रविवार, 30 अक्तूबर 2016

पुरस्कार की व्यथा-कथा

मैं पुरस्कार हूं। मुझे बांटा-बंटावाया जाता है। मैं किसी के शो-केस की 'शोभा' बढ़ाता हूं तो किसी के साहित्यिक-सामाजिक सम्मान में बृद्धि करता हूं। मुझे हर किसी के द्वारा हाथों-हाथ लिया जाता है।

तिस पर भी मेरा 'दुखड़ा' यह है कि मुझे वक्त-बेवक्त 'ड्रम' की तरह 'बजाया' जाता रहता है। जिसे मैं मिलता हूं वो गा-गाकर मुझे बजाता है। जिसे मैं नहीं मिलता वो मुझे रो-रोकर बजाता है। जिसे मिलने वाला होता हूं- किंतु किसी कारणवश नहीं मिल पाता- वो मुझे गरिया-गरियाकर बजाता है। कुछ लोग मुझे लौटाकर अपनी वाह वाह की खातिर मुझे बजाते हैं। रही बात निर्णायक मंडल के सदस्यों की वे मुझे कित्ता और किस-किस तरह से बजाते हैं, इस एहसास को मैं महसूस करना भी नहीं चाहता।

मेरी जिंदगी बाहर से जित्ती सुनहरी और हरी-भरी आपको दिखती है, अंदर से यह उत्ती ही 'लफड़ों' भरी है। कभी-कभी तो इन लफड़ों को झेलते-झेलते मेरे फेफड़ें तक बोल जाते हैं। क्या करूं, झेलना पड़ता है। न झेलूं तो लोग कहेंगे पुरस्कार होकर नखरे दिखाता है। भला मेरे काहे के नखरे? सारे नखरे तो मुझे लेने, देने और ठुकराने वाले ही दिखला देते हैं।

अच्छा, पुरस्कार होकर मुझे ऐसा कभी लगा नहीं कि मैंने कोई बहुत बड़ा तीर मारा है। मेरा तरकश हमेशा खाली रहता है। तीर तो असल में वो लोग मारते हैं, जिन्हें मैं दिया-दिलवाया जाता हूं। विडंबना देखिए, मुझे ले लेने के बाद भी कुछ लोग कभी 'संतुष्ट' नहीं होते। हर वक्त हर किसी के सामने वे यही कहते-रोते पाए जाते हैं कि फलां पुरस्कार भी मुझे मिल जाता तो मेरे सम्मान में एक खिताब और जुड़ जाता। मानो- मैं कोई हार टाइप हूं कि एक मोती जड़ देने भर से उसकी सुंदरता बढ़ जाएगी।

साहित्य-राजनीति के सयानों ने मुझे दायरों में बांट रखा है। मेरा भी धर्म-जाति-संप्रदाय निर्धारित कर दिया है। मैंने ऐसे लोग भी खूब देखे हैं, जो अपने धर्म, अपनी जाति के लोगों को ही पुरस्कार देते-दिलवाते हैं।

बुरा न मानिएगा, मेरा सबसे अधिक 'नुकसान' किया है साहित्यिक बिरादरी वालों ने। अभी तलक कोई ऐसा साहित्यिक पुरस्कार न होगा, जो विवादों से परे रहा हो। हर साहित्यिक पुरस्कार पर कोई न कोई 'लफड़ा' जरूर होता है। लोगों को रचनाकार से इत्ती असहमतियां नहीं होतीं, जित्ती मुझसे होती हैं। जोड़-तोड़-जुगाड़ साहित्यिक बिरादरी वाले करें-करवाएं और गरियाया मुझे जाए। भला यह कहां की 'नैतिकता' है हुजूर?

देश हो चाहे विदेश मैं हमेशा हर साहित्यकार-लेखक के निशाने पर रहता हूं। कई साल पहले एक बड़े विदेशी साहित्यकार ने मुझे आलू की बोरी का गठ्ठर कह दिया था। बताइए, यह तो इज्जत है मेरी साहित्यकारों के बीच। फिर भी.. फिर भी.. मेरे वास्ते एक-दूसरे से लड़ने-झगड़ने को हर समय तैयार बैठे रहते हैं।

कभी-कभी तो मुझे लेखकों-साहित्यकारों-बुद्धिजीवियों के ऊपर इत्ती हंसी, इत्ती हंसी आती है कि मन करता है अपनी हंसी का विडियो बनाकर इन सबको व्हाट्सएप कर दूं। ऐसे पढ़े-लिखे होने से क्या फायदा कि उस पुरस्कार की ही इज्जत न कर पाओ, जो पूरी दुनिया में तुम्हारी शान में चार-चांद लगा रहा है। तुमसे तो बे-पढ़े-लिखे ही अच्छे, जिन्हें न ढंग से पुरस्कार का पता होता है न साहित्य का।

वैसे मुझे (पुरस्कार) लेकर जित्ता रोया-राट हिंदी में मचता है, इत्ता अंगरेजी में नहीं। अंगरेजी साहित्य वाले एकदम मस्त रहते हैं। उनका जोर पुरस्कार से ज्यादा अपने लेखन पर रहता है। हिंदी की वनिस्बत वहां एक-दूसरे की टांग-खिंचाई भी कम है। मगर हिंदी लेखन के तो मसले ही निराले हैं। मुझे लेकर क्या कवि, क्या कहानीकार, क्या व्यंग्यकार, क्या समीक्षक, क्या आलोचक हर वक्त एक-दूसरे पर तोप ताने ही खड़े मिलते हैं। वैचारिक द्वंद्व यहां इस कदर हैं कि अच्छा-खासा बंदा भी पगला जाए।

देख रहा हूं आजकल कुछ कथित बुद्धिजीवि टाइप लोग एक कवियत्री की बोल्ड कविता पर घोषित हुए पुरस्कार के पीछे हाथ-पैर धोकर पड़ गए हैं। वे उस कविता तो कविता मान ही नहीं रहे। कह रहे हैं, कवियत्री ने कविता की भाषा को तोड़-फोड़के रख दिया है। अतः हम सब इस पुरस्कार के खिलाफ हैं।

अमां, जिन्हें होना है पुरस्कार या कवियत्री के खिलाफ हो जाएं इससे न फर्क मेरी सेहत पर कुछ पड़ने वाला न कवियत्री की। यह तो लोग हैं लोगों का काम है कहना।

मुझे तो अब आदत-सी पड़ गई है। कान खोलकर सुन लीजिए, मुझे गरियाकर आप मेरा नहीं अपना ही 'अहित' कर रहे हैं। मैं तो जैसा हूं हमेशा वैसा ही रहूंगा। शेष मर्जी आपकी।

3 टिप्‍पणियां:

Kavita Rawat ने कहा…


.. अपना-अपना काम सब अपने-अपने हिसाब-किताब से करते हैं ... सही कहा आपने ....यह तो लोग हैं लोगों का काम है कहना.. Happy Diwali!

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’नमन भूगोल रचने वाले व्यक्तित्वों को - ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

मज़ेदार !