शुक्रवार, 28 अक्तूबर 2016

क्यों नहीं मिला हमें नोबेल

पत्नी ने सवाल दागा- ‘सारे नोबेल पुरस्कार विदेशियों को ही मिले, हमें कोई क्यों नहीं मिला?’ मैंने कहा- ‘तो क्या हुआ?’ पत्नी ने आंखें दिखाईं- ‘तो क्या हुआ.. का क्या मतलब? नोबेल न मिलने से सारी दुनिया में हमारी ‘नाक’ कट गई और तुम कह रहे हो तो क्या हुआ? क्या तुम्हें देश से प्रेम नहीं?’ ‘अरे नहीं.. नहीं..। ये तुमसे किसने कहा कि मुझे देश से प्रेम नहीं। बहुत प्रेम है। पर नोबेल के न मिल पाने का जहां तक सवाल है तो हमारे कने और भी बहुत से काम हैं, नोबेल के अलावा।‘ मैंने कहा। पत्नी ने पुनः सवाल छोड़ा- ‘भला नोबेल के अलावा हमारे कने और कौन-सा जरूरी काम हो सकता है, बताना।‘

इस दफा मैंने पत्नी को थोड़ा विस्तार से समझाने की कोशिश की। ‘देखो प्रियवर, नोबेल पुरस्कार हवा में तो मिल नहीं जाता। इसे पाने के लिए नई-नई खोजें और बड़े-बड़े काम करने पड़ते हैं। अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा इसके वास्ते खपाना पड़ता है। लेकिन हम ठहरे राजनीति पसंद मुल्क। जिंदगी का आधे से ज्यादा समय तो हम एक-दूसरे के खिलाफ राजनीति करने या रणनीतियां बनाने में ही जाया कर देते हैं। जब राजनीति से फुर्सत पाते हैं तो एक-दूसरे की लगाई-बुझाई, लड़ाई-भिड़ाई, रोने-टोकने में लगा देते हैं। हम खुद से कहीं से ज्यादा चिंता आज पड़ोसी के घर कौन-सी सब्जी बनी है या फलां मोहल्ले के लड़के का चक्कर अलां मोहल्ले की किस लड़की से चल रहा है या ढिमकाना अगर इत्ता कमा रहा है तो कहां से कमा रहा है.. इस टाइप की खोजों में हमें ज्यादा आनंद आता है।‘

‘तो डियर पत्नी जब हमारे दिमाग का लक्ष्य नोबेल न होकर पड़ोसी या राजनीति होगा तो क्या खाक मिलेगा हमें नोबेल।‘

मेरे समझाने पर पत्नी के तेवर थोड़ा ढीले पड़े। लेकिन गोली की मानिंद उसने पुनः मुझ पर सवाल दागा- ‘अगर वाकई ऐसा है तो तुम क्यों नहीं मेहनत करते नोबेल पाने की? घर में खाली पड़े-पड़े पन्ने लाल-पीले करते रहते हो? तुम्हें नोबेल मिलेगा तो न केवल मेरा बल्कि देश का सिर भी गर्व से ऊंचा होगा।‘

लंबी गहरी सांस भरते हुए मैंने पत्नी से इत्ता ही कहा- ‘न न मैं जैसा हूं वैसा ही ठीक हूं। मुझे न करनी कोई मेहनत नोबेल के लिए। तुम्हें पाता नहीं, यहां लेखक को पुरस्कार मिलते ही कित्तों के पेट में मरोड़ें उठना शुरू हो जाती हैं। कैसी-कैसी छिछालेदरें होती हैं। प्रियवर, किसी भी प्रकार के नोबेल का ‘बोझ’ मैं अपने सिर नहीं लेना चाहता।‘
मेरी बात सुनकर पत्नी थोड़ा भुनभुनाई और यह कहते हुए किचन में चली गई- ‘रहने दो तुमसे न हो पाएगा।‘

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