बुधवार, 30 नवंबर 2016

आइए, कैशलेस हुआ जाए

सरकार तो अब कैशलेस होने की बात कह रही है, अरे, मैं तो बचपन से कैशलेस हूं। जैसे बचपन में जेब में कुछ नहीं हुआ करता था, सीन आज भी कुछ ऐसा ही है। तब पापा से मिलने वाले 10 पैसे में ‘जन्नत’ दिखा करती थी, आज हजारों भी मिल जाएं तो ठन-ठन गोपाल। इसीलिए तो मैं बगैर रुपए-पैसे सुकून की जिंदगी काटने में अधिक विश्वास रखता हूं।

सच कहूं तो नोटबंदी से मेरी जेब और सेहत पर खास कोई फर्क नहीं पड़ा है। जरूरत भर के पैसे जेब में रखता हूं। जेब जब खाली हो जाती है, चुप-चुप लाइन में लगकर रुपए निकाल लेता हूं। न ज्यादा झगड़ा-टंटा, न सरकार की बुराई-भलाई। कौन-सा अपने अंतिम समय में रुपए-पैसे मुझे संग लेके जाने हैं। खाली आया था, खाली हाथ ही जाऊंगा। फिर इत्ती मारा-मारी किसलिए।

वैसे, कैशलेस होने के फायदे ही फायदे हैं। अगर बंदा मेरी तरह कैशलेस है तो सोने पे सुहागा। गौरतलब है, नोटबंदी के इस मौसम में एक भी बंदा न मुझसे नोट बदलने आया है, न उधार-छुट्टा मांगने। यहां तक कि पत्नी भी अब रुपए-पैसे की बात नहीं करती। बल्कि जित्ते रुपए उसने जोड़ रखे थे, एक दिन सब के सब निकालकर मेरे सामने रख दिए और बोली- जाके इन्हें अपने खाते में डाल आओ। अब ये मेरे किसी काम के नहीं। मैं कैशलेस ही भली।

और तो और मेरे वो दोस्त भी कैशलेस हो लिए हैं तो रात-दिन अपने रुपए-पैसे दम मेरे सामने भरा करते थे। अब सरे-राह मिलते हैं तो नजरें छुपा जाते हैं। इत्ता पैसा ठिकाने कहां लगाएं? सरकार ने नोटबंदी करके मालदारों की नाक में इत्ती मोटी नकेल फंसा दी है कि उनसे न निकाले बन रहा है न हिलगाए। बेचारे सब के सब- कैश होने के बाद भी- कैशलेस हो गए हैं।

मुझे इस बात की बेहद राहत है कि मैं पहले की तरह अब भी अपने मोहल्ले में सिर उठाकर चल रहा हूं। जो लोग कभी मेरे कैशलेस होने का खुलेआम मजाक उड़ाया करते थे, आज बिंदास सलाम ठोकते हैं। अमां, जिंदगी में ऐसी बहुत-सी चीजें हैं जिनसे ‘मोह’ पाला जा सकता है मगर कैश से तौबा-तौबा। अंटी में जित्ते नोट हों, हाथ-पैर भी उत्ते ही फैलाने चाहिए।

हां, लोगों को हो रहीं तकलीफों से इंकार नहीं मगर इस नोटबंदी ने प्रत्येक बंदे के भीतर कम में गुजारा करने की थोड़ी-बहुत आदत तो डाल ही दी। पहले जेब नोटों से भरी रहती थी, अब या तो कागजों से भरी होती या डेबिड-क्रेडिट कार्ड से। अब तो हर कोई बेताब-सा दिखता है कैशलेस हो जाने को। अखबारों-टीवी चैनलों पर तमाम विज्ञापन आ रहे हैं, कैशलेस होने की आदत डालिए। यहां तक कि सरकार का जोर भी कैशेलेस लेन-देन पर ही है।

आम नागरिक के भीतर अगर कैशलेस होने की व्यवाहारिता आ गई तो बेचारे चोरों का धंधा जरूर मंदा हो लेगा। फिर उन्हें भी कोई ऐसा जरिया खोजना पड़ेगा, जहां चोरी कैशलेस हो। चलो, हम सब के बीच कुछ तो बदलेगा। बदलने में ही भलाई है प्यारे।

कैशलेस जिंदगी जीके तो देखिए, कसम से, जन्नत से भी बढ़कर सुकून मिलेगा। साथ-साथ पैंट की जेबों को भी आराम मिलेगा। न वे जल्दी फटा करेंगी, न कटा।

तो आइए कैशलेस हुआ जाए।

रविवार, 20 नवंबर 2016

सोनम गुप्ता बेवफा (नहीं) है

प्रिय आशिको,
मैं सोनम गुप्ता। ओह! मुझको तो अपना नाम बतलाने की जरूरत ही नहीं। मैं तो सोशल मीडिया पर आजकल सोनम गुप्ता बेवफा है के संबोधन से जबरदस्त ‘ट्रेंड’ कर ही रही हूं। अच्छा है। बहुत अच्छा है। ट्रेंड करवाने के लिए भाई लोग कुछ भी खोज या किसी को भी पकड़ लेते हैं। इस दफा मैं ही सही। खैर, कोई गम नहीं।

नोटबंदी के बाद जिस तरह से मेरे बेवफा होने के चर्चे खासो-आम हुए हैं- आपकी कसम- मुझे बहुत मजा आ रहा है। किस्म-किस्म के नोटों पर जब मैंने सोनम गुप्ता बेवफा है लिखा देखा, मेरा दिल तो सातवें आसमान पर पहुंच गया। रातभर में मैं इत्ती ‘फेमस’हो गई, इत्ती तो शायद मैं ‘मिस वर्ल्ड’बन जाने के बाद भी नहीं होती! अब तो चौबीसों घंटे मेरे भीतर ‘सेलिब्रिटी’वाली फीलिंग छाई रहती है। आपका तहे-दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया।

लेकिन यहां मैं एक बात साफ कर दूं कि मैं बेवफा कतई नहीं हूं। हां, यह ठीक है कि मैं अपने बेवफा कहे या बनाए जाने को सोशल मीडिया पर ‘एन्जॉय’ जरूर कर रही हूं लेकिन बेवफाई से मेरा दूर-दूर तलक कोई नाता-वास्ता नहीं। अरे, बेवफा तो वो होगा न जो प्यार में धोखा देगा। प्यार में विश्वास को तार-तार करेगा। प्यार को समझने की कोशिश नहीं करेगा। किंतु मैंने तो कभी- न निजी जीवन में, न सोशल मीडिया पर- किसी से प्यार किया ही नहीं। फिर बताइए, मैं बेवफा कैसे हो गई?

अगर 10, 100, 500, 2000 के नोटों या डॉलर पर लिख देने भर से ही मैं बेवफा घोषित हो जाती हूं तो ऐसी बेवफाई पर मुझे ‘हंसी’ ही आ सकती है। न.. न.. मेरे लिए यह रोने या खीझने का विषय बिल्कुल भी नहीं है। दुनिया-समाज में किस्म-किस्म के लोग होते हैं, जो चीजों या व्यक्तियों को केवल ‘एन्जॉयमेंट’की नजरों से ही देखते-परखते हैं। ऐसे महानुभावों पर ‘रिएक्ट’ करना खुद को भरी भीड़ में ‘बौना’साबित करने जैसा है। और, बौना मैं किसी कीमत पर होना नहीं चाहती।

हालांकि मेरी बेवफाई के बाबत मुझसे मेरी फ्रेंड्स और कॉलेज में कई बार पूछा गया। मैंने सबको मुस्कुराते हुए एक ही जवाब दिया- कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना...।

फिर भी अगर आपको लगता है कि सोनम गुप्ता बेवफा है तो ये ही सही। सोशल मीडिया पर बेवफा होने जाने मात्र से न मेरा हीमोग्लोबिन, न मेरी प्लेटलेटस घट जानी हैं। यहां तो हर मोड़ पर कुछ न कुछ ‘ट्रौल’या ‘ट्रेंड’करता ही रहता है। लोग भी न अपनी अंदरूनी संतुष्टि के लिए क्या-क्या नहीं करते। आज सोनम गुप्ता है, कल को कोई और होगी।

सोशल मीडिया की कारिस्तानियों को अगर आप ‘दिल’ से लगा लेंगे तो बहुत मुश्किल होगी। यहां चीजों को या तो ‘एग्नोर’ कीजिए या ‘एन्जॉय’। जैसे मैं सोनम गुप्ता बेवफा है को खूब एन्जॉय कर रही हूं।

बुधवार, 16 नवंबर 2016

नोटबंदी की मार चोर हुए बेरोजगार

मेरे मोहल्ले के चोर लगभग ‘कंगाल’ होने की कगार पर हैं। नोटबंदी के कारण सबसे अधिक ग्रह उन्हीं के खराब हुए हैं। किसी को लूटने या कहीं चोरी करते वक्त इस बात की कोई ‘गारंटी’ नहीं रहती- अगले के पास ‘छुट्टे’ होंगे ही। यही वजह है, मोहल्ले में चोरी-चपाटी, छिना-छपट्टी की वारदातों में विकट कमी आई है। पुलिस भी राहत की सांस ले रही है, चलो- यहां-वहां की भाग-दौड़ बची।

लेकिन मेरा मन चोरों की इस हालत को देखकर खासा व्यथित है। हालांकि मैं कभी चोरा-चारी के पक्ष में नहीं रहा किंतु मेरा मानना है, रोजी-रोटी सबकी चलती रहती चाहिए। रोजी-रोटी चलेगी तब ही जब दुकान चलेगी। मगर यहां तो दुकान ही बंदी के समीप है। आलम यह है कि लोगों ने दुकान के अंदर तो छोड़िए उसके आस-पास तक से गुजरना बंद कर दिया है। अब बताइए, ऐसे में क्या चोर क्या ज्वैलर क्या कमाएगा, क्या खाएगा, क्या पहनेगा, क्या खर्च करेगा।

चलो हम-आप तो अपना दर्द किसी न किसी तरह मंत्री, अधिकारी या प्रधानमंत्री के सामने रख भी सकते हैं मगर बेचारे चोर तो अपनी तकलीफ किसी से कह भी नहीं सकते। वे तो यह भी कहने के नहीं रहे- नोटबंदी ने हमारे चोरी के रोजगार पर लात मार दी है अतः जल्दी से जल्दी हालात सामान्य किए जाएं। चोर को तो हमेशा अपने पकड़े जाने का खतरा रहता है न। चोरी-चकारी ही उसकी आय का एकमात्र माध्यम है, मोदीजी ने आजकल उस पर भी ताला जड़ दिया है।

चोरों की तकलीफ तो खैर समझ आती है लेकिन देश के कुछ नेता इत्ते ‘बौखलाए’ हुए से क्यों हैं? दिल्ली के मुख्यमंत्री से लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के पापाजी तक सब के सब नोटबंदी पर इत्ता नाराज हैं कि काटो तो खून नहीं। हमारे (सरजी) दिल्ली के मुख्यमंत्री तो मोदीजी को चौबीस घंटे का समय दे चुके हैं नोटबंदी पर पुनः विचार करने का। उनसे लाइन में खड़े आम आदमी की तकलीफ देखी नहीं जा रही। मगर वे यह भी नहीं कह पा रहे कि भईया, तुम थोड़ी देर साइड में बैठकर आराम करो। थोड़ा पानी-शानी, चाय-शाय पी लो तब तक मैं तुम्हारी जगह लाइन में खड़ा हो लेता हूं। मगर नेता लोग तो अपने-अपने चेहरों को चमकाने कभी चार हजार के नोट बदलने तो कभी चेतावनी देने के बहाने चैनलों के कैमरों के आगे आनकर खड़े हो जाते हैं।

खैर, नेताओं के अपने-अपने राजनीतिक हित हैं। पर बेचारे चोरों का क्या? वो तो ‘मुफ्त’ में ही निपट लिए। न कहीं चोरी करने से रहे, न किसी को लूटने से। बाकी का बचा दिन लाइन में खड़े होने में बीत जाता है। मुसीबत घणी है पर कहें किससे।

फिलहाल, मोहल्ले के एकाध चोर को मैंने समझाया कि लल्ला अपना चोरी-चकारी का पेशा छोड़ अब कोई अच्छा-सा काम-धंधा ढूंढ़ लो। उसी में तुम्हारी, तुम्हारे परिवार की भलाई है। मोदीजी का कोई भरोसा नहीं नोटबंदी के बाद आगे कौन-सी सख्त स्कीम ले आएं।

शुक्रवार, 11 नवंबर 2016

जो जीता वही सिकंदर

डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिका का राष्ट्रपति होना मुबारक। बेशक उनसे सहमति रखिए या असहमति मुबारकवाद देना तो बनता है। यों भी, उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव छोले-भटूरे खाते हुए तो नहीं न जीता है। अगले ने पूरी जान लगा दी इत्ता बड़ा चुनाव जीतने में। समाज और दुनिया में तूती केवल ‘जो जीता वही सिकंदर’ बनने वाले की ही बोलती है।

जानता हूं, डोनाल्ड ट्रंप न केवल कुछ अमेरिकनस बल्कि कुछ भारतीयों की भी पसंद नहीं हैं। वे उनके चरित्र और (खासकर भाषा) से बड़ी नफरत करते हैं। तो क्या...। यों तो दाग चांद में भी है फिर भी वो लोगों के दिलों के बेहद करीब है। प्रेमियों-प्रेमिकाओं का तो चांद फेवरिट है। हां यह सही है कि डोनाल्ड ट्रंप चांद नहीं हैं पर सितारे (स्टार) तो हैं ही।

सबसे अधिक हैरान मैं उन लोगों की राय जानकर हूं, जिन्हें सब्जी मंडी में पालक के भाव का पता नहीं और ट्रंप पर ज्ञान ऐसे पेल रहे हैं मानो बचपन में उन्होंने उन्हें गोद खिलाया हो। चलिए यहां की जाने दीजिए, खुद अमेरिकनस उनके बारे में कित्ता जानते हैं। पूरजोर विरोध और आलोचनाओं के बाद भी ट्रंप ने बाजी मार ही ली।

राय आप किसी के बारे में कैसी भी बनाने को स्वतंत्र हैं। जैसे- हमारे यहां 500-1000 के नोटों के बैन होने पर लोग सरकार और प्रधानमंत्री पर बना रहे हैं। कुछ खुश हैं तो कुछ इत्ते दुखी कि माथे पर दो इंच चौड़े बल डाल लिए हैं। न जाने देश में ऐसा क्या अनोखा-अजूबा टाइप घट गया कि बर्दाशत ही नहीं हो पा रहा।

वैसे, कायदा तो यही कहता है कि जो है उसे स्वीकार कीजिए। अगर स्वीकार नहीं कर सकते तो एक कोने या कोप भवन में बैठकर कोसा-कासी करते रहिए। लेकिन आपकी कोसाहट को यहां सुनने वाला कोई नहीं। यह दुनिया अपनी गति चलती है। नए को आत्मसात और पुराने को बीच राह में छोड़ देती है।

ओबामा अब अमेरिका के लिए इतिहास हैं। डोनाल्ड ट्रंप ही अब उनका भविष्य और वर्तमान हैं। यही बात यहां पुराने 500-1000 और नए 500-2000 के नोटों पर लागू होती है। बदलाव ऐसे ही आते हैं ‘अचानक’। जिंदगी का असली लुत्फ इसी ‘अचानक’ में हैं। चाहो तो मानो या फिर रौंदू बने रोते रहो। किसे परवाह।

यहां लोग केवल सिकंदर को पहचानते हैं। जो हार गया समझो मर गया। बाकी बातें हैं, बातों का क्या।

गुरुवार, 10 नवंबर 2016

500-1000 के नोट की उलझन

विकट उलझन में हूं। कुछ समझ नहीं पा रहा क्या करूं, क्या करूं। कभी दिल करता है, घर-शहर छोड़कर ऐसी जगह चला जाऊं जहां मुझे 500-1000 के नोट सपने में भी आएं। आलम यह है कि मैं 500-1000 के नोट देखकर हीडर’ जाता हूं।

नहीं.. नहीं.. ऐसा कतई नहीं है कि मेरे कनेजाली करेंसी’ है। अरे, मैं तो मिखारियों को दिए 500-1000 के नोट बदल-बदलकर परेशान हूं। चौंकिए मत, यह सच है। अक्सर ही ऐसा होता था, कभी राह चलते कोई मिखारी कुछ मांग लेता तो मैं झट्ट से 500-1000 का नोट निकालकर उसे दे देता। मेरे मोहल्ले के मिखारी- जब भी उन्हें जरूरत होती- मुझसे 500-1000 का नोट मांगकर ले जाया करते थे। यही वजह थी कि मैं केवल अपने मोहल्ले बल्कि पड़ोस के इलाकों में भी अच्छा-खासा फेमस था। कभी-कभी ऐसा भी होता था कि दूसरे शहरों के मिखारी भी मुझसे भीख मांगने जाया करते थे। लेकिन निराश में किसी को नहीं किया करता था। आखिर इत्ता कमा मैं किसके लिए रहा हूं।

यों भी, भिखारियों को नोट देने में मुझे दिली-तसल्ली मिला करती थी। किसी मजबूर के काम आना कोई गुनाह हो नहीं। इसीलिए मैं जेब में कभी छोटे नोट रखता ही नहीं था। हमेशा बड़े (500-1000) के नोट ही रहते थे। मेरा हमेशा से मानना रहा है कि छोटे नोट रखने से व्यक्ति के भीतरहीन भावना’ जाती है। और मैं ऐसा कभी नहीं चाहूंगा कि रुपए-पैसे को लेकर मेरे अंदर हीन भावना आए।

सबकुछ अच्छा खासा चल रहा था। लेकिन बीती रात मोदीजी द्वारा 500-1000 के नोट बंद होने का एलान होते ही मोहल्ले और आस-पड़ोस के मिखारियों का जमघट मेरे दरवाजे पर लगा हुआ है। हर मिखारी यह चाहता है कि मैं उसका 500-1000 का नोट चेंज कर छोटे नोट उसे दे दूं। जबकि कित्ती ही बार मैं उनको समझा चुका हूं कि मैं बैंक नहीं हूं। नोट चेंज करने के लिए बैंक जाओ। पर वे कुछ भी सुनने-समझने को तैयार नहीं। बस एक ही जिद्द पकड़े हुए हैं, चूंकि नोट आपने दिए थे, अतः बदलोगे भी आप ही।

अच्छी-खासी मुसीबत में फंस गया हूं। घर के बाहर जा सकता हूं, घर के अंदर रह सकता हूं। घर के अंदर रहता हूं तो बीवी ताने मारती है कि तुमने इत्ता रुपया मिखारियों में दान कर दिया और मैंने जब मांगा तो साफ मना कर दिया कि अभी नहीं है। ससुरा, मदद करना भी जी का जंजाल बन सकता है आज महसूस हो रहा है।

फिलहाल, सारे मिखारियों ने 500-1000 के नोट मेरे दरवाजे पर फेंक दिए हैं और चेतावनी दे गए हैं कि दो दिन के भीतर मैं उन्हें छोटे दे दूं। मैं बैंक हूं रिजर्व बैंक समझ नहीं पा रहा इत्ते नोट कहां खपाऊं। अजीब उलझन में डाल दिया मोदीजी आपने तो मुझे।

500-1000 की ऐसी हड्डी गले में आन फंसी है उगलते बन पा रही है निगलते।

शुक्रवार, 4 नवंबर 2016

खामोश! आपातकाल आने को है

इस वक्त घर में दुबक के बैठे रहने के अतिरिक्त मेरे पास कोई चारा नहीं। विद्रोह और विरोध करना मुझे आता नहीं। क्रांति मैं कर नहीं पाऊंगा। क्रांतिकारी बनने का मुझे शौक नहीं। हां, बहुत से बहुत मैं यह कर सकता हूं कि अपनी फेसबुक वॉल पर सरकार या बुद्धिजीवियों से सहमति-असहमति जताते हुए कुछ लिख भर दूं।

ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं, किसी ने मुझे बताया कि आपातकाल आने को है! कोई ऐसा-वैसा नहीं बड़ा भयंकर किस्म का आपातकाल आएगा। सच बोलूं- आपातकाल का नाम सुनते ही मेरी ‘घिघ्घी’ बंधना शुरू हो गई है। कुछ समझ नहीं पा रहा कि क्या करूं, क्या न करूं। आखिर आपातकाल है कोई मजाक नहीं। सुना है, आपातकाल में लिखने से लेकर बोलने तक पर विकट टाइप का बैन लग जाता है। जिसने सरकार या नेता के खिलाफ जरा भी हिमाकत की, उसे तुरंत जेल में हवा खाने भेज दिया जाता है। पिछले आपातकाल में बहुत से सूरमाओं की पाजामे ढिले हुए थे। इससे भला कौन इंकार करेगा।

मैं इस चिंता में घुला-पिघला जा रहा हूं अगर आपातकाल आ गया तो मेरे लिखने (बोलने में मैं ज्यादा विश्वास नहीं करता) का क्या होगा? लेखन से जो ठीक-ठाक कमाई हो रही है, वो कैसे नियमित रह पाएगी? हालांकि मैं विद्रोही टाइप का लेखन नहीं किया करता फिर भी सरकार के दिमाग का क्या भरोसा कब में पलटी मार जाए। यों भी, सरकार ने अभी एक अति-क्रांतिकारी चैनल को चौबीस घंटे के लिए बैन किया ही है।

इस बैन के खिलाफ उठ रहीं ज्यादातर आवाजें वे हैं, जो वर्तमान सरकार के साथ ‘एडजस्टमेंट’ नहीं कर पा रहीं। बात-बात में उन्हें विचार और लोकतंत्र खतरे में जान पड़ता है। इस समय आपातकाल का हल्ला भी सबसे अधिक इन्हीं अति-क्रांतिकारियों ने मचाया हुआ है। मचाने दीजिए न, किसे परवाह है।

मुझे न एक पैसे का लेना अति-क्रांतिकारियों से है न देना बैन या सरकार से। मेरी इच्छा केवल इत्ती-सी है कि मेरे लेखन की गाड़ी बिन बाधा चलती रहे। एडजस्टमेंट तो मैं हर कहीं कर सकता हूं। बेवजह बुद्धिजीवि या प्रगतिशील बनने का मुझे शौक नहीं। जिन्हें सरकार या व्यवस्था से लड़ने-भिड़ने की बीमारी है, वे अपनी दुकानें सजाए रखें।


खैर, आपताकाल को जब आना होगा आ जाएगा। मुझे ज्यादा डर लगेगा तो मैं अपनी रजाई में दुबक जाऊंगा। यही ठीक भी रहेगा। कोशिश मेरी तब भी यही रहेगी कि अपनी लेखन की दुकान यों ही चलती रहे। बाकी तब की तब देखी जाएगी।

मंगलवार, 1 नवंबर 2016

सब फेक हैं, एक आप ही नेक हैं

चूंकि ऐसा कहना बुद्धिजीवियों के बस का नहीं, नहीं तो वे देश की आजादी को ही ‘फेक’ बता देते। वे बुद्धिजीवि हैं कुछ भी कह-बोल सकने का ‘साहस’ रखते हैं इसीलिए उन्होंने सिमी आतंकियों के एन्काउंटर को ठां से ‘फेक’ बतला दिया।

अक्सर मैं सोचता हूं, हमारे देश के बुद्धिजीवियों-विपक्षियों को ‘ज्ञान’ किस ‘सोर्स’ से प्राप्त होता है। देखिए न, इधर घटना घटती है उधर तुरंत उनकी प्रतिक्रिया आ जाती है कि फेक है, जांच होनी चाहिए, यह सरकार का सेट एजेंडा है आदि-इत्यादि। आजकल वैसे भी सरकार से उनका ‘छत्तीस का आंकडा’ चल रहा है तो हर बात, हर घटना, हर मुद्दे का विरोध तो बनता है न। अरे, उन्होंने तो पिछले दिनों हुए ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की वैधता पर ही तमाम प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए थे।

ऐसा जान पड़ता है कि विरोध करने का कीड़ा देश के विपक्षियों-बुद्धिजीवियों के दिमाग में हरदम चहलकदमी करता रहता है। विरोध करते वक्त वे यह कतई नहीं देखते कि इससे देश के सम्मान को ठेस भी पहुंच सकती है। शायद इसीलिए देश उनके तईं बाद में, पहले विरोध, विरोध और विरोध है।

जब उनके दिलों-दिमाग में विरोध का इत्ता ही गुबार भरा पड़ा है तो फिर घर-परिवार के बीच कैसे ‘एडजस्ट’ कर पाते होंगे। जबकि घर का तो हर मसला उनकी निगाह के सामने से गुजरता होगा। मसलन- खाने का विरोध। कपड़ों का विरोध। नहाने-धोने का विरोध। आने-जाने का विरोध। नाते-रिश्तेदारों का विरोध। दाल में नमक के कम या ज्यादा होने का विरोध। आदि-इत्यादि। बेचारे घर वाले तो इन विरोधियों के कथित विरोध को सुनते-सुनते पक ही जाते होंगे न। हां (अपवादों को छोड़कर) जिनकी पत्नियां तेज-तररार होती होंगी, वे उनके फेक विरोध का जवाब ‘बेलन’ से ही देती होंगी।

चूंकि हम एक लोकतांत्रिक मुल्क हैं इसीलिए ऐसे लोगों को ‘बर्दाशत’ कर लेते हैं। यहां लिखने-बोलने की आजादी सबको मिली हुई है सो उन्हें सुन लेते हैं। कहीं किसी गैर-लोकतांत्रिक मुल्क में ये रहे होते तो पता चलता कि हर घटना को फेक ठहराना कित्ता भारी पड़ सकता है। पर हमें क्या, ‘कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना।‘ अगर वे नहीं कहे-बोलेंगे तो बेचारे अंदर ही अंदर घुटते रहेंगे। यों भी, उनके कुछ भी कह या बोल देने से जो सच है वो बदल तो नहीं जाएगा न।

यही वजह है कि मैं फेक टाइप के बुद्धिजीवियों-विपक्षियों की संगत में आने से डरता हूं। हमेशा उनसे घणी दूरी बनाकर रहता हूं। इनका कोई भरोसा नहीं कब, किसे, कहां फेक ठहरा दें। या विरोध करने बैठ जाएं। आजकल कुछ अलग दिखने के वायरस ने देश के बुद्धिजीवियों को भी अपनी चपेट में ले लिया है।

चलिए। छोड़िए। बजाने दीजिए उन्हें फेक एन्काउंटर का ढोल। हमारे लिए तो यही राहत की बात है कि खूंखार आतंकियों को मार डाला गया है। बाकी बातें हैं बातों का क्या।

उनका प्रोफेशनल विरोधी होना

बात-बेबात विरोध करना उनकी ‘आदत’ नहीं अब ‘पेशा’ बन चुका है। उनका विरोध का यह पेशा आजकल टनाटन चल रहा है। गली-मोहल्ले या सभा-आयोजन में जब भी विरोध करने वाले की जरूरत पड़ती है, उन्हें बुला लिया जाता है। विरोध करने के बकायदा उन्हें पैसे मिलते हैं। यानी, वे ‘प्रोफेशनल-विरोधी’ हैं।

मुझे उनका प्रोफेशनल-विरोधी होना जरा भी अखरता नहीं। बल्कि इस ‘साहस’ के वास्ते मैं कई दफा उन्हें बधाईयां भी दे चुका हूं। मुझे ऐसे ही लोग पसंद हैं, जो अंदर और बाहर से एक जैसे रहते हैं। विरोध करना उनका पेशा है तो है। राजनीति में जब टिकट बांटना और काटना पेशा बन सकता है तो विरोध करना क्यों नहीं।

यों ही एक दिन मुझे वो सब्जी मंडी में मिल गए। हैलो-नमस्कार के बाद पांच-सात मिनट उनसे बातचीत भी हुई। मैंने उनसे पूछा- ‘यहां-वहां, इस-उस का विरोध करके आपको मिलता क्या है?’ उन्होंने तपाक से जवाब दिया- ‘जी, पैसा। आजकल के जमाने में पैसा ही सबकुछ है। पैसा किसी की नौकरी करके भी कमाया जा सकता है और किसी का विरोध करके भी।‘ मैंने फिर से सवाल दागा- ‘ऐसा पैसा भला किस काम का जिसमें केवल विरोध ही निहित हो?’ पहले तो वे लंबी हंसी हंसे फिर बोले- ‘जनाब, शौकिया विरोधी होने से कहीं बेहतर है प्रोफेशनल विरोधी होना। मैं उन जैसे शौकिया विरोधियों टाइप नहीं जो केवल अपने ‘निजी हित’ के वास्ते किस के भी पाले में जाकर विरोध कर लेते हैं किंतु ऊपर से बड़े ‘लल्ला’ बने फिरते हैं। मैं शुद्ध प्रोफेशनल विरोधी हूं, आप मुझसे किसी भी पार्टी, नेता, विचारधारा, सिस्टम, कंट्री का विरोध करवा सकते हैं।‘

उनके इस खुले उत्तर के बाद अब कुछ बाकी नहीं रह गया था पूछना। अतः उनसे विदा लेते हुए मैं अपने, वे अपने रास्ते निकल लिए।

मगर हां प्रोफेशनल विरोध पर उनकी बात मुझे काफी जमी। बेशक विरोध हमारी मानसिकता में है किंतु उसका इस्तेमाल हम केवल अपने हित के वास्ते ही करते हैं। देख लीजिए न, आजकल जिस तरह से सरकार का विरोध बुद्धिजीवि और कथित प्रगतिशील मिलकर कर रहे हैं। आज उनकी निगाह में सब गड़बड़ हो रहा है मगर कल तक सब ठीक-ठाक था। विरोध करते-करते बेचारे इत्ते ‘दुबले’ हो गए हैं कि अब सेहत भी जवाब देने लगी है।

खैर मुझे क्या। मुझे तो उनका प्रोफेशनल विरोधी होना बेहद जंचा। मैं भी उनके पदचिन्हों पर चलने की सोच रहा हूं।