रविवार, 18 दिसंबर 2016

सर्दी और मफलर

मेरे मफलर को अक्सर मुझसे यही शिकायत रहती है कि मैं उस पर कभी कुछ नहीं लिखता। जबकि रजाई पर हर वक्त कुछ न कुछ लिखता ही रहता हूं। रजाई पर मैं अब तक इत्ता लिख चुका हूं कि एकाध किताब आराम से तैयार हो जाए। लेकिन ऐसा कतई नहीं है कि केवल रजाई ही मेरी ‘प्रिय’ है। मफलर भी मुझे उत्ता ही प्रिय है, जित्ता रजाई। बल्कि कहना चाहिए- अगर रजाई और मफलर न होते तो मैं व्यंग्य के अखाड़े में- इत्ते तगड़े पहलवानों के बीच- उतर ही न पाता।

बहरहाल, आज चर्चा-ए-फोकस रजाई पर न रहकर मफलर पर केंद्रित रहेगा। ताकि मेरा मफलर अपने भीतर किसी भी प्रकार का ‘इनफिरियोरटी कॉप्लेक्स’ न लाने पाए।

यों हर एक की लाइफ में कोई न कोई चीज महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। जैसे- केजरीवालजी के जीवन में मोदीजी के खिलाफ ‘टि्वटरबाजी’ और पूनम पांडेजी के जीवन में ‘बिकनी-प्रदर्शन’। ठीक ऐसे ही मेरे जीवन एवं व्यवहार में मफलर खास जगह रखता है। न.. न.. ऐसा कतई नहीं है कि मफलर की याद मुझे सिर्फ सर्दियों में ही आती है, बता दूं, मैं इससे रिश्ता भीषण गर्मियों में भी ऐसे ही बनाके रखता हूं। मेरा मफलर मल्टीपरपरज है, सर्दियों में गर्मी का अहसास, गर्मियों में ठंडी राहत देता है।

मुझे खूब ध्यान है, मैंने अपना पहला व्यंग्य मफलर और रजाई के साथ जुगलबंदी साधकर ही लिखा था। व्यंग्य के अखाड़े में कूदे मुझे 10-12 साल भले ही हो चुके हों मगर मैंने आज तलक अपनी रजाई और मफलर को खुद से जुदा नहीं किया। साये की मानिंद दोनों मेरे साथ रहते हैं। मफलर का तो आलम यह है कि मेरी सर्दियों की सुबह और रात मफलर की सरपरस्ती में ही गुजरती है। हालांकि कई दफा पत्नी ने भी मेरे मफलर-प्रेम पर विकट एतराज जताया है। पर उसको मैंने साफ बोल दिया- दुनियादारी एक तरफ, मफलर के प्रति अनुराग एक तरफ। इसमें कोई समझौता नहीं।

मुझे यह देखकर अच्छा लगता है कि आज के टोपी-वादी युग में लोगों ने मफलर के प्रति अपने ‘स्नेह’ को कम नहीं किया है। तरह-तरह के डिजाइनर मफलरों को फैशन का हिस्सा बना लिया है। जैसे सालभर में सर्दी वापसी करती है ऐसे ही मफलर भी। मफलर की वापसी सबसे सुखद अनुभव देती है सर्दियों में। केजरीवालजी ने तो मफलर पहनते-पहनते दिल्ली वालों को टोपी ही पहना दी। उन्होंने तो मफलर और टोपी दोनों को एक साथ नुकसान पहुंचाया।

किंतु मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं है। मेरे तईं मफलर का महत्त्व हमेशा उत्ता रहेगा जित्ता कृश्न चंदर के लेखन में ‘गधे की वापसी’ और ‘एक गधे की आत्मकथा’ का। किश्न चंदर को पढ़के ही जानी थी पहली दफा ‘गधे की महत्ता’। मैं किश्न चंदर के गधे और अपने मफलर के बीच अद्भूत वैचारिक, व्यवहारिक एवं आत्मीय कॉम्बिनेशन देखता हूं।

मेरा प्रिय मफलर मुझे निरंतर ऊर्जा देता रहा है। हालांकि वक्त के साथ उसके रंग में थोड़ा फीकापन जरूर आया है पर गरमाहट बरकरार है। यह गरमाहट जित्ती मेरे साथ उसके रिश्ते की है, उत्ती ही उसकी मेरे प्रति वफादारी की भी। दुनिया या परिवार वाले चाहे जो कहते रहें लेकिन मैं मेरे मफलर का साथ कभी नहीं छोड़ सकता। दिमाग में ढेरों टाइप के वन-लाइनर टाइप आइडियाज मफलर पहनके ही तो आते हैं मुझे। सच्ची।

उम्मीद करता हूं, मेरे इस लेख को पढ़ने के बाद मफलर ‘मेरे लिए कुछ नहीं लिखते…’ टाइप अपनी ‘शिकायत’ से बाहर आ चुका होगा। अपने सारे गीले-शिकवे मिटा चुका होगा।

हम तीनों रजाई, मफलर और मेरे बीच फिर से वही ‘जुगलबंदी’ बनेगी, जो अब तलक बनती चली आई है। आमीन।

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