सोमवार, 29 अगस्त 2016

बोलने में गोल्ड मेडल

यह सदियों पुराना सत्य है कि हम खेलों में उत्ती मेहनत नहीं करते, जित्ती बोलने या पड़ोस की खोज-खबर रख लेने में कर लेते हैं। बोलने या एक-दूसरे की लगाई-बुझाई में हमारा जवाब नहीं। जित्ता पता हमें हमारे घर का नहीं रहता, उससे कहीं ज्यादा पता पड़ोसी के घर का रहता है। पड़ोस में कौन आया-गया। किसने क्या खाया-कमाया। किस लड़की या लड़के का अफेयर किस मोहल्ले में किससे चल रहा है। हमें सब मालूम रहता है।

मैं पूरी जिम्मेवारी के साथ कह सकता हूं अगर रियो ओलंपिक में एक प्रतियोगिता बोलने या खोज-खबर रखने की रही होती तो हमें निश्चित ही 'गोल्ड मेडल' मिलता।

देखिए न, जैसे-तैसे कर रियो ओलंपिक में हमें जो दो पदक प्राप्त हुए उस पर भी लोगों का आंय-बांय बोलना थमा नहीं है। किस्म-किस्म की राय देते-देते लोग थक नहीं रहे। यह होना चाहिए था। वो होना चाहिए था। सिंधु-साक्षी को थोड़ा ऐसे, थोड़ा वैसे खेलना चाहिए था। कुछ तो कोच पर ही सीधा होने से नहीं चूक रहे। एक-एक कर सरकार और सिस्टम की तमाम खामियां-खराबियां बताए चले जा रहे हैं।

लेकिन बोलने वालों की इत्ती भीड़ में से अभी तलक एक भी चेहरा ऐसा निकलकर सामने न आया है, जिसने छाती ठोककर यह कहा हो कि हां.. हां.. मैं अपने बच्चे को कोई भी खेल चुनने-खेलने की आजादी देता या देती हूं। पढ़ाई-लिखाई से ज्यादा पैसा मैं बच्चे के खेल पर खर्च करूंगा या करूंगी।

देखो जी, बात सिंपल है। जुबान हिलाने में कतई पैसे नहीं लगते। चाहे जित्ती हिला-घुमा लो। मगर खेलों के प्रति फैसला लेने में जिगर चाहिए होता है, जो हमारे पास न के बराबर है। यों, खोज-खबर हमें पड़ोस के साथ-साथ पूरी दुनिया की रहती है लेकिन अपने घर के बच्चे की खेल-च्वाइस के बारे में हम अनजान बने रहते हैं।

यही वजह है कि मैं बोलने वालों से सबसे अधिक घबराता हूं। सामाजिक जीवन के साथ-साथ फेसबुक पर भी ऐसे सयानों से उचित दूरी ही बनाकर रखता हूं। मैं नहीं चाहता कि उनकी सोहबत में पड़कर खुद भी 'बकलोल' टाइप हो जाऊं। मुझे अपनी इज्जत से कहीं ज्यादा चिंता अपनी जुबान की रहती है।

मैं तो कहता हूं, अगले ओलंपिक में उन सबको एक दफा जरूर खेलने भेजा जाना चाहिए जो आज फेसबुक और गली के नुक्कड़ पर खड़े होकर तरह-तरह का ज्ञान पेलने में लगे हैं। आखिर उन्हें भी तो पता चले आटे-दाल का भाव। बोलने और खुद उसी काम को करने में बहुत फर्क होता है प्यारे।

रियो में जो हुआ सो हुआ। इस पर जित्ता रो सकते थे, रोए भी। अब आगे यह सब न हो कोशिश तो यही होनी चाहिए। बाकी डिपेंड सरकारों-नेताओं पर करता है कि वो खेल को अधिक 'तरजीह' देते हैं या सिर्फ 'बोलने वालों' को। 

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