शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

लंबी जुबान का दर्द

सुबह उठते ही सबसे पहले मैंने अपनी जुबान चेक की। पूरी ताकत से उसे बाहर निकाला। दाएं-बाएं और ऊपर-नीचे करके देखा। नाक से छूआने की कोशिश भी की। लेकिन वहां तलक पहुंच नहीं पाई। थैंक गॉड। मैंने राहत की सांस ली। फिर जुबान को अंदर कर अपने दूसरे कामों में लग गया।

हो सकता है, आपको जुबान के प्रति मेरे इस 'बर्ताब' पर 'हंसी' आ रही हो। दबी आवाज में आपने मुझे 'बेवकूफ' भी कह दिया हो। कोई नहीं। मैं किसी के कहे की फिकर नहीं करता। जुबान मेरी है। उसकी देख-रेख करना मेरी जिम्मेवारी। जुबान है तो सब है। जुबान नहीं तो कुछ नहीं।

दरअसल, मैं यह खबर पढ़के थोड़ा सहम-सा गया कि सर जी की लंबी जुबान की वजह से उनकी जुबान का ऑपरेशन करना पड़ा। जुबान की लंबाई को घटाया गया। इस वजह से उन्हें कुछ दिन चुप रहकर ही गुजारने होंगे।

भला सर जी और चुप...! इसकी कल्पना तो सपने में करना भी बेमानी टाइप लगता है। लेकिन करना पड़ेगा। आखिर जुबान का सवाल है। जुबान स्वस्थ रहेगी तो ही सर जी इस-उस को हड़का सकेंगे। बिन जुबान किस काम की अकड़।

वैसे, मेरे एक करीबी मित्र ने बतलाया कि अक्सर जुबान किसी शख्स की निरंतर बुराई करने से भी लंबी हो जाया करती है। कहीं सर जी की जुबान पर इसी बुराई का असर तो नहीं हो गया! क्योंकि हर बात के लिए वो प्रधानमंत्री जी को कोसते ही रहते थे। क्या मालूम जुबान को उनकी बुराई पसंद न आई हो और वो लंबी हो ली हो! भई, यह इंडिया है। यहां इंसान और जुबान के साथ कहीं भी, कुछ भी हो सकता है।

मित्र की बात सुनकर थोड़ा मैं भी डर गया हूं। क्योंकि मैं भी अक्सर साहित्यिक वरिष्ठों और परिवारिक नाते-रिश्तेदारों की बुराईयां करता ही रहता हूं। इस बुराईबाजी का प्रभाव कहीं मेरी जुबान पर न पड़ जाए। जैसे-तैसे करके एक जुबान पाई है कहीं उससे भी हाथ न धोने पड़ें। जुबान न रहने पर कल को कहीं पत्नी ने तलाक दे दिया तो...।

नहीं...। नहीं...। मैं ऐसा अपनी जुबान के साथ कतई नहीं होने दूंगा। मुझे मेरी जुबान लेखन से कहीं ज्यादा प्यारी है। सर जी तो ऑपरेशन का खरचा फिर भी अफॉर्ड कर सकते हैं किंतु मैं नहीं कर सकता। नन्हीं-सी सैलरी में क्या बचाऊं या खरच करूं, इसी जोड़-घटाने में पूरा महीना बीत लेता है।

तो प्यारे, आज से बल्कि अभी से मैं यह कसम खाता हूं कि कभी किसी की बुराई नहीं करूंगा। और पत्नी की तो सपने में भी नहीं करूंगा। हमेशा अच्छा और मीठा-मीठा ही बोलूंगा। मैं नहीं चाहता कि जो सर जी की जुबान के साथ हुआ, मेरी जुबान के साथ भी हो। 

2 टिप्‍पणियां:

अजय कुमार झा ने कहा…

हा हा हा एक जबान की कीमत तुम क्या जानो राइटर बाबू ..बीच बीच खांस खांसकर "आप" अपनी दुकान बहुत चमका सकते हैं

शिवम् मिश्रा ने कहा…

इसी लिए कहा जाता है ... जबान संभाल कर बोलो !!!




ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "विवादित पर जानदार चित्रकार - मक़बूल फ़िदा हुसैन“ , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !