मंगलवार, 2 अगस्त 2016

क्यों गिरा झुमका बरेली में!

झुमका बरेली में ही क्यों गिरा? दिल्ली, आगरा मथुरा, झांसी, कानपुर में भी तो गिर सकता था। बरेली में गिरकर झुमके ने हम बरेलीवासियों को 'दुविधा' में डाल दिया है। किसी अनजान बंदे को बताओ कि जी, मैं बरेली से हूं तो झट से पूछ बैठता है, आपको तो पता ही होगा साधना का झुमका बरेली के किस बाजार में गिरा था। दो पल इधर-उधर की बगलें झांककर बंदे को मना करना पड़ता है, न जी न मुझे न मालूम साधना का झुमका बरेली के किस बाजार में गिरा था।

यों, सुनाई में तो यही आया है कि खुद गीतकार राजा मेहंदी अली खां को नहीं मालूम था कि झुमका बरेली के किस बाजार में गिरा। न ही कभी वे बरेली आए, न उनका दूर-पास का कोई रिश्तेदार यहां का है। फिर भी उन्होंने झुमका बरेली में ही गिराया। यहां तक कि यह रहस्य साधना को भी नहीं मालूम।

भई, यह तो गीतकार का दिमाग है, कब कहां किधर दौड़ जाए। बख्शी साहब तो चोली के पीछे क्या है को ही लिखकर सुपरहिट हो गए। बड़ी सहजता से उन्होंने चोली के पीछे दिल को बैठा दिया।

लेकिन झुमके ने जो दुनियाभर में 'तहलका' मचाया उसने तमाम रहस्य एवं खोजवादियों को 'संशय' में डाल दिया। हालांकि एकाध दफा मैंने भी तलाशने की भरपूर कोशिशें कीं, शायद बरेली के बाजार में साधना का गिरा झुमका कहीं दिख जाए। तमाम पुराने लोगों से पूछा-पाछी भी की। मगर झुमका नहीं मिलना था नहीं ही मिला।

इस झुमके का न मिलना बतौर बरेलीवासी मुझे कई सालों से सला रहा है। वो तो राजा मेहंदी अली खां अब दुनिया में नहीं हैं, नहीं तो एक दफा उनसे जाकर जरूर पूछता- जनाब, आप ही बतला दो झुमका बरेली के बाजार में कहां और किधर गिरा था।

कहते हैं, खोजने पर भगवान भी मिल जाया करते हैं लेकिन यह झुमका तो भगवान से भी बड़ा वाला निकला आज तलक मिलके न दिया।

पिछले दिनों सुनने में आया था कि बीडीए (बरेली) ने कथित झुमके के गिरने की जगह ढूंढ ली है। उसी जगह पर झुमके की आर्टिफिशल कृति को लटकाया जाएगा। लेकिन अभी खबर पड़ी कि झुमका उस जगह पर न लटकाकर कहीं और लटकाया जाना तय हुआ। झुमके को भी उन्होंने सरकारी दफ्तर में टांगे जाने वाला केलैंडर बना दिया है, जब जहां मन करे टांग लो। झुमका अगर बरेली के बाजार में बीचों-बीच लटकता तो बात कुछ और ही होती।

यही वजह है कि मैंने पत्नी को झुमका पहनकर बाजार में जाने से मना कर रखा है। झुमका पहने का शौक है तो घर में पहनो। जित्ता मर्जी उत्ता पहनो। एक नहीं दस पहनो। खबरदार, जो बाजार में पहनके गईं तो।

वो तो साधना जी की 'सहनशीलता' थी कि उनका गिरा झुमका कभी मिल नहीं पाया। न ही उन्होंने इस बाबत ज्यादा हंगामा काटा। यहां तक कि पुलिस में भी यह बात नहीं पहुंची। अगर पत्नी का झुमका बाजार में कहीं गिर गया, तब मेरी तो सिर से लेकर पैर तक आफत हो लेगी। इत्ती भीड़ में भला मैं कैसे ढूंढकर दूंगा, उसका गुम हुआ झुमका। यहां तो भीड़-भाड़ में मोबाइल कहीं गिर जाए तो न मिलता फिर यह तो झुमका ठहरा। एक दफा किसी के हत्थे लग गया उसकी तो चांदी ही चांदी।

बेहतर हो, बरेली के बाजार में झुमके के गिरने को 'रहस्य' ही रहने दिया जाए।

4 टिप्‍पणियां:

Kavita Rawat ने कहा…

अरे बाप रे! कभी से अगर बरेली पहुंचे तो झुमका उतार कर, वर्ना मिलने वाला नहीं .... हा.. हा ..... बहुत खूब

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 'जिंदगी के सफ़र में किशोर कुमार - ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

हमारे गुरुदेव स्व. के.पी.सक्सेना जी ने अपनी एक पुस्तक में अपना परिचय देते हुए लिखा था कि मैं उस शहर में पैदा हुआ हुआ जहाँ कभी झुमका गिरा था. ये बात अलग है कि ये झुमके वाली बात उनके जन्मा के कई सालों बाद प्रकाश में आई! खैर, जो भी हो, आपका यह आलेख गुदगुदाता है!!

Jitendra Mishra ने कहा…

Bahut badiya rastogi sahab

Mene bhi google me bahutera sar khafaya fir bhi apke jhumke ke bare me sahi jagah ka pta nahi chal paya.....soch rha hu ekbar bareli me hi jakar dhundu