गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

आइए, कैशलेस इकॉनोमी का लुत्फ उठाएं

लेस चीजों का अपना ही मजा है। एक तो ‘लेस’ में ‘एक्सिस’ का ‘झंझट’ नहीं रहता। लेस रहने में चीजें ‘फिट’ व ‘स्लीम’ रहती हैं। सेक्सी होने, लगने या दिखने के तईं अतिरिक्त मेहनत नहीं करनी पड़ती। अगर आप अपनी बॉडी में ‘लेस-वेट’ हैं तो हर भार से मुक्त हैं। जैसे कुछ साल पहले करीना कपूर ने एक फिल्म के वास्ते अपनी ‘बॉडी’ को ‘जीरो’ किया था। तब उनकी उस ‘जीरो-फिगर’ से मैं भी काफी प्रभावित रहा। कोशिश भी की अपनी बॉडी को जीरो बनाने की किंतु संभव न हो सका। दिल के अरमान फिलहाल दिल में ही हिलगे रह गए।

अब हमारी सरकार ऐसा ही कुछ हमसे भी चाहती है। 1000 और 500 के नोट बंद करने के बाद उसका सीधा-सा उद्देश्य देश के साथ-साथ इकॉनोमी को भी ‘कैशलेस’ बनाना है। सरकार चाहती है, प्रत्येक आम-ओ-खास सारे भुगतान ‘इ-पेमेंट’ के माध्यम से करे। अंटी में नोट न रख ‘प्लास्टिक मनी’ रखे। नोट के प्रति दशकों पुराना अपना ‘मोह’ त्याग दे। पूरी तरह से ‘डिजिटली-इनेविलड’ हो जाए। हालांकि इकॉनोमी और देश को कैशलेस करने का विचार है तो बहुत उम्दा लेकिन इसमें लोचे भी कुछ कम नहीं। हां, इसका समर्थन तो सब कर रहे हैं मगर अमल में लाने की हिम्मत कोई न कर पा रहा। हर किसी को बिना नोट के प्लास्टिक मनी पर निर्भर रहना मानो ‘क्लॉथलेस’ होने जैसा लग रहा है।

नोटबंदी के बाद से देश की राजनीति और कॉमरेड टाइप बुद्धिजीवियों के बीच जैसी तू-तू, मैं-मैं हुई है, उसने बहस या बातचीत के हर दरवाजे पर ताला ठोक दिया है। जो कैशलेस के हिमाइती नहीं हैं, उन्हें देश की इकॉनोमी गर्त में जाती दिख रही है। जो कैशलेस के समर्थक हैं, उन्हें देश उत्तर-आधुनिकता की ओर बढ़ता नजर आ रहा है। देश, समाज और इकॉनोमी दो पाटन के बीच फंस गई है। प्रश्न यही है कि जाएं तो जाएं कहां?

दरअसल, हमारी मनःस्थितियां थोड़ा डिफरेंट टाइप की रहती हैं। ‘चेंज’ से हम ‘घबरा’ से जाते हैं। विडंबना देखिए, हम नेचर में तो चेंज के हिमाइती हैं किंतु देश, समाज या इकॉनोमी में चेंज लाने से डरते हैं। भयभीत से रहते हैं अगर चेंज आ गया तो ‘परंपरागत चीजों’ का क्या होगा? अरे, परंपरागत चीजों को परंपराओं के हवाले कर आगे बढ़ने में मजा है। दुनिया इत्ती तेजी से जाने किन-किन बातों-चीजों में लेस पर लेस हुई चली जा रही है और एक हम हैं जो कैशलेस सोसाइटी या इकॉनोमी के चेंज से ही घबराए पड़े हैं।

अमां, एकदफा कैशलेस होके तो देखिए। जमाने भर के झाड़-झंकाड़ों से मुक्ति पा लेंगे। कैशलेस होने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि न कोई हमसे उधार मांग सकता है न हम दे सकते हैं। जेब और बटुआ नोटों के बोझ से फ्री रहते हैं। साथ-साथ चोर बिरादरी भी चोरी का धंधा छोड़ कोई इज्जत के काम पर विचार करेगी।

जरा कल्पना करके देखिए, कैशलेस इकॉमोनी में पानी-पूरी वाला, रिक्शे वाला, ऑटो वाला, ठेले वाला, सब्जी वाला यहां तक की भिखारी भी जब आपसे कार्ड के माध्यम से पेमेंट मांगेंगे तो सीना फुलकर 56 से 98 इंजी चौड़ा हो लेगा। फिर हम भी दूसरे देशों से अपनी कैशलेस इकॉनोमी के चर्चे कर सकेंगे। अपना भी उदाहरण दे पाएंगे।

देश, समाज और लोगों के बीच चेंज ऐसे ही लाए जाते हैं। अगर हम उस दौर में कमप्यूटर से डर रहे होते न तो आज न हम विंडोज 10 पर होते, न हमारे हाथों में मोबाइल होता। जो लोग बात-बात में चेंज को गरियाते रहते हैं न, सच तो यह है कि वे ही सबसे ज्यादा चेंज का ‘उपभोग’ करने वाले होते हैं। खुद चौबीस घंटे फेसबुक, टि्वटर, वाट्सएप, आइ-फोन पर पिले रहेंगे पर बात जब समाज या इकॉनोमी में बदलाव की आती है तो इनके सीनों पर सांप-बिच्छू लोटने लगते हैं। दरअसल, बात-बात में विरोध करने वाले बेपेंदी के लोटे टाइप होते हैं। कब, किस वक्त, किसके पाले में जा लुढ़केंगे इनका कोई भरोसा नहीं रहता।

मगर कोई नहीं...। ‘मरता क्या न करता…’ की तर्ज पर विरोधी भी एक दिन कैशलेस इकॉनोमी की मुख्यधारा में आएंगे। जिंदगी का असली मजा तो लेस होने में ही है। बाकी तो बातें हैं बातों का क्या।

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