शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

दुनिया में हर कोई फेंक रहा है!

फेंकने में बुराई कोई नहीं। सहूलियत के हिसाब से आप कित्ता भी फेंक सकते हैं। फेंकने में न पैसे खरच होने हैं न दिमाग। बस जुबान को हिलाते रहना है। जुबान फेंकने में महत्ती भूमिका निभाती है।

मैंने तो ऐसे-ऐसे लोग देखे हैं, जो केवल अपने फेंकने के दम पर न सिर्फ लोगों के बीच ‘लोकप्रिय’ हैं बल्कि ठीक-ठाक पदों पर मस्ती कर रहे हैं। हालांकि कहने वाले उन्हें ‘शेखचिल्ली’ तक कह देते हैं मगर इससे उनकी सेहत पर फरक कोई नहीं पड़ता। उन्हें हर हाल में फेंकना है तो फेंकना है। उनकी दुकान जब फेंकने से ही चल रही है तो क्यों न फेंके।

यों, ज्यादा या कम हर कोई फेंकता है। बिन फेंके हम इस दुनिया-समाज में ‘सरवाइव’ कर ही नहीं सकते। फेंकने के मामले में अगर नेता का कोई जवाब नहीं होता तो पीछे बुद्धिजीवि भी नहीं रहता। फर्क बस इत्ता होता है कि नेता मैदान में जनता के बीच फेंकता और बुद्धिजीवि कागजों पर। आमो-खास को ‘रंगीन सपने’ दोनों ही दिखाते हैं। अगर इत्ता भी न करें तो बेकार है नेता का नेता और बुद्धिजीवि का बुद्धिजीवि होना।

फेंकने की कोशिश मैंने भी कई दफा की है। किंतु हर बार मेरा फेंकना पकड़ा गया। किसी और ने नहीं पत्नी ने ही पकड़ा। वैसे, यह ‘फैक्ट’ है- चाहे कोई कित्ता ही बड़ा ‘फेंकू’ क्यों न हो, अपनी पत्नी के आगे उसकी हर फेंक ‘बौनी’ ही साबित होती है। हां, फेंकने के मामले में वो लोग ‘सुखी’ होते हैं, जिनकी या तो पत्नियां नहीं होतीं या फिर जो पत्नियों की पहुंच से कोसों दूर रहते हैं। मुझ जैसा 24x7 पत्नी की निगरानी में रहने वाला पति फेंकने की सोचना तो छोड़िए हिम्मत भी नहीं कर सकता।

अपना दिल बहलाने के लिए फेंकू टाइप के व्यक्तियों का होना भी जरूरी है। अगर फेंकने वाले न हों तो दुनिया कतई ‘नीरस’ लगे। लंबी-लंबी फेंकने से जित्ता उनका चित्त प्रसन्न रहता है, उत्ता ही हमारा भी। हालांकि फेंकना ‘क्षणिक प्रवृत्ति’ है पर ‘मनोरंजन’ होने में क्या जाता है। जब आपका दिल ‘स्टैंड-अप कॉमेडी’ से बहल सकता है तो फेंकूओं की फेंकाहट से क्यों नहीं! दिल को बहलाते और मन को लगाते रहना चाहिए क्या मालूम जिंदगी की शाम कब, कहां, किस छोर पर खाक हो ले।

गड़बड़ बस वहीं हो जाती है जब हम फेंकूओं या शेखचिल्लियों को ‘सीरियसली’ ले लेते हैं। उनके फेंकने पर ‘खीझने’ जाते हैं। वे जुबान से ही तो फेंक रहे हैं, कोई पत्थर थोड़े न मार रहे। फेंकने दीजिए न। इत्ते पर भी आपको एतराज है तो अपने कान बंद कर लीजिए। बी-कूल डूड। जस्ट चिल्ल।

फेंकने वालों को सलाम ठोकिए और अपने काम पर चलिए।

1 टिप्पणी:

Digamber Naswa ने कहा…

फेंकने वाले न होंगे तो समेटने वाले कहाँ जायेंगे ...
नव वर्ष मंगलमय हो ...