शुक्रवार, 11 नवंबर 2016

जो जीता वही सिकंदर

डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिका का राष्ट्रपति होना मुबारक। बेशक उनसे सहमति रखिए या असहमति मुबारकवाद देना तो बनता है। यों भी, उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव छोले-भटूरे खाते हुए तो नहीं न जीता है। अगले ने पूरी जान लगा दी इत्ता बड़ा चुनाव जीतने में। समाज और दुनिया में तूती केवल ‘जो जीता वही सिकंदर’ बनने वाले की ही बोलती है।

जानता हूं, डोनाल्ड ट्रंप न केवल कुछ अमेरिकनस बल्कि कुछ भारतीयों की भी पसंद नहीं हैं। वे उनके चरित्र और (खासकर भाषा) से बड़ी नफरत करते हैं। तो क्या...। यों तो दाग चांद में भी है फिर भी वो लोगों के दिलों के बेहद करीब है। प्रेमियों-प्रेमिकाओं का तो चांद फेवरिट है। हां यह सही है कि डोनाल्ड ट्रंप चांद नहीं हैं पर सितारे (स्टार) तो हैं ही।

सबसे अधिक हैरान मैं उन लोगों की राय जानकर हूं, जिन्हें सब्जी मंडी में पालक के भाव का पता नहीं और ट्रंप पर ज्ञान ऐसे पेल रहे हैं मानो बचपन में उन्होंने उन्हें गोद खिलाया हो। चलिए यहां की जाने दीजिए, खुद अमेरिकनस उनके बारे में कित्ता जानते हैं। पूरजोर विरोध और आलोचनाओं के बाद भी ट्रंप ने बाजी मार ही ली।

राय आप किसी के बारे में कैसी भी बनाने को स्वतंत्र हैं। जैसे- हमारे यहां 500-1000 के नोटों के बैन होने पर लोग सरकार और प्रधानमंत्री पर बना रहे हैं। कुछ खुश हैं तो कुछ इत्ते दुखी कि माथे पर दो इंच चौड़े बल डाल लिए हैं। न जाने देश में ऐसा क्या अनोखा-अजूबा टाइप घट गया कि बर्दाशत ही नहीं हो पा रहा।

वैसे, कायदा तो यही कहता है कि जो है उसे स्वीकार कीजिए। अगर स्वीकार नहीं कर सकते तो एक कोने या कोप भवन में बैठकर कोसा-कासी करते रहिए। लेकिन आपकी कोसाहट को यहां सुनने वाला कोई नहीं। यह दुनिया अपनी गति चलती है। नए को आत्मसात और पुराने को बीच राह में छोड़ देती है।

ओबामा अब अमेरिका के लिए इतिहास हैं। डोनाल्ड ट्रंप ही अब उनका भविष्य और वर्तमान हैं। यही बात यहां पुराने 500-1000 और नए 500-2000 के नोटों पर लागू होती है। बदलाव ऐसे ही आते हैं ‘अचानक’। जिंदगी का असली लुत्फ इसी ‘अचानक’ में हैं। चाहो तो मानो या फिर रौंदू बने रोते रहो। किसे परवाह।

यहां लोग केवल सिकंदर को पहचानते हैं। जो हार गया समझो मर गया। बाकी बातें हैं, बातों का क्या।

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