मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

रसिया टाइप व्यंग्य-लेखक

मैं मूलतः ‘रसिया’ टाइप व्यंग्य-लेखक हूं। इस बात की न मुझे ‘शर्म’ है न ‘अफसोस’। जो हूं, सो हूं। मेरे तईं खुद का होना कहीं ज्यादा मायने रखता है वनिस्पत किसी के मानने से। आप ही बताएं, व्यंग्य-लेखक में अगर रसिया टाइप लक्षण न होंगे तो क्या आलोचक में होंगे? आलोचक को 24x7 कभी भी देख लीजिए, हमेशा उसके माथे पर बल और सूरत पर पौने बारहा बजे होते हैं। कभी-कभार कोई सप ना देखकर हंसता हो तो हंसता हो किंतु मैंने तो कभी किसी आलोचक को हंसते-मुस्कुराते देखा नहीं।

पर मुझे क्या लेना-देना आलोचकों से। कौन-सी मेरी कोई किताब पुस्तक मेले में आनी है, जो मैं आलोचकों की ‘तेल-मालिश’ में जुटूं- समीक्षा के वास्ते। मुझे तो मतलब केवल अपने व्यंग्य-लेखन से है। बाकी साहित्य में कौन किसकी कहां-कहां बजा या बजवा रहा है, वे जानें।

वैसे, मैंने व्यंग्य की लाइन चुनके ठीक ही किया। यह एक ऐसी जगह है, जहां मूड एकदम ‘फ्रैश’ और ‘मस्त’ रहता है। न विचार का बोझ, न विचारधारा का झंझट। न भाषा में हटो-बचो, न गहराई के झगड़े। जो मन में आए, उसे व्यंग्य या वन-लाइनर की शक्ल देकर खींच डालो। व्यंग्यबाजी ऐसा नशा है, जो रात-दिन खोपड़ी को मदहोश किए रहता है। हरदम दिल यही करता है, रसिया बनके शब्दों का रस निचोड़ते रहो।

मुझे व्यंग्य खींचने में आनंद आता है इसीलिए खींचता हूं। खींचाई में यहां-वहां से थोड़ी-बहुत कमाई भी हो लेती है तो सोने पे सुहागा। यों भी, प्रत्येक लेखक को इत्ता प्रोफेशनल तो होना ही चाहिए। आफ्टरऑल लिखने में अपनी खोपड़ी खरच कर रहे हैं तो क्या पैसा भी न लेंगे। देखो जी, मुफत का लेखन जी का जंजाल टाइप होता है। जित्ता मुफत में लिखोगे उत्ता ही यूज किए जाओगे। खुद को और अपने लेखन को कतई प्रोफेशनलता के सांचे में ढाल लो फिर देखो मजा।

सच बोलूं तो मुझे व्यंग्य को बिना ‘ग्लैमरस’ बनाए मजा ही नहीं आता। व्यंग्य में ग्लैमर रजाई में रूई जित्ता ही जरूरी है। ग्लैमरता व्यंग्य को चटपटा एवं मसालेदार बनाए रखती है। ये क्या कि व्यंग्य लिख दिया और मस्ती भी नहीं मिली। व्यंग्य मूड को लाइट बनाने का काम करता है। व्यंग्य में भी अगर धीरता या गहराई का बोझा लाद देंगे तो भला कैसे चलेगा? व्यंग्य में रस की मात्र ही तो व्यंग्य लेखक को रसिया टाइप बनाए रखती है। व्यंग्य खींचने में इत्ती लिबर्टी भी न ली तो बेकार है व्यंग्य लेखक होना।

इसीलिए मेरी कोशिश हर दम यही रहती है कि व्यंग्य और वनलाइनर्स में मूड को लाइट और फ्रैश रखा जाए। ताकि पाठक पर वैचारिकता का अतिरिक्त बोझ न पड़े। गंभीरता-वैचारिकता के लिए साहित्य में तमाम कोने मौजूद हैं।

फिलहाल, अपना व्यंग्य लेखन तो हमेशा ऐसा ही चलेगा। बाकी सीनियर व्यंग्यकार अपनी खुद जानें।

1 टिप्पणी:

संजय बेंगाणी ने कहा…

सीधे सीधे यह मान लेते है कि आप श्रृंगार रस के व्यंग्यकार हैं.