मंगलवार, 1 नवंबर 2016

उनका प्रोफेशनल विरोधी होना

बात-बेबात विरोध करना उनकी ‘आदत’ नहीं अब ‘पेशा’ बन चुका है। उनका विरोध का यह पेशा आजकल टनाटन चल रहा है। गली-मोहल्ले या सभा-आयोजन में जब भी विरोध करने वाले की जरूरत पड़ती है, उन्हें बुला लिया जाता है। विरोध करने के बकायदा उन्हें पैसे मिलते हैं। यानी, वे ‘प्रोफेशनल-विरोधी’ हैं।

मुझे उनका प्रोफेशनल-विरोधी होना जरा भी अखरता नहीं। बल्कि इस ‘साहस’ के वास्ते मैं कई दफा उन्हें बधाईयां भी दे चुका हूं। मुझे ऐसे ही लोग पसंद हैं, जो अंदर और बाहर से एक जैसे रहते हैं। विरोध करना उनका पेशा है तो है। राजनीति में जब टिकट बांटना और काटना पेशा बन सकता है तो विरोध करना क्यों नहीं।

यों ही एक दिन मुझे वो सब्जी मंडी में मिल गए। हैलो-नमस्कार के बाद पांच-सात मिनट उनसे बातचीत भी हुई। मैंने उनसे पूछा- ‘यहां-वहां, इस-उस का विरोध करके आपको मिलता क्या है?’ उन्होंने तपाक से जवाब दिया- ‘जी, पैसा। आजकल के जमाने में पैसा ही सबकुछ है। पैसा किसी की नौकरी करके भी कमाया जा सकता है और किसी का विरोध करके भी।‘ मैंने फिर से सवाल दागा- ‘ऐसा पैसा भला किस काम का जिसमें केवल विरोध ही निहित हो?’ पहले तो वे लंबी हंसी हंसे फिर बोले- ‘जनाब, शौकिया विरोधी होने से कहीं बेहतर है प्रोफेशनल विरोधी होना। मैं उन जैसे शौकिया विरोधियों टाइप नहीं जो केवल अपने ‘निजी हित’ के वास्ते किस के भी पाले में जाकर विरोध कर लेते हैं किंतु ऊपर से बड़े ‘लल्ला’ बने फिरते हैं। मैं शुद्ध प्रोफेशनल विरोधी हूं, आप मुझसे किसी भी पार्टी, नेता, विचारधारा, सिस्टम, कंट्री का विरोध करवा सकते हैं।‘

उनके इस खुले उत्तर के बाद अब कुछ बाकी नहीं रह गया था पूछना। अतः उनसे विदा लेते हुए मैं अपने, वे अपने रास्ते निकल लिए।

मगर हां प्रोफेशनल विरोध पर उनकी बात मुझे काफी जमी। बेशक विरोध हमारी मानसिकता में है किंतु उसका इस्तेमाल हम केवल अपने हित के वास्ते ही करते हैं। देख लीजिए न, आजकल जिस तरह से सरकार का विरोध बुद्धिजीवि और कथित प्रगतिशील मिलकर कर रहे हैं। आज उनकी निगाह में सब गड़बड़ हो रहा है मगर कल तक सब ठीक-ठाक था। विरोध करते-करते बेचारे इत्ते ‘दुबले’ हो गए हैं कि अब सेहत भी जवाब देने लगी है।

खैर मुझे क्या। मुझे तो उनका प्रोफेशनल विरोधी होना बेहद जंचा। मैं भी उनके पदचिन्हों पर चलने की सोच रहा हूं।

कोई टिप्पणी नहीं: