मंगलवार, 30 अगस्त 2016

लड़ते-भिड़ते व्यंग्यकार

ऐसा लग रहा है, व्यंग्यकारों के भीतर आलोचकों की 'आत्मा' प्रवेश कर गई है! आलोचकों की तरह व्यंग्यकार भी आपस में खूब जमकर लड़-भिड़ रहे हैं। गनीमत बस इत्ती है कि यह लड़ाई-भिड़ाई सड़क-चौराहे पर न होकर फेसबुक पर हो रही है। हर बड़ा-छोटा व्यंग्यकार खुद को दूसरे से 'तगड़ा' बताने पर तुला हुआ है। लुत्फ यह है, सबके अपने-अपने चेले-चपाटे हैं, जो अपने मालिक की प्रत्येक सही-गलत बात का समर्थन 'लाइक' या 'कमेंट' ठोककर करते रहते हैं।

व्यंग्यकारों के बीच बहस का सबसे 'हॉट' मसला 'व्यंग्य को कैसा होना चाहिए' है। व्यंग्य में कित्ती मात्रा गंभीरता की, कित्ती शिल्प की, कित्ती गहराई की, कित्ती हास्य की रहनी चाहिए। हर व्यंग्यकार के अपने-अपने तर्क हैं। कुछ व्यंग्य में गंभीरता को लेकर गंभीर हैं। तो कुछ व्यंग्य में शिल्प को लेकर उतावले। बस इन्हीं कुछ मुद्दों पर व्यंग्यकारों में आपस में तलवारें तनी रहती हैं। वे अपना कम बल्कि दूसरे के लिखे पर 'फतवे' अधिक जारी करते दिखते हैं।

भला ऐसा कभी व्यंग्य या व्यंग्यकारों के बीच हुआ है। हर व्यंग्यकार व्यंग्य को अपने तरीके से लिखने के लिए 'स्वतंत्र' है। तो लिखने दीजिए न। काहे को एक-दूसरे की स्वतंत्रता पर 'बुलडोजर' चलाने को तैयार बैठे रहते हैं। यह व्यंग्यकार पर छोड़ दें कि वो अपने व्यंग्य को 'गंभीर' बनाता है या उसमें 'हास्य' भरता है।

लेकिन नहीं। लोगों ने मानो 'जिद' पाल ली है कि हम तो टांग बीच में घुसेडेंगे ही घुसेडेंगे। अमां, खुद की नहीं कम से कम अपनी टांग की ही फिकर कर लो। अपनी लड़ाई के बीच टांग की ऐसी-तैसी क्यों किए रहते हो।

व्यंग्यकारों के इत्ते झगड़े देखकर कभी-कभी तो मुझे लगता है कि इनमें से ज्यादातर शायद अपने घरों से 'प्रताड़ित' हैं। चूंकि घर में इनकी कोई सुनता-सुनाता नहीं तो मियां चले आते हैं फेसबुक पर अपने दिलों की भड़ास निकालने। अक्सर कुछ झगड़े तो इसी मुद्दे पर हो लेते हैं कि तूने मेरे स्टेटस को कॉपी कर अपना क्यों बना लिया। या, तेरा व्यंग्य या वन-लाइन मेरे व्यंग्य या वन-लाइन से 'श्रेष्ठ' कैसे। कुछ भी कहिए- लेखन में 'श्रेष्ठता' के लफड़े बड़े तगड़े हैं जनाब। जिसे देखो वो श्रेष्ठता का रस चखने को बेताब बैठा रहता है।

बाकी व्यंग्यकारों की जाने दें। अगर मुझसे कोई पूछे कि व्यंग्य क्या है? तो प्यारे मैं इत्ता ही कहूंगा कि व्यंग्य लेखन की सबसे 'ग्लैमरस' और 'हॉट' विधा है। वन-लाइनर के तड़के ने तो इसे और भी 'मस्त' बना दिया है। खासकर, टि्वटर पर आने वाले वन-लाइनर तो स्थापित व्यंग्यकारों के लंबे-चौड़े व्यंग्य से कहीं ज्यादा 'कैची' और 'धांसू' होते हैं।

इत्ती मस्त विधा के बीच रहकर भी जब व्यंग्यकारों को आपस में एक-दूसरे की 'बजाते' देखता हूं तो बड़ा दुख होता है। ऐसे में आलोचकों और व्यंग्यकारों में अंतर ही कहां रह जाता है? अमां, जित्ता टाइम आप लड़ने-भिड़ने में खोटी करते हो, इत्ते में तो एक से बढ़कर एक धांसू और हॉट टाइप का व्यंग्य खींचा जा सकता है।

बाकी आपकी मर्जी।

2 टिप्‍पणियां:

Ravishankar Shrivastava ने कहा…

हाँय? यहाँ भी झगड़ा और ऐसा भी?
जरा लिंक विंक दें कहाँ हो रहा है. हम भी अपनी गंद फ़ैला आएं तनिक. व्यंग्य में थोड़ी दखल हम भी रखते हैं - एक अच्छे व्यंग्य पाठक के नाते ! :)

अजय कुमार झा ने कहा…

हाँ तो व्यंग्यकार कौन से मंगल ग्रह से अवतरित हुए हैं ..उन्हें भी पूरा हक़ है कि वे भी ..व्हाय शुड .....हैव आल द फन ..का आनंद ले सकें ..चुटीला बहुत ही चुटीला