बुधवार, 7 सितंबर 2016

खाट का महत्त्व

भले ही उनकी 'खाट सभा' में खाट का इस्तेमाल खास राजनीतिक फायदे के लिए किया गया हो किंतु मेरे जीवन में खाट का विशेष महत्त्व है। अगर खाट न होती तो आज मैं लेखक भी न होता- यह कहना गलत न होगा। खाट ने न केवल मेरा जीवन बल्कि मेरा लेखकीय करियर तक बदलकर रख दिया। इत्ता डिजिटल समय होने के बाद भी मैं अपना ज्यादातर लेखन खाट पर बैठकर ही करता हूं। जिस दिन खाट पर बैठकर न लिखूं तो ऐसा लगता है कि आज का दिन अधूरा रहा।

उनकी खाट सभा में यह देखकर मुझे थोड़ा दुख हुआ कि उन्होंने अपनी खाटें लूट जाने दीं। खाट लुटाने के लिए नहीं होती। जिनकी खाट लूट जाती है फिर उनकी खटिया खड़ी होते कतई देरी नहीं लगती। राजनीति में तो खासकर नेताओं को अपनी खाट खड़ी होने और लुटने से जरूर बचानी चाहिए। क्योंकि जिसके पास खाट नहीं, उसका जीवन 'नीरस' है। कुर्सी से कहीं ज्यादा महत्त्व खाट का है।

लेकिन खाट के महत्त्व को यहां कोई समझता ही नहीं। नेता लोग तो महज राजनीतिक गोटियां बिछाने की तरह खाट का इस्तेमाल करते हैं। जहां राजनीतिक फायदा देखा बस वहीं अपनी खाट डालके बैठ गए। जबकि लेखकों-साहित्यकारों के पास खाटें ढूंढ़े नहीं मिलेंगी। उन्होंने तो कुर्सी-मेज को अपने लेखन का आधार बनाया हुआ है। वहीं बैठकर वे तरह-तरह की क्रांतियों के गुब्बारे फुलाते रहते हैं।

किंतु मैंने अपने खाट-प्रेम को अब तलक बरकरार रखा है। साफ शब्दों में कहूं तो मुझे पत्नी से अधिक प्यार अपनी खाट से है। हालांकि पत्नी कई दफा मुझे बे-खाट करने की कोशिशें कर चुकी है मगर हर बार बचाया मुझे मेरी खाट ने ही है। बिन खाट मैं अपने जीवन के अस्तित्व की कल्पना तक नहीं कर सकता।

खाट एक प्राकृतिक आसन है। खाट पर बैठकर कभी आप खुद में 'वरिष्ठता' या 'एलिटता' का भाव नहीं ला सकते। खाट हमेशा आपके 'देसी ठाठ' को बनाए रखती है। जो आराम आप खाट पर लेटकर पा सकते हैं, वो बात पलंग या बैड पर मिलना नामुंकिन है। पहले शायद ही कोई घर ऐसा होता हो, जहां खाट न होती हो। पहले के लोग खाट को अपने दिल से लगाकर रखा करते थे। मगर आधुनिकता की अंधी भागम-भाग ने खाट को ही बे-खाट कर दिया।

अपने घर आए मेहमान से अगर मैं खाट पर बैठने के लिए बोलता हूं तो अगला ऐसे मुंह बनता है मानो मैंने उसकी बीवी का हाथ मांग लिया हो। यह खाट पर न लेटने-बैठने का ही नतीजा है कि हमारी पीठें हमेशा दर्द से करहाती रहती हैं।

कहने को आप मुझे पिछड़ी सोच का कह सकते हैं लेकिन मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। खाट के प्रति अपने लगाव को मैं कभी कम नहीं करने वाला, चाहे दुनिया कित्ता ही क्यों न बदल ले। जिस खाट पर बैठकर मुझे किस्म-किस्म के आईटियाज आते हैं, भला उस खाट का दामन मैं कैसे छोड़ सकता हूं। नहीं। कभी नहीं। खाट है तो मैं हूं। मेरा लेखन है। मेरा आस्तित्व है।

राजनीति या साहित्य में लोग भले ही दूसरों की खाट खड़ी करने में लगे रहते हों मगर मैं अपने खाट के प्रति प्रेम को हमेशा यों ही बनाए रखूंगा।

2 टिप्‍पणियां:

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ' विरोध के बाद भी चमका जिनका सितारा - ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...