मंगलवार, 1 नवंबर 2016

सब फेक हैं, एक आप ही नेक हैं

चूंकि ऐसा कहना बुद्धिजीवियों के बस का नहीं, नहीं तो वे देश की आजादी को ही ‘फेक’ बता देते। वे बुद्धिजीवि हैं कुछ भी कह-बोल सकने का ‘साहस’ रखते हैं इसीलिए उन्होंने सिमी आतंकियों के एन्काउंटर को ठां से ‘फेक’ बतला दिया।

अक्सर मैं सोचता हूं, हमारे देश के बुद्धिजीवियों-विपक्षियों को ‘ज्ञान’ किस ‘सोर्स’ से प्राप्त होता है। देखिए न, इधर घटना घटती है उधर तुरंत उनकी प्रतिक्रिया आ जाती है कि फेक है, जांच होनी चाहिए, यह सरकार का सेट एजेंडा है आदि-इत्यादि। आजकल वैसे भी सरकार से उनका ‘छत्तीस का आंकडा’ चल रहा है तो हर बात, हर घटना, हर मुद्दे का विरोध तो बनता है न। अरे, उन्होंने तो पिछले दिनों हुए ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की वैधता पर ही तमाम प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए थे।

ऐसा जान पड़ता है कि विरोध करने का कीड़ा देश के विपक्षियों-बुद्धिजीवियों के दिमाग में हरदम चहलकदमी करता रहता है। विरोध करते वक्त वे यह कतई नहीं देखते कि इससे देश के सम्मान को ठेस भी पहुंच सकती है। शायद इसीलिए देश उनके तईं बाद में, पहले विरोध, विरोध और विरोध है।

जब उनके दिलों-दिमाग में विरोध का इत्ता ही गुबार भरा पड़ा है तो फिर घर-परिवार के बीच कैसे ‘एडजस्ट’ कर पाते होंगे। जबकि घर का तो हर मसला उनकी निगाह के सामने से गुजरता होगा। मसलन- खाने का विरोध। कपड़ों का विरोध। नहाने-धोने का विरोध। आने-जाने का विरोध। नाते-रिश्तेदारों का विरोध। दाल में नमक के कम या ज्यादा होने का विरोध। आदि-इत्यादि। बेचारे घर वाले तो इन विरोधियों के कथित विरोध को सुनते-सुनते पक ही जाते होंगे न। हां (अपवादों को छोड़कर) जिनकी पत्नियां तेज-तररार होती होंगी, वे उनके फेक विरोध का जवाब ‘बेलन’ से ही देती होंगी।

चूंकि हम एक लोकतांत्रिक मुल्क हैं इसीलिए ऐसे लोगों को ‘बर्दाशत’ कर लेते हैं। यहां लिखने-बोलने की आजादी सबको मिली हुई है सो उन्हें सुन लेते हैं। कहीं किसी गैर-लोकतांत्रिक मुल्क में ये रहे होते तो पता चलता कि हर घटना को फेक ठहराना कित्ता भारी पड़ सकता है। पर हमें क्या, ‘कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना।‘ अगर वे नहीं कहे-बोलेंगे तो बेचारे अंदर ही अंदर घुटते रहेंगे। यों भी, उनके कुछ भी कह या बोल देने से जो सच है वो बदल तो नहीं जाएगा न।

यही वजह है कि मैं फेक टाइप के बुद्धिजीवियों-विपक्षियों की संगत में आने से डरता हूं। हमेशा उनसे घणी दूरी बनाकर रहता हूं। इनका कोई भरोसा नहीं कब, किसे, कहां फेक ठहरा दें। या विरोध करने बैठ जाएं। आजकल कुछ अलग दिखने के वायरस ने देश के बुद्धिजीवियों को भी अपनी चपेट में ले लिया है।

चलिए। छोड़िए। बजाने दीजिए उन्हें फेक एन्काउंटर का ढोल। हमारे लिए तो यही राहत की बात है कि खूंखार आतंकियों को मार डाला गया है। बाकी बातें हैं बातों का क्या।

5 टिप्‍पणियां:

Kavita Rawat ने कहा…

यही वजह है कि मैं फेक टाइप के बुद्धिजीवियों-विपक्षियों की संगत में आने से डरता हूं। हमेशा उनसे घणी दूरी बनाकर रहता हूं। इनका कोई भरोसा नहीं कब, किसे, कहां फेक ठहरा दें। या विरोध करने बैठ जाएं। आजकल कुछ अलग दिखने के वायरस ने देश के बुद्धिजीवियों को भी अपनी चपेट में ले लिया है।
...लाख टके की बात कही आपने ....

yashoda Agrawal ने कहा…

राष्ट्रहित सर्वोपरि
आलोचना और सबूत
माँगने वाले मूर्ख है
सादर

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बातों का क्या? सटीक ।

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’रंगमंच के मुगलेआज़म को याद करते हुए - ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

Jyoti Dehliwal ने कहा…

विरोध करनेवाले करते रहेंगे और काम करनेवाले अच्छे काम करते रहेंगे। सुंदर प्रस्तुति!