मंगलवार, 20 सितंबर 2016

मच्छर से क्या डरना

पुरानी कहावत है- जो डर गया, समझो मर गया। आजकल इस कहावत को मैं बेहद जोश-खरोश के साथ फॉलो कर रहा हूं। साथ ही, आपको बता देना चाहता हूं कि मैंने मच्छर से डरना छोड़ दिया है। अब मैं किसी भी टाइप के कहीं के भी मच्छर से नहीं डरता। बहुत जी लिया, मच्छर से डर-डरके। अब और नहीं।

यह डर मुझे ‘डिप्रेशन’ में लिए जा रहा था। रात-दिन सिर्फ मच्छर, डेंगू, चिकनगुनिया के ही डरावने सपने आते रहते थे। जहां शरीर पर कहीं लाल दाने दिखे, खुजली हुई या हल्का-फुल्का बुखार महसूस हुआ, यही लगता था कि कहीं मैं भी डेंगू की गिरफ्त में तो नहीं आ गया। पूरे-पूरे दिन कपड़ों से शरीर को ढंके रहता था। एक तरफ गर्मी का जोर, दूसरी मच्छर का खौफ; जिंदगी की मट्टी पलीद हो गई थी।

लेकिन अब ऐसा कुछ नहीं है। बिंदास रहता हूं। कम कपड़े पहनता हूं। मच्छर का डटकर मुकाबला करता हूं। जहां बैठा या उड़ता दिख जाता है, तुरंत मसल डालता हूं। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। अरे, एक जरा-सा मच्छर इंसान की ऐसी-तैसी करे हुआ है। विडंबना देखिए, इंसान शेर-चीते से बिंदास भिड़ जाता है मगर एक मच्छर से पार नहीं पा रहा। जिधर देखो उधर ही डेंगू, चिकनगुनिया के फैलने की खबरें सुनने में आ रही हैं।

इसमें बेचारे मच्छर की भी कोई गलती नहीं। उसे पाला-पोसा तो हमहीं ने है। जगह-जगह गंदी के ढेर लगाकर उसे खुल्ला दावत दी है कि वो आए और हमारा शिकार करे। साफ-सफाई के प्रति हमारी धारण कुछ यों रही है कि अपना घर साफ-सुथरा रहे भले ही अपने घर का कूड़ा पड़ोसी के दरवाज के आगे क्यों न डाल दें। दुख तो इस बात है कि सरकार और प्रधानमंत्री द्वारा इत्ता समझाने के बाद भी हमने सफाई और गंदी के प्रति अपना नजरिया ज्यादा कुछ बदला नहीं है।

तब क्यों न पनपेगा डेंगू, चिकनगुनिया का मच्छर। मच्छरों को पैदा होने का घर तो हम ही दे रहे हैं। फिर क्यों डेंगू या चिकनगुनिया के प्रभाव से हलकान हुए जाते हैं।

चूंकि मैं पक्का साफ-सफाई पसंद बंदा हूं इसीलिए अब न मच्छर से डरता हूं न डेंगू, चिकनगुनिया से। अमां, डरने-डराने के लिए दुनिया में और भी चीजें हैं। यह क्या कि एक मामूली से मच्छर से डरे जा रहे हैं। डरने का इत्ता ही शौक है तो पत्नी से डरिए। हकीकत यह है कि जो लोग गाहे-बगाहे इस या उस से ‘न’ डरने की ‘डींगे’ हांकते रहते हैं न, वो घर में सबसे अधिक अपनी पत्नी से डरते हैं। इत्ता डरते हैं, इत्ता डरते हैं कि कतई भीगी बिल्ली बने रहते हैं।

अव्वल तो अब कोई मच्छर मुझे डरा नहीं पाएगा। फिर भी अगर किसी मच्छर ने मुझे डराने या धमकाने की जुर्रत की तो उसका मैं वही हश्र करूंगा, जो राम ने रावण का किया था। डरी-डरी सी जिंदगी जीना मुझे पसंद नहीं। जीने का असली मजा तो ‘निडर’ होकर जीने में है।

मच्छर अगर बेशर्म हो गए हैं तो आप भी उनके प्रति बेशर्म हो जाइए। जैसे तो तैसा। डरेंगे तो मच्छर और डराएगा। और हां मच्छर भगाने का सारा जिम्मा सरकार या मंत्रियों पर मत छोड़िए, कुछ जिम्मा आप भी उठाइए। एकदम बिंदास होके- मेरी तरह से- मच्छर के विरूद्ध खड़े हो जाएं फिर देखना मच्छर कैसे नहीं भागता है यह मुल्क छोड़के। ‘निडरता’ में ही हम सबकी ‘भलाई’ है।

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