गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

लुढ़कते रुपये को संभालिए हुजूर

लुढ़कने की स्वतंत्रता बेपेंदी के लोटे के पास पूरी रहती है। अपनी इच्छा एवं सुविधानुसार वो कहीं भी, किधर भी लुढ़क सकता है। उसके लुढ़कने पर न धरती फटती है न आसमान पर काले बादल छाते हैं। यों भी, लुढ़कना जिनकी नीयत में शामिल होता है वे अपनी ‘इज्जत’ की परवाह कभी नहीं किया करते।

किंतु यहां मसला जरा दूसरा है। यह लुढ़काहट किसी बेपेंदी के लोटे से नहीं, रुपये से जुड़ी है। रुपये का लुढ़कना न हमारी अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए भला है न सरकार की। यह दीगर बात है, रुपया जब भी, जिन भी हालातों में लुढ़का है, देश में ‘तूफान’ ही लेकर आया है। इस अप्रत्याशित तूफान में न जाने कित्ते ही उड़ व उजड़ लिए हैं। निशान यहां-वहां अब भी बाकी हैं।

पिछली सरकार में तो रुपया गिरा ही था, इस सरकार में भी खूब गिर रहा है। डॉलर रुपये के सिर पर सवार होकर ‘भरतनाट्यम’ कर रहा है। चूहे-बिल्ली की दौड़ में, अफसोस, बिल्ली आगे निकल गई है। ताजुब्ब है, रुपये के लुढ़कने की भनक न सरकार के कानों तलक पहुंच पाई है न आरबीई गर्वनर के। दोनों ही नोटबंदी को प्रसांगिक बनाने में इत्ता मशगूल हैं कि रुपया की तरफ से मुंह फेर लिया है। मानो- रुपया किसी मोहल्ले का आवारा मजनूं टाइप हो!

रुपये के स्वभाव से मैं ब-खूबी वाकिफ हूं। रुपया हर हालात में ‘खामोश’ ही रहता है। सेंसेक्स की मानिंद ज्यादा उछल-कूद नहीं किया करता। रुपये को अगर चोट लगती है तो बिना आह-ऊह-आऊच किए सह लेता है। मगर सहने की भी एक सीमा होती है प्यारे। आजकल जिस बुरे दौर से रुपया गुजर रहा है (ऐ खुदा! किसी दुश्मन को भी ये दिन न देखने पड़ें) उसके संकेत खतरनाक हैं। रुपया न घरों में चैन ले पा रहा है, न तिजोरियों में, न लाइनों में, न बैंकों में, न खासो-आम की जेबों में और न अर्थव्यवस्था के तरकश में। डॉलर के मुकाबले हमारा रुपया बड़ा मायूस और मजबूर नजर आ रहा है।

दरअसल, सीन बड़ा गड़बड़ हो लिया है। नोटबंदी के कोलाहल में रुपये की पीड़ा कोई सुन-समझ ही नहीं पा रहा। नोटबंदी पर दोनों तरफ से ऐसी विकट तलवारें खींची हुई हैं कि समर्थन करो तो ‘देशभक्त’ और विरोध करो तो ‘देशद्रोही’। क्या नेता, क्या बुद्धिजीवि हर किसी के सुर पल-पल में बदल-बिखर रहे हैं। सबको जनता को हो रहीं परेशानियों की चिंता है किंतु बाहर निकलकर कोई नहीं आ रहा जनता के साथ लाइनों में लगने को। बड़ी खामोशी के साथ रुपया नोटबंदी की नौटंकियों को देख अपने हालात पर मातम मना रहा है। लेकिन कहे किससे? किसी के पास वक्त ही नहीं। वित्तमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक सब नोटबंदी की जय-जयकारों में बिजी हैं।

यों, लुढ़कते रुपये की हालत मुझसे नहीं देखी जाती। देखी जाए भी कैसे? आखिर यह रुपया ही है, जो हमारी नींव को अपने मजबूत कंधों पर रोके हुआ है। इसीलिए हर वक्त दुआएं करता रहता हूं, हमारे रुपये के कंधे यों ही मजबूत रहें। साथ-साथ सरकार भी समझे कि लुढ़कते रुपये की अनदेखी ज्यादा ठीक नहीं। सनद रहे, पिछली सरकार को रुपये की अनदेखी इत्ती भारी पड़ी कि वो सत्ता से ही बाहर हो ली।

जैसे- सवा सौ करोड़ देशवासी लाइनों में नजर आ रहे हैं, ठीक ऐसे ही, रुपया भी मुझे लाइन में खड़ा दिखाई दे रहा है। डॉलर अमेरिका में बैठकर तालियां बजा रहा है। उसे रुपये के यों निरंतर पिछड़ते जाने पर बड़ी खुशी है। मगर डॉलर की यह खुशी हमारे तईं चिंता का सबब है। रुपया लुढ़कता है तो देश के भीतर-बाहर से बहुत कुछ लुढ़कता-बिखरता रहता है। बाकी जज्बाती बातें एक तरफ पर यह दुनिया कायम रुपये की बुनियाद पर ही है। रुपया पास है तो हर खुशी अपनी। रुपया पास नहीं तो निल्ल-बटा-सन्नाटा।

हे! देश के नीति-निर्धारकों, नोटबंदी के शोर-गुल से जब फुर्सत पाओ तो एक नजर रुपये की सेहत पर भी जरूर डाल लेना। कहीं ऐसा न हो, उधर का तो नोट बच जाए, इधर का रुपया लुढ़कर जमींदोज न हो जाए!

कोई टिप्पणी नहीं: