मंगलवार, 9 अगस्त 2016

लाइक और दस्त

आलम यह है, मुझे दिन में दो वक्त खाना न मिले, चलेगा। लेकिन फेसबुक पर 'लाइक' भरपूर मिलते रहने चाहिए। बिना लाइक की जिंदगी कोई जिंदगी है। मुझे इससे कतई फर्क नहीं पड़ता कि लाइक मेरी किस और कौन-सी पोस्ट पर आ रहे हैं। लाइक बस आते रहने चाहिए। जित्ते अधिक लाइक होंगे, सोशल मीडिया में मेरा उत्ता ही 'जलवा' होगा।

अभी कल ही की बात लीजिए। मैंने एक पोस्ट मुझे 'दस्त' लगने पर डाली। हालांकि दस्त की शुरुआत अभी ठीक से हुई भी नहीं थी मगर पोस्ट यह सोचकर डाल दी कि मित्रों के संज्ञान में आ जाए। मिनट भर में पोस्ट पर दे-दनादन लाइक आना शुरू हो गए। दस्त पर मित्र लोग अपनी-अपनी राय-सलाह देने लगे। दस्त के दौरान मुझे क्या खाना और किस चीज से परहेज करना चाहिए बताने-समझाने लगे।

मगर मुझे राय या सलाह से कहीं ज्यादा 'खुशी' इस बात पर थी कि मेरे लाइक का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है। मतलब- फेसबुकिए मुझे दस्त लगने को 'पसंद' कर रहे हैं। लाइक एक ऐसा जुनून है, जिसे पाने की खातिर बंदा या बंदी कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते हैं। जिनकी पोस्टों पर भरपूर लाइक नहीं आते। सोशल मीडिया में उन्हें 'तुच्छ प्राणी' की निगाह से देखा जाता है। बाहर कभी मिलते हैं तो पूछा जाता है कि जनाब आपकी पोस्ट पर लाइक का मार्केट इत्ता ठंडा क्यों रहता है?

लेकिन पत्नी को मेरी दस्त वाली पोस्ट कतई नहीं भाई। उसने तुरंत डपट दिया- 'क्या सठिया गए हो जो दस्त लगने वाली पोस्ट भी फेसबुक पर चिपका दी।' मैंने उसे समझाया- 'यह पोस्ट मैंने 'सहानुभूति' जुटाने के लिए नहीं बल्कि लाइक पाने के लिए डाली थी। जित्ते अधिक लाइक मिलेंगे, उत्ती ही जल्दी मेरे दस्त दुरुस्त होंगे।' पत्नी चौंकी। 'ओह! फिर तो हर बीमार शख्स को डॉक्टर के पास नहीं बल्कि सीधा फेसबुक पर आना चाहिए न! अपने बीमार होने की पोस्ट पर मिले लाइक उसके तईं दवा-दारु का काम करेंगे। क्यों?' मैंने कहा- 'एक्जेक्टली! 'तुम्हें क्या पता, लाइक लोगों के लिए संजीवनी-बूटी समान होते हैं। मैंने तो यहां तक सुना है कि लाइक खरीदे-बेचे भी जाते हैं।'

मेरे तर्क से पक चुकी पत्नी पैर पटकते हुए यह कहकर चली गई- ऐसे दिखावटी लाइक तुम्हें ही मुबारक।

यह तो चलिए मुझे दस्त लगने की बात रही मैंने तो स्वर्ग सिधारने वाली पोस्टों पर भी खूब-खूब लाइक देखे हैं। जहां किसी के स्वर्ग सिधारने की पोस्ट फेसबुक पर आई नहीं कि भाई लोग इत्ती तेजी से उसे लाइक करना शुरू कर देते हैं मानो अगले के जाने की कित्ती खुशी है उन्हें। आलम यह रहता है पोस्ट में अलग से लिख देने के बाद भी- 'कृपया इस खबर-सूचना को लाइक न करें' लाइक मारने का सिलसिला खत्म नहीं होता। लाइक लोगों की नसों में इत्ता कदर समा चुका है कि वे सोते हुए भी 'लाइक-कर्म' करना न भूलते होंगे।

कहे कोई कुछ भी पर लाइक की महिमा अपरमपार है। लाइक का स्थान कोई नहीं ले सकता। मरने-जीने, नौकरी पाने-खोने, इश्क होने-छूटने हर मर्ज की दवा लाइक है। वो दिन दूर नहीं, जब दो देशों के बीच भिन्न-भिन्न मुद्दों पर बातचीत या समझौते आपस में मिलने-जुलने से नहीं केवल लाइक के दम पर ही हो जाया करेंगे!

सच कह रहा हूं, अगर लाइक की डोज मुझे नहीं मिलती तो मेरे दस्त भी इत्ती जल्दी ठीक न होते। नाऊ फीलिंग बैटर।

1 टिप्पणी:

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 'क्रांतिकारी आन्दोलन के प्रथम शहीद खुदीराम बोस को समर्पित ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...