मंगलवार, 11 अक्तूबर 2016

रावण से बातचीत

ऐसे ही एक दिन सोशल मीडिया पर टहलकदमी करते हुए, रावण के दर्शन हो लिए। एक बार को यकीन ही न हुआ कि रावण सोशल मीडिया पर क्या कर रहा है। सोचा, दिल बहलाने के लिए थोड़ा रावण से ही बातचीत क्यों न कर ली जाए। कुछ अपनी कही, कुछ उसकी सुनी जाए। यों भी, रावण के तईं ये दुनिया एकदम नई और अचंभित करने वाली ही होगी।

पूछा- ‘भाई रावण, यहां सोशल मीडिया पर कैसे? क्या तुम्हें फिर से दूसरा जन्म मिल गया है?’ कुछ देर तक तो रावण की ओर से कोई जवाब ही नहीं आया। शायद सोच रहा हो कि इंसान ने मुझे यहां भी पहचान लिया!

खैर, कुछ मिनटों बाद उसका उत्तर आया। बोला- ‘हां जी, मैं यहां भी। क्या करूं, जब मुझे इंसानों के बीच रहना ही है तो क्यों न उनसे जुड़ी हर चीज को सीख लिया जाए।‘ मैंने कहा- ‘तुम्हारा काम तो तमाम श्रीराम ने युगों पहले कर दिया था, लेकिन क्या तुम मरे नहीं थे?’ वही अपनी चिर-परिचित हंसी में रावण हंसा और बोला- ‘भला मैं कैसे मर सकता हूं प्यारे? जब तलक घरती पर बुराई का अस्तित्व रहेगा मैं किसी न किसी रूप में जन्म लेता ही रहूंगा। मैं बुराई का दामन किसी हालत नहीं छोड़ सकता।‘

इस बीच रावण ने मुझसे सवाल किया- ‘मित्र, यह बताओ- आज का इंसान (बुराई, नफरत, भ्रष्टाचार के मामले में) तो मेरे जमाने के लोगों का भी ‘बाप’ है? क्या यह दुनिया, यह समाज, यहां के लोग इत्ते जालिम हो चुके हैं?’ रावण ने सवाल तो ठीक किया था। मैंने उसे बताया- ‘देखो भाई, तब के जमाने और अब के जमाने में जमीन-आसमान का अंतर आ चुका है। अब जो दिखता है वो है नहीं। जो नहीं दिखता वो ही है। दुनिया, समाज और लोग इस हद तक बदल चुके हैं कि उन मुखौटों को पहचान पाना बहुत कठिन हो गया है।‘

कुछ पल चुप रहने के बाद रावण बोला- ‘हां, देखकर तो ऐसा ही लगता है इस दुनिया को। उस युग में श्रीराम ने मुझे मारकर बुराई को हमेशा-हमेशा के लिए खत्म जरूर कर दिया था पर उन्हें क्या मालूम था कि इस धरती पर आने वाले समय में मुझसे से भी बड़े-बड़े धूर्त जन्म ले लेंगे।‘ हा हा हा हा। (रावण जोर की हंसी हंसा...)।

‘चलो खैर इन बातों को छोड़ो, जब तलक दुनिया है, यह सब यों ही चलता रहेगा।‘ मैंने बीच में टोकते हुए कहा। ‘अच्छा, यह बताओ- सोशल मीडिया का अनुभव कैसा रहा तुम्हारा?’ रावण ने जवाब दिया- ‘बहुत मस्त। बहुत ही मस्त। जब मेरा दिल लंका में नहीं लगता, मैं यहां (इस दुनिया में) आ जाता हूं। कुछ पुराने परिचित यहीं मिल जाते हैं। उनसे बाहर मिलने भी नहीं जाना पड़ता। अब आपस में मिलने-जुलने का ‘टाइम’ ही किसके पास है। पता है, मैं अपने भाईयों, बेटों, पत्नियों से यहीं बातचीत कर लिया करता हूं। सब मजे में हैं।‘

मैंने कहा- ‘वाह। बहुत अच्छे। यानी तुम भी ‘टेक्नो-फ्रैंडली’ हो गए हो।‘ हा हा हा हा हा... रावण हंसा।

तब ही अचानक से रावण को याद आया कि आज दशहरा है। आज मेरा काम तमाम होने का दिन है। तो बोला- ‘अच्छा दोस्त। अभी चलता हूं। तुमसे बातचीत मस्त रही। जरा सोशल मीडिया पर खुद को मरते (जलते) हुए देख लूं। बड़ा मजा आता है यह सब देखकर। आधे से ज्यादा लोग तो मुझे सोशल मीडिया पर मार या जलाकर ही खुश हो लेते हैं। अलविदा।‘

3 टिप्‍पणियां:

Ashutosh Dubey ने कहा…

acchi rachna !
हिन्दीकुंज,Hindi Website/Literary Web Patrika

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति डॉ. राम मनोहर लोहिया और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बढ़िया :)