सोमवार, 29 अगस्त 2016

एक मच्छर से मुलाकात

हाल ही में एक मच्छर से मुलाकात का मौका मिला। प्रस्तुत है उक्त मुलाकात की संक्षित-संपादित डिटेल।

मैं- यार मच्छर, घणा आतंक मचाए हुए हो आजकल देश में।
मच्छर- आतंक? मैं क्या कोई आतंकवादी हूं, जो आतंक मचाऊंगा।
मैं- अरे, नहीं.. नहीं..। वो वाला आतंक नहीं। डेंगू वाला आतंक।
मच्छर- गुजारिश है, डेंगू को आतंक के साथ कम्पेयर मत करो। डेंगू और आतंक में जमीन-आसमान का अंतर है।
मैं- जमीन-आसमान का अंतर कैसे? आतंकवादी भी आतंक फैलाकर बेकसूर जनता को मार रहे हैं। यही काम डेंगू भी कर रहा है।
मच्छर- देखो, हमें कोई शौक नहीं डेंगू फैलाने का। इसके लिए जिम्मेदार तुम इंसान ही हो।
मैं- जिम्मेदार? भला हम कैसे जिम्मेदार हुए?
मच्छर- अच्छा। यहां-वहां गंदगी बिखेरो तुम। नदी से लेकर कूलर तक का पानी दूषित करो तुम। सड़क पर सड़ी-गली चीजें फेंको तुम। फिर कहो कि हम जिम्मेदार कैसे हुए?
मैं- अमां, इत्ते बड़े मुल्क और इत्ती आबादी के बीच इत्ता तो चलता है। फिर भी हम सब मय प्रधानमंत्री लगे हुए हैं साफ-सफाई के अभियान में। सुधार होते-होते ही तो होंगे न।
मच्छर- बुरा न मानियो। तुम चाहे कित्ता ही प्रयास क्यों न कर लो, इंसान अपनी गंदगी और गंदी आदतों को कभी सुधार ही नहीं सकता। गंदगी इंसान का सबसे प्रिय शगल है।
मैं- देखो.., तुम जरूरत ज्यादा आगे बढ़ रहो। अपनी हदों में रहो। हम इंसानों को यों गरियाना उचित नहीं। ध्यान रखो, तुम्हारा 'अस्तित्व' केवल हमारी वजह से है।
मच्छर- हमारे अस्तित्व को चुनौती न दो। हम तो संसार में तब से हैं, जब तुम लोग बंदर की भांति पीछे पूंछ लगाए यहां-वहां टहला करते थे। तब तुम लोग ज्यादा 'सभ्य' थे।
मैं- वो तो समय के साथ-साथ इंसान के शरीर और व्यवहार में बदलाव होते रहते हैं। इसमें नया क्या है। तुम खुद को ही देख लो न। कित्ता बदल गए हो तुम। अब तो तुम पर किसी भी कीटनाशक का कोई असर न होता। सबसे बच निकलते हो।
मच्छर- अबे, जहरीला तो तुमने ही बनाया है हमें। बल्कि तुम इंसान तो हमें भी ज्यादा जहरीले हो। हम पर तो फिर भी कीटनाशक का असर हो जाता है। तुम पर तो किसी कीटनाशक का असर नहीं होता। जहर भी तुमसे पनाह मांगता है।
मैं- झूठ बोल रहे हो तुम। अगर हम पर कीटनाशक का असर न होता तो तुम्हारा एक डंक हमारे शरीर में प्लेटलेट्स की मात्रा को इत्ता कम न कर देता। समझे।
मच्छर- हमारा तो काम ही खून चुसना है। यही हमारा भोजन है। अगर हमारे डंक से तुम्हें इत्ती ही परेशानी है तो अपना खून बदल लो न।
मैं- खून बदल लें। क्यों बदल लें खून। कुछ पता भी है, खून बदलने में कित्ता खरचा आता है।
मच्छर- तुम्हारी मर्जी। लेकिन हम तुम्हें न डंक मारना बंद करेंगे, न खून चुसना। जो चाहे करो लो।
मैं- वाकई। बढ़े ढीठ मच्छर हो बे। जरा भी सुधने को तैयार नहीं। अपने आतंक से पूरी इंसान बिरादरी की बजा रखी है। लानत है तुम पर।
मच्छर- तुम हमें चाहे कुछ कह लो। लेकिन जब तक तुम इस दुनिया में हो, हम खत्म न होने के। खाद-पानी तो हमें तुम्हीं से मिल रहा है।
अभी तो यह शुरुआत है, आगे-आगे देखो होता है क्या।
मैं- फिर तुम भी कान खोलकर सुन लो। हमने भी सोच लिया कि हम तुम्हारी कंपलीट बजाके ही दम लेंगे। बस्स, बहुत डंक मार लिए तुमने हमारे।
मच्छर- आगे की आगे देखी जाएगी। फिलहाल, तुम चुप करो। नहीं तो मैं अपने डंक से तुम्हारी इसी वक्त बजा दूंगा। डेंगू का मच्छर हूं मैं डेंगू का।

इत्ता सुन मैंने उस मच्छर से किनारा करने में ही अपनी भलाई समझी। चुप-चाप वहां से निकल लिया। एक बार को बीवी से पंगा लिया जा सकता है लेकिन मच्छर से पंगा लेना। तौबा-तौबा...।

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