बुधवार, 30 नवंबर 2016

आइए, कैशलेस हुआ जाए

सरकार तो अब कैशलेस होने की बात कह रही है, अरे, मैं तो बचपन से कैशलेस हूं। जैसे बचपन में जेब में कुछ नहीं हुआ करता था, सीन आज भी कुछ ऐसा ही है। तब पापा से मिलने वाले 10 पैसे में ‘जन्नत’ दिखा करती थी, आज हजारों भी मिल जाएं तो ठन-ठन गोपाल। इसीलिए तो मैं बगैर रुपए-पैसे सुकून की जिंदगी काटने में अधिक विश्वास रखता हूं।

सच कहूं तो नोटबंदी से मेरी जेब और सेहत पर खास कोई फर्क नहीं पड़ा है। जरूरत भर के पैसे जेब में रखता हूं। जेब जब खाली हो जाती है, चुप-चुप लाइन में लगकर रुपए निकाल लेता हूं। न ज्यादा झगड़ा-टंटा, न सरकार की बुराई-भलाई। कौन-सा अपने अंतिम समय में रुपए-पैसे मुझे संग लेके जाने हैं। खाली आया था, खाली हाथ ही जाऊंगा। फिर इत्ती मारा-मारी किसलिए।

वैसे, कैशलेस होने के फायदे ही फायदे हैं। अगर बंदा मेरी तरह कैशलेस है तो सोने पे सुहागा। गौरतलब है, नोटबंदी के इस मौसम में एक भी बंदा न मुझसे नोट बदलने आया है, न उधार-छुट्टा मांगने। यहां तक कि पत्नी भी अब रुपए-पैसे की बात नहीं करती। बल्कि जित्ते रुपए उसने जोड़ रखे थे, एक दिन सब के सब निकालकर मेरे सामने रख दिए और बोली- जाके इन्हें अपने खाते में डाल आओ। अब ये मेरे किसी काम के नहीं। मैं कैशलेस ही भली।

और तो और मेरे वो दोस्त भी कैशलेस हो लिए हैं तो रात-दिन अपने रुपए-पैसे दम मेरे सामने भरा करते थे। अब सरे-राह मिलते हैं तो नजरें छुपा जाते हैं। इत्ता पैसा ठिकाने कहां लगाएं? सरकार ने नोटबंदी करके मालदारों की नाक में इत्ती मोटी नकेल फंसा दी है कि उनसे न निकाले बन रहा है न हिलगाए। बेचारे सब के सब- कैश होने के बाद भी- कैशलेस हो गए हैं।

मुझे इस बात की बेहद राहत है कि मैं पहले की तरह अब भी अपने मोहल्ले में सिर उठाकर चल रहा हूं। जो लोग कभी मेरे कैशलेस होने का खुलेआम मजाक उड़ाया करते थे, आज बिंदास सलाम ठोकते हैं। अमां, जिंदगी में ऐसी बहुत-सी चीजें हैं जिनसे ‘मोह’ पाला जा सकता है मगर कैश से तौबा-तौबा। अंटी में जित्ते नोट हों, हाथ-पैर भी उत्ते ही फैलाने चाहिए।

हां, लोगों को हो रहीं तकलीफों से इंकार नहीं मगर इस नोटबंदी ने प्रत्येक बंदे के भीतर कम में गुजारा करने की थोड़ी-बहुत आदत तो डाल ही दी। पहले जेब नोटों से भरी रहती थी, अब या तो कागजों से भरी होती या डेबिड-क्रेडिट कार्ड से। अब तो हर कोई बेताब-सा दिखता है कैशलेस हो जाने को। अखबारों-टीवी चैनलों पर तमाम विज्ञापन आ रहे हैं, कैशलेस होने की आदत डालिए। यहां तक कि सरकार का जोर भी कैशेलेस लेन-देन पर ही है।

आम नागरिक के भीतर अगर कैशलेस होने की व्यवाहारिता आ गई तो बेचारे चोरों का धंधा जरूर मंदा हो लेगा। फिर उन्हें भी कोई ऐसा जरिया खोजना पड़ेगा, जहां चोरी कैशलेस हो। चलो, हम सब के बीच कुछ तो बदलेगा। बदलने में ही भलाई है प्यारे।

कैशलेस जिंदगी जीके तो देखिए, कसम से, जन्नत से भी बढ़कर सुकून मिलेगा। साथ-साथ पैंट की जेबों को भी आराम मिलेगा। न वे जल्दी फटा करेंगी, न कटा।

तो आइए कैशलेस हुआ जाए।

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