गुरुवार, 29 सितंबर 2016

काश! कोई मुझ पर भी जूता फेंके

न जाने वो ‘सुनहरा दिन’ कब आएगा, जब मुझ पर जूता फेंका जाएगा! मेरे नाम के मोहल्ले से लेकर राष्ट्रीय मीडिया तक में ‘चर्चे’ होंगे। नाते-रिश्तेदार मेरा हाल-चाल लेने घर आएंगे। मुझ पर फेंके गए जूते की क्लिप को बार-बार टीवी चैनलों पर दिखलाया जाएगा। सोचिए, कित्ता अद्भूत टाइप का एक्सपीरिंयस मेरे साथ जुड़ेगा।

यों तो अब तलक नेताओं पर ही जूते फेंके गए हैं किंतु मैं बतौर लेखक खुद पर जूता फिंकवाना चाहता हूं। मैं उस ‘कुंठा’ से बाहर निकलना चाहता हूं कि क्यों कोई लेखकों पर जूते नहीं फेंकता। अगर ऐसा कुछ मेरे साथ होता है तो मैं पहला ऐसा लेखक कहलाऊंगा जिस पर जूता फेंका गया।

इसीलिए मैं आजकल लेखन भी इसी टाइप का कर रहा हूं कि कोई ‘पीड़ित पाठक’ मुझसे कुपित होकर मेरे जूता दे मारे। मैं जानता हूं, यह काम इत्ता सरल नहीं। जूता मारना तो बहुत आसान है किंतु जूता खाना बहुत कठिन। जूता खाने के बाद मैंने अच्छों-अच्छों के माथे पर पसीने की धराएं बहती देखी हैं। उस पल उनके कने न कुछ उगलने को होता है न निगलने को। बात भी सही है। भरी सभा के बीच कहीं से कोई दन-दनाता हुआ जूता आए और सीधा आप पर चिपक जाए। ये तो खुलेआम बहुत बड़ी वाली बेइज्जती हो गई न। ऐसे में जित्ती शर्म जूता फेंकने वाले को नहीं आती, उससे कहीं ज्यादा उसे खाने वाले को आती है। बेचारा काटो तो खून नहीं टाइप हो जाता है।

इस सच से कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि अब तलक जिन्होंने भी जूते खाने के एहसास को झेला है, वे सभी रातों-रात ‘स्टार’ बन गए। न केवल लोकल लेवल पर बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी उनकी खूब चर्चाएं हुईं। और ‘हीरो’ वो भी बन गया, जिसने जूता फेंका। न केवल समाज बल्कि परिवार के बीच भी उसका ‘स्टेटस’ बढ़ गया। मेरा साफ मानना है, दुनिया में नाम होना चाहिए, चाहे बदनाम होकर ही क्यों न हो।

इसीलिए तो मैं अपनी ‘बदनामी’ से भी नहीं डरता। क्या होगा अगर कोई मुझ पर जूता फेंक देगा। बता दूं, मुझे चिंता इस बात की बिल्कुल नहीं होगी कि मुझ पर जूता फेंका गया। बल्कि मुझे तो खुशी होगी कि मैं बतौर लेखक उस पांत में आन खड़ा हुआ जिसमें बड़े-बड़े नेता और राष्ट्रपति तक शामिल रहे हैं।

‘जग-प्रसिद्ध’ होने-बनने के साधनों में अब जूता-स्याही भी शामिल हो चुके हैं। आए दिन कोई न कोई नेता या मंत्री इनका शिकार हो ही जाता है। वे भी क्या करें। किस-किस को रोंके। किस-किस पर गुस्से का इजहार करें। सो, उन्होंने भी इस प्रकिया को आदत टाइप बना लिया है।

मैं तो बड़ी ‘बेसर्बी’ उस दिन ‘सुनहरे दिन’ के इंतजार में हूं कि कब कोई मुझ पर जूता फेंके। न न मैं उस जूता फेंकने वाले पर कतई ‘नाराज’ नहीं होऊंगा बल्कि उसका ‘एहसानमंद’ रहूंगा कि उसने जूता फेंककर मुझ जैसे ‘अ-प्रसिद्ध’ लेखक को ‘जग-प्रसिद्ध’ बना दिया।

कोई टिप्पणी नहीं: