गुरुवार, 8 दिसंबर 2016

समझ नहीं पा रहे, उन्हें क्या मानें...!

प्यारे, मैं थोड़ा ‘कनफ्यूज’ हो लिया हूं। या कहूं, उन्होंने मुझे कनफ्यूज होने के लिए मजबूर कर दिया है। एक मैं ही नहीं, जिसने भी उन्हें सुना सब के सब ‘कनफ्यूजड’ हो रखे हैं। आपस में एक-दूसरे से कभी फोन कर तो कभी फेसबुक-वाट्सएप पर पूछ रहे हैं, क्या तुमने उन्हें सुना कि उन्होंने क्या कहा? विकट कनफ्यूजन।

मुझे ठीक-ठाक याद पड़ता है, पहले उन्होंने खुद को ‘प्रधान-सेवक’ बतलाया था। जनता की सेवा करने की तरह-तरह की कसमें खाईं थीं। खुल्ला कहा था- ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा।‘ छप्पन इंच का सीना चाहिए बोल्ड टाइप निर्णय लेने के लिए। तब जनता ने उनके आत्मविश्वास पर जोर-जोर से तालियां बजाईं थीं। अरे, किसी और को क्या कहूं, उनके छप्पन इंची सीने की बात सुनकर खुद मेरा सीना साढ़े सत्तावन इंची हो लिया था। उनके लहजे में कंप्लीट प्रधान-सेवक टाइप अदा दिख रही थी। लोग गद-गद हुए जा रहे थे। साथ-साथ प्रधान-सेवक अपने परिधानों के कारण भी देश से लेकर विदेश तक में तमाम सुर्खियां बटोर रहे थे।

चलिए, देश ने उन्हें प्रधान-सेवक स्वीकार किया। फिर एक दिन अचानक से उन्होंने खुद को ‘चौकीदार’ घोषित कर दिया। एकदम चुस्त-दुरुस्त चौकीदार। चौबीस घंटे देश के अंदर-बाहर पैनी निगाहें रखने वाला। दुश्मन को ललकार कर तुरंत ‘भिगी बिल्ली’ बना देने वाला। देश व जनता के भीतर एक बार फिर से आत्मविश्वास जागा कि उन्हें अब मजबूत चौकीदार भी मिल गया है। जनता फिर से खूब तालियां बजा-बजाकर अपने चौकीदार का उत्साह बढ़ाने लगी। एक पल को लगा कि दुखियारों के दुख अब ज्यादा दिनों तलक टिके न रह सकेंगे। जो काम 70 सालों में न हुए अब चुटकियों में हो जाएंगे।

हालांकि चौकीदार ने- देश-जनता के प्रति- अपने कामों को करने में कोई कसर न छोड़ी। वो तो अब भी जारी है। किंतु इस बीच भक्ति का ऐसा दौर शुरू हुआ कि लोगों की ‘देशभक्ति’ पर ही तरह-तरह के ‘सवाल’ उठाए जाने लगे। परिभाषा कुछ यों बन गई- जो तारीफ करे वो ‘भक्त’। जो असहमति जतलाए वो ‘अ-भक्त’। दबी-ढकी जुबान में चौकीदार ने भी भक्तों, अ-भक्तों से ये सब न करने की अपील की पर मानने वाले भला कहां माने हैं। खैर, चौकीदार अपने काम में लगा रहा। कभी देश में तो कभी विदेश में।

काफी दिनों तक- प्रधान-सेवक और चौकीदार की- प्रतीकात्मकता का सीन यों ही चलता रहा। कि अभी हाल अचानक से उन्होंने खुद को ‘फकीर’ घोषित कर डाला। मामूली-सा झोला लेकर चलने वाला फकीर। जनता फिर से हैरान-परेशान कि उन्हें प्रधान-सेवक माने या चौकीदार या फकीर? फकीर का जुमला ऐसा चला कि क्या सोशल मीडिया, क्या नुक्कड़-मोहल्ला हर जगह वायरल हो लिया। हर बंदा अपने ट्वीट या फेसबुक पोस्ट में पूछता हुआ मिला- अगर ये फकीर हैं तो वो प्रधान-सेवक और चौकीदार कौन थे? विकट टाइप कनफ्यूजन।

इस बीच फकीर ने चेतावनी दे डाली- काला धन रखने वालो को कि वो होश में आ जाएं। शालीनता से 50-50 का ऑप्शन चुन, काले को सफेद बना लें। यह सरकार गरीबों की है। गरीब को ही समर्पित है। हां, थोड़ी परेशानी है, चिंता की कोई बात नहीं, कुछ दिनों में दूर हो जाएगी। मुझ पर विश्वास रखें।

बाकी सब तो ठीक है लेकिन मेरा कनफ्यूजन ठीक होने का नाम ही नहीं ले रहा। बार-बार खुद से सवाल करने लग जाता हूं कि आखिर मैं उन्हें क्या मानूं? कल को अगर मेरी बेटी ने पूछ लिया कि पापा, वो प्रधान-सेवक हैं या चौकीदार या फकीर? बताइए, मैं उसको क्या उत्तर दूंगा। साहेब विकट ऊहापोह में डाल दिया आपने हमें। उप-नामों की ऐसी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की है कि समझ नहीं पा रहे- आपको क्या मानें, क्या न मानें।

1 टिप्पणी:

Ravishankar Shrivastava ने कहा…

जाकी रही भावना जैसी.... :)
मस्त.
यह कन्फ़्यूजन तो मुझे भी है :)