामपंथ तो समाज और लोगों के बीच से भी ‘खारिज’ हो चुका है। नई पीढ़ी तो वामपंथ की ए बी सी डी तक नहीं जानती। वामपंथियों की हार पर भला कैसा प्रलाप?’

मेरी बात सुनकर मित्र थोड़ा भुनभुनाए- ‘बहुत ही गलत धारणा है आपके मन में वामपंथ को लेकर। आपको पता होना चाहिए, वामपंथी विचारधारा दुनिया की समस्त धाराओं में सबसे श्रेष्ठ और प्रोग्रेसिव है। आप जैसे जड़-बुद्धि लोगों ने ही हमारे वामपंथ को हर जगह ‘बदनाम’ किया हुआ है। आप खोखले पूंजीवादी हैं।‘

मित्र की ‘पीड़ा’ को मैं समझ सकता था। हारा हुआ वामपंथी अक्सर ऐसा ही बर्ताव करता है। दिमाग पर ज्यादा लोड लेने का नहीं। फिर भी मैंने अपने वामपंथी मित्र को समझाते हुए कहा- ‘देखिए जनाब, आप मुझे कह कुछ भी लीजिए लेकिन हकीकत यही है कि पूरी दुनिया में वामपंथ को ‘कोने में सरका’ दिया गया है। वाम विचारधारा पूरी तरह से ‘इरेलीवेंट’ पड़ चुकी है। और, ये सब आप लोगों की ‘यथास्थितिवादी सोच’ के कारण ही है। जब तलक आप मार्केट, अमेरिका, तकनीक को गरियाते रहेंगे, आप यों ही हाशिए पर धकेले जाते रहेंगे। स्वीकार कर लीजिए, वामपंथियों की नाक टूट चुकी है।‘

लेकिन मित्र मेरा एक भी तथ्य स्वीकार करने की स्थिति में नहीं थे। अब उनका मुझे गरियाना और अधिक बढ़ गया था। आखिर, खीझकर उन्होंने मुझे ‘राष्ट्रवादी’ घोषित कर ही दिया।

यों भी, मित्रों की बातों का ‘बुरा’ मानने का शौक मुझे नहीं है। सो, अपने वाम-मित्र के कहे का बुरा भी मैंने नहीं माना। कौन-सा बुरा मान लेने से वो या मैं अपने विचारों में बदल जाते।

फिर भी, जाते-जाते मित्र यह सलाह देना नहीं भूले कि मुझे वामपंथी विचारधारा को अभी और पढ़ने-जानने की जरूरत है। अपने दिमाग को खोलने की जरूरत है। कॉरपोरेट राजनीतिक पूंजीवाद को समझने की जरूरत है।

फिलहाल, मित्र की सलाहें सर-आंखों पर।

बुधवार, 15 मार्च 2017

व्यंग्य में सरोकार

मैंने इस मसले पर तमाम लोगों से बात की। बीवी से लेकर गर्लफ्रेंड तक की राय ली। सभी छंटे हुए वरिष्ठ व्यंग्यकारों को पढ़ा-सुना। फेसबुक-टि्वटर तक छान मारा। किंतु व्यंग्य में सरोकार का तड़का कैसे डाला जाए- यह बताने को कोई राजी नहीं। अरे, मैं तो उस बंदे को रिश्वत तक देने को तैयार हूं, जो मुझे व्यंग्य में सरोकार पैदा करने का ज्ञान दे सके। मगर अफसोस कोई आगे नहीं आ रहा। सब कन्नी काट रहे हैं।

तो क्या मैं मान लूं, व्यंग्य में सरोकार होते ही नहीं? या व्यंग्य में सरोकारनुमी हवा का जो लोग झंडा बुलंद करते रहते हैं, ‘ठरकी’ टाइप हैं?

कुछ तो जरूर है। अब तक मैंने इतने व्यंग्य खींच लिए मुझे ध्यान नहीं पड़ता कि किसी व्यंग्य में मैंने सरोकार का राग छेड़ा हो। या किसी ने मुझे- आपके टूथपेस्ट में नमक है- की तर्ज बोला हो- आपके व्यंग्य में सरोकार हैं? फिर भी, पता नहीं क्यों कुछ लोग व्यंग्य में सरोकार का हल्ला रात-दिन फेसबुक पर मचाते रहते हैं। जबकि बेचारा सरोकार व्यंग्य में अपने होने न होने पर कभी दुख या एतराज नहीं जताता।

आजकल के जमाने में लोग रिश्तों में परस्पर सरोकार की बात नहीं करते फिर भला व्यंग्य में सरोकार पर क्यों अपना दिमाग खपाएंगे? आज हर आदमी तो व्यस्त है अपनी रोजी-रोटी की जुगाड़ में। अगर वो यों ही यहां-वहां सरोकार ढूंढता फिरेगा तब तो चला लिया उसने अपना घर-परिवार। दफ्तर में बॉस की हड़काई और घर में बीवी की आंख-दिखाई के आगे न ‘सरोकार का भूत’ दो सेकेंड में उतर कर ‘उड़न-छू’ हो लेता है। दुनिया इतनी जटिल हो चुकी है, यहां न बेटे को मां-बाप के, न चचा को भतीजे के, न भाई को बहन के सरोकार से खास कोई मतलब नहीं रहता। सब अपनी-अपनी लाइफ में अपनी तरह से बिजी हैं। फिर काहे का और कौन-सा सरोकार?

चलिए, व्यंग्य में सरोकार को जाने दीजिए, कविता-कहानी-उपन्यास में कौन-सा सरोकार अब नजर आ रहा है। बदलते वक्त के साथ लेखकों की ‘सरोकारी प्राथमिकताएं’ बदल गई हैं। कभी किसी जमाने में हुआ करते थे सरोकारी टाइप लेखक-साहित्यकार। अब तो लेखक का सारा सरोकार अखबारों-पत्रिकाओं में छपने, प्रकाशक से किताब छपवाने, सम्मान-पुरस्कार पाने में ही अधिक जुड़ा रहता है। बुरा न मानिएगा, यही हकीकत है। इधर, लेखक लोग जब से फेसबुक पर सक्रिय हुए हैं, तब से सारे सरोकार ‘पोस्टनुमा’ हो गए हैं। मन में कोई सरोकार आते ही झट से फेसबुक पर पोस्ट हो जाता है।

इसीलिए तो मैं व्यंग्य में सरोकार होने न होने के चक्करों में ज्यादा नहीं पड़ता। व्यंग्य में सरोकार घुसेड़ कर मुझे कविता-कहानी वालों की दुकानें थोड़े न बंद करनी हैं। व्यंग्य तो खुद में इतना बड़ा सरोकार है कि अच्छे-अच्छे लेखक-साहित्यकार उसके आगे पानी भरते नजर आते हैं। फिर जबरन क्यों व्यंग्य में सरोकार की पैरवी की जाए?

व्यंग्य में जितना ‘कूल’ रहेंगे, उतना ही ‘आनंद’ आएगा। व्यंग्य पर एंवई किस्म-किस्म की भावनाओं-गहराईयों का बोझा लाद देंगे तो उसे बड़ी तकलीफ होगी। यहां इंसान की लाइफ में दर्दे-ओ-गम पहले ही क्या कम हैं, जो उसका असर व्यंग्य में भी बनाए रखा जाए। व्यंग्य बड़ी ही ‘ग्लैमरस’ और ‘मस्त’ विधा है, क्यों न इसे ऐसे ही बना रहने दिया जाए।


सरोकारों का अगर इतना ही शौक है तो कविता लिखिए, कहानी लिखिए, उपन्यास लिखिए, आत्मकथा लिखिए, डायरी लिखिए। पर व्यंग्य को सरोकार टाइप बहसों से दूर ही रखिए। इसी में व्यंग्य और व्यंग्यकार दोनों की भलाई है। जय श्रीराम।

गुरुवार, 9 मार्च 2017

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागिन डांस

आजकल ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ हर किसी की खूब जोर मार रही है। सोशल मीडिया पर तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ‘नागिन डांस’ टाइप ही चल रहा है। जिसे देखो वो अपने गले में तख्ती लटकाए झूमे पड़ा है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के गाने पर। स्टेप कहीं के कहीं पड़ रहे हैं तब भी मन में जिद्द है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नागिन डांस पर थिरके ही मानेंगे। चूंकि मुझे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नागिन डांस करना नहीं आता इसीलिए मैं दूर खड़ा सबको नाचते देखने का आनंद ले रहा हूं। इसी में मेरी भलाई भी है।

कमाल देखिए, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नागिन डांस करने वे लोग भी कूद पड़े हैं, जिन्हें अब तलक मैंने अपनी पत्नियों के आगे ही ‘फैमली डांस’ करते देखा-पाया है। पत्नियों के आगे ‘भीगी बिल्ली’ बने रहने वाले वीर पुरुष हमें सीख दे रहे हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को हर हाल में बचाना ही होगा। जबकि घर में ये लोग अपनी पत्नी के बेलन से खुद के सिरों न बचा पाते हों पर सोशल मीडिया पर लेक्चर यों दे रहे हैं मानो- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के एकमात्र ठेकेदार ये ही हों।

इत्ते लोगों को एक साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नागिन डांस करते देख मन ही मन थोड़ा घबरा भी जाता हूं। घबरा कर दिमाग पर लोड लेने लग जाता हूं कि देश-समाज में ऐसी क्या ‘अनहोनी घटनाएं’ घट गईं जो कथित क्रांतिवीर यहां-वहां गुस्साए-गुस्साए घुम रहे हैं। ऐसा भयानक प्रचार कर रहे हैं मानो देश-समाज में हर किसी की जुबान पर ताले ठोक दिए गए हों। कोई विकट विपत्ति टाइप आन खड़ी हो। विपत्ति से निपटने की खातिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अंड-वंड-शंड नागिन डांस किए जा रहे हैं। अगर नागिन डांस करने का इत्ता ही शौक है तो अपने मोहल्ले या रिश्तेदारों की शादियों में क्यों नहीं करते? वहां ऐसे बूत बने खड़े हो जाते हैं जैसे डांस के मामले में कतई ‘लल्ला’ हों।

एकाध दफा सोशल मीडिया पर मुझसे भी कहा गया कि मैं भी उनके साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वाले नागिन डांस में शामिल हो जाऊं। मगर मैंने यह कहते हुए मना कर दिया- मुझे जित्ता डांस करना होता है अपनी पत्नी के आगे कर लेता हूं। फिर यहां-वहां डांस करने की मुझसे ‘हिम्मत’ ही नहीं बचती। मेरी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पत्नी से शुरू होकर पत्नी पर ही खत्म हो जाती है। फिर भला मैं क्यों दूसरों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लफड़े में पड़ूं? अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को आप संभालें।

सच बातऊं तो देश-समाज के बीच अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरा-वतरा कुछ है नहीं। ये सब सोशल मीडिया पर बैठे चंद ठलुए प्रगतिशीलों के बनाए शोशे हैं, जिन्हें वे अपनी सुविधाओं या कुंठाओं की खातिर उछाले पड़े हैं। जरा ठंडे दिमाग से सोचकर देखिए, अभिव्यक्ति की जित्ती स्वतंत्रता हमारे देश में है उत्ती कहीं और है क्या?

खैर, मुझे क्या। मुझे तो उनका नागिन डांस देखने में फुल-टू आनंद आ रहा है। मैं चाहता भी यही हूं कि वे सोशल मीडिया पर यों ही नाच-नाचकर हम सब का ‘मनोरंजन’ करते रहें।

बुधवार, 8 मार्च 2017

छिपकली को बदनाम करने की साजिश

एंवई सब मिलकर बिचारी छिपकली को ‘बदनाम’ करे पड़े हैं। इसमें छिपकली का क्या ‘दोष’? छिपकली को क्या मालूम कि वो एक ऊंची कंपनी के फ्रेंच फ्राइज में ‘शहादत’ देने जा रही है। छिपकली अपने नेचर में कतई ‘स्वतंत्र’ होती है। बेरोक-टोक कहीं भी आ-जा सकती है। कहीं भी गिर या निकल सकती है। वो भला इंसान को क्या डराएगी, इंसान खुद उसका नाम सुनते ही पसीने-पसीने हो जाता है।

सोशल मीडिया पर तो छिपकली को ‘वायरल’ कर दिया गया है। बतौर ‘खलनायक’ छिपकली को प्रस्तुत किया जा रहा है। कहीं यह भी लिखा देखा था कि फ्रेंच फ्राइज में छिपकली मिलने से पूरा परिवार ‘दहशत’ में हैं! लो कल्लो बात। दहशत में आने का क्या मतलब? मरी छिपकली ने परिवार वालों को कोई ‘धमकी’ थोड़े न दी थी, जो परिवार दहशत में आ गया। एक तो बिचारी को जान से हाथ धोना पड़ा, ऊपर से बदनामी मिली सो अलग।

सारी लगती तो उस कंपनी के शेफ की है, जिसने बिना देखे-जाने फ्रेंच फ्राइज के साथ छिपकली को भी तल दिया। शेफ मासूम छिपकली की हत्या का दोष है। मेरे विचार में तो इस मामले की सीबीआइ जांच बनती है। कित्ती तकलीफ हुई होगी बिचारी छिपकली को तले जाते वक्त। लेकिन हम इंसानों को छिपकली के दर्द-ओ-गम से क्या वास्ता, हम तो उसे सोशल मीडिया पर वायरल करने में व्यस्त हैं।

दरअसल, छिपकली के प्रति हमारी धारणाएं काफी गलत हैं। नब्बे परसेंट लोग उसे ‘घृणा’ की नजर से ही देखते हैं। बाथरुम से लेकर बैडरुम तक में उसकी आवाजाही पर गाहे-बगाहे रोक-टोक लगाते रहते हैं। छिपकली को देख यों चिल्लाते हैं मानो घर के भीतर कोई शेर-चीता घुस आया हो। जबकि छिपकली मूलतः बेहद शांत जीव है। न कभी किसी से कुछ कहती है, न किसी को डराती-धमकाती। शांत-सी दीवार पर चिपकी रहती है। पूर्णता धर्मनिरपेक्ष होती है। जातिवाद में रत्तीभर यकीन नहीं रखती।

मैंने छिपकली को कभी किसी से खाना मांगते नहीं देखा। अपना खाना वो स्वयं अपनी मेहनत के बल पर जुटाती है। फिर भी बदनाम है। घर-परिवारों के बीच छिपकली की हैसियत कॉकरोज टाइप ही है। न जाने हम लोग छिपकली और कॉकरोज से इत्ता भय क्यों खाते हैं? जबकि सच तो यह है कि इंसान से डरवाना और खतरनाक इस धरती पर कोई नहीं।

कुर्बान हुई छिपकली के प्रति मेरे मन में बेहद इज्जत है। बिना किसी कारण उसे काल के गाल में समा जाना पड़ा। कसूरवार था कोई, जिम्मेदार बिचारी छिपकली को ठहराया जा रहा है। मेरा सख्त मानना है कि छिपकली समुदाय को इस मौत (अन्याय) के खिलाफ जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन करना चाहिए। सरकार को नींद से जगाना चाहिए। आखिर ऐसे कब तलक छिपकलियां इंसानों के खाने में अपनी शहादत देती फिरेंगी? इत्ती बदनामियां भी ठीक नहीं छिपकली समुदाय के लिए।

साथ-साथ छिपकली समुदाय की तरफ से मेरी भी अपील है कि दोषी को सख्त से सख्त सजा मिले।

सोमवार, 6 मार्च 2017

मरने पर लाइक!

फेसबुक पर लाइक के मसले तगड़े हैं। आए-दिन अखबारों में छपने वाली रपटें बताती रही हैं कि लाइक की चाह में लोग ‘डिप्रेशन’ तक का शिकार होने लगे हैं। लोगों में अपने काम एवं नींद के प्रति इत्ता उत्साह देखने में न आता, जित्ता एक लाइक को लेकर रहता है। लाइक पाना मानो उनकी जिंदगी का अहम मकसद बन गया हो! यों भी, सोशल मीडिया में सबसे ज्यादा लाइक पाने वाले को ‘सम्मान’ और कम लाइक पाने वाले को ‘हिकारत’ भरी निगाहों से देखा जाता है। पार्टियों में भी लोग एक-दूसरे का हालचाल बाद में पहलेफेसबुक की फलां- फलां पोस्ट या फोटू पर मिले लाइक का हिसाब पूछते हैं।

लाइक की दीवानगी के बीच एक बात मैंने अनेकों बार नोट की है कि लोग किसी के मरने की खबर को भी लाइक करे बिना नहीं रह पाते। ऊपर से कमाल ये, फलां व्यक्ति के मरने की खबर देने वाला बंदा अगर अपने स्टेटस में यह भी लिख दे- कृपया, इस स्टेटस को लाइक न करें- तब भी लोग लाइक करे बिना नहीं मानते। बल्कि मैंने तो मरने की खबर पर ही 500-700 लाइक आते देखे हैं। वाह! क्या बात है- सोशल मीडिया में लोग मरने को खबर को भी उत्ता ही ‘पसंद’ करते हैं जित्ता किसी के ‘पैदा’ होने को!

अक्सर मुझे लगता है कि लाइक की चाह हमारे दिलो-दिमाग के सभी दरवाजे एकदम बंद करके रखती है। लाइक करने वाले को केवल लाइक पर चटका लगाने से मतलब होता है- फिर खबर चाहे कैसी भी क्यों न हो। बाकी चोट-फेंट, बुखार-दस्त आदि के स्टेटसों पर लाइक ठोकना आम बात है। शायद तब तलक रोटी हलक से नीचे न उतरती होगी, जब तलक बंदा या बंदी अपने बीमार होने की खबर फेसबुक पर पोस्ट न कर दे।

मरना धरती पर भले ही शोक-संवदेना की खबर माना जाता हो किंतु फेसबुक पर यह ‘लाइक का औजार’ है। अगला किसी के मरने की खबर यह समझकर पोस्ट करता होगा कि इस बहाने दस-पचास लोगों को पता चल जाएगा पर मरने की खबर को ही फेसबुकिए लाइक कर बैठेंगे, सोचिए क्या गुजरती होगी उसके दिल पर। यानी, सोशल मीडिया के लोग किसी के जाने पर प्रसन्न होते हैं, शायद इसीलिए लाइक पे लाइक ठोके जाते हैं।

मरने वाला चाहे स्वर्ग में जाए या नरक में यमराज की निगाह में ‘सम्मानित’ व्यक्ति ही होता होगा! भई, सम्मानित क्यों न होगा; आखिर इत्ते सारे लाइक पाने के बाद स्वर्ग या नरक में आया है। समस्त देवतागण उसका सम्मान फूल-मालाओं के साथ किया करते होंगे। मन ही मन खुद को ‘कोसते’ जरूर होंगे कि हाय! हमारे जमाने में फेसबुक क्यों न हुआ। मरने पर कुछ लाइक हमें भी मिल जाते।

सोशल मीडिया में संवदेनशीलता अब दूर की कौड़ी है। यहां समस्त हाव-भाव या तो लाइक से जुड़े होते हैं या कमेंट से। खुश हैं तो लाइक कीजिए। गम है तो लाइक कीजिए। बीमार हैं तो लाइक कीजिए। घूम-घाम रहे हैं तो लाइक कीजिए। मानो- पूरी दुनिया एक लाइक पर आनकर टिक गई है।

फेसबुक पर अगर हम ‘छींक’ या ‘खंखार’ भी दे तो भी मन में तमन्ना कुछ लाइकस पाने की ही रहती है। मैंने तो मात्र ‘हाय’ पर ही ढेरों लाइकस यहां पड़े देखे हैं।

तो प्यारे किसी के मरने की खबर पर यों संजीदा होनी की आवश्यकता नहीं बस ‘लाइक’ कीजिए और काम पर चलिए। फेसबुक की आवाम का यही दस्तुर है।

रविवार, 5 मार्च 2017

मार्केटिंग का फंडा

उस रोज मेरे मोबाइल पर एक कॉल आई। कॉल चूंकि अनजान नंबर से थी, सो मैंने रिसिव नहीं की। दस मिनट बाद उसी नंबर से पुनः कॉल आई। मैंने यह सोचकर रिसिव कर ली कि शायद किसी अखबार के संपादक का फोन रहा, मुझसे कुछ लिखवा हो।

कॉल रिसिव करते ही, उधर से बंदा बोलता है। सर, ‘मैं फलां मार्केटिंग कंपनी का सेल्स-मैनेजर बोल रहा हूं। क्या आपके दो मिनट ले सकता हूं?’ उस वक्त मैं भी थोड़ा खाली था, तो कह दिया, ‘दो क्या दो घंटे ले ले। लोग फोन पर गर्लफ्रैंड से दो घंटे बात करने में जाया कर देते हैं, तुम मेरे दो मिनट लेके कौन-सा खुद या मुझ पर एहसास कर दोगे?’

बंदा फोन पर तुरंत सवाल दागता है- ‘सर, आप टूथपेस्ट कौन-सा यूज करते हो?’ मैंने बता दिया। फिर उसने पूछा- ‘सर, आप बाथसोप कौन-सा यूज करते हो?’ यह भी बता दिया। फिर पूछा- ‘सर, आप टी किस कंपनी की लेते हो?’ यह भी बता डाला। फिर पूछता है, ‘सर- आपका रंग काला है या गोरा?’ अब तो मेरे माथे की सटक ली। मैंने कर्रा होकर उसे डंटा- ‘क्या बे, मेरे रंग से तुम्हारा क्या लेना-देना?’ वो बोला, ‘सर, किरपिया, बुरा न मानें, हमें अपने कस्टमर्स से ऐसा पूछना पड़ता है। प्लीज बताएं।‘ मैंने खुद को हल्का करते हुए कहा- ‘न ज्यादा काला, न ज्यादा गोरा। सामान्य।‘ उसने थैंक्स कहते हुए बोलना जारी रखा।

‘सर, हमारी कंपनी जेनटस के ‘ब्यूटी-प्रॉडेक्टस’ बनाती है। खासकर, फेस-क्रीम। कोले को गोरा कर देती है। नॉमर्ल क्लर वालों को नेचुरल क्लर में ले आती है। मैंने कहा- ‘अच्छा। लेकिन यार मुझे तो किसी फेस-क्रीम की रिकॉयरमेंट नहीं। मैं मेरे सामान्य क्लर से साथ खुश हूं।‘ मुझे बीच में टोकते हुए मार्केटिंग मैनेजर बोला- ‘नहीं सर, ऐसा न कहें कि फेस-क्रीम की जरूरत नहीं। फेस का गुड-लुकिंग होना समय की डिमांड है। सुंदर लगने-दिखने का क्रेज आजकल जेनटस में भी लेडिज के मुकाबले अधिक बढ़ गया है। आप एक बार हमारी कंपनी की फेस-क्रीम यूज करके तो देखें। न केवल भाभीजी बल्कि आपके आस-पास की लेडिज भी आप पर ‘क्रश’ करने लेगेंगी। गारंटी हमारी है।‘

बंदा अपने मार्केटिंग स्टाइल से मुझे लगातार रिझाए चला जा रहा था। अब मेरा मन भी धीरे-धीरे कर उसके ब्यूटी-प्रॉडेक्ट की तरफ खींच-सा रहा था। खासकर, उसकी क्रश वाली बात को सुनकर। अगर फेस-क्रीम लगाने से ऐसा हो जाता है तो क्या दिक्कत है थोड़ा-बहुत फ्लर्ट कर लेने में। लाइफ में थोड़ा चेंज तो मांगता है न। मैंने भी बंदे से कह ही दिया- ‘मैं तुम्हारा प्रॉडेक्ट खरीदने को एर्गी हूं, शर्त केवल इत्ती है पैसा फेस पर चेंज दिख लेने के बाद ही मिलेगा।‘ इत्ता सुन मार्केटिंग मैनेजर राजी भी हो गया। तुरंत बोला- ‘सर, पैसा देने की टेंशन न लें। आप हमारे प्रॉडेक्ट को यूज करें बस। खुद भी यूज करें और अपने फ्रैंड्स को भी यूज करवाएं। अगर आप अपने दो-चार फ्रैंड्स को हमारा प्रॉडेक्ट खरीदवा देते हैं तो हम इसे आपके लिए बिल्कुल ‘फ्री’ कर देंगे। बल्कि अपना मैंबर भी बना लेंगे। मतलब- हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा।‘

इत्ता सुन मन ही मन लड्डू टाइप फूटने लगे। यह धंधा बढ़िया है। खुद मुफ्त में यूज करो, दूसरों से पैसा लो। वाह! मार्केटिंग के टेक्ट्स भी निराले हैं प्यारे। लेखन से कहीं बढ़िया तो मार्केटिंग का धंधा है। शुरू की थोड़ी मेहनत लाइफ बना डालती है। आजकल जमाना ही प्योर सेल्स का। आपमें बेचने का हुजूर होना चाहिए फिर तो कुछ भी बेच डालो।

फिलहाल, ‘फेस-क्रीम’ मंगवा ली है। खुद पर यूज बाद में करूंगा पहले अपने दोस्तों को बेच पैसा सीधा कर लूं। यू नो, सिंपल मार्केटिंग!

बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

गधे सुखी हैं

कृश्न चंदर गधे की वापसी में लिखते हैं- ‘इंसानों की दुनिया में वही लोग प्रसन्न रह सकते हैं, जो गधे बनकर रहें।‘

वाकई। गधे बनकर रहने का ‘सुख’ क्या है, यह कोई मुझसे पूछे। मैं अपने खानदान का एक मात्र गधा हूं, जिसे स्कूल से लेकर परिवार तक हमेशा गधा ही कहा-माना जाता रहा है। किंतु खुद के गधा होने का ‘बुरा’मैंने कभी नहीं माना। बुरा मानके किसी का मैं बिगाड़ भी क्या लेता? जबकि मुझे यह अच्छे से मालूम है कि जो मुझे गधा कह या पुकार रहा है, वो कौन-सा बुद्धिजीवियों का खुदा है!

बुद्धिजीवि बनकर रहने में तो तब भी तमाम तरह के खतरे हैं मगर गधा बने रहने में रत्तीभर खतरा नहीं। गधा बुद्धि और बुद्धिजीविता दोनों से पूर्णता मुक्त रहता है। जैसाकि मैं हूं।

गधा धरती का सबसे ‘शांत’ जीव है। न ज्यादा किसी से मतलब रखता है, न किन्हीं सामाजिक-राजनीतिक पचड़ों में पड़कर अपना दिमाग खोटी करता है। वो या तो अपने मालिक का बोझा ढोने में बिजी रहता है या फिर कहीं हरी-भरी घास चरता हुआ मिल जाता है। बहुत हुआ तो बीच-बीच में कुछ ढेंचू-ढेंचू... टाइप कर लेता है, वो भी अपनी खुशी का इजहार करने के वास्ते। मैंने गधे के चेहरे पर कभी झुंझलाहट या तीखापन नहीं देखा। बेहद कूलता के साथ अपनी जिंदगी काटता है गधा।

फिर भी पता नहीं क्यों कुछ लोगों को खुद के गधा कहे या बोले जाने पर एतराज टाइप रहता है। गधा नाम सुनते ही उनके मुंह पर ‘लालपन’ आ जाता है। मरने-मारने को दौड़ पड़ते हैं। कोर्ट-कचहरी तक की नौबत आ जाती है। लेकिन दिमाग को ठंडा रख यह सोचने की जहमत कोई नहीं फरमाता कि किसी के गधा कह देने भर से वे गधा हो थोड़े न जाएगा। अरे भई, गधा तो प्रतीकात्मक संकेत है किसी की उतारने का। गधा तो पूरे विश्व में एक ही रहेगा, जिसे ऊपर वाले ने गधा बनाया है। गधा इंसानों द्वारा खुद के गधा कहने जाने का बुरा नहीं मानता फिर इंसान क्यों मान बैठता है? शायद यही फर्क है, इंसान और गधे के बीच।

चुनावी सभाओं में तो आजकल नेता लोग आपस में खूब गधा-गधा खेल रहे हैं। जबकि गधे का दूर-दूर तलक राजनीति और नेता से कोई मतलब नहीं फिर भी बेचारों को बीच में घुसेड़े ले रहे हैं। यों, अपने खिलाफ ‘मिथ्या-प्रचार’ का बुरा तो गधों को खूब लग रहा होगा पर बेचारे कहें किससे? बगावत कर नहीं सकते दाना-पानी का संकट खड़ा हो सकता है। इसीलिए गधों ने ‘मौन’ रहना ही उचित समझा। एंवई, नेताओं के लफड़े में पड़कर गधा समाज क्यों अपना कीमती वक्त बर्बाद करे। जब वे गधे हैं तो गधे ही रहेंगे। इंसान तो बन नहीं जाएंगे।

आजकल इंसान भी कौन-सा इंसान रहा है। कभी-कभी तो गधों की श्रेणी से भी आगे निकल जाता है। गधे तो फिर भी अपने गधेपन पर रश्क करते हैं, इंसान ने तो इंसानियत को ही बेच डाला है।

यही वजह है कि मैंने आज तलक कभी खुद के गधा होने या पुकारे जाने पर ‘अफसोस’ नहीं जताया है। बैठे-ठाले पत्नी भी ताना मार देते है कि मैं गधे टाइप का लेखक हूं। प्रतिकार इसलिए नहीं करता कहीं घर से बेदखल न कर दिया जाऊं। गधा बने रहकर इस दुनिया का मजा लें। बाकी आदर्श टाइप जिंदगी में कुछ न धरा है पियारे।

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

दुमदार बुद्धिजीवि

मेरे पड़ोस में एक ‘दुमदार बुद्धिजीवि’ रहते हैं! नहीं.. नहीं..उनकी सचमूच की ‘दुम’ नहीं है। हैं वो हमारी-आपकी तरह ही सामान्य इंसान। दुमदार उन्हें इसलिए कह रहा हूं क्योंकि वे हर वक्त मुझे यह एहसास करवाते रहते हैं कि उनकी बुद्धिजीविता उनकी दुम (विचारधारा) में बसा करती है। यों, मोहल्ले में उनका किसी से भी दुआ-सलाम नहीं है सिवाय मेरे। उन्हें ऐसा लगता है, चूंकि मैं अखबारों में लिखता हूं, इस नाते मैं भी उन्हीं की तरह बुद्धिजीवि हूं और मेरी भी दुम है!

जबकि हकीकत यह है कि मैं न बुद्धिजीवि हूं। न मेरी कोई दुम (विचारधारा) है। न ही मैं किसी टाइप के बुद्धिजीवि से दूर-पास का रिश्ता रखना पसंद करता हूं। बुद्धिजीवियों से मैं उत्ता ही घबराता हूं, जित्ता इंसान सांप से। मोहल्ले में आते-जाते जब भी वो मेरे सामने पड़ते हैं, कोशिश यही रहती है, उनसे हट-बचकर निकला जाए। किंतु हर दफा किस्मत भी कहां साथ देती है।

अभी दो-चार रोज पहले वे हमारे घर आ धमके। घर आए पड़ोसी को यों टरकराना भी अच्छा नहीं लगा सो उनके साथ बैठक जमानी पड़ी। साहित्य-राजनीति-समाज आदि से जुड़े मुद्दों पर आपस में खूब लंबी-लंबी खींची।

पहला सवाल उन्होंने मुझ पर यह दागा कि मैं किस विचाधारा को मानता हूं? जिज्ञासावश मैंने उनसे पूछ लिया- ‘विचारधारा...? यह क्या बला होती है भला?’ चेहरे पर गंभीरता का भाव लाते हुए बुद्धिजीवि महोदय बोले- ‘अरे, आप विचारधारा नहीं जानते? ‘विचारधारा’ तो बुद्धिजीवियों की ‘दुम’ समान होती है। जैसे- मेरी है। मैं बिना दुम (विचारधारा) के न कुछ सोच सकता हूं न लिख सकता। लेखन की बुनियाद विचारधारा पर ही टिकी होती है।‘

बुद्धिजीवि महोदय से बात करते वक्त मैं थोड़ा ‘नर्वस’ था। पहली दफा किसी दुमदार बुद्धिजीवि का सामना कर रहा था न। उस पर विचारधारा पर बहस...! ये तो मेरे सिर के ऊपर से ही जा रही थी। थोड़ा हिम्मत का दामन थामने हुए मैंने उनसे कहा- ‘महोदय, यह सच है कि मैं लेखक हूं। लिखता हूं। किंतु किसी दुम (विचारधारा) का गुलाम नहीं हूं। मैं लेखन में ‘बे-दुम’ ही रहना चाहता हूं। वैचारिक प्रतिबद्धता को साथ लेकर चलना तो आप जैसे ऊंचे दुमदार बुद्धिजीवियों का काम है। मैं खुद को इस लायक नहीं मानता।‘

इत्ता सब सुनने के बाद बुद्धिजीवि महोदय लंबी सांस भीतर खींचते हुए बोले- ‘आपकी मर्जी...। लेकिन बिना दुम (विचारधारा) के आप न लेखन, न साहित्य में ज्यादा टिक नहीं पाएंगे। लेखन विचारवानों-विचारशीलों की दुनिया है। यहां बे-दुमों का कोई काम नहीं। मैं हैरान हूं कि आप बिना विचारधारा के लिख कैसे लेते हैं?’

मैंने भी दो-टुक लहजे में उनसे कह दिया- ‘लेखन में न मुझे करियर बनाना है न सम्मान-पुरस्कार हासिल करना। गाड़ी जब तलक चल रही है, चलने दे रहा हूं। मैं मेरे लेखन के साथ खुश हूं। लिखता मैं इसलिए हूं ताकि कुछ खरचा-पानी निकल सके। बाकी लेखन में विचारधारा, गंभीरता, वैचारिकता, सहजता, कथ्य, सौंदर्य आदि-आदि को जीवित रखना तो आप जैसे दुमदार बुद्धिजीवियों का काम है।‘

बुद्धिजीवि महोदय के चेहरे पर मुझसे घोर असहमति के भाव साफ नजर आ रहे थे। वो तो उनका बस नहीं चल पा रहा था, नहीं तो मेरे खिलाफ उसी वक्त ‘फतवा’ जारी कर देते। फिर भी, अपने गुस्साई अंदाज में उन्होंने मुझसे कह ही दिया- ‘आप लेखक हैं नहीं। आपको विचारधारा से ज्यादा प्रिय पारिश्रमिक है। अतः मेरी आपसे कतई नहीं बन सकती। मैंने बहुत बड़ी गलती की जो आपसे मिलने आपके घर चला आया।‘

बिना नमस्कार किए हुए ही दुमदार बुद्धिजीवि अपनी दुम को संभाले मेरे घर से रुखस्त हो लिए। और मैं पुनः डट गया, एक बे-वैचारिक टाइप व्यंग्य खींचने में।

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

टि्वटर के बाबा लोग

टि्वटर पर बाबाओं की धूम है। ये बाबा धरती पर पाए जाने वाले भगवा-धारी बाबाओं से भिन्न होते हैं। ज्यादातर बाबा ‘ट्रौलर्स’ हैं पर हैं ‘मजेदार’। उनके ट्वीटस पढ़कर तबीयत हरी हो जाती हैं। विषय चाहे राजनीति का हो या कोई और बाबा किसी को नहीं बख्शते। टि्वटर पर सबसे उम्दा वनलाइन बाबाओं की तरफ से ही आते हैं।

एक व्यंग्य को लिखने में जहां हम 400 से 500 शब्द खरचा कर देते हैं टि्वटर के बाबा मात्र 140 कैरेक्टर में ही समा बांध देते हैं। उनके 140 कैरेक्टर भारी-भरकम व्यंग्य पर भारी पड़ते हैं। बाबाओं ने ही हमें बताया कि व्यंग्य 140 कैरेक्टर में भी खींचा जा सकता है। बस आपका ‘विट’ स्ट्रांग होना चाहिए। क्या समझे...।

इस वक्त सबसे बढ़िया व्यंग्य टि्वटर पर ही लिखा जा रहा है। न विषय की सीमाएं। न अधिक शब्दों का झंझट। न इस-उस की रोक-टोक। न भाषाई हदबंदियां। मात्र 140 कैरेक्टर हैं आपके पास। इसी दायरे के बीच आपको धांसू-सा वनलाइनर (व्यंग्य) खींचना है। टि्वटर के बाबा लोग यह काम बहुत प्रोफेशनल तरीके से कर रहे हैं। कम शब्दों में बात को कहने का हुनूर तो कोई टि्वटर के बाबाओं से सीखे।

जोकबाजी और वनलाइनर के लिए टि्वटर सबसे मस्त जगह है। फेसबुक पर कब्जा जमाए बैठे किस्म-किस्म की विचारधाराओं के बुद्धिजीवि तो यहां कहीं नहीं ठहरते। न वे ज्यादा टि्वटर पर आते हैं, न ट्रौलर-बाबाओं से सीधा पंगा ही लेते हैं। उन्हें यह अच्छे से मालूम है, बाबा लोग ट्रौल करने में माहिर होते हैं। ट्रौलर्स से तो सेलिब्रिटी लोग भी हट-बचकर रहते हैं।

टि्वटर पर मौजूद बाबाओं की खास बात यह है कि वे न किसी खास (अपवादों को छोड़कर) राजनीतिक दल के समर्थक हैं, न विचारधाराओं के गुलाम। एकदम स्वतंत्र। खुल्ला होकर अपने ट्वीट करते हैं। अच्छा लगे तो रि-ट्वीट कर दीजिए वरना मन ही मन कुढ़ते रहिए। उनकी सेहत पर कोई फरक न पड़ना। दीन-दुनिया से बेखबर अपनी ही मस्तियों में मस्त रहते हैं टि्वटर के बाबा लोग।

टि्वटर पर बाबा लोगों की पूरी फौज है। फौज मौज लेने का कोई मौका नहीं छोड़ती। या तो ये बाबा लोग आपस में ही ट्रौलिंग करते हैं या फिर वनलाइनर जोक चिपकाते रहते हैं। अजीबो-गरीब नाम के बाबा लोग मिलेंगे यहां। मसलम- अदृश्य बाबा, गंजेड़ी बाबा, धाकड़ बाबा, चिलम बाबा, बलिया वाले बाबा, ट्रौल बाबा, बावला बाबा, डॉलर वाले बाबा, लड्डू वाले बाबा, रिउड बाबा, बाबा उल्टानंद, बुलट बाबा, नीम-हकीम बाबा, लुटेरा बाबा आदि-आदि। एक तरह से टि्वटर के हर कोने में कोई न कोई बाबा घुसा बैठा है।

जिन भाषावादियों को भाषा की चिंता हर वक्त परेशान किए रहती है, उन्हें जरूर बाबा लोगों के ट्वीट की भाषा रास न आए फिर भी टि्वटर पर उनके ‘फॉलोअर्स’ की संख्या गजब है। यों भी, उनका उद्देश्य लोगों का मनोरंजन करना है, भाषा-सुधार का ठेका लेना नहीं। सोशल मीडिया में तो ऐसी भाषा चलती है। एकदम आम और फ्री टाइप। मानसिक तृप्ति भी अब इसी भाषा में मिलती है।

भाषाई गरिमा या किन्हीं आदर्शों को परे रख कभी टि्वटर के बाबा लोगों की दुनिया के बीच जाकर देखिए अगर आनंद न आए तो वापस अपनी दुनिया में लौट आइएगा। वनलाइनर ट्वीट का असली लुत्फ तो यहीं है प्यारे।

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

लाठी के वीर और वैलेंटाइन डे

बातें चाहे कित्ती ही क्यों न बना लें पर दुनियां-जहां में चलती लाठी के वीरों की ही है। लाठी के वीरों से आम तो क्या खास भी ‘कंपता’ है। उचित दूरी बनाकर रहता है। न उनका साया खुद पर, न खुद का साया उन पर पड़ने देता है। लाठी के वीरों का क्या भरोसा कब में अपना ‘ब्रहमास्त्र’ चल दें। उनके ब्रहमास्त्र को झेलने वाला पानी तक न मांगता।

अक्सर देखा है, वैलेंटाइन डे के आस-पास लाठी के वीरों की सक्रियता सड़कों-चौराहों, पार्कों-रेस्त्रां, स्कूल-कॉलेजों में खासा बढ़ जाती है। लाठी थामे तैयार रहते हैं देश की सभ्यता-संस्कृति से खिलवाड़ करने वाले तत्वों से निपटने के लिए। उनमें कुछ वीर ऐसे भी होते हैं, जो वैलेंटाइन-समर्थकों को सरेआम मुर्गा बनाने में पीछे नहीं हटते। दो मिनट में इश्क-प्यार-मोहब्बत का भूत उतारने का माआदा रखते हैं। मजाल है, कोई उनकी प्यारी संस्कृति का अपमान कर जाए।

इसीलिए तो मैं वैलेंटाइन वाले दिन घर से ही नहीं निकलता। घर में रहकर ही अपनी पत्नी संग वैलेंटाइन डे मनाने की कोशिश करता हूं। हालांकि पत्नी ‘जिद्द’ यही रहती है कि हम वैलेंटाइन बाहर कहीं रेस्त्रां-पार्क में बैठकर ‘सेलिब्रेट’ करें। कुछ तुम अपने दिल की, कुछ मैं अपने दिल की कहूं। यों, कहने-सुनने में ही पूरा दिन तमाम हो जाए। मगर मैं पत्नी को साफ मना कर देता हूं कि नहीं, वैलेंटाइन बाहर नहीं केवल घर में ही मनेगा। क्योंकि मुझमें अभी इत्ता ‘साहस’ नहीं आ पाया है कि मैं सरेआम लाठी के वीरों से लड़-भिड़ सकूं। इसी मसले पर हम पति-पत्नी के बीच बहस चलती रहती है और वैलेंटाइन डे ‘हंगामा डे’ सरीखा बन जाता है।

कोई नहीं। मुझे अपने वैलेंटाइन डे का हंगामा डे बनने का अफसोस नहीं। कम से कम ‘पीठ’ और ‘खोपड़ी’ तो ‘सुरक्षित’ हैं। वैलेंटाइन का क्या है, कभी भी मना लो। पर उस खास दिन बाहर जाने से बचो।

अच्छा, हमारे लाठी के वीर भी खूब हैं। इन्हें अपनी कथित सभ्यता-संस्कृति की याद ठीक वैलेंटाइन डे वाले दिन ही आती है। इस दिन उनका सांस्कृतिक प्रेम इत्ता जागता है इत्ता जागता है कि वैलेंटाइन डे को उन्होंने ‘मातृ-पितृ दिवस’ ही घोषित कर डाला है। प्रेम दोनों ही जगह कॉमन है बस प्रतिबिम्ब बदले हुए हैं। लाठी के वीरों को यह कौन समझाए कि यार, डंडे के दम पर अगर प्रेम को रोका जा सकता तो यहां न हीर-रांझा हुए होते, न शीरीं-फरहाद, न रोमियो-जूलियट, न राधा-कृष्ण। पर लाठियां कहां प्रेम की परिभाषाओं को समझ पाई हैं।

जब से हमारा दखल ‘सोशल नेटवर्किंग’ के बीच बढ़ा है, तब से हम हर दिवस-त्यौहार को ऑन-लाइन या डिजिटली मनाना अधिक पसंद करने लगे हैं। वैलेंटाइन के दीवानों ने भी अब इसी रास्ते को चुन लिया है। वे अब पार्कों या रेस्त्रां आदि में अपने प्यार का इजहार करने के बजाय सीधा वाट्सएप करते हैं। चिट्ठी-पत्री, ग्रिटिंग-कार्ड के जमाने अब हवा हुए। न इधर-उधर मिलने का झंझट न खुलेआम वीरों की लाठियां खाने का रगड़ा। सिंपल वाट्सएप पर प्रपोज करो। उत्तर आया तो सही, नहीं तो कोई और देखेंगे। इश्क अब ‘इंसटेंट-कॉफी’ की तरह हो लिया है। तुरंत तैयार। तुरंत खत्म।

ऑन-लाइन या डिजिटल इश्क पर तो लाठी के वीर पहरे नहीं बैठा सकते न। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हर पल जाने कित्ती प्रेम कहानियां चलती और खत्म होती रहती हैं। कोई हिसाब नहीं।

दूसरों को सभ्यता-संस्कृति की नसीहतें देने वाले लाठी के वीर खुद कौन-सा दूध के धुले टाइप होते हैं। बल्कि वैलेंटाइन-समर्थकों से कहीं ज्यादा रंगीन-तबियत होते हैं। हां, यह बात और है कि वे मुंह में राम, बगल में छुरी रखें पर भीतर की बातें कहां छुपती हैं भला।

इश्क चीज ही ऐसी है प्यारे कि दिल मचले बिना मानता ही नहीं। हर तमन्ना का रास्ता दिल से होकर ही गुजरता है। लाठीबाज भी अपने दिल के हाथों मजबूर रहते हैं। इस हकीकत को वे स्वीकार करें या न करें किंतु ‘अंतिम सत्य’ यही है।

चलिए। खैर। लाठी के वीर कोशिशें कित्ती ही कर लें पर वैलेंटाइन की कशिश को प्रेमियों के दिलों से जुदा कभी न कर पाएंगे। लाठियां थक जाएंगी मगर इश्क की दास्तानें कभी खत्म न होंगी।

हैप्पी वैलेंटाइन डे।

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

काश! रेनकोट वाला ज्ञान महीने भर पहले मिला होता

ज्ञान लेने या देने के मामले में मैं जरा ‘चूजी’ हूं। एंवई, हर किसी से न ज्ञान लेता हूं, न देता है। आज के डिजिटल युग में लोग ज्ञानियों की शरण में न जाकर सीधा गूगल करना ज्यादा पसंद करते हैं। सही भी है। अपना ज्ञान, अपना रिस्क।

लेकिन संसद में प्रधानमंत्रीजी से ‘रेनकोट’ वाला जो ज्ञान मिला, उसे पाकर मैं ‘अभिभूत’ हूं। हालांकि उनका ‘तंज’ कहीं और था मगर ‘फायदा’ मुझे हुआ। काश! यह ज्ञान महीने भर पहले मिल जाता तो मुझे इत्ती विकट ठंड में नाहते वक्त इत्ता ठिठुरना तो नहीं पड़ता। सीधा रेनकोट पहनकर ही न नाहता। नहाने के पीछे न हर रोज पत्नी से कहा-सुनी होती। न ही ऑफिस वाले मुझे मेरे न नहाने के पीछे ताने देते।

मगर ज्ञान और इश्क किसी के चाहने या न चाहने से भला कब मिले हैं? कोई नहीं, देर से ही मिला पर मिला तो, अब इस ज्ञान को मैं ‘ताउम्र’ अपने पास रखूंगा।

न केवल सर्दियों में बल्कि गर्मियों में भी रेनकोट में नहाने का कॉनसेप्ट है बढ़िया। ये तो हींग लगे न फिटकरी रंग जोखा वाली कहावत को चरितार्थ सा करता है। मुझ जैसे विकट ‘न’ नहाने के चोरों के तईं यह किसी ‘वरदान’ से कम नहीं। यों भी, सर्दियों में बिना कपड़ों के नहाना शरीर की ‘बेइज्जती’ टाइप करना ही है। मेरा बचपन से यही मानना रहा है कि नहाने से कुछ नहीं होता। इससे केवल शरीर के ऊपरी हिस्से का मैल ही साफ होता है, जो मैल शरीर के भीतर भरा पड़ा है वो यथावत रहता है।

दुनिया का ऐसा कोई साबुन या पानी नहीं बना जिससे इंसान के भीरती मैल को नहाकर साफ-सुधरा किया जा सके। नहाना महज एक ‘भ्रम’ है। इसी भ्रम को जिंदा रखने की खातिर हम सदियों से बेचारे शरीर को जाड़ा-गर्मी-बरसात में ‘कष्ट’ देते चले आ रहे हैं। शर्मनाक।

पर अब और नहीं। अब से मैंने तय किया है कि मैं चाहे मौसम कैसा भी क्यों न हो सिर्फ और सिर्फ रेनकोट पहनकर ही नाहूंगा। अब चाहे पत्नी से पंगा हो या ऑफिस वाले बातें बनाएं।
इत्ता लाभकारी ज्ञान बड़े सौभाग्य से मिला करता है।

जब हम बरसातों में रेटकोट पहनकर न भीगने का ‘सुख’ उठा सकते हैं तो नहाने वक्त इस सुख को ले लेने में भला क्या ‘बुराई’ है? क्यों...?

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2017

शव और सेल्फियां

डिसक्लेमर- यह किस्सा नितांत काल्पनिक है। अतः रत्तीभर भी दिल पे न लिया जाए।

तो प्यारे, किस्सा कुछ यों है। हमारे पड़ोस में रहने वाले एक सज्जन अचानक से स्वर्ग सिधार गए। बतला दूं, सज्जन हर काम अचानक से ही किया करते थे। अचानक से ही हमारे घर आ धमकते थे। अचानक से ही कहीं भी चल पड़ते थे। अचानक से उन्हें सर्दी-गर्मी का एहसास होने लगता था। अचानक से ही खाते थे। अचानक से ही पीते थे। अचानक से ही सोते थे। अचानक से ही जागते थे। और तो और (जैसाकि उन्होंने एक दफा बताया) अचानक से ही उनकी शादी और बच्चे भी हुए थे।

मतलब- उन सज्जन की पूरी जिंदगी ही अचानक-अचानक किस्म के किस्सों से भरी पड़ी थी। इसीलिए अचानक से ही वो हमारे बीच से खर्च भी हो लिए।

मुझे उनके इस तरह अचानक से चले जाने का जरा भी ‘अफसोस’ नहीं हुआ। मुझे मालूम था कि एक दिन को वो यों ही अचानक से चले जाएंगे। वैसे, अचानक से मौत आने का लुत्फ अलग ही होता है। एक दम चुप-चाप बिना किसी को बताए, परेशान किए पतली गली से निकल लेना। यह क्या कि भयंकर बीमार होकर, घिसट-घिसटकर मरे भी तो क्या मरे। खुद तो परेशान हुए ही, दूसरों को उससे ज्यादा किया।

सज्जन चूंकि भरे-पूरे परिवार के मालिक थे अतः उनके अचानक से चले जाने पर घर में ज्यादा चीख-पुकार सुनाई न दी। घर वाले हल्की-फुल्की हंसी-ठिठोली टाइप मूड में लग-दिख रहे थे। पड़ोसी होने के नाते अपनी शोक संवेदनाएं व्यक्त करने मैं भी उनके घर गया। जहां उनके शव को रखा गया था, वहां का नजारा ही डिफरेंट था। घर-परिवार वाले और नाते-रिश्तेदार एक-एक कर सज्जन के शव के साथ सेल्फियां लेने में लगे हुए थे। सेल्फियां लेते वक्त किसी के चेहरे पर मुस्कुराहट थी। कोई विकटरी का चिन्ह बनाए हुआ था। किसी ने अपनी सीधी उंगली को उनकी तरफ इंडिकेट कर रखा था। एक मियां तो ऐसे भी दिखे, जो अपने नए-नवेले स्मार्टफोन से पहली सेल्फी सज्जन के शव के साथ ले रहे थे।

ये सब देखकर मुझे थोड़ा अटपटा-सा लगा तो बाजू में खड़े उनके परिवारिक सदस्य से पूछा। महोदय- ‘शव के साथ किस्म-किस्म की सेल्फियां आप लोग ले रहे हैं, यह तो बड़ा शर्मनाक है।‘ वे बोले- ‘शर्मनाक कैसा भाईसाब। आजकल हर चीज ऑन-रिकार्ड होनी चाहिए। हम हमारे अंकल के साथ सेल्फियां इसीलिए ले रहे हैं ताकि प्रमाण साथ रहे। आगे किसी किस्म का परिवार में कोई झगड़ा-शगड़ा न हो।‘ मैंने बीच में टोकते हुए कहा- ‘किंतु ये सब करने की क्या जरूरत है? आखिर डेथ-सर्टिफिकेट तो नगर निगम से मिलेगा ही न।‘ वो बोले- ‘हां, वो तो मिलेगा ही। चूंकि सब लोगों की इच्छा थी कि उनके शव के साथ और शव-यात्रा की सेल्फियां ली जाएं तो हम सब ले रहे हैं। सेल्फी लेना तो आजकल का ट्रेंड है भाईसाब। सब चलता है। आप एंवई दिल पे लोड ले रहे हैं।‘

इससे पहले मैं उससे कुछ और कह पाता वो यह कहते हुए चला गया- ‘अभी हम सब को अंकल की शव-यात्रा के साथ भी सेल्फियां लेनी हैं। आइए, आइए आप भी आइए न। पड़ोसी होने के नाते एक सेल्फी आपके साथ भी बनती है।‘

न.. न.. मैंने दूर से ही हाथ जोड़कर मना कर दिया। और मन में सोचने लगा- वाकई जमाना कित्ता बदल लिया है। अभी सेल्फियां खुद तक सीमित थीं, अब शव-यात्रा के साथ भी ली जा रही हैं। तभी मुझे टि्वटर पर देखी उस सेल्फी का ध्यान हो गया, जिसमें एक बंदा संडास में बैठा अपनी सेल्फी ले रहा था। वाह रे, सेल्फी-संपन्न युग।

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

सेंसेक्स को बजट समझ आ गया

मुझे कभी इस बात की चिंता नहीं रही कि बजट मुझे समझ आया कि नहीं। बजट दरअसल चीज ही ऐसी है, जो समझ में तो किसी के नहीं आता फिर भी लोग पब्लिक में जतलाते ऐसे हैं कि वित्तमंत्री के बाद अगर बजट किसी को समझ आया तो वे ही हैं। किंतु मैं ऐसा ‘शो-ऑफ’ करना पसंद नहीं करता। मेरा बजट से उत्ता ही नाता रहता है, जित्ता नमक का पानी से। केवल मोटी-मोटी बातें ही दिमाग में रखता हूं बाकी किनारे कर देता हूं। यों भी, बजट को समझकर या ना-समझकर कौन-सा मुझे वित्तमंत्रालय में नौकरी मिल जानी है।

हां, मुझे इस बात की घणी प्रसन्नता है कि सेंसेक्स को पूरा बजट समझ आ गया। खुशी के मारे ऐसा झूमा, ऐसा झूमा कि चार सौ अंकों के पार निकल गया। मंदड़ियों को एक ही झटके में चारों खाने चित्त कर डाला। बेचारे न घर के रहे, न घाट के। अक्सर देखा यही है कि बजट के दौरान सबसे अधिक कूदा-फांदी मंदड़िए ही किया करते हैं। पूरा जोर इनका इस बात पर रहता है कि सेंसेक्स बजट को न समझ पाए और घड़ाम से गिरा जाए। अपने चहाने वालों को डूबा जाए। स्टॉक मार्केट में अंधेरा छा जाए। बाजार मंदी की गर्त में चला जाए। बहुत, बहुत ही शातिर होते हैं स्टॉक मार्केट के मंदड़िए।

लेकिन कुछ भी कहिए, इस दफा सेंसेक्स ने न केवल मेरी बल्कि वित्तमंत्री के साथ-साथ इकोनॉमी की भी इज्जत रख ली। सरपट-सरपट ऐसा दौड़ा कि पीछे मुड़कर ही नहीं देखा। आखिरकार, बुल ने बियर के गले में घंटी बांध ही दी।

अब तो यह भी सुनाई में आने लगा है कि आगे आने वाले महीने सेंसेक्स की बढ़ोत्तरी के ही हैं। होने चाहिए भी। बेचारा एक तरफा गिर-गिरकर दुबला भी तो कित्ता हो गया था। बजट ने सेंसेक्स की सेहत में फिर से एक नई स्फूर्ति पैदा कर दी है। बहुत मुश्किल है मंदड़ियों के हाथ अब सेंसेक्स की लगाम आ पाना। सेंसेक्स तो छुट्टा सांड है, एक दफा जिस रास्ते पर दौड़ गया फिर इत्ती आसानी से वापस नहीं लौटता।

नोटबंदी के बाद वित्तमंत्री ने बजट में जो गुलाबी राहत दी, उससे आम आदमी के साथ-साथ सेंसेक्स भी खासा सुकून में है। इस गुलाबी राहत का आंकलन अर्थशास्त्री या विपक्ष अपने हिसाब से चाहे जैसा करे, उससे कोई फरक पड़ने वाला नहीं। इतिहास गवाह है, विपक्ष को बजट न पहले कभी समझ आया न अब समझ आएगा। प्रत्येक विपक्षी को बजट किसान, गरीब, दलित विरोधी ही नजर आता है। उनके कथन पर अपना दिमाग काहे खोटी करना।

इकोनॉमी को बूस्ट सेंसेक्स के दम पर ही मिलता है। सेंसेक्स की चाल मस्त रहती है तो बाजार में भी खुशियों का आलम बना रहता है। अपना सेंसेक्स तो हमेशा से ही इकोनॉमी को मजबूत करने के पक्ष में रहा है मगर कुछ मंदड़िए टाइप लोग पीछे से उसकी टांग खींच लेते हैं तो बेचारा घड़ाम हो लेता है। वरना, सेंसेक्स हर आमो-खास का हितैषी है। इस बजट में बढ़कर उसने अपनी बात को सिद्ध किया भी।

बाकी जिन्हें बजट, इकोनॉमी और सेंसेक्स को लेकर निगेटिव मिस्ट-कॉट करनी हैं, खूब तबीयत से करें। इससे फरक न कोई इकोनॉमी पर पड़ना है, न सेंसेक्स पर। सेंसेक्स के अच्छे दिन आ चुके हैं। अब उसे आगे की तरफ दौड़ते जाना है। अजी, इकोनॉमी को गुलाबी रंग देने का पूरा दारोमदार जो है उस पर।

रविवार, 29 जनवरी 2017

कौन डरता है बजट से

हालांकि मैं कॉमर्स का स्टूडेंट जरूर रहा लेकिन मुझे न कभी कॉमर्स पल्ले पड़ी, न अर्थशास्त्र, न ही बजट। कॉमर्स का इस्तेमाल मैंने केवल पास हो जाने भर के लिए ही किया। इसमें न कभी गंभीरता दिखाई, न दिलचस्पी। वो क्या है, मेरी कोशिश हमेशा से अपनी अक्ल को पढ़ाई के बोझ से मुक्त करने में ही रही। सो, उत्ती पढ़ाई की जित्ती से खाने-कमाने भर का काम चल जाए। जो अधिक पढ़ लिए उन्हें उनकी पढ़ाई बहुत-बहुत मुबारक। मैं कम पढ़ा-लिखा होने में ही मस्त हूं।
ठीक ऐसी ही स्थिति मेरे तईं बजट की रही है। सच बोलूं, बजट की महिमा आज तलक मुझे कभी समझ नहीं आई। घंटे-दो घंटे खड़े होकर वित्तमंत्रीजी क्या कह-बोल जाते हैं, जोर देने के बाद भी मेरी खोपड़ी में नहीं घुस पाता। मेरे तईं बजट की सीधी-सी परिभाषा है- जो बढ़ गया, जो घट गया, जो चुनावी झुनझुना बन गया बस यही बजट है। आम जनता का बजट से लेना-देना कित्ता है, कित्ता नहीं; ये सब अर्थशास्त्री टाइप ज्ञानी जानें। मगर हां इसमें ज्यादातर हित कॉरपोरेट घराने वालों के ही निहित होते हैं।
आपने देखा भी होगा, बजट पर सबसे पहले प्रतिक्रिया कॉरपोरेट तंत्र वालों की ही आती है। वो ही सबसे पहले जुटते हैं अपने-अपने जोड़-घटाने में। एक बेचारा सेंसेक्स है, जो बजट वाले दिन खामखां ही बलि का बकरा बन जाता है। बजट मन-मुताबिक आता है तो झुम पड़ता है। नहीं तो अपने चाहने वालों को ऐसी धोबी पछाड़ देता है कि बेचारों के सालों-साल अपने पिछवाड़ों को सहलाने में ही निकल जाते हैं। मतलब- करे कोई, भरे कोई।
बजट आने के बाद मुझ जैसे लेखक के घर का सीन (बाकियों का मुझे नहीं मालूम) यथावत रहता है। न दिमाग पर किसी खरचे के बढ़ने का लोड, न घटने की खुशी। एकदम नॉरमल टाइप। मुझे पता है, मैंने अपने घर का बजट ‘वित्तमंत्री’ के कहने से नहीं, अपनी ‘होम-मंत्री’ के कहने से बनाना है। कहां कित्ता खरच करना है। किसे कित्ता देना है। अपनी पॉकेट में कित्ता रखना है। बच्चों, नाते-रिश्तेदारों, कपड़ों-लत्तों, किचन आदि-इत्यादि के साथ कैसा फाइनेंशियल व्यवहार रखना है; सारा दरोमदार होम-मंत्री पर ही रहता है। तो प्यारे, बजट चाहे ‘करेला’ टाइप आए या ‘मलाईदार’ अपनी सेहत पर कोई फरक न पड़ना।
अच्छा, मैंने तमाम ऐसे लोग देखे हैं जो बजट आने के हफ्ते-दस दिन तक इत्ता टेंशन में रहते हैं मानो उनके बोर्ड एग्जाम का रिजल्ट आया हो। जाने क्या-क्या खुरपेच बजट के भीतर-बाहर करते रहते हैं। टीवी चैनलों पर रात-दिन लंबी-लंबी बहसें चलती रहती हैं। गुलाबी अखबार पढ़ने वाले- भले ही अपने घर का बजट सेट न कर पाते हों- हमें ज्ञान ऐसे देते हैं मानो हमारे गुरु हों। खासकर, अर्थशास्त्रियों की तो बाछें ही खिल जाती हैं। बजट बेला में ऐसा प्रतीत होता है मानो ईश्वर ने आज के दिन उनके दिमाग में अतिरिक्त ज्ञान फिट कर दिया हो। तब तो मोहल्ले का छोटा-मोटा अर्थशास्त्री भी खुद को ऐसे प्रोजेक्ट करता है जैसे अगला बजट का ज्योतिषी हो।
किंतु बजट के इस शोर-शराबे से मैं खुद दूर और मुक्त ही रखता हूं। क्योंकि जिस गली जाना नहीं, वहां की कन्या से भला क्या दिल लगाना। मूड को लाइट रखिए। चाहे बजट आए या शेर; आपकी बला से। बजट के जोड़-घटाने में खोपड़ी खपाके भला कौन-सी वित्तमंत्रालय में नौकरी मिल जानी है। मेरे घर का बजट (बजट आने से पहले और आने के बाद) एकदम टनाटन रहता है।
हां, वित्तमंत्री महोदय से अपनी इत्ती गुजारिश अवश्य है कि कभी समय निकालकर बजट में हम लेखकों पर भी कुछ ध्यान दे लें। बजट में कुछ ‘लाभकारी गणित’ हम लेखकों के लिए भी सेट करें। अखबारों-पत्रिकाओं को निर्देश दें, लेखकों को पारिश्रमिक बढ़ाकर दिया करें। आखिर हम लेखक अपनी-अपनी कीमती खोपड़ी खरच करते हैं, लेख आदि को लिखने में। मुफत की दुकानदारी अब हमने न होने वाली। बाकी आप वित्तमंत्री हैं जैसा उचित लगे, करें।
तो प्यारे, बजट एक ‘तिलिस्मी तहखाना’ है, इसके आजू-बाजू जाने से बचें। अपनी खोपड़ी की ऊर्जा को बचाकर रखें। अगर सब बजट के लाभ-हानि जानने-समझने में खरच कर दी, तो आगे रिचार्ज कराने में घणी मुसीबत आ सकती है। शेष आपकी मर्जी।

गुरुवार, 26 जनवरी 2017

गणतंत्र दिवस बनाम सेल दिवस

गणतंत्र दिवस पर हम शहीदों को तो याद करते ही हैं। साथ-साथ इस दिन लगने वाली ‘सेल’ का फायदा उठाना भी हम नहीं भूलते। अब गणतंत्र और सेल एक-दूसरे के पूरक टाइप बन गए हैं। जब भी गणतंत्र दिवस आने को होता है, अखबारों के पहले पन्ने सेल-डिस्काउंट-ऑफर्स के विज्ञापनों से भर जाते हैं। ग्राहकों को ऐसे-ऐसे ऑफर्स दिए जाते हैं, एक बार को तो वो भूल ही जाता है कि आज ‘गणतंत्र दिवस’ है या ‘सेल दिवस’!

एक गणतंत्र दिवस ही नहीं लगभग सारे दिवसों का यही हाल है। बाजार हर दिवस को भुनाना जानता है। आप चाहें या न चाहें दिवसों पर ऑफर्स या सेल की लॉलीपॉप आपको मिलनी ही मिलनी है। विडंबना देखिए, बच्चों को भी अब गणतंत्र दिवस कम, किस्म-किस्म के ऑफर्स ज्यादा ध्यान रहते हैं। ऑन-लाइन बाजार ने सबको अपना दीवाना बना दिया है। खरीददारी के लिए आपको यहां-वहां बाजार में धक्के खाने की जरूरत नहीं, अब बाजार आपके फोन की टच-स्क्रीन पर खुद-ब-खुद हाजिर है। न मोल-भाव, न हील-हुज्जत सस्ते पर सस्ते की लूट मची है।

मैंने बहुतों को देखा है कि वे 26 जनवरी का इंतजार अपने गणतंत्र को शान से मनाने के लिए नहीं बल्कि इस दिन मिलने वाले ऑफर्स का लाभ उठाने के लिए करते हैं। सेल के लिए यों पगलाए रहते हैं मानो आज के बाद लाइफ में यह कभी मिलेगी ही नहीं। छुट्टी और ऑन-लाइन परचेचिंग ही उनकी प्राथमिकता में रहती है।

ऑन-लाइन स्टोर्स की देखा-दाखी यही हाल अब हमारे शहरों के बाजारों का हो गया है। वे भी अब गणतंत्र दिवस वाले दिन तैयार रहते हैं अपनी सेल और ऑफर्स से ग्राहकों को पटाने के लिए। गणतंत्र दिवस पर हर कोई बेचने और डिस्काउंट का लाभ उठाने में ही लगा रहता है। मुझे नहीं लगता कि शायद कोई भी इस दिन किसी महान क्रांतिकारी या शहीद की फोटो भी खरीदता होगा। विडंबना देखिए, इसका ध्यान न ऑन-लाइन स्टोर्स रखते हैं न आम बाजार वाले। ऑफर्स और सेल की दीवानगी या तो मोबाइल फोन में दिखाती या फिर कपड़ों-लत्तों में।

गणतंत्र... कैसा गणतंत्र, कहां का गणतंत्र? गणतंत्र के मायने अब बाजार और वहां मिलने वाले किस्म-किस्म के ऑफर्स हैं। गणतंत्र दिवस एक दिन की रस्म-अदायगी है जो छुट्टी और डिस्कांउट का लाभ उठाकर मना ली जाती है।

लोग भी कैसे-कैसे अहमक हैं, अपने परिचितों को फलां-फलां ऑन-लाइन स्टोर्स पर लगी सेल या महा-सेल बताने के लिए तो फोन करेंगे किंतु बातचीत में एक बार भी गणतंत्र दिवस की एक-दूसरे को शुभकामनाएं नहीं देंगे। भला क्यों देने लगे शुभकामनाएं, उनके तईं सेल-ऑफर्स-डिस्काउंट अहम हैं या गणतंत्र दिवस। गणतंत्र दिवस तो सरकारों-नेताओं-स्कूलों के जिम्मे है, वे ही उसकी रस्मों को निभाएं। ऑन-लाइन सेल में तीन हजार की चीज उन्हें दो हजार में मिल गई, उनका तो हो गया गणतंत्र दिवस।

सारा खेल बाजार का है। बाजार हम पर इस कदर हावी हो चुका है कि वो अपने ऑफर्स की च्वाइस के अतिरिक्त हमें कुछ सोचने का मौका ही नहीं देता। उसके तईं चीज को बेचना महत्त्वपूर्ण है। फिर चाहे वो गणतंत्र दिवस हो या स्वतंत्रता दिवस या फिर कनागत ही क्यों न हो। हर कहीं वो खुद को बेचने की जुगाड़ सेट कर ही लेता है।

जहां सेल, वहां भीड़। हम अब इसी रास्ते पर चल रहे हैं। बाजार में खरीद-बेच की होड़ लगी है चाहे दिवस कोई-सा भी क्यों न हो।

तो प्यारे, गणतंत्र दिवस पर ज्यादा सेंटी-वेंटी होने की जरूरत नहीं। सीधा किसी ऑन-लाइन स्टोर की वेब साइट पर जाओ। वहां विकट सेल लगी है। अपने तईं कुछ खरीदो। छुट्टी का आनंद लो। शाम को किसी महंगे रेस्त्रां में डिनर एन्जॉय करो। बाकी गणतंत्र दिवस का क्या है, उसे तो हर साल ही आना है। लेकिन ऑफर्स का लाभ लेने में कहीं कोई ‘कोताही’ नहीं होनी चाहिए। समझे न...।

मंगलवार, 24 जनवरी 2017

दिलचस्प चुनावी घोषणापत्र

चुनावी घोषणपत्रों को भले ही आप-हम ‘जुमलेबाजी की किताब’ मानें लेकिन ये होते बड़े ‘दिलचस्प’ हैं। घोषणपत्रों का हिसाब ‘जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि’ टाइप होता है। राजनीतिक दल जित्ते किस्म के वायदे जनता से कर सकते हैं; सब के सब घोषणापत्रों में घुसेड़ देते हैं। साथ-साथ उनके बीच यह हिरस भी रहती है कि उसका घोषणापत्र मेरे घोषणापत्र से ‘उजला’ कैसे?

अगर एक ही दल के पिछले घोषणापत्रों से वर्तमान घोषणापत्र को मिलाया जाए तो उनमें तारीख और साल के अतिरिक्त खास कुछ बदला हुआ नहीं मिलेगा। लगभग सारे वायदे एक जैसे रहते हैं। वो पांच साल पहले भी गरीब और गरीबी को दूर कर रहे थे, आगे भी करेंगे। वो पांच साल पहले भी बेरोजगारों को रोजगार दिलवा रहे थे, आगे भी दिलवाएंगे। वो पांच साल पहले भी गांव-देहातों में बिजली-पानी ला रहे थे, आगे भी लाएंगे। वो पांच साल भी सड़कें-पुल-हस्पताल बनवा रहे थे, आगे भी बनवाएंगे। वो पांच साल पहले भी आरक्षण के हमदर्द थे, आगे भी रहेंगे। वो साल पहले भी महिलाओं को सुरक्षा दे रहे थे, आगे भी देते रहेंगे। वो पांच साल पहले भी शिक्षा पर फोकसड थे, आगे भी रहेंगे। वो पांच साल पहले भी जाति-धर्म से ऊपर उठने को कह रहे थे, आगे भी उठते रहेंगे। आदि-आदि।

हां, इधर घोषणापत्रों में ‘डिजिटल’ शब्द और जुड़ गया है। अब लगभग सारे राजनीतिक दल जनता को ‘डिजिटल-क्रांति’ में ले आना चाहते हैं। हर एक की जेब में ‘ई-वॉलेट’ वाला ‘स्मार्ट-फोन’ हो। हर कोई डेबिट-क्रेडिट कार्ड धारक हो। हर कोई पेमेंट एप यूज करता हो। घर में ‘दाल’ चाहे गले न गले किंतु लैपटॉप और स्मार्टफोन जरूर मिलना चाहिए। इधर जब से चीजों को ‘मुफ्त’ बांटने का रिवाज चला है, संभव है, आगे भी डिजिटल टाइप चीजें मुफ्त ही बांटी जाएंगी।

हालांकि राजनीतिक दल ऐसा कहते जरूर हैं कि इस बार का घोषणापत्र हमने बड़ी मेहनत से तैयार किया है। हर वर्ग, हर मुद्दे का खूब ध्यान रखा है। यकीन मानिए, अगर हमारी सरकार बनती है तो घोषणापत्र में दर्ज प्रत्येक वायदों को हर कीमत पर निभाया जाएगा। जनता भी भोली-भाली है। मान जाती है। एक मौका और दे देती है। लेकिन चुनावी वायदे तो चुनावी ही होते हैं। अपने ‘अच्छे दिनों’ का जनता इंतजार करती रह जाती है मगर अच्छे दिन आ नेता और पार्टी के जाते हैं।

जुमलेबाजियों में यों ही साल-दर-साल निकलते चले जाते हैं। सरकारें आती हैं। चली जाती हैं। घोषणापत्रों में दर्ज वायदे हर बार ‘चमकीला आवरण’ धारण किए होते हैं। नेता लोग जब अपने आपस में किए वायदों को पूरा नहीं कर पाते तो घोषणापत्रों के वायदों को क्या खाक पूरा करेंगे। इत्ते पर भी घोषणापत्रों को पढ़ने में आता बड़ा मजा है। ये एक प्रकार से ‘दिलचस्प उपन्यास’ टाइप होते हैं। कि पढ़ते जाओ, पढ़ते जाओ पर मन न भरे।

कभी-कभी तो मेरा दिल भी करता है इस लेखन-वेखन को छोड़ पार्टियों के घोषणापत्रों को लिखने का काम ले लूं। इन्हें बनाने में दिमाग तो नहीं खपाना पड़ेगा। एक सेट फॉरमेट में बस कुछ नए जुमलों (आइ मीन वायदों) को चिपकाना भर होता है। और हो गया घोषणापत्र तैयार। फिर बड़ी पार्टी से जुड़े रहने का रूतबा ही अलग है। यहां तो पूरी जिंदगी कलम तोड़के भी कुछ खास हासिल न होना। घर-बिरादरी में ‘शान’ अलग होगी कि अगला फलां-फलां पॉलीटिकल पार्टी का घोषणापत्र सेट करता है।

काश! ये चुनावी बेला हर साल आया करे, इस बहाने पार्टियों के ‘दिलचस्प घोषणापत्र’ तो पढ़ने को मिल जाया करेंगे।