गुरुवार, 29 सितंबर 2016

काश! कोई मुझ पर भी जूता फेंके

न जाने वो ‘सुनहरा दिन’ कब आएगा, जब मुझ पर जूता फेंका जाएगा! मेरे नाम के मोहल्ले से लेकर राष्ट्रीय मीडिया तक में ‘चर्चे’ होंगे। नाते-रिश्तेदार मेरा हाल-चाल लेने घर आएंगे। मुझ पर फेंके गए जूते की क्लिप को बार-बार टीवी चैनलों पर दिखलाया जाएगा। सोचिए, कित्ता अद्भूत टाइप का एक्सपीरिंयस मेरे साथ जुड़ेगा।

यों तो अब तलक नेताओं पर ही जूते फेंके गए हैं किंतु मैं बतौर लेखक खुद पर जूता फिंकवाना चाहता हूं। मैं उस ‘कुंठा’ से बाहर निकलना चाहता हूं कि क्यों कोई लेखकों पर जूते नहीं फेंकता। अगर ऐसा कुछ मेरे साथ होता है तो मैं पहला ऐसा लेखक कहलाऊंगा जिस पर जूता फेंका गया।

इसीलिए मैं आजकल लेखन भी इसी टाइप का कर रहा हूं कि कोई ‘पीड़ित पाठक’ मुझसे कुपित होकर मेरे जूता दे मारे। मैं जानता हूं, यह काम इत्ता सरल नहीं। जूता मारना तो बहुत आसान है किंतु जूता खाना बहुत कठिन। जूता खाने के बाद मैंने अच्छों-अच्छों के माथे पर पसीने की धराएं बहती देखी हैं। उस पल उनके कने न कुछ उगलने को होता है न निगलने को। बात भी सही है। भरी सभा के बीच कहीं से कोई दन-दनाता हुआ जूता आए और सीधा आप पर चिपक जाए। ये तो खुलेआम बहुत बड़ी वाली बेइज्जती हो गई न। ऐसे में जित्ती शर्म जूता फेंकने वाले को नहीं आती, उससे कहीं ज्यादा उसे खाने वाले को आती है। बेचारा काटो तो खून नहीं टाइप हो जाता है।

इस सच से कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि अब तलक जिन्होंने भी जूते खाने के एहसास को झेला है, वे सभी रातों-रात ‘स्टार’ बन गए। न केवल लोकल लेवल पर बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी उनकी खूब चर्चाएं हुईं। और ‘हीरो’ वो भी बन गया, जिसने जूता फेंका। न केवल समाज बल्कि परिवार के बीच भी उसका ‘स्टेटस’ बढ़ गया। मेरा साफ मानना है, दुनिया में नाम होना चाहिए, चाहे बदनाम होकर ही क्यों न हो।

इसीलिए तो मैं अपनी ‘बदनामी’ से भी नहीं डरता। क्या होगा अगर कोई मुझ पर जूता फेंक देगा। बता दूं, मुझे चिंता इस बात की बिल्कुल नहीं होगी कि मुझ पर जूता फेंका गया। बल्कि मुझे तो खुशी होगी कि मैं बतौर लेखक उस पांत में आन खड़ा हुआ जिसमें बड़े-बड़े नेता और राष्ट्रपति तक शामिल रहे हैं।

‘जग-प्रसिद्ध’ होने-बनने के साधनों में अब जूता-स्याही भी शामिल हो चुके हैं। आए दिन कोई न कोई नेता या मंत्री इनका शिकार हो ही जाता है। वे भी क्या करें। किस-किस को रोंके। किस-किस पर गुस्से का इजहार करें। सो, उन्होंने भी इस प्रकिया को आदत टाइप बना लिया है।

मैं तो बड़ी ‘बेसर्बी’ उस दिन ‘सुनहरे दिन’ के इंतजार में हूं कि कब कोई मुझ पर जूता फेंके। न न मैं उस जूता फेंकने वाले पर कतई ‘नाराज’ नहीं होऊंगा बल्कि उसका ‘एहसानमंद’ रहूंगा कि उसने जूता फेंककर मुझ जैसे ‘अ-प्रसिद्ध’ लेखक को ‘जग-प्रसिद्ध’ बना दिया।

गुरुवार, 22 सितंबर 2016

श्रेष्ठ व्यंग्यकार होने का मुगालता

मुगालते पालने का शौक मुझे बचपन से है। हर टाइप का मुगालता मैं पाल सकता हूं। मुझे रत्तीभर ‘शर्म’ नहीं आती मुगालता पालने में। जैसे- आजकल मैंने अपने श्रेष्ठ व्यंग्यकार होने का मुगालता पाला हुआ है। चाहे दिन हो या रात 24x7 मैं इसी मुगालते में ‘ऐंठा’ रहता हूं। इस मुगालते ने मेरे दिलो-दिमाग पर ऐसा टनाटन असर किया है कि मैं- व्यंग्य के क्षेत्र में- किसी जूनियर या सीनियर व्यंग्यकार को कुछ समझता ही नहीं। यानी, जो हूं सिर्फ और सिर्फ मैं ही हूं।
न केवल पत्नी बल्कि मोहल्ले वालों को भी साफ कह दिया है कि वे मेरा नाम पुकारने से पहले उसके आगे ‘श्रेष्ठ’ अवश्य लगाएं। जब लोग अपने नाम के आगे अंतरराष्ट्रीय कवि या शायर लिख-लिखवा सकते हैं तो मैं क्यों नहीं श्रेष्ठ हो सकता? श्रेष्ठ होना मेरा लोकतांत्रिक अधिकार है। दुनिया को मेरी श्रेष्ठता का पता चले या न चले मगर मुझे यह एहसास हर वक्त रहना चाहिए कि मैं एक ‘श्रेष्ठ व्यंग्यकार’ हूं।
और फिर एक मैं ही नहीं इस समाज-दुनिया में हर कोई अपने-अपने हिसाब से मुगालते पाले बैठा है। किसी को अपने वरिष्ठ आलोचक होने का मुगालता है। किसी को अपने ईमानदार होने का मुगालता है। किसी को अपने बेस्ट नेता होने का मुगालता है। किसी को अपने धांसू कलाकार होने का मुगालता है। किसी को अपने उम्दा हलवाई होने का मुगालता है। तो प्यारे जिंदगी में अगर खुद को ‘ऊर्जावान’ बनाए रखना है तो खूब मुगालते पालिए। मुगालते पालने में न पैसे खर्च होने हैं, न दिमाग।
बाकी लेखकों का नहीं जानता किंतु व्यंग्यकार को खुद के श्रेष्ठ होने का मुगालता जरूर पालना चाहिए। व्यंग्यकार अगर मुगालता नहीं पालेगा तो मस्त टाइप व्यंग्य लिख ही नहीं पाएगा। दूसरों पर ‘कटाक्ष’ करने से बेहतर पहले खुद पर करके देखिए कि आप उसे ‘बर्दाशत’ कर भी पाते हैं कि नहीं। ऐसा नहीं होना चाहिए कि अपना गिरेबान तो दागदार है मगर हम दूसरे का गिरेबान पकड़कर उसे उसके दाग दिखा रहे हैं।
फेसबुक-टि्वटर आपको मौका देते हैं अपने बारे में किस्म-किस्म के मुगालते पालने का। जो मुगालते खुद के बारे में पाल रखे हैं, उन्हें बिंदास अपनी दीवार पर चिपका दीजिए। बाकी ‘लोग क्या कहेंगे’ इस पर खाक डालिए। ध्यान रखें, लोगों के कहे के चक्कर में अगर उलझे रहेंगे तो मुगालते कभी नहीं पाल पाएंगे।

फिलहाल, मैंने तो लोगों के कहे को परे रखकर अपने श्रेष्ठ व्यंग्यकार होने का मुगालता पाला हुआ है।

मंगलवार, 20 सितंबर 2016

मच्छर से क्या डरना

पुरानी कहावत है- जो डर गया, समझो मर गया। आजकल इस कहावत को मैं बेहद जोश-खरोश के साथ फॉलो कर रहा हूं। साथ ही, आपको बता देना चाहता हूं कि मैंने मच्छर से डरना छोड़ दिया है। अब मैं किसी भी टाइप के कहीं के भी मच्छर से नहीं डरता। बहुत जी लिया, मच्छर से डर-डरके। अब और नहीं।

यह डर मुझे ‘डिप्रेशन’ में लिए जा रहा था। रात-दिन सिर्फ मच्छर, डेंगू, चिकनगुनिया के ही डरावने सपने आते रहते थे। जहां शरीर पर कहीं लाल दाने दिखे, खुजली हुई या हल्का-फुल्का बुखार महसूस हुआ, यही लगता था कि कहीं मैं भी डेंगू की गिरफ्त में तो नहीं आ गया। पूरे-पूरे दिन कपड़ों से शरीर को ढंके रहता था। एक तरफ गर्मी का जोर, दूसरी मच्छर का खौफ; जिंदगी की मट्टी पलीद हो गई थी।

लेकिन अब ऐसा कुछ नहीं है। बिंदास रहता हूं। कम कपड़े पहनता हूं। मच्छर का डटकर मुकाबला करता हूं। जहां बैठा या उड़ता दिख जाता है, तुरंत मसल डालता हूं। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। अरे, एक जरा-सा मच्छर इंसान की ऐसी-तैसी करे हुआ है। विडंबना देखिए, इंसान शेर-चीते से बिंदास भिड़ जाता है मगर एक मच्छर से पार नहीं पा रहा। जिधर देखो उधर ही डेंगू, चिकनगुनिया के फैलने की खबरें सुनने में आ रही हैं।

इसमें बेचारे मच्छर की भी कोई गलती नहीं। उसे पाला-पोसा तो हमहीं ने है। जगह-जगह गंदी के ढेर लगाकर उसे खुल्ला दावत दी है कि वो आए और हमारा शिकार करे। साफ-सफाई के प्रति हमारी धारण कुछ यों रही है कि अपना घर साफ-सुथरा रहे भले ही अपने घर का कूड़ा पड़ोसी के दरवाज के आगे क्यों न डाल दें। दुख तो इस बात है कि सरकार और प्रधानमंत्री द्वारा इत्ता समझाने के बाद भी हमने सफाई और गंदी के प्रति अपना नजरिया ज्यादा कुछ बदला नहीं है।

तब क्यों न पनपेगा डेंगू, चिकनगुनिया का मच्छर। मच्छरों को पैदा होने का घर तो हम ही दे रहे हैं। फिर क्यों डेंगू या चिकनगुनिया के प्रभाव से हलकान हुए जाते हैं।

चूंकि मैं पक्का साफ-सफाई पसंद बंदा हूं इसीलिए अब न मच्छर से डरता हूं न डेंगू, चिकनगुनिया से। अमां, डरने-डराने के लिए दुनिया में और भी चीजें हैं। यह क्या कि एक मामूली से मच्छर से डरे जा रहे हैं। डरने का इत्ता ही शौक है तो पत्नी से डरिए। हकीकत यह है कि जो लोग गाहे-बगाहे इस या उस से ‘न’ डरने की ‘डींगे’ हांकते रहते हैं न, वो घर में सबसे अधिक अपनी पत्नी से डरते हैं। इत्ता डरते हैं, इत्ता डरते हैं कि कतई भीगी बिल्ली बने रहते हैं।

अव्वल तो अब कोई मच्छर मुझे डरा नहीं पाएगा। फिर भी अगर किसी मच्छर ने मुझे डराने या धमकाने की जुर्रत की तो उसका मैं वही हश्र करूंगा, जो राम ने रावण का किया था। डरी-डरी सी जिंदगी जीना मुझे पसंद नहीं। जीने का असली मजा तो ‘निडर’ होकर जीने में है।

मच्छर अगर बेशर्म हो गए हैं तो आप भी उनके प्रति बेशर्म हो जाइए। जैसे तो तैसा। डरेंगे तो मच्छर और डराएगा। और हां मच्छर भगाने का सारा जिम्मा सरकार या मंत्रियों पर मत छोड़िए, कुछ जिम्मा आप भी उठाइए। एकदम बिंदास होके- मेरी तरह से- मच्छर के विरूद्ध खड़े हो जाएं फिर देखना मच्छर कैसे नहीं भागता है यह मुल्क छोड़के। ‘निडरता’ में ही हम सबकी ‘भलाई’ है।

शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

लंबी जुबान का दर्द

सुबह उठते ही सबसे पहले मैंने अपनी जुबान चेक की। पूरी ताकत से उसे बाहर निकाला। दाएं-बाएं और ऊपर-नीचे करके देखा। नाक से छूआने की कोशिश भी की। लेकिन वहां तलक पहुंच नहीं पाई। थैंक गॉड। मैंने राहत की सांस ली। फिर जुबान को अंदर कर अपने दूसरे कामों में लग गया।

हो सकता है, आपको जुबान के प्रति मेरे इस 'बर्ताब' पर 'हंसी' आ रही हो। दबी आवाज में आपने मुझे 'बेवकूफ' भी कह दिया हो। कोई नहीं। मैं किसी के कहे की फिकर नहीं करता। जुबान मेरी है। उसकी देख-रेख करना मेरी जिम्मेवारी। जुबान है तो सब है। जुबान नहीं तो कुछ नहीं।

दरअसल, मैं यह खबर पढ़के थोड़ा सहम-सा गया कि सर जी की लंबी जुबान की वजह से उनकी जुबान का ऑपरेशन करना पड़ा। जुबान की लंबाई को घटाया गया। इस वजह से उन्हें कुछ दिन चुप रहकर ही गुजारने होंगे।

भला सर जी और चुप...! इसकी कल्पना तो सपने में करना भी बेमानी टाइप लगता है। लेकिन करना पड़ेगा। आखिर जुबान का सवाल है। जुबान स्वस्थ रहेगी तो ही सर जी इस-उस को हड़का सकेंगे। बिन जुबान किस काम की अकड़।

वैसे, मेरे एक करीबी मित्र ने बतलाया कि अक्सर जुबान किसी शख्स की निरंतर बुराई करने से भी लंबी हो जाया करती है। कहीं सर जी की जुबान पर इसी बुराई का असर तो नहीं हो गया! क्योंकि हर बात के लिए वो प्रधानमंत्री जी को कोसते ही रहते थे। क्या मालूम जुबान को उनकी बुराई पसंद न आई हो और वो लंबी हो ली हो! भई, यह इंडिया है। यहां इंसान और जुबान के साथ कहीं भी, कुछ भी हो सकता है।

मित्र की बात सुनकर थोड़ा मैं भी डर गया हूं। क्योंकि मैं भी अक्सर साहित्यिक वरिष्ठों और परिवारिक नाते-रिश्तेदारों की बुराईयां करता ही रहता हूं। इस बुराईबाजी का प्रभाव कहीं मेरी जुबान पर न पड़ जाए। जैसे-तैसे करके एक जुबान पाई है कहीं उससे भी हाथ न धोने पड़ें। जुबान न रहने पर कल को कहीं पत्नी ने तलाक दे दिया तो...।

नहीं...। नहीं...। मैं ऐसा अपनी जुबान के साथ कतई नहीं होने दूंगा। मुझे मेरी जुबान लेखन से कहीं ज्यादा प्यारी है। सर जी तो ऑपरेशन का खरचा फिर भी अफॉर्ड कर सकते हैं किंतु मैं नहीं कर सकता। नन्हीं-सी सैलरी में क्या बचाऊं या खरच करूं, इसी जोड़-घटाने में पूरा महीना बीत लेता है।

तो प्यारे, आज से बल्कि अभी से मैं यह कसम खाता हूं कि कभी किसी की बुराई नहीं करूंगा। और पत्नी की तो सपने में भी नहीं करूंगा। हमेशा अच्छा और मीठा-मीठा ही बोलूंगा। मैं नहीं चाहता कि जो सर जी की जुबान के साथ हुआ, मेरी जुबान के साथ भी हो। 

मंगलवार, 13 सितंबर 2016

हिंदी डे सेलिब्रेशन

यू नो, 'हिंदी डे' को 'सेलिब्रेट' करने का अपना ही लुत्फ है। आज के दिन हिंदी अपनी बहुत अपनी-सी लगती है। आज हिंदी को फुल-टू जी लेने का दिल करता है। सोते-जागते, खाते-पीते, नाचते-गाते, रोते-हंसते, टहलते-दौड़ते बस हिंदी ही हिंदी दिमाग और जहन पर छाई रहती है। ऐसा फील होता है, जैसे हिंदी आज हमारी प्रेमिका टाइप बन गई है।

अपने मोहल्ले में मैं 'हिंदी डे' पर हिंदी के सम्मान में ग्रैंड-प्रार्टी रखता हूं। इलाके के सम्मानीत राइटर्स को बुलाता हूं। इसमें यंग राइटर्स की भागीदार अधिक रहती है। हिंदी पर तमाम टाइप के लेक्चर होते हैं। मंच से सब अपनी-अपनी छोड़ते हैं। सबसे खास बात यह है कि कोई भी राइटर न तो हिंदी के प्रति बेचारगी का भाव जतलाता है, न हिंदी की चिंता में दुबला हुआ जाता है। सब मस्त रहते हैं। मस्ती के साथ अपने व दूसरे के कहे को 'एन्जॉय' करते हैं।

यों भी, मेरा बचपन से यही मानना रहा है कि हिंदी रोने-धोने की नहीं बल्कि 'एन्जॉयमेंट' की लैंग्वेज है। भाषा और शब्दों की मस्तियां जित्ती हिंदी में हैं, उत्ती कहीं नहीं। आजकल टि्वटर और फेसबुक पर लिखे जाने वाले 'वनलाइर्स' का सबसे ज्यादा मजा हिंदी में मिलता है। पढ़कर तबीयत ग्रीन-ग्रीन हो लेती है। एक से बढ़कर एक फन्नी वनलाइनर्स पूरा दिन बना देते हैं।

हिंदी अपनी स्पीड में 'धांसू' बढ़ रही है। इत्ता बड़ा मार्केट आज हिंदी का गुलाम है। बिना हिंदी का सहारा लिए मार्केट एक कदम आगे नहीं बढ़ सकता। सारे ऐड केवल हिंदी के दम पर ही हिट हो रहे हैं। जिन ऐड्स में हिंदी का तड़का नहीं होता, वो बड़े ही 'बोगस' टाइप लगते हैं। डियो से लेकर कंडोम तक के ऐड में हिंदी अपना जलवा जमाए हुए है।

न केवल बॉलीवुड बल्कि हॉलीवुड की फिल्मों में भी हिंदी ने अपना असर जमा रखा है। हॉलीवुड फिल्म हिंदी में डब होकर मजे को दोगुना कर देती है। बॉलीवुड फिल्मों की अथाह कमाई में हिंदी का बहुत बड़ा योगदान है।

इत्ते पर भी हिंदी के कथित चिंताधारियों को हिंदी की चिंता रहती है। आए दिन वे हिंदी के गिरते स्तर का रोना रोते रहते हैं। खासकर, 'हिंदी डे' पर तो हिंदी के प्रति चिंता जतलाते-जतलाते इत्ते गमगीन हो जाते हैं, मानो कहीं मंच पर लुढ़क न पड़ें। जबकि इन सब चिंताधारियों की कथित चिंताओं से बेफिकर हिंदी मस्ती के साथ चली और बढ़ी जा रही है। ग्लोबल मार्केट में 'बिंदास' अपनी धाक जमा रही है। यहां तक कि अंगरेजों को भी हिंदी बोलने-सीखने के वास्ते प्रेरित कर रही है। फिर मैं क्यों न कहूं कि 'हिंदी इज ए फन्नी लैंग्वीज'।

केवल 14 सिंतबर ही नहीं बल्कि मेरा तो दिल करता है कि मैं 24x7 'हिंदी डे' को 'सेलिब्रेट' करता रहूं। मैं जिस भाषा में लिखता, पढ़ता, सोचता, कमाता हूं, उसे हर पल सेलिब्रेट करना मेरे भीतर प्राउड टाइप फीलिंग को जिंदा रखता है। यू नो, हिंदी मेरी लाइफ का सबसे 'इंर्पोंटेंट पार्ट' है।

तो प्यारे हिंदी के लिए कतई चिंतित न हो। हिंदी अपनी सेहत में एकदम ठीक और मस्त है। हर डे को हिंदी डे के सेलिब्रेशन के नाम रख दो। फिर देखो हिंदी का असली मजा। 

सोमवार, 12 सितंबर 2016

कॉमेडियन खुद बन गए कॉमेडी

ऐसा नहीं है कि हर बार निशाना सीधा ही लगे। कभी-कभी उलटा भी लग जाता है। उलटा लगने पर जो 'छिछालेदर' होती है, उसे अगले को 'झेल' पाना बड़ा मुश्किल हो जाता है। ठीक ऐसा ही मशहूर कॉमेडियन कपिल शर्मा के साथ हुआ। मियां ने शिकायत की थी बीएमसी के भ्रष्टाचार की (वो भी प्रधानमंत्री को ट्वीट कर) मगर जाल में फंस खुद गए।

जब खुद के भ्रष्टाचार पर उनसे जवाब मांगा जा रहा है, तब मियां अपनी बगलें झांकने में लगे हैं। दूसरों की कॉमेडी करते-करते आज कपिल शर्मा खुद कॉमेडी बन गए हैं। टि्वटर पर उन्हें जिस तरह से 'ट्रॉल' किया जा रहा है, देखने काबिल है। इसीलिए तो कहा जाता है, दूसरे के गिरेबान में हाथ घुसेड़ने से पहले खुद का गिरेबान जरूर देख लेना चाहिए- कि, पाक साफ है या नहीं।

भ्रष्टाचार पर लाख सरकार, नेता, व्यवस्था को गालियां दीजिए लेकिन उससे पहले एक दफा अपना भ्रष्टाचार भी जरूर चेक कर लीजिए हुजूर। यह हकीकत है कि हमें अपना किया भ्रष्टाचार कभी दिखता नहीं। जबकि हम भी जाने-अनजाने किसी न किसी भ्रष्टाचार में सीधे लिप्त रहते हैं। चूंकि भ्रष्टाचार के मुद्दे हमारे यहां सबसे अधिक सुर्खियों में रहते हैं, शायद कपिल शर्मा ने भी यही सोचा हो कि वो बीएमसी का भ्रष्टाचार जतला कर ओवरनाइटली केजरीवाल बन जाएंगे। लेकिन सबकुछ सोच के मुताबिक होता ही कहां हैं प्यारे।

दांव उलटा पड़ने के बाद से महाराज कपिल शर्मा अपनी सफाई में न टि्वटर पर, न मीडिया के सामने कुछ नहीं कह-बोल रहे। प्रधानमंत्री जी से अच्छे दिन पर सवाल करने वाले खुद बुरे दिन में हिलग-से गए हैं।

सेलिब्रिटी टाइप लोग जब व्यवस्था पर सवाल उठाते हैं न तो मुझे उन पर खासा तरस आता है। जबकि वे खुद इसी व्यवस्था से कहीं न कहीं समझौता करे बैठे होते हैं। और फिर आज के जमाने में कौन इत्ता दूध का धुला है? या किसकी दाल में कालापन नहीं है? क्या कपिल शर्मा की कॉमेडी पूरी तरह से साफ-सुथरी (स्वच्छ) है?

देखो जी, आप कॉमेडियन हो। अच्छी कॉमेडी भी कर लेते हो। नामी सेलिब्रिटियों में आपकी पूछ है। फिर क्यों भ्रष्टाचार की टांग में टांग घुसेड़कर उसे टंगड़ी देना चाहते हो। अमां, भ्रष्टाचार की जड़ें बहुत गहरी हैं। इत्ती आसानी से न उखड़ने वाली। केजरीवाल जी आए थे न, देश-समाज-जनता को भ्रष्टाचार से मुक्त करवाने, एक नई तरह की राजनीति सिखलाने, आज उनके तमाम मंत्री-विधायक उसी दलदल में धसे हुए हैं।

तो प्यारे, भ्रष्टाचार पर बोलना बहुत आसान है किंतु खुद पर खरा उतरना उत्ता ही मुश्किल। क्या समझे...।

गुरुवार, 8 सितंबर 2016

आइफोन-7 और खाट

नहीं। मेरी इत्ती 'औकात' नहीं है कि मैं आइफोन-7 खरीद सकूं। यह तो आइफोन-7 रहा, मैं ऐसी किसी भी चीज को खरीदने का 'पक्षधर' नहीं, जहां मुझे अपना घर फूंकता नजर आए। अपना घर फूंककर तमाशा देखना मेरा शौक नहीं। हां, आइफोन-7 से भी महत्त्वपूर्ण एक और चीज है मेरे पास। जी हां, मेरे पास खाट है। खाट के आगे आइफोन-7 की क्या बिसात होगी, इसे आप सहज ही समझ सकते हैं।

आज मार्केट में जित्ता हो-हल्ला आइफोन-7 के वास्ते मचा हुआ है, उससे कहीं ज्यादा हल्ला खाट को लेकर मच रहा है। हर तरफ बस खाट, खाट और खाट के ही चर्चे हैं। 'खाट सभा' के बाद जिस तरह से खाट-लूट के लिए भगदड़ मची- कसम से- उन नजारों को देखकर मेरा दिल 'प्रसन्न' हो गया। वाकई, लोगों के दिलों में अब भी खाट के प्रति इत्ता मोह, इत्ता सम्मान बचा है कि खाट को सिर पर या साइकिल पर उठाए लिए जा रहे हैं। कुछ ऐसे लोग भी दिखे जिन्होंने खाट के पाए ही उखाड़ लिए ताकि कंधों पर बोझ कम पड़ सके।

खाट के ठाठ को देखकर मेरे दिलो-दिमाग से आइफोन-7 का क्रेज तुरंत उतर गया। लोगों की बुद्धि पर मुझे 'तरस' आने लगा, जो हजारों रुपए देखकर आइफोन-7 को खरीदने के लिए 'बेताब' हुए जा रहे हैं। इत्ते रुपए में तो कित्ती ही खाटें खरीदी जा सकती हैं। खाट की खरीद से कम से कम खाट बनाने वालों का ही भला हो जाएगा। हाशिए पर जा चुका उनका धंधा फिर से चमकने लगेगा।

सोशल मीडिया पर मैं कई लोगों को खाट-लूट के खिलाफ निरंतर लिखते-बोलते सुन रहा हूं पर मैं उनसे सहमत नहीं। मेरे विचार में, जनता ने कुछ गलत नहीं किया खाट लूटकर। यह जनता कम से कम उस माल्या से तो बेहतर ही है, जो देश का करोड़ों रुपया लेकर चंपत हो लिया। सरकार के ऐड़ी-चोटी का दम लगाने के बाद भी उसका देश लौटना असंभव-सा जान पड़ता है।

इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोगों का विश्वास नए आइफोन-7 में कित्ता बन पाता है, कित्ता नहीं। मुझे तो यह देखकर अथाह खुश हो रही है कि जनता खाट की ओर लौट रही है। अपना विश्वास खाट में कायम कर रही है। न केवल गांव-देहात बल्कि शहरी बंदे भी अब घर में खाट होनी चाहिए पर सहमति बनाते दिख रहे हैं।

'खाट सभा' के बाद खाट के 'अच्छे दिन' लौटते हुए से जान पड़ रहे हैं। बाकी आइफोन-7 के दिन अच्छे रहते या बुरे इससे अपनी सेहत पर कोई खास फरक नहीं पड़ता। अपने हित तो केवल खाट से जुड़े हैं। जय खाट। जय जनता।

बुधवार, 7 सितंबर 2016

खाट का महत्त्व

भले ही उनकी 'खाट सभा' में खाट का इस्तेमाल खास राजनीतिक फायदे के लिए किया गया हो किंतु मेरे जीवन में खाट का विशेष महत्त्व है। अगर खाट न होती तो आज मैं लेखक भी न होता- यह कहना गलत न होगा। खाट ने न केवल मेरा जीवन बल्कि मेरा लेखकीय करियर तक बदलकर रख दिया। इत्ता डिजिटल समय होने के बाद भी मैं अपना ज्यादातर लेखन खाट पर बैठकर ही करता हूं। जिस दिन खाट पर बैठकर न लिखूं तो ऐसा लगता है कि आज का दिन अधूरा रहा।

उनकी खाट सभा में यह देखकर मुझे थोड़ा दुख हुआ कि उन्होंने अपनी खाटें लूट जाने दीं। खाट लुटाने के लिए नहीं होती। जिनकी खाट लूट जाती है फिर उनकी खटिया खड़ी होते कतई देरी नहीं लगती। राजनीति में तो खासकर नेताओं को अपनी खाट खड़ी होने और लुटने से जरूर बचानी चाहिए। क्योंकि जिसके पास खाट नहीं, उसका जीवन 'नीरस' है। कुर्सी से कहीं ज्यादा महत्त्व खाट का है।

लेकिन खाट के महत्त्व को यहां कोई समझता ही नहीं। नेता लोग तो महज राजनीतिक गोटियां बिछाने की तरह खाट का इस्तेमाल करते हैं। जहां राजनीतिक फायदा देखा बस वहीं अपनी खाट डालके बैठ गए। जबकि लेखकों-साहित्यकारों के पास खाटें ढूंढ़े नहीं मिलेंगी। उन्होंने तो कुर्सी-मेज को अपने लेखन का आधार बनाया हुआ है। वहीं बैठकर वे तरह-तरह की क्रांतियों के गुब्बारे फुलाते रहते हैं।

किंतु मैंने अपने खाट-प्रेम को अब तलक बरकरार रखा है। साफ शब्दों में कहूं तो मुझे पत्नी से अधिक प्यार अपनी खाट से है। हालांकि पत्नी कई दफा मुझे बे-खाट करने की कोशिशें कर चुकी है मगर हर बार बचाया मुझे मेरी खाट ने ही है। बिन खाट मैं अपने जीवन के अस्तित्व की कल्पना तक नहीं कर सकता।

खाट एक प्राकृतिक आसन है। खाट पर बैठकर कभी आप खुद में 'वरिष्ठता' या 'एलिटता' का भाव नहीं ला सकते। खाट हमेशा आपके 'देसी ठाठ' को बनाए रखती है। जो आराम आप खाट पर लेटकर पा सकते हैं, वो बात पलंग या बैड पर मिलना नामुंकिन है। पहले शायद ही कोई घर ऐसा होता हो, जहां खाट न होती हो। पहले के लोग खाट को अपने दिल से लगाकर रखा करते थे। मगर आधुनिकता की अंधी भागम-भाग ने खाट को ही बे-खाट कर दिया।

अपने घर आए मेहमान से अगर मैं खाट पर बैठने के लिए बोलता हूं तो अगला ऐसे मुंह बनता है मानो मैंने उसकी बीवी का हाथ मांग लिया हो। यह खाट पर न लेटने-बैठने का ही नतीजा है कि हमारी पीठें हमेशा दर्द से करहाती रहती हैं।

कहने को आप मुझे पिछड़ी सोच का कह सकते हैं लेकिन मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। खाट के प्रति अपने लगाव को मैं कभी कम नहीं करने वाला, चाहे दुनिया कित्ता ही क्यों न बदल ले। जिस खाट पर बैठकर मुझे किस्म-किस्म के आईटियाज आते हैं, भला उस खाट का दामन मैं कैसे छोड़ सकता हूं। नहीं। कभी नहीं। खाट है तो मैं हूं। मेरा लेखन है। मेरा आस्तित्व है।

राजनीति या साहित्य में लोग भले ही दूसरों की खाट खड़ी करने में लगे रहते हों मगर मैं अपने खाट के प्रति प्रेम को हमेशा यों ही बनाए रखूंगा।

मंगलवार, 6 सितंबर 2016

सीडी का रायता

उन्होंने कहा कि दलित होने के नाते उन्हें 'सीडी एपिसोड' में 'फंसाया' जा रहा है! यह विपक्ष की 'साजिश' है! जबकि न सीडी, न उस नंग-धड़ंग दिखने वाले आदमी से उनका दूर-पास का कोई लेना-देना नहीं!

अगर उनके कहे को ही 'अंतिम सत्य' मान लिया जाए फिर तो उनकी पार्टी ने उनके साथ कतई ठीक नहीं किया। पार्टी से तो बाहर निकाला ही, साथ में 'गंदी मछली' और कह दिया।

उफ्फ... इत्ती तौहीन। अपने एक ईमानदार मंत्री (!) की। अमां, आप तो ऐसे न थे।

लेकिन इसमें आप भी क्या कर सकते हैं? राजनीति का कायदा ही यह रहा है कि जहां बात अपने सिर पर सवार होने लगे तुरंत उससे पल्ला झाड़ लो। ऐसे अनजान बन जाओ कि न हम तुम्हें जानें, न तुम हमें जानो...। यहां भी सेम-टू-सेम यही हो रहा है।

मामला किसी टाइप के भ्रष्टाचार-फ्रटाचार का होता तो भी संभाल लिया जाता। लेकिन यहां तो समस्त क्रिया-कलाप खुल्ला सीडी में दिख रहे हैं। भला इससे कैसे इंकार कर सकते हैं। एक-दो मिनट का नहीं पूरे दस मिनट का सीन है। साथ में कामासूत्र टाइप फोटू-शोटू भी हैं।

नेता-मंत्री लोग भी न पिछले सीडी एपिसोडों से कोई सबक नहीं लेते। जबकि उन्हें अच्छे से मालूम है कि पिछले सीडी कांडों में नेताओं-मंत्रियों की कित्ती दुर्गत हुई थी। मगर फिर भी...। अमां, अपनी सीडीयां बनवाने का इत्ता ही शौक है तो राजनीति छोड़कर फिल्म इंडस्ट्री क्यों नहीं ज्वाइन कर लेते। फिर हर रोज बनाते-बनवाते रहियो सीडीयां। कौन रोकने, कौन टोकने वाला होगा वहां।

देखा, एक सीडी ने अंदर-बाहर हर जगह 'रायता' फैलवा दिया। पार्टी के मालिक जो अब तलक दूसरों के रायते फैलाकर मजा लेते थे, अब जुटे हुए हैं अपने ही मंत्री के फैलाए रायते को समेटने में। मगर यह रायता है ही इत्ता पतला कि न टोपी में समा पा रहा है न ईमानदारी की गागर में। ऊपर से विपक्षी दल भी उचक-उचक के मजे ले रहे हैं। सोशल मीडिया पर तो जोकों की बाढ़-सी आई हुई है। हर दूसरा ट्वीट मंत्री जी की सीडी पर टारगेटिड रहता है।

मंत्री जी और मुख्यमंत्री जी के तईं यह विकट समय है। क्या करें, क्या न करें के बीच गाड़ी फंसी हुई है। बीच-बीच में कुछ कड़े बयान देकर मामले पर पानी डालने की कोशिशें जरूर की जा रही हैं पर कोई फायदा नहीं। रायता बहुत तगड़ा करके फैल चुका है।

अफसोस कि एक और मंत्री जी सीडी एपिसोड की भेंट चढ़ गए। आगे-आगे देखिए होता है क्या।