बुधवार, 16 नवंबर 2016

नोटबंदी की मार चोर हुए बेरोजगार

मेरे मोहल्ले के चोर लगभग ‘कंगाल’ होने की कगार पर हैं। नोटबंदी के कारण सबसे अधिक ग्रह उन्हीं के खराब हुए हैं। किसी को लूटने या कहीं चोरी करते वक्त इस बात की कोई ‘गारंटी’ नहीं रहती- अगले के पास ‘छुट्टे’ होंगे ही। यही वजह है, मोहल्ले में चोरी-चपाटी, छिना-छपट्टी की वारदातों में विकट कमी आई है। पुलिस भी राहत की सांस ले रही है, चलो- यहां-वहां की भाग-दौड़ बची।

लेकिन मेरा मन चोरों की इस हालत को देखकर खासा व्यथित है। हालांकि मैं कभी चोरा-चारी के पक्ष में नहीं रहा किंतु मेरा मानना है, रोजी-रोटी सबकी चलती रहती चाहिए। रोजी-रोटी चलेगी तब ही जब दुकान चलेगी। मगर यहां तो दुकान ही बंदी के समीप है। आलम यह है कि लोगों ने दुकान के अंदर तो छोड़िए उसके आस-पास तक से गुजरना बंद कर दिया है। अब बताइए, ऐसे में क्या चोर क्या ज्वैलर क्या कमाएगा, क्या खाएगा, क्या पहनेगा, क्या खर्च करेगा।

चलो हम-आप तो अपना दर्द किसी न किसी तरह मंत्री, अधिकारी या प्रधानमंत्री के सामने रख भी सकते हैं मगर बेचारे चोर तो अपनी तकलीफ किसी से कह भी नहीं सकते। वे तो यह भी कहने के नहीं रहे- नोटबंदी ने हमारे चोरी के रोजगार पर लात मार दी है अतः जल्दी से जल्दी हालात सामान्य किए जाएं। चोर को तो हमेशा अपने पकड़े जाने का खतरा रहता है न। चोरी-चकारी ही उसकी आय का एकमात्र माध्यम है, मोदीजी ने आजकल उस पर भी ताला जड़ दिया है।

चोरों की तकलीफ तो खैर समझ आती है लेकिन देश के कुछ नेता इत्ते ‘बौखलाए’ हुए से क्यों हैं? दिल्ली के मुख्यमंत्री से लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के पापाजी तक सब के सब नोटबंदी पर इत्ता नाराज हैं कि काटो तो खून नहीं। हमारे (सरजी) दिल्ली के मुख्यमंत्री तो मोदीजी को चौबीस घंटे का समय दे चुके हैं नोटबंदी पर पुनः विचार करने का। उनसे लाइन में खड़े आम आदमी की तकलीफ देखी नहीं जा रही। मगर वे यह भी नहीं कह पा रहे कि भईया, तुम थोड़ी देर साइड में बैठकर आराम करो। थोड़ा पानी-शानी, चाय-शाय पी लो तब तक मैं तुम्हारी जगह लाइन में खड़ा हो लेता हूं। मगर नेता लोग तो अपने-अपने चेहरों को चमकाने कभी चार हजार के नोट बदलने तो कभी चेतावनी देने के बहाने चैनलों के कैमरों के आगे आनकर खड़े हो जाते हैं।

खैर, नेताओं के अपने-अपने राजनीतिक हित हैं। पर बेचारे चोरों का क्या? वो तो ‘मुफ्त’ में ही निपट लिए। न कहीं चोरी करने से रहे, न किसी को लूटने से। बाकी का बचा दिन लाइन में खड़े होने में बीत जाता है। मुसीबत घणी है पर कहें किससे।

फिलहाल, मोहल्ले के एकाध चोर को मैंने समझाया कि लल्ला अपना चोरी-चकारी का पेशा छोड़ अब कोई अच्छा-सा काम-धंधा ढूंढ़ लो। उसी में तुम्हारी, तुम्हारे परिवार की भलाई है। मोदीजी का कोई भरोसा नहीं नोटबंदी के बाद आगे कौन-सी सख्त स्कीम ले आएं।

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