शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

दुनिया में हर कोई फेंक रहा है!

फेंकने में बुराई कोई नहीं। सहूलियत के हिसाब से आप कित्ता भी फेंक सकते हैं। फेंकने में न पैसे खरच होने हैं न दिमाग। बस जुबान को हिलाते रहना है। जुबान फेंकने में महत्ती भूमिका निभाती है।

मैंने तो ऐसे-ऐसे लोग देखे हैं, जो केवल अपने फेंकने के दम पर न सिर्फ लोगों के बीच ‘लोकप्रिय’ हैं बल्कि ठीक-ठाक पदों पर मस्ती कर रहे हैं। हालांकि कहने वाले उन्हें ‘शेखचिल्ली’ तक कह देते हैं मगर इससे उनकी सेहत पर फरक कोई नहीं पड़ता। उन्हें हर हाल में फेंकना है तो फेंकना है। उनकी दुकान जब फेंकने से ही चल रही है तो क्यों न फेंके।

यों, ज्यादा या कम हर कोई फेंकता है। बिन फेंके हम इस दुनिया-समाज में ‘सरवाइव’ कर ही नहीं सकते। फेंकने के मामले में अगर नेता का कोई जवाब नहीं होता तो पीछे बुद्धिजीवि भी नहीं रहता। फर्क बस इत्ता होता है कि नेता मैदान में जनता के बीच फेंकता और बुद्धिजीवि कागजों पर। आमो-खास को ‘रंगीन सपने’ दोनों ही दिखाते हैं। अगर इत्ता भी न करें तो बेकार है नेता का नेता और बुद्धिजीवि का बुद्धिजीवि होना।

फेंकने की कोशिश मैंने भी कई दफा की है। किंतु हर बार मेरा फेंकना पकड़ा गया। किसी और ने नहीं पत्नी ने ही पकड़ा। वैसे, यह ‘फैक्ट’ है- चाहे कोई कित्ता ही बड़ा ‘फेंकू’ क्यों न हो, अपनी पत्नी के आगे उसकी हर फेंक ‘बौनी’ ही साबित होती है। हां, फेंकने के मामले में वो लोग ‘सुखी’ होते हैं, जिनकी या तो पत्नियां नहीं होतीं या फिर जो पत्नियों की पहुंच से कोसों दूर रहते हैं। मुझ जैसा 24x7 पत्नी की निगरानी में रहने वाला पति फेंकने की सोचना तो छोड़िए हिम्मत भी नहीं कर सकता।

अपना दिल बहलाने के लिए फेंकू टाइप के व्यक्तियों का होना भी जरूरी है। अगर फेंकने वाले न हों तो दुनिया कतई ‘नीरस’ लगे। लंबी-लंबी फेंकने से जित्ता उनका चित्त प्रसन्न रहता है, उत्ता ही हमारा भी। हालांकि फेंकना ‘क्षणिक प्रवृत्ति’ है पर ‘मनोरंजन’ होने में क्या जाता है। जब आपका दिल ‘स्टैंड-अप कॉमेडी’ से बहल सकता है तो फेंकूओं की फेंकाहट से क्यों नहीं! दिल को बहलाते और मन को लगाते रहना चाहिए क्या मालूम जिंदगी की शाम कब, कहां, किस छोर पर खाक हो ले।

गड़बड़ बस वहीं हो जाती है जब हम फेंकूओं या शेखचिल्लियों को ‘सीरियसली’ ले लेते हैं। उनके फेंकने पर ‘खीझने’ जाते हैं। वे जुबान से ही तो फेंक रहे हैं, कोई पत्थर थोड़े न मार रहे। फेंकने दीजिए न। इत्ते पर भी आपको एतराज है तो अपने कान बंद कर लीजिए। बी-कूल डूड। जस्ट चिल्ल।

फेंकने वालों को सलाम ठोकिए और अपने काम पर चलिए।

गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

आइए, कैशलेस इकॉनोमी का लुत्फ उठाएं

लेस चीजों का अपना ही मजा है। एक तो ‘लेस’ में ‘एक्सिस’ का ‘झंझट’ नहीं रहता। लेस रहने में चीजें ‘फिट’ व ‘स्लीम’ रहती हैं। सेक्सी होने, लगने या दिखने के तईं अतिरिक्त मेहनत नहीं करनी पड़ती। अगर आप अपनी बॉडी में ‘लेस-वेट’ हैं तो हर भार से मुक्त हैं। जैसे कुछ साल पहले करीना कपूर ने एक फिल्म के वास्ते अपनी ‘बॉडी’ को ‘जीरो’ किया था। तब उनकी उस ‘जीरो-फिगर’ से मैं भी काफी प्रभावित रहा। कोशिश भी की अपनी बॉडी को जीरो बनाने की किंतु संभव न हो सका। दिल के अरमान फिलहाल दिल में ही हिलगे रह गए।

अब हमारी सरकार ऐसा ही कुछ हमसे भी चाहती है। 1000 और 500 के नोट बंद करने के बाद उसका सीधा-सा उद्देश्य देश के साथ-साथ इकॉनोमी को भी ‘कैशलेस’ बनाना है। सरकार चाहती है, प्रत्येक आम-ओ-खास सारे भुगतान ‘इ-पेमेंट’ के माध्यम से करे। अंटी में नोट न रख ‘प्लास्टिक मनी’ रखे। नोट के प्रति दशकों पुराना अपना ‘मोह’ त्याग दे। पूरी तरह से ‘डिजिटली-इनेविलड’ हो जाए। हालांकि इकॉनोमी और देश को कैशलेस करने का विचार है तो बहुत उम्दा लेकिन इसमें लोचे भी कुछ कम नहीं। हां, इसका समर्थन तो सब कर रहे हैं मगर अमल में लाने की हिम्मत कोई न कर पा रहा। हर किसी को बिना नोट के प्लास्टिक मनी पर निर्भर रहना मानो ‘क्लॉथलेस’ होने जैसा लग रहा है।

नोटबंदी के बाद से देश की राजनीति और कॉमरेड टाइप बुद्धिजीवियों के बीच जैसी तू-तू, मैं-मैं हुई है, उसने बहस या बातचीत के हर दरवाजे पर ताला ठोक दिया है। जो कैशलेस के हिमाइती नहीं हैं, उन्हें देश की इकॉनोमी गर्त में जाती दिख रही है। जो कैशलेस के समर्थक हैं, उन्हें देश उत्तर-आधुनिकता की ओर बढ़ता नजर आ रहा है। देश, समाज और इकॉनोमी दो पाटन के बीच फंस गई है। प्रश्न यही है कि जाएं तो जाएं कहां?

दरअसल, हमारी मनःस्थितियां थोड़ा डिफरेंट टाइप की रहती हैं। ‘चेंज’ से हम ‘घबरा’ से जाते हैं। विडंबना देखिए, हम नेचर में तो चेंज के हिमाइती हैं किंतु देश, समाज या इकॉनोमी में चेंज लाने से डरते हैं। भयभीत से रहते हैं अगर चेंज आ गया तो ‘परंपरागत चीजों’ का क्या होगा? अरे, परंपरागत चीजों को परंपराओं के हवाले कर आगे बढ़ने में मजा है। दुनिया इत्ती तेजी से जाने किन-किन बातों-चीजों में लेस पर लेस हुई चली जा रही है और एक हम हैं जो कैशलेस सोसाइटी या इकॉनोमी के चेंज से ही घबराए पड़े हैं।

अमां, एकदफा कैशलेस होके तो देखिए। जमाने भर के झाड़-झंकाड़ों से मुक्ति पा लेंगे। कैशलेस होने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि न कोई हमसे उधार मांग सकता है न हम दे सकते हैं। जेब और बटुआ नोटों के बोझ से फ्री रहते हैं। साथ-साथ चोर बिरादरी भी चोरी का धंधा छोड़ कोई इज्जत के काम पर विचार करेगी।

जरा कल्पना करके देखिए, कैशलेस इकॉमोनी में पानी-पूरी वाला, रिक्शे वाला, ऑटो वाला, ठेले वाला, सब्जी वाला यहां तक की भिखारी भी जब आपसे कार्ड के माध्यम से पेमेंट मांगेंगे तो सीना फुलकर 56 से 98 इंजी चौड़ा हो लेगा। फिर हम भी दूसरे देशों से अपनी कैशलेस इकॉनोमी के चर्चे कर सकेंगे। अपना भी उदाहरण दे पाएंगे।

देश, समाज और लोगों के बीच चेंज ऐसे ही लाए जाते हैं। अगर हम उस दौर में कमप्यूटर से डर रहे होते न तो आज न हम विंडोज 10 पर होते, न हमारे हाथों में मोबाइल होता। जो लोग बात-बात में चेंज को गरियाते रहते हैं न, सच तो यह है कि वे ही सबसे ज्यादा चेंज का ‘उपभोग’ करने वाले होते हैं। खुद चौबीस घंटे फेसबुक, टि्वटर, वाट्सएप, आइ-फोन पर पिले रहेंगे पर बात जब समाज या इकॉनोमी में बदलाव की आती है तो इनके सीनों पर सांप-बिच्छू लोटने लगते हैं। दरअसल, बात-बात में विरोध करने वाले बेपेंदी के लोटे टाइप होते हैं। कब, किस वक्त, किसके पाले में जा लुढ़केंगे इनका कोई भरोसा नहीं रहता।

मगर कोई नहीं...। ‘मरता क्या न करता…’ की तर्ज पर विरोधी भी एक दिन कैशलेस इकॉनोमी की मुख्यधारा में आएंगे। जिंदगी का असली मजा तो लेस होने में ही है। बाकी तो बातें हैं बातों का क्या।

मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

रसिया टाइप व्यंग्य-लेखक

मैं मूलतः ‘रसिया’ टाइप व्यंग्य-लेखक हूं। इस बात की न मुझे ‘शर्म’ है न ‘अफसोस’। जो हूं, सो हूं। मेरे तईं खुद का होना कहीं ज्यादा मायने रखता है वनिस्पत किसी के मानने से। आप ही बताएं, व्यंग्य-लेखक में अगर रसिया टाइप लक्षण न होंगे तो क्या आलोचक में होंगे? आलोचक को 24x7 कभी भी देख लीजिए, हमेशा उसके माथे पर बल और सूरत पर पौने बारहा बजे होते हैं। कभी-कभार कोई सप ना देखकर हंसता हो तो हंसता हो किंतु मैंने तो कभी किसी आलोचक को हंसते-मुस्कुराते देखा नहीं।

पर मुझे क्या लेना-देना आलोचकों से। कौन-सी मेरी कोई किताब पुस्तक मेले में आनी है, जो मैं आलोचकों की ‘तेल-मालिश’ में जुटूं- समीक्षा के वास्ते। मुझे तो मतलब केवल अपने व्यंग्य-लेखन से है। बाकी साहित्य में कौन किसकी कहां-कहां बजा या बजवा रहा है, वे जानें।

वैसे, मैंने व्यंग्य की लाइन चुनके ठीक ही किया। यह एक ऐसी जगह है, जहां मूड एकदम ‘फ्रैश’ और ‘मस्त’ रहता है। न विचार का बोझ, न विचारधारा का झंझट। न भाषा में हटो-बचो, न गहराई के झगड़े। जो मन में आए, उसे व्यंग्य या वन-लाइनर की शक्ल देकर खींच डालो। व्यंग्यबाजी ऐसा नशा है, जो रात-दिन खोपड़ी को मदहोश किए रहता है। हरदम दिल यही करता है, रसिया बनके शब्दों का रस निचोड़ते रहो।

मुझे व्यंग्य खींचने में आनंद आता है इसीलिए खींचता हूं। खींचाई में यहां-वहां से थोड़ी-बहुत कमाई भी हो लेती है तो सोने पे सुहागा। यों भी, प्रत्येक लेखक को इत्ता प्रोफेशनल तो होना ही चाहिए। आफ्टरऑल लिखने में अपनी खोपड़ी खरच कर रहे हैं तो क्या पैसा भी न लेंगे। देखो जी, मुफत का लेखन जी का जंजाल टाइप होता है। जित्ता मुफत में लिखोगे उत्ता ही यूज किए जाओगे। खुद को और अपने लेखन को कतई प्रोफेशनलता के सांचे में ढाल लो फिर देखो मजा।

सच बोलूं तो मुझे व्यंग्य को बिना ‘ग्लैमरस’ बनाए मजा ही नहीं आता। व्यंग्य में ग्लैमर रजाई में रूई जित्ता ही जरूरी है। ग्लैमरता व्यंग्य को चटपटा एवं मसालेदार बनाए रखती है। ये क्या कि व्यंग्य लिख दिया और मस्ती भी नहीं मिली। व्यंग्य मूड को लाइट बनाने का काम करता है। व्यंग्य में भी अगर धीरता या गहराई का बोझा लाद देंगे तो भला कैसे चलेगा? व्यंग्य में रस की मात्र ही तो व्यंग्य लेखक को रसिया टाइप बनाए रखती है। व्यंग्य खींचने में इत्ती लिबर्टी भी न ली तो बेकार है व्यंग्य लेखक होना।

इसीलिए मेरी कोशिश हर दम यही रहती है कि व्यंग्य और वनलाइनर्स में मूड को लाइट और फ्रैश रखा जाए। ताकि पाठक पर वैचारिकता का अतिरिक्त बोझ न पड़े। गंभीरता-वैचारिकता के लिए साहित्य में तमाम कोने मौजूद हैं।

फिलहाल, अपना व्यंग्य लेखन तो हमेशा ऐसा ही चलेगा। बाकी सीनियर व्यंग्यकार अपनी खुद जानें।

सोमवार, 26 दिसंबर 2016

दिसंबर, रजाई और देश

इत्ती सर्दी में बाहर निकलने का दिल न किया तो सोचा क्यों न रजाई के भीतर समाके ही दिसंबर में देश के हालातों को देखा-परखा जाए। यों भी, देश-दुनिया-जहान को देखने या चिंता करने का जो ‘आनंद’ रजाई में है कहीं और नहीं। रजाई के भीतर से सबकुछ अपना-अपना-सा लगता है।

यों तो दिसंबर में देश में बहुत कुछ घटा किंतु सब पर ‘हावी’ नोटबंदी ही रही। नोटबंदी के नशे ने हर खबर का भूत सिर से यों उतार दिया जैसे- ‘राम तेरी गंगा मैली हो गई’ में मंदाकनी ने अपने कपड़े उतारे थे। हालांकि तब से अब तब समय की रेत पर से बहुत कुछ मिट चुका है, पर क्या कीजिएगा, इतिहास में एक दफा जो दर्ज हो जाता है फिर हो ही जाता है।

चलिए... खैर...।

दिसंबर में देश को करीना-सैफ से एक नया नन्हा मेहमान मिला। मगर नन्हें मेहमान के दुनिया में आते ही उसके ‘नाम’ पर ऐसी जूतम-पैजार मची, ऐसी जूतम-पैजार मची कि सारा का सारा सोशल मीडिया ही इस बहस में कूद लिया। कुछ उसके नाम के समर्थन में खड़े दिखे तो कुछ विरोध में। हर किसी ने बारी-बारी से अपनी ‘कथित विद्वता’ का प्रदर्शन फेसबुक-टि्वटर पर किया। कुछ आलोचक तो इत्ते ‘वीर’ निकले कि उन्होंने उस बेचारे नन्हे मेहमान के समूचे खानदान को ही ‘गलिया’ डाला। क्या कीजिएगा, सोशल मीडिया पर न किसी का हाथ पकड़ सकें हैं न जुबान रोक सकें। ‘कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना...।‘

केवल नाम पर इत्ता दिमाग खरच करने से कहीं बेहतर होता कि वे लाइन में खड़े लोगों की मदद के लिए कुछ सार्थक करते।

दिसंबर में देश में आमिर खान की बहुचर्चित ‘दंगल’ भी रिलीज हो ली। फिल्म तो अपनी रिलीज से पहले ही अच्छी-खासी ‘चर्चे’ पा चुकी थी। फिल्म के बारे में अब तलक जो भी सुनाई या पढ़ाई में आया, लगभग सभी ने इसकी ‘तारीफ’ ठोकी है। अपना तो हमेशा से मानना रहा है कि हर अच्छी चीज की तारीफ होनी चाहिए। फिर भी, जिन्हें ‘दंगल’ की कामयाबी या तारीफ पर एतराज है, वे लंबी तानकर सोएं। बाहर ठंड बहुत है।

दिसंबर में देश में यहां-वहां से पकड़े गए गुलाबी नोटों की रंगत भी खूब तारी रही। नजरें जहां-जहां दौड़ीं गुलाबी नोटों की रंगत देखकर आंखे चौंधियां गईं। बताइए, हमारे देश के कथित अमीरों कने कित्ता नोट है। इत्ता कमाने के बाद भी नोट के प्रति उनकी भूख कम नहीं होती। किसी ने गुलाबी नोटों को अपने गुसलखाने में छिपाकर रखा तो किसी ने तहखाने में दबाकर। क्या चाय वाला, क्या भिखारी, क्या रद्दी वाला तक करोड़ों-करोड़ों के मालिक निकले। और एक मैं हूं। इत्ते सालों से कलम घिसाई कर रहा हूं फिर भी हाथ-पल्ले ‘घंटा’ कुछ नहीं आता। ऊपर से दिमाग का दही होता है सो अलग। हालांकि वे सब बदनाम जरूर हुए पर नाम भी तो खूब हुआ न। तिस पर भी लोग कहते हैं कि भारत गरीब मुल्क है। अमां, अपना देश तो अब भी ‘सोने की चिड़िया’ ही है। लेकिन चंद लोगों ने इस चिड़िया को अपने जाल में कैद कर रखा है।

दिसंबर में देश में राजनीतिक और नेताओं के बीच उठक-पठक और तू-तू, मैं-मैं भी खूब हुई। पर उस सब का जिक्र यहां करने बैठूंगा तो यह ‘व्यंग्य’ पूरा ‘उपन्यास’ बन लेगा। यों, राजनीति में हलचल 24x7 होती रहती है। इसमें क्या खोपड़ी खपाना।

दिसंबर का अंत करीब आते-आते एक अच्छी खबर मशहूर लेखिका नासिरा शर्मा को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलने की आई। नासिराजी को बधाईयां रहेंगी। उन्होंने जो भी लिखा कमाल लिखा। हां, कुछ साहित्यिक टाइप सयानों ने उनमें भी हिंदू-मुसलिम होने की दरार खोज ली। उन पर ‘मुसलिम लेखिका’ होने का तमगा जड़ दिया। लेखिका इससे आहत भी हुईं जोकि लाजिमी था। किंतु श्रेष्ठ काम के आगे ऐसी बौनी बातें या लोग लंबे समय तक टिके नहीं पाते। चिंता न कीजिए, एक दिन हवा में भाप बनकर ये लोग भी उड़ लेंगे। सो, बी-कूल डूड।

बाकी दिसंबर में देश एकदम ‘मस्त’टाइप ‘टनाटन’रहा। उधर सनी लियोनी का ‘रईस’ का आइटम नंबर ‘लैला मैं लैला…’खासी धूम मचाए रहा तो इधर पूनम पांडे का क्रिसमस पर यू-ट्यूब पर डाला पर अपना हॉट वीडियो।

चला-चली के बीच दिसंबर में देश पर फिलहाल सर्दी का ताप तारी है। और मैं अपनी रजाई में बैठा इन सबका आनंद ले रहा हूं।

शनिवार, 24 दिसंबर 2016

डिजिटल संता के झोले में डिजिटल गिफ्टस

चूंकि जमाना बहुत तेजी से ‘कैशलेस’ की तरफ बढ़ चला है तो इस दफा प्यारे संता के झोले में ‘पारंपरिक गिफ्टस’ न होकर ‘डिजिटल गिफ्टस’ होंगे! उम्मीद है, सदियों से चली आ रही परंपरा को इस बार संता तोड़ देगा। यों भी, पुरानी परंपराओं को टूट चाहिए भी ताकि समाज के बीच ‘यथास्थितिवादी’ की जड़ें मजबूत न हों। जब हम कलम से ‘की-बोर्ड’ और ‘टच-स्क्रीन’ पर आ सकते हैं तो क्या संता ‘डिजिटल गिफ्टस’ पर नहीं आ सकता? टाइम के साथ चेंज होने में ही भलाई है बंधु।

जब से कंप्यूटर, मोबाइल, वीडियो गेम, कार्टून चैनलस आदि-इत्यादि ने बच्चों के बीच खास जगह बनाई है, तब से उनका खिलौनों के प्रति चाव भी थोड़ा घटा है। बच्चे दिन-ब-दिन ‘हाई-टेक’ हो चले हैं। ‘इ-टेक्नॉलेजी’ या ‘डिजिटल नो-हाऊ’ को वो हम बड़ों से कहीं बेहतर समझते-जानते हैं। जित्ती देर में हम टच-स्क्रीन पर उंगलियां यहां-वहां नचा पाते हैं, उत्ती देर में तो वे टैक्स लिखकर वाट्सएप कर देते हैं। है न फर्क उनकी और हमारी ‘शार्पनेस’ में।

तो इसमें बच्चों को कोई हैरानी या परेशानी नहीं होनी चाहिए अगर इस बार संता के झोले में भिन्न-भिन्न टाइप के डिजिटल गिफ्टस मिलें। अजी ये तो संता का एक महत्त्वपूर्ण कदम होगा ‘डिजिटाइजेशन’ को आगे बढ़ाने में। हो सकता है, इस बहाने सरकार संता को कुछ डिस्काउंट-इस्काउंट भी दे दे, उसकी डिजिटल प्रतिबद्धता के प्रति।

हां, इन डिजिटल गिफ्टस पर कुछ लोग आपत्ति जरूर जतला सकते हैं कि संता ये सब देकर बच्चों को बिगाड़ रहा है। उनका बचपना छिन रहा है। तो क्या...? न उनके कहने से बच्चे बिगड़ने वाले हैं न संता ही मानने वाला है। अमां, दुनिया इत्ती तेजी से निरंतर बदल रही है। सुनाई में आ रहा है कि कुछ सालों के भीतर मंगल पर इंसान का आशियाना भी संभव हो सकता है। फिर संता के हाई-टेक होने में क्या परेशानी?

और फिर संता भी अब कहां घर-घर जाकर बच्चों को गिफ्टस बांटता फिरता है। वो या तो अब बच्चों से ‘फेसबुक’ या ‘वाट्सएप’ पर मिल लेता है। वहीं उसे जो देना होता है दे देता है। इस भाग-दौड़ भरी जिंदगी में न अब संता, न बच्चों कने टाइम ही कहां बचा है। दोनों अपनी-अपनी लाइफ में जबरदस्त बिजी हैं। बच्चों पर पढ़ाई-करियर का बोझ है तो संता पर उम्र का।

अब थोड़ा संता को भी आराम करना चाहिए। सदियां हो गईं हर क्रिसमस पर गिफ्ट्स बांटते-बांटते। नए संता आ नहीं रहे। जो हैं भी उनमें उन संता जैसे गुण नहीं। वैसे भी संता चाहे घर-घर जाकर गिफ्टस बांटे या मोबाइल-इंटरनेट पर बच्चों के प्रति उसका स्नेह या प्यार भला कहां कम होने वाला है। संता क्लॉज और बच्चों का संग-साथ तो जन्म-जन्मांतर का है।

कुछ भी कहिए, डिजिटल होते संता मस्त लगते हैं। भिन्न-भिन्न रूप-रंगों में देखने को मिलते हैं। कभी डिजिटली हंसाते हैं तो कभी लाइफ का बहुत बड़ा मंत्रा हमारे मानस-पटल पर छोड़ जाते हैं। न केवल बच्चे बल्कि बड़े भी उन्हें उत्ता ही एंजॉव्य करते हैं। इसीलिए तो संता क्लॉज हर किसी का प्यारा-दुलारा होता है।

इस तेजी से डिजिटल होते समय में डिजिटल संता के डिजिटल-गिफ्टस हमारे लिए अलग ही आकर्षण का केंद्र होंगे। हां, थोड़ा गिफ्टस का स्वरूप जरूर बदल जाएगा पर उनमें छिपी भावनाएं बिल्कुल वैसी ही रहेंगी।

तो बच्चों के साथ-साथ पूरी दुनिया को अपने डिजिटल संता के डिजिटल गिफ्टस का आनंद लेने दें।


हैप्पी मैरी क्रिसमस।

रविवार, 18 दिसंबर 2016

सर्दी और मफलर

मेरे मफलर को अक्सर मुझसे यही शिकायत रहती है कि मैं उस पर कभी कुछ नहीं लिखता। जबकि रजाई पर हर वक्त कुछ न कुछ लिखता ही रहता हूं। रजाई पर मैं अब तक इत्ता लिख चुका हूं कि एकाध किताब आराम से तैयार हो जाए। लेकिन ऐसा कतई नहीं है कि केवल रजाई ही मेरी ‘प्रिय’ है। मफलर भी मुझे उत्ता ही प्रिय है, जित्ता रजाई। बल्कि कहना चाहिए- अगर रजाई और मफलर न होते तो मैं व्यंग्य के अखाड़े में- इत्ते तगड़े पहलवानों के बीच- उतर ही न पाता।

बहरहाल, आज चर्चा-ए-फोकस रजाई पर न रहकर मफलर पर केंद्रित रहेगा। ताकि मेरा मफलर अपने भीतर किसी भी प्रकार का ‘इनफिरियोरटी कॉप्लेक्स’ न लाने पाए।

यों हर एक की लाइफ में कोई न कोई चीज महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। जैसे- केजरीवालजी के जीवन में मोदीजी के खिलाफ ‘टि्वटरबाजी’ और पूनम पांडेजी के जीवन में ‘बिकनी-प्रदर्शन’। ठीक ऐसे ही मेरे जीवन एवं व्यवहार में मफलर खास जगह रखता है। न.. न.. ऐसा कतई नहीं है कि मफलर की याद मुझे सिर्फ सर्दियों में ही आती है, बता दूं, मैं इससे रिश्ता भीषण गर्मियों में भी ऐसे ही बनाके रखता हूं। मेरा मफलर मल्टीपरपरज है, सर्दियों में गर्मी का अहसास, गर्मियों में ठंडी राहत देता है।

मुझे खूब ध्यान है, मैंने अपना पहला व्यंग्य मफलर और रजाई के साथ जुगलबंदी साधकर ही लिखा था। व्यंग्य के अखाड़े में कूदे मुझे 10-12 साल भले ही हो चुके हों मगर मैंने आज तलक अपनी रजाई और मफलर को खुद से जुदा नहीं किया। साये की मानिंद दोनों मेरे साथ रहते हैं। मफलर का तो आलम यह है कि मेरी सर्दियों की सुबह और रात मफलर की सरपरस्ती में ही गुजरती है। हालांकि कई दफा पत्नी ने भी मेरे मफलर-प्रेम पर विकट एतराज जताया है। पर उसको मैंने साफ बोल दिया- दुनियादारी एक तरफ, मफलर के प्रति अनुराग एक तरफ। इसमें कोई समझौता नहीं।

मुझे यह देखकर अच्छा लगता है कि आज के टोपी-वादी युग में लोगों ने मफलर के प्रति अपने ‘स्नेह’ को कम नहीं किया है। तरह-तरह के डिजाइनर मफलरों को फैशन का हिस्सा बना लिया है। जैसे सालभर में सर्दी वापसी करती है ऐसे ही मफलर भी। मफलर की वापसी सबसे सुखद अनुभव देती है सर्दियों में। केजरीवालजी ने तो मफलर पहनते-पहनते दिल्ली वालों को टोपी ही पहना दी। उन्होंने तो मफलर और टोपी दोनों को एक साथ नुकसान पहुंचाया।

किंतु मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं है। मेरे तईं मफलर का महत्त्व हमेशा उत्ता रहेगा जित्ता कृश्न चंदर के लेखन में ‘गधे की वापसी’ और ‘एक गधे की आत्मकथा’ का। किश्न चंदर को पढ़के ही जानी थी पहली दफा ‘गधे की महत्ता’। मैं किश्न चंदर के गधे और अपने मफलर के बीच अद्भूत वैचारिक, व्यवहारिक एवं आत्मीय कॉम्बिनेशन देखता हूं।

मेरा प्रिय मफलर मुझे निरंतर ऊर्जा देता रहा है। हालांकि वक्त के साथ उसके रंग में थोड़ा फीकापन जरूर आया है पर गरमाहट बरकरार है। यह गरमाहट जित्ती मेरे साथ उसके रिश्ते की है, उत्ती ही उसकी मेरे प्रति वफादारी की भी। दुनिया या परिवार वाले चाहे जो कहते रहें लेकिन मैं मेरे मफलर का साथ कभी नहीं छोड़ सकता। दिमाग में ढेरों टाइप के वन-लाइनर टाइप आइडियाज मफलर पहनके ही तो आते हैं मुझे। सच्ची।

उम्मीद करता हूं, मेरे इस लेख को पढ़ने के बाद मफलर ‘मेरे लिए कुछ नहीं लिखते…’ टाइप अपनी ‘शिकायत’ से बाहर आ चुका होगा। अपने सारे गीले-शिकवे मिटा चुका होगा।

हम तीनों रजाई, मफलर और मेरे बीच फिर से वही ‘जुगलबंदी’ बनेगी, जो अब तलक बनती चली आई है। आमीन।

गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

लुढ़कते रुपये को संभालिए हुजूर

लुढ़कने की स्वतंत्रता बेपेंदी के लोटे के पास पूरी रहती है। अपनी इच्छा एवं सुविधानुसार वो कहीं भी, किधर भी लुढ़क सकता है। उसके लुढ़कने पर न धरती फटती है न आसमान पर काले बादल छाते हैं। यों भी, लुढ़कना जिनकी नीयत में शामिल होता है वे अपनी ‘इज्जत’ की परवाह कभी नहीं किया करते।

किंतु यहां मसला जरा दूसरा है। यह लुढ़काहट किसी बेपेंदी के लोटे से नहीं, रुपये से जुड़ी है। रुपये का लुढ़कना न हमारी अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए भला है न सरकार की। यह दीगर बात है, रुपया जब भी, जिन भी हालातों में लुढ़का है, देश में ‘तूफान’ ही लेकर आया है। इस अप्रत्याशित तूफान में न जाने कित्ते ही उड़ व उजड़ लिए हैं। निशान यहां-वहां अब भी बाकी हैं।

पिछली सरकार में तो रुपया गिरा ही था, इस सरकार में भी खूब गिर रहा है। डॉलर रुपये के सिर पर सवार होकर ‘भरतनाट्यम’ कर रहा है। चूहे-बिल्ली की दौड़ में, अफसोस, बिल्ली आगे निकल गई है। ताजुब्ब है, रुपये के लुढ़कने की भनक न सरकार के कानों तलक पहुंच पाई है न आरबीई गर्वनर के। दोनों ही नोटबंदी को प्रसांगिक बनाने में इत्ता मशगूल हैं कि रुपया की तरफ से मुंह फेर लिया है। मानो- रुपया किसी मोहल्ले का आवारा मजनूं टाइप हो!

रुपये के स्वभाव से मैं ब-खूबी वाकिफ हूं। रुपया हर हालात में ‘खामोश’ ही रहता है। सेंसेक्स की मानिंद ज्यादा उछल-कूद नहीं किया करता। रुपये को अगर चोट लगती है तो बिना आह-ऊह-आऊच किए सह लेता है। मगर सहने की भी एक सीमा होती है प्यारे। आजकल जिस बुरे दौर से रुपया गुजर रहा है (ऐ खुदा! किसी दुश्मन को भी ये दिन न देखने पड़ें) उसके संकेत खतरनाक हैं। रुपया न घरों में चैन ले पा रहा है, न तिजोरियों में, न लाइनों में, न बैंकों में, न खासो-आम की जेबों में और न अर्थव्यवस्था के तरकश में। डॉलर के मुकाबले हमारा रुपया बड़ा मायूस और मजबूर नजर आ रहा है।

दरअसल, सीन बड़ा गड़बड़ हो लिया है। नोटबंदी के कोलाहल में रुपये की पीड़ा कोई सुन-समझ ही नहीं पा रहा। नोटबंदी पर दोनों तरफ से ऐसी विकट तलवारें खींची हुई हैं कि समर्थन करो तो ‘देशभक्त’ और विरोध करो तो ‘देशद्रोही’। क्या नेता, क्या बुद्धिजीवि हर किसी के सुर पल-पल में बदल-बिखर रहे हैं। सबको जनता को हो रहीं परेशानियों की चिंता है किंतु बाहर निकलकर कोई नहीं आ रहा जनता के साथ लाइनों में लगने को। बड़ी खामोशी के साथ रुपया नोटबंदी की नौटंकियों को देख अपने हालात पर मातम मना रहा है। लेकिन कहे किससे? किसी के पास वक्त ही नहीं। वित्तमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक सब नोटबंदी की जय-जयकारों में बिजी हैं।

यों, लुढ़कते रुपये की हालत मुझसे नहीं देखी जाती। देखी जाए भी कैसे? आखिर यह रुपया ही है, जो हमारी नींव को अपने मजबूत कंधों पर रोके हुआ है। इसीलिए हर वक्त दुआएं करता रहता हूं, हमारे रुपये के कंधे यों ही मजबूत रहें। साथ-साथ सरकार भी समझे कि लुढ़कते रुपये की अनदेखी ज्यादा ठीक नहीं। सनद रहे, पिछली सरकार को रुपये की अनदेखी इत्ती भारी पड़ी कि वो सत्ता से ही बाहर हो ली।

जैसे- सवा सौ करोड़ देशवासी लाइनों में नजर आ रहे हैं, ठीक ऐसे ही, रुपया भी मुझे लाइन में खड़ा दिखाई दे रहा है। डॉलर अमेरिका में बैठकर तालियां बजा रहा है। उसे रुपये के यों निरंतर पिछड़ते जाने पर बड़ी खुशी है। मगर डॉलर की यह खुशी हमारे तईं चिंता का सबब है। रुपया लुढ़कता है तो देश के भीतर-बाहर से बहुत कुछ लुढ़कता-बिखरता रहता है। बाकी जज्बाती बातें एक तरफ पर यह दुनिया कायम रुपये की बुनियाद पर ही है। रुपया पास है तो हर खुशी अपनी। रुपया पास नहीं तो निल्ल-बटा-सन्नाटा।

हे! देश के नीति-निर्धारकों, नोटबंदी के शोर-गुल से जब फुर्सत पाओ तो एक नजर रुपये की सेहत पर भी जरूर डाल लेना। कहीं ऐसा न हो, उधर का तो नोट बच जाए, इधर का रुपया लुढ़कर जमींदोज न हो जाए!

गुरुवार, 8 दिसंबर 2016

समझ नहीं पा रहे, उन्हें क्या मानें...!

प्यारे, मैं थोड़ा ‘कनफ्यूज’ हो लिया हूं। या कहूं, उन्होंने मुझे कनफ्यूज होने के लिए मजबूर कर दिया है। एक मैं ही नहीं, जिसने भी उन्हें सुना सब के सब ‘कनफ्यूजड’ हो रखे हैं। आपस में एक-दूसरे से कभी फोन कर तो कभी फेसबुक-वाट्सएप पर पूछ रहे हैं, क्या तुमने उन्हें सुना कि उन्होंने क्या कहा? विकट कनफ्यूजन।

मुझे ठीक-ठाक याद पड़ता है, पहले उन्होंने खुद को ‘प्रधान-सेवक’ बतलाया था। जनता की सेवा करने की तरह-तरह की कसमें खाईं थीं। खुल्ला कहा था- ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा।‘ छप्पन इंच का सीना चाहिए बोल्ड टाइप निर्णय लेने के लिए। तब जनता ने उनके आत्मविश्वास पर जोर-जोर से तालियां बजाईं थीं। अरे, किसी और को क्या कहूं, उनके छप्पन इंची सीने की बात सुनकर खुद मेरा सीना साढ़े सत्तावन इंची हो लिया था। उनके लहजे में कंप्लीट प्रधान-सेवक टाइप अदा दिख रही थी। लोग गद-गद हुए जा रहे थे। साथ-साथ प्रधान-सेवक अपने परिधानों के कारण भी देश से लेकर विदेश तक में तमाम सुर्खियां बटोर रहे थे।

चलिए, देश ने उन्हें प्रधान-सेवक स्वीकार किया। फिर एक दिन अचानक से उन्होंने खुद को ‘चौकीदार’ घोषित कर दिया। एकदम चुस्त-दुरुस्त चौकीदार। चौबीस घंटे देश के अंदर-बाहर पैनी निगाहें रखने वाला। दुश्मन को ललकार कर तुरंत ‘भिगी बिल्ली’ बना देने वाला। देश व जनता के भीतर एक बार फिर से आत्मविश्वास जागा कि उन्हें अब मजबूत चौकीदार भी मिल गया है। जनता फिर से खूब तालियां बजा-बजाकर अपने चौकीदार का उत्साह बढ़ाने लगी। एक पल को लगा कि दुखियारों के दुख अब ज्यादा दिनों तलक टिके न रह सकेंगे। जो काम 70 सालों में न हुए अब चुटकियों में हो जाएंगे।

हालांकि चौकीदार ने- देश-जनता के प्रति- अपने कामों को करने में कोई कसर न छोड़ी। वो तो अब भी जारी है। किंतु इस बीच भक्ति का ऐसा दौर शुरू हुआ कि लोगों की ‘देशभक्ति’ पर ही तरह-तरह के ‘सवाल’ उठाए जाने लगे। परिभाषा कुछ यों बन गई- जो तारीफ करे वो ‘भक्त’। जो असहमति जतलाए वो ‘अ-भक्त’। दबी-ढकी जुबान में चौकीदार ने भी भक्तों, अ-भक्तों से ये सब न करने की अपील की पर मानने वाले भला कहां माने हैं। खैर, चौकीदार अपने काम में लगा रहा। कभी देश में तो कभी विदेश में।

काफी दिनों तक- प्रधान-सेवक और चौकीदार की- प्रतीकात्मकता का सीन यों ही चलता रहा। कि अभी हाल अचानक से उन्होंने खुद को ‘फकीर’ घोषित कर डाला। मामूली-सा झोला लेकर चलने वाला फकीर। जनता फिर से हैरान-परेशान कि उन्हें प्रधान-सेवक माने या चौकीदार या फकीर? फकीर का जुमला ऐसा चला कि क्या सोशल मीडिया, क्या नुक्कड़-मोहल्ला हर जगह वायरल हो लिया। हर बंदा अपने ट्वीट या फेसबुक पोस्ट में पूछता हुआ मिला- अगर ये फकीर हैं तो वो प्रधान-सेवक और चौकीदार कौन थे? विकट टाइप कनफ्यूजन।

इस बीच फकीर ने चेतावनी दे डाली- काला धन रखने वालो को कि वो होश में आ जाएं। शालीनता से 50-50 का ऑप्शन चुन, काले को सफेद बना लें। यह सरकार गरीबों की है। गरीब को ही समर्पित है। हां, थोड़ी परेशानी है, चिंता की कोई बात नहीं, कुछ दिनों में दूर हो जाएगी। मुझ पर विश्वास रखें।

बाकी सब तो ठीक है लेकिन मेरा कनफ्यूजन ठीक होने का नाम ही नहीं ले रहा। बार-बार खुद से सवाल करने लग जाता हूं कि आखिर मैं उन्हें क्या मानूं? कल को अगर मेरी बेटी ने पूछ लिया कि पापा, वो प्रधान-सेवक हैं या चौकीदार या फकीर? बताइए, मैं उसको क्या उत्तर दूंगा। साहेब विकट ऊहापोह में डाल दिया आपने हमें। उप-नामों की ऐसी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की है कि समझ नहीं पा रहे- आपको क्या मानें, क्या न मानें।