मंगलवार, 30 अगस्त 2016

लड़ते-भिड़ते व्यंग्यकार

ऐसा लग रहा है, व्यंग्यकारों के भीतर आलोचकों की 'आत्मा' प्रवेश कर गई है! आलोचकों की तरह व्यंग्यकार भी आपस में खूब जमकर लड़-भिड़ रहे हैं। गनीमत बस इत्ती है कि यह लड़ाई-भिड़ाई सड़क-चौराहे पर न होकर फेसबुक पर हो रही है। हर बड़ा-छोटा व्यंग्यकार खुद को दूसरे से 'तगड़ा' बताने पर तुला हुआ है। लुत्फ यह है, सबके अपने-अपने चेले-चपाटे हैं, जो अपने मालिक की प्रत्येक सही-गलत बात का समर्थन 'लाइक' या 'कमेंट' ठोककर करते रहते हैं।

व्यंग्यकारों के बीच बहस का सबसे 'हॉट' मसला 'व्यंग्य को कैसा होना चाहिए' है। व्यंग्य में कित्ती मात्रा गंभीरता की, कित्ती शिल्प की, कित्ती गहराई की, कित्ती हास्य की रहनी चाहिए। हर व्यंग्यकार के अपने-अपने तर्क हैं। कुछ व्यंग्य में गंभीरता को लेकर गंभीर हैं। तो कुछ व्यंग्य में शिल्प को लेकर उतावले। बस इन्हीं कुछ मुद्दों पर व्यंग्यकारों में आपस में तलवारें तनी रहती हैं। वे अपना कम बल्कि दूसरे के लिखे पर 'फतवे' अधिक जारी करते दिखते हैं।

भला ऐसा कभी व्यंग्य या व्यंग्यकारों के बीच हुआ है। हर व्यंग्यकार व्यंग्य को अपने तरीके से लिखने के लिए 'स्वतंत्र' है। तो लिखने दीजिए न। काहे को एक-दूसरे की स्वतंत्रता पर 'बुलडोजर' चलाने को तैयार बैठे रहते हैं। यह व्यंग्यकार पर छोड़ दें कि वो अपने व्यंग्य को 'गंभीर' बनाता है या उसमें 'हास्य' भरता है।

लेकिन नहीं। लोगों ने मानो 'जिद' पाल ली है कि हम तो टांग बीच में घुसेडेंगे ही घुसेडेंगे। अमां, खुद की नहीं कम से कम अपनी टांग की ही फिकर कर लो। अपनी लड़ाई के बीच टांग की ऐसी-तैसी क्यों किए रहते हो।

व्यंग्यकारों के इत्ते झगड़े देखकर कभी-कभी तो मुझे लगता है कि इनमें से ज्यादातर शायद अपने घरों से 'प्रताड़ित' हैं। चूंकि घर में इनकी कोई सुनता-सुनाता नहीं तो मियां चले आते हैं फेसबुक पर अपने दिलों की भड़ास निकालने। अक्सर कुछ झगड़े तो इसी मुद्दे पर हो लेते हैं कि तूने मेरे स्टेटस को कॉपी कर अपना क्यों बना लिया। या, तेरा व्यंग्य या वन-लाइन मेरे व्यंग्य या वन-लाइन से 'श्रेष्ठ' कैसे। कुछ भी कहिए- लेखन में 'श्रेष्ठता' के लफड़े बड़े तगड़े हैं जनाब। जिसे देखो वो श्रेष्ठता का रस चखने को बेताब बैठा रहता है।

बाकी व्यंग्यकारों की जाने दें। अगर मुझसे कोई पूछे कि व्यंग्य क्या है? तो प्यारे मैं इत्ता ही कहूंगा कि व्यंग्य लेखन की सबसे 'ग्लैमरस' और 'हॉट' विधा है। वन-लाइनर के तड़के ने तो इसे और भी 'मस्त' बना दिया है। खासकर, टि्वटर पर आने वाले वन-लाइनर तो स्थापित व्यंग्यकारों के लंबे-चौड़े व्यंग्य से कहीं ज्यादा 'कैची' और 'धांसू' होते हैं।

इत्ती मस्त विधा के बीच रहकर भी जब व्यंग्यकारों को आपस में एक-दूसरे की 'बजाते' देखता हूं तो बड़ा दुख होता है। ऐसे में आलोचकों और व्यंग्यकारों में अंतर ही कहां रह जाता है? अमां, जित्ता टाइम आप लड़ने-भिड़ने में खोटी करते हो, इत्ते में तो एक से बढ़कर एक धांसू और हॉट टाइप का व्यंग्य खींचा जा सकता है।

बाकी आपकी मर्जी।

सोमवार, 29 अगस्त 2016

एक मच्छर से मुलाकात

हाल ही में एक मच्छर से मुलाकात का मौका मिला। प्रस्तुत है उक्त मुलाकात की संक्षित-संपादित डिटेल।

मैं- यार मच्छर, घणा आतंक मचाए हुए हो आजकल देश में।
मच्छर- आतंक? मैं क्या कोई आतंकवादी हूं, जो आतंक मचाऊंगा।
मैं- अरे, नहीं.. नहीं..। वो वाला आतंक नहीं। डेंगू वाला आतंक।
मच्छर- गुजारिश है, डेंगू को आतंक के साथ कम्पेयर मत करो। डेंगू और आतंक में जमीन-आसमान का अंतर है।
मैं- जमीन-आसमान का अंतर कैसे? आतंकवादी भी आतंक फैलाकर बेकसूर जनता को मार रहे हैं। यही काम डेंगू भी कर रहा है।
मच्छर- देखो, हमें कोई शौक नहीं डेंगू फैलाने का। इसके लिए जिम्मेदार तुम इंसान ही हो।
मैं- जिम्मेदार? भला हम कैसे जिम्मेदार हुए?
मच्छर- अच्छा। यहां-वहां गंदगी बिखेरो तुम। नदी से लेकर कूलर तक का पानी दूषित करो तुम। सड़क पर सड़ी-गली चीजें फेंको तुम। फिर कहो कि हम जिम्मेदार कैसे हुए?
मैं- अमां, इत्ते बड़े मुल्क और इत्ती आबादी के बीच इत्ता तो चलता है। फिर भी हम सब मय प्रधानमंत्री लगे हुए हैं साफ-सफाई के अभियान में। सुधार होते-होते ही तो होंगे न।
मच्छर- बुरा न मानियो। तुम चाहे कित्ता ही प्रयास क्यों न कर लो, इंसान अपनी गंदगी और गंदी आदतों को कभी सुधार ही नहीं सकता। गंदगी इंसान का सबसे प्रिय शगल है।
मैं- देखो.., तुम जरूरत ज्यादा आगे बढ़ रहो। अपनी हदों में रहो। हम इंसानों को यों गरियाना उचित नहीं। ध्यान रखो, तुम्हारा 'अस्तित्व' केवल हमारी वजह से है।
मच्छर- हमारे अस्तित्व को चुनौती न दो। हम तो संसार में तब से हैं, जब तुम लोग बंदर की भांति पीछे पूंछ लगाए यहां-वहां टहला करते थे। तब तुम लोग ज्यादा 'सभ्य' थे।
मैं- वो तो समय के साथ-साथ इंसान के शरीर और व्यवहार में बदलाव होते रहते हैं। इसमें नया क्या है। तुम खुद को ही देख लो न। कित्ता बदल गए हो तुम। अब तो तुम पर किसी भी कीटनाशक का कोई असर न होता। सबसे बच निकलते हो।
मच्छर- अबे, जहरीला तो तुमने ही बनाया है हमें। बल्कि तुम इंसान तो हमें भी ज्यादा जहरीले हो। हम पर तो फिर भी कीटनाशक का असर हो जाता है। तुम पर तो किसी कीटनाशक का असर नहीं होता। जहर भी तुमसे पनाह मांगता है।
मैं- झूठ बोल रहे हो तुम। अगर हम पर कीटनाशक का असर न होता तो तुम्हारा एक डंक हमारे शरीर में प्लेटलेट्स की मात्रा को इत्ता कम न कर देता। समझे।
मच्छर- हमारा तो काम ही खून चुसना है। यही हमारा भोजन है। अगर हमारे डंक से तुम्हें इत्ती ही परेशानी है तो अपना खून बदल लो न।
मैं- खून बदल लें। क्यों बदल लें खून। कुछ पता भी है, खून बदलने में कित्ता खरचा आता है।
मच्छर- तुम्हारी मर्जी। लेकिन हम तुम्हें न डंक मारना बंद करेंगे, न खून चुसना। जो चाहे करो लो।
मैं- वाकई। बढ़े ढीठ मच्छर हो बे। जरा भी सुधने को तैयार नहीं। अपने आतंक से पूरी इंसान बिरादरी की बजा रखी है। लानत है तुम पर।
मच्छर- तुम हमें चाहे कुछ कह लो। लेकिन जब तक तुम इस दुनिया में हो, हम खत्म न होने के। खाद-पानी तो हमें तुम्हीं से मिल रहा है।
अभी तो यह शुरुआत है, आगे-आगे देखो होता है क्या।
मैं- फिर तुम भी कान खोलकर सुन लो। हमने भी सोच लिया कि हम तुम्हारी कंपलीट बजाके ही दम लेंगे। बस्स, बहुत डंक मार लिए तुमने हमारे।
मच्छर- आगे की आगे देखी जाएगी। फिलहाल, तुम चुप करो। नहीं तो मैं अपने डंक से तुम्हारी इसी वक्त बजा दूंगा। डेंगू का मच्छर हूं मैं डेंगू का।

इत्ता सुन मैंने उस मच्छर से किनारा करने में ही अपनी भलाई समझी। चुप-चाप वहां से निकल लिया। एक बार को बीवी से पंगा लिया जा सकता है लेकिन मच्छर से पंगा लेना। तौबा-तौबा...।

बोलने में गोल्ड मेडल

यह सदियों पुराना सत्य है कि हम खेलों में उत्ती मेहनत नहीं करते, जित्ती बोलने या पड़ोस की खोज-खबर रख लेने में कर लेते हैं। बोलने या एक-दूसरे की लगाई-बुझाई में हमारा जवाब नहीं। जित्ता पता हमें हमारे घर का नहीं रहता, उससे कहीं ज्यादा पता पड़ोसी के घर का रहता है। पड़ोस में कौन आया-गया। किसने क्या खाया-कमाया। किस लड़की या लड़के का अफेयर किस मोहल्ले में किससे चल रहा है। हमें सब मालूम रहता है।

मैं पूरी जिम्मेवारी के साथ कह सकता हूं अगर रियो ओलंपिक में एक प्रतियोगिता बोलने या खोज-खबर रखने की रही होती तो हमें निश्चित ही 'गोल्ड मेडल' मिलता।

देखिए न, जैसे-तैसे कर रियो ओलंपिक में हमें जो दो पदक प्राप्त हुए उस पर भी लोगों का आंय-बांय बोलना थमा नहीं है। किस्म-किस्म की राय देते-देते लोग थक नहीं रहे। यह होना चाहिए था। वो होना चाहिए था। सिंधु-साक्षी को थोड़ा ऐसे, थोड़ा वैसे खेलना चाहिए था। कुछ तो कोच पर ही सीधा होने से नहीं चूक रहे। एक-एक कर सरकार और सिस्टम की तमाम खामियां-खराबियां बताए चले जा रहे हैं।

लेकिन बोलने वालों की इत्ती भीड़ में से अभी तलक एक भी चेहरा ऐसा निकलकर सामने न आया है, जिसने छाती ठोककर यह कहा हो कि हां.. हां.. मैं अपने बच्चे को कोई भी खेल चुनने-खेलने की आजादी देता या देती हूं। पढ़ाई-लिखाई से ज्यादा पैसा मैं बच्चे के खेल पर खर्च करूंगा या करूंगी।

देखो जी, बात सिंपल है। जुबान हिलाने में कतई पैसे नहीं लगते। चाहे जित्ती हिला-घुमा लो। मगर खेलों के प्रति फैसला लेने में जिगर चाहिए होता है, जो हमारे पास न के बराबर है। यों, खोज-खबर हमें पड़ोस के साथ-साथ पूरी दुनिया की रहती है लेकिन अपने घर के बच्चे की खेल-च्वाइस के बारे में हम अनजान बने रहते हैं।

यही वजह है कि मैं बोलने वालों से सबसे अधिक घबराता हूं। सामाजिक जीवन के साथ-साथ फेसबुक पर भी ऐसे सयानों से उचित दूरी ही बनाकर रखता हूं। मैं नहीं चाहता कि उनकी सोहबत में पड़कर खुद भी 'बकलोल' टाइप हो जाऊं। मुझे अपनी इज्जत से कहीं ज्यादा चिंता अपनी जुबान की रहती है।

मैं तो कहता हूं, अगले ओलंपिक में उन सबको एक दफा जरूर खेलने भेजा जाना चाहिए जो आज फेसबुक और गली के नुक्कड़ पर खड़े होकर तरह-तरह का ज्ञान पेलने में लगे हैं। आखिर उन्हें भी तो पता चले आटे-दाल का भाव। बोलने और खुद उसी काम को करने में बहुत फर्क होता है प्यारे।

रियो में जो हुआ सो हुआ। इस पर जित्ता रो सकते थे, रोए भी। अब आगे यह सब न हो कोशिश तो यही होनी चाहिए। बाकी डिपेंड सरकारों-नेताओं पर करता है कि वो खेल को अधिक 'तरजीह' देते हैं या सिर्फ 'बोलने वालों' को। 

मंगलवार, 23 अगस्त 2016

फेसबुक, खाना और सेल्फी

खाने की खोज जिस सदी में हुई होगी, शुक्र मनाइए तब फेसबुक नहीं था। तब खाना खाने-पकाने की कलाएं मनुष्य तलक ही सीमित रहीं ज्यादा वायरल न हुईं। बेहद सुकून के साथ खाया खाना मनुष्य के शरीर को लगा होगा। कित्ती चैन भरी जिंदगी होगी तब न।

अब खाना खाने-पकाने के मसले एकदम चेंज हो चुके हैं। खाना खाने-पकाने से पहले फेसबुक पर शेयर हो जाता है। पूरी दुनिया जान जाती है कि अगला आज क्या खाना खा या पका रहा है। अगला बिन खाए ही खाने का 'वर्चुल स्वाद' चख लेता है। खाने पर हजारों की तादाद में 'लाइक' और 'कमेंट' निरंतर टपकते रहते हैं।

खाना दुनिया के किसी भी हिस्से या रेस्त्रां में बैठकर खाया जाए फेसबुक पर पोस्ट (मय सेल्फी) तुरंत तन जाती है। गजब यह है कि 'ब्यूटी एप' की 'हेल्प' से सेल्फी के साथ-साथ लोग खाने को भी सजा-संवारकर 'चमका' देते हैं। पिक्स देखने के बाद ऐसा लगता है मानो खाने को 'नहलाकर' यहां लगाया गया है। एकदम धुला-पुछा-तंदुरुस्त दिखता है खाना।

कहना न होगा, फेसबुक और स्मार्टफोन ने खाना खाने और पकाने के 'अच्छे दिन' ला दिए हैं। अगला कभी जिन सब्जियों को खाने से पहले नाक-मुंह मारा करता था, सेल्फी में इत्ता 'डैशिंग' लगता है मानो बचपन से ही उन सब्जियों का घणा शौकिन रहा हो। खाने की पोस्ट के साथ 'यम्मी...', 'इस्पाइसी...' लिखना कभी न भूलता।

देखा-दाखी एकदफा मैंने भी तुरई के साथ 'डिलिशियस...' लिखकर अपने खाने की सेल्फी फेसबुक पर चिपका दी। हालांकि उस सेल्फी पर लाइक और कमेंट तो भरपूर मिले मगर पत्नी ने पोस्ट देखते ही मुझे हड़काया- 'क्यों तुम्हें तुरई की सब्जी कब से स्वादिष्ट लगने लगी? मेरे सामने तो बड़े आड़े-तिरछे मुंह बनाते हो तुरई को देखके। और यहां फेसबुक पर तुम्हें यही सब्जी 'डिलिशियस' लग रही है!'

मैंने पत्नी को ठंडी भाषा में समझाया। 'न.. न.. ऐसा कुछ नहीं है जैसा तुम समझ रही हो। मेरा तुरई की सब्जी से आज भी उत्ता ही छत्तीस का आंकड़ा है जित्ता वामपंथियों का राष्ट्रवादियों से। वो तो दो-चार लाइक-कमेंट बटोरने के लिए पोस्ट फेसबुक पर चढ़ाई थी। इधर थोड़ी-बहुत बीमारी मुझे भी 'लाइक' की लग गई है, सो...।'

खैर, जैसे-तैसे कर पत्नी को तो मना लिया मगर फेसबुक पर खाने की सेल्फियों को देखकर निकट भविष्य में हम खाना मेज-कुर्सी पर नहीं बल्कि फेसबुक-टि्वटर पर बैठकर खाया-पकाया करेंगे। संभवता यह खाने का 'डिजिटलिकरण' कहलाएगा।

बुधवार, 17 अगस्त 2016

यमराज से संवाद

गए रोज यह संवाद यमराज (जी हां, यमराज) से इन-बॉक्स में घटित हुआ। इस संवाद का किंचित संपादित अंश यहां प्रस्तुत है।

यमराज- हैलो वत्स।
मैं- जी। हैलो। मैं वत्स नहीं रस्तोगी हूं। र स्तो गी। आप कौन सर?
यमराज- हां हां मैं जानता हूं तुम वत्स नहीं रस्तोगी हो। किंतु हमारे यहां बेटे को प्यार से वत्स कहा जाता है। मैं यमराज हूं।
मैं- य..य..मराज। लेकिन सर आप मेरे इन-बॉक्स में। क्या मेरा समय पूरा हुआ? बट, अभी मैंने देखा ही क्या है?
यमराज- अरे, नहीं.. नहीं वत्स। तुम नाहक चिंतित हो रहे हो। मैं तो यों ही तुमसे इन-बॉक्स में चैट करने आ गया था।

(मैं राहत की सांस लेते हुए।)

मैं- ओह! थैंक गॉड। मैं तो डर ही गया था। जी, बताएं। आप फेसबुक पर कब आए? क्या इंटरनेट आपके इलाके में भी पहुंच गया?
यमराज- अभी चार-पांच महीने पहले ही सीधा धरती से इंटरनेट का कनेक्शन लिया है।
मैं- सीधा धरती से? वाह! जलवे हैं आपके।
यमराज- हा हा हा हा हा (भारी-भरक हंसी हंसते हुए।)
मैं- अच्छा। तभी फेसबुक पर आपने एकाउंट क्रिएट किया होगा।
यमराज- अरे वत्स, हमें कहां आता है इंटरनेट-फेसबुक चलाना। ये सब तो हमें स्टीव जॉब्स ने बताया-समझाया है। स्टीव पिछले दिनों ही तो आया है यहां।
मैं- स्वीट जॉब्स। एप्पल के को-फाउंडर थे।
यमराज- हां वही वही। बंदा वाकई बड़ा होशियार है। थोड़े दिनों में ही हम सब को इंटरनेट-फेसबुक चलाने में ट्रेंड कर दिया।
मैं- जी सर। वो तो हैं ही ग्रेट।
यमराज- अच्छा वत्स, ये बताओ। क्या धरती पर कविगण ज्यादा हो गए हैं?
मैं- नहीं। ऐसा तो नहीं हैं। यहां तो हर प्रकार का बंदा है। क्यों क्या हुआ?
यमराज- यार, जब से फेसबुक पर आया हूं हर तरफ कवि ही कवि दिखलाई देते हैं। हर रोज कोई न कोई कवि मेरे इन-बॉक्स को अपना बैडरूम समझके चला आता है सर, मेरी कविताएं पढ़कर बताइए।
मैं- ओह! अच्छा। फेसबुक के कवियों ने आपको भी कविताएं चिपका शुरू कर दीं। मैं स्वयं उनकी इस प्रवृति से दुखी हूं पर क्या करूं?
यमराज- मुझे कविताएं पढ़ने का रत्तीभर शौक नहीं। फेसबुक पर तो मैं इसलिए आया हूं ताकि हम सब देवतागण आपस में कनैक्ट रह सकें। किंतु धरती वालों ने हमें यहां भी न छोड़ा।
मैं- सर, फेसबुक की सेटिंग में आपको एक 'ब्लॉक' का ऑप्शन मिलेगा। जो कवि आपको ज्यादा परेशान करते हैं कृपया उन्हें ब्लॉक कर दें।
यमराज- हां। अब यही करना पड़ेगा। स्टीव को बोलता हूं इसे करने को।
मैं- इसके अतिरिक्त कोई और दिक्कत या परेशानी। तो बताएं, सर।
यमराज- नहीं.. नहीं..। बाकी सब यहां मस्त चल रहा है। वो तो मेरे पास खाली समय था। तुम्हारी हरी बत्ती जल रही थी। सोचा तुमसे ही थोड़ा संवाद कर लिया जाए।
मैं- आपका शुक्रिया सर। आपसे इन-बॉक्स में बतियाकर मैं धन्य हुआ।
यमराज- आयुष्मान भवः।
मैं- जब भी टाइम मिले इन-बॉक्स में आते रहिएगा।
यमराज- अवश्य वत्स। अवश्य। अब चलूंगा। संदेसा आया है, तुम्हारी धरती पर दो-चार लोगों का समय पूरा हो लिया है। उनको लाना है।
मैं- ओह! ड्यूटी इज फ्सर्ट। गुड वाय सर।
यमराज- गुड वाय। टेक केयर, वत्स।

गुरुवार, 11 अगस्त 2016

व्यंग्य में प्रेरणाएं

व्यंग्यकार को व्यंग्य खींचने की प्रेरणा कहीं से भी मिल सकती है। जरूरी नहीं वो प्रेरणा बहुत धीर-गंभीर या क्रांतिकारी टाइप हो। ग्लैमरस, मस्त और बिंदास प्रेरणा से भी उसका काम चल सकता है।

बाकी व्यंग्यकारों का मैं नहीं जानता लेकिन मैं ऐसी ही प्रेरणाओं से अक्सर प्रेरणा पाता रहता हूं। अगर ये प्रेरणाएं न हों तो शायद मैं व्यंग्य खींच ही न पाऊं। व्यंग्य में मेरी प्रेरणाएं सनी लियोनी और राखी सावंत हैं। हो सकता है, ऐसा सुनकर वरिष्ठ टाइप व्यंग्यकारों को 'तीखी मिर्ची' लगी हो। उन्होंने मुझे व्यंग्य-लेखक मानने से भी 'इंकार' कर दिया हो। मगर इससे मेरी सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता। भई, इत्ती बड़ी दुनिया में लेखक कहीं से, किसी से भी प्रेरणा पा सकता है। क्या नहीं?

मैंने प्रायः देखा है, प्रत्येक छोटे-बड़े लेखक की प्रेरणा में कोई न कोई वरिष्ठ टाइप लेखक ही रहता है। रात-दिन वो उन्हीं के गुणगानों का बैंड बजाता रहता है। जब जहां भी मिलता है अपने प्रेरणा-संपन्न लेखक का ये या वो पढ़ने पर इत्ता जोर डालता है, इत्ता जोर डालता है कि अगला भी उक्ता जाए। लेकिन मैं किसी वरिष्ठ टाइप लेखक-साहित्यकार को अपनी प्रेरणा न मानता। उन्हें प्रेरणा मानकर मुझे अपने व्यंग्य या भाषा का बैंड थोड़े न बजाना है।

मेरी प्रेरणाएं ग्लैमरस हैं इसीलिए पूरी कोशिश रहती है व्यंग्य में ग्लैमर का तड़का लगाए रखने की। मेरे विचार में व्यंग्य 'ग्लैमर-प्रधान' ही होना चाहिए ताकि अगला पढ़कर 'बोर' न हो। व्यंग्य को ही गंभीर बना देंगे, तो क्या खाक मजा आएगा लिखने-पढ़ने में।

मुझे लगता है अखबारों को व्यंग्य को छोटा रखने की प्ररेणा इन्हीं ग्लैमरस बालाओं की 'माइक्रो-ड्रेसस' से मिली होगी। सही भी है, व्यंग्य जित्ता माइक्रो होगा, पढ़ने में उत्ता ही लुत्फ देगा। लंबे-चौड़े व्यंग्य न अब कोई पढ़ना चाहता है न लिखना। वक्त के साथ पाठकों ने अपनी चॉइस भी बदल ली है।

बालाओं से प्रेरणा पाकर मुझे भी माक्रो टाइप व्यंग्य खींचने में ही ज्यादा आनंद आता है। न खोपड़ी पर वैचारिता हावी होती है न बुद्धिजीविता का दंभ सवार रहता है। मस्त होकर माइक्रो व्यंग्य खींचे जाओ। माइक्रो ड्रेस और माइक्रो व्यंग्य का यही तो मजा है प्यारे।

आगे कभी मूड बना तो मैं अपना व्यंग्य संग्रह इन्हीं प्रेरणाओं को समर्पित करूंगा। इस बहाने मार्केट में मेरी किताब की डिमांड भी धांसू रहेगी। सेलिब्रिटी प्रेरणाओं के सहारे सेलिब्रिटी लेखक बनने का मजा ही कुछ और है। प्रेरणाएं जिंदाबाद।

मंगलवार, 9 अगस्त 2016

लाइक और दस्त

आलम यह है, मुझे दिन में दो वक्त खाना न मिले, चलेगा। लेकिन फेसबुक पर 'लाइक' भरपूर मिलते रहने चाहिए। बिना लाइक की जिंदगी कोई जिंदगी है। मुझे इससे कतई फर्क नहीं पड़ता कि लाइक मेरी किस और कौन-सी पोस्ट पर आ रहे हैं। लाइक बस आते रहने चाहिए। जित्ते अधिक लाइक होंगे, सोशल मीडिया में मेरा उत्ता ही 'जलवा' होगा।

अभी कल ही की बात लीजिए। मैंने एक पोस्ट मुझे 'दस्त' लगने पर डाली। हालांकि दस्त की शुरुआत अभी ठीक से हुई भी नहीं थी मगर पोस्ट यह सोचकर डाल दी कि मित्रों के संज्ञान में आ जाए। मिनट भर में पोस्ट पर दे-दनादन लाइक आना शुरू हो गए। दस्त पर मित्र लोग अपनी-अपनी राय-सलाह देने लगे। दस्त के दौरान मुझे क्या खाना और किस चीज से परहेज करना चाहिए बताने-समझाने लगे।

मगर मुझे राय या सलाह से कहीं ज्यादा 'खुशी' इस बात पर थी कि मेरे लाइक का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है। मतलब- फेसबुकिए मुझे दस्त लगने को 'पसंद' कर रहे हैं। लाइक एक ऐसा जुनून है, जिसे पाने की खातिर बंदा या बंदी कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते हैं। जिनकी पोस्टों पर भरपूर लाइक नहीं आते। सोशल मीडिया में उन्हें 'तुच्छ प्राणी' की निगाह से देखा जाता है। बाहर कभी मिलते हैं तो पूछा जाता है कि जनाब आपकी पोस्ट पर लाइक का मार्केट इत्ता ठंडा क्यों रहता है?

लेकिन पत्नी को मेरी दस्त वाली पोस्ट कतई नहीं भाई। उसने तुरंत डपट दिया- 'क्या सठिया गए हो जो दस्त लगने वाली पोस्ट भी फेसबुक पर चिपका दी।' मैंने उसे समझाया- 'यह पोस्ट मैंने 'सहानुभूति' जुटाने के लिए नहीं बल्कि लाइक पाने के लिए डाली थी। जित्ते अधिक लाइक मिलेंगे, उत्ती ही जल्दी मेरे दस्त दुरुस्त होंगे।' पत्नी चौंकी। 'ओह! फिर तो हर बीमार शख्स को डॉक्टर के पास नहीं बल्कि सीधा फेसबुक पर आना चाहिए न! अपने बीमार होने की पोस्ट पर मिले लाइक उसके तईं दवा-दारु का काम करेंगे। क्यों?' मैंने कहा- 'एक्जेक्टली! 'तुम्हें क्या पता, लाइक लोगों के लिए संजीवनी-बूटी समान होते हैं। मैंने तो यहां तक सुना है कि लाइक खरीदे-बेचे भी जाते हैं।'

मेरे तर्क से पक चुकी पत्नी पैर पटकते हुए यह कहकर चली गई- ऐसे दिखावटी लाइक तुम्हें ही मुबारक।

यह तो चलिए मुझे दस्त लगने की बात रही मैंने तो स्वर्ग सिधारने वाली पोस्टों पर भी खूब-खूब लाइक देखे हैं। जहां किसी के स्वर्ग सिधारने की पोस्ट फेसबुक पर आई नहीं कि भाई लोग इत्ती तेजी से उसे लाइक करना शुरू कर देते हैं मानो अगले के जाने की कित्ती खुशी है उन्हें। आलम यह रहता है पोस्ट में अलग से लिख देने के बाद भी- 'कृपया इस खबर-सूचना को लाइक न करें' लाइक मारने का सिलसिला खत्म नहीं होता। लाइक लोगों की नसों में इत्ता कदर समा चुका है कि वे सोते हुए भी 'लाइक-कर्म' करना न भूलते होंगे।

कहे कोई कुछ भी पर लाइक की महिमा अपरमपार है। लाइक का स्थान कोई नहीं ले सकता। मरने-जीने, नौकरी पाने-खोने, इश्क होने-छूटने हर मर्ज की दवा लाइक है। वो दिन दूर नहीं, जब दो देशों के बीच भिन्न-भिन्न मुद्दों पर बातचीत या समझौते आपस में मिलने-जुलने से नहीं केवल लाइक के दम पर ही हो जाया करेंगे!

सच कह रहा हूं, अगर लाइक की डोज मुझे नहीं मिलती तो मेरे दस्त भी इत्ती जल्दी ठीक न होते। नाऊ फीलिंग बैटर।

गुरुवार, 4 अगस्त 2016

जीएसटी बिल का पारित और रजनीकांत का टि्वटर हैंडल हैक होना

हैरान न होइए। जीएसटी बिल का रजनीकांत से दूर-दूर तलक कोई आस्ता-वास्ता नहीं है। वो तो जीएसटी को रजनीकांत के साथ मुझे इसलिए रखना पड़ा ताकि व्यंग्य का बेलैंस बराबर रहे। न जीएसटी समर्थक मुझसे नाराज हों, न रजनीकांत समर्थक।

जीएसटी बिल के पारित हो लेने से चारों तरफ 'हर्ष' का सा माहौल देख रहा हूं। जित्ती खुशी सरकार के चेहरे पर है, उससे कहीं ज्यादा खुशी सरकार के चाहने वालों को है। होगी भी क्यों नहीं। इत्ते लंबे वक्त से की जा रही कवायद आखिर रंग ले ही आई।

अब जीएसटी के फायदे-नुकसान या तो अर्थशास्त्री जानें या उद्योगपति। मेरी लेखकीय खोपड़ी में ये टैक्स-सम्मत बातें ज्यादा नहीं घुस पातीं। या कहूं, जानबूझकर घुसने देता भी नहीं। मुझे क्या मतलब इन गूढ़-गंभीर बातों से। मैं ठहरा एक अदना-सा लेखक। जिसका कुछ गुजारा नौकरी तो कुछ यहां-वहां छपने-छपाने से चल ही जाता है। जो ज्ञाता टाइप के बंदे हैं वो ही उलझें जीएसटी की उलझनों में।

मैं तो मोटी-सी बात जानता हूं कि जीएसटी का कोई असर पीने-पिलाने पर नहीं पड़ेगा। मेरे तईं यही काफी है। यों भी, सरकारों को शौक पर पाबंदी या टैक्स थोपना भी नहीं चाहिए। गम को गलत और खुशी को सेलिब्रेट करने के लिए शौक बेहद जरूरी है।

जीएसटी की खुशनुमा लहर के बीच- जब से रजनीकांत के टि्वटर हैंडल के हैक होने की खबर पड़ी है, मेरा दिमाग टोटल सदमे में है। मैं यही सो-सोचकर आधा हुआ जा रहा हूं, आखिर ऐसा वो कौन-सा बंदा है जिसने रजनीकांत (हां हां रजनीकांत) का टि्वटर हैंडल हैक कर लिया। जिस रजनीकांत के महज हाथ उठा देने भर से सिगरेट उछलकर सीधे मुंह में आन गिरती है। जिस रजनीकांत के मोबाइल चार्ज करने मात्र से ग्रिड फेल हो जाती है। जिस रजनीकांत की फिल्म के रिलीज होने की खुशी में ऑफिसों में छुट्टी कर दी जाती है। जिस रजनीकांत का धाकड़ एक्शन देख विलेन की सू-सू निकल जाती है। बताइए, उस महान रजनीकांत का टि्वटर हैंडल हैक हो गया।

यह न केवल बहुत बड़ी बल्कि बहुत ही गंभीर बात है। इस मामले में तो सरकार को तुरंत जांच बैठा देनी चाहिए। अभी रजनीकांत का टि्वटर हैंडल हैक हुआ है, कल को कटप्पा या बाहुबली का भी हो सकता है। हैकर्स का कोई दीन-धरम न होता। किसी का भी हैंडल हैक कर लेते हैं।

बेशक, जीएसटी बिल के पारित होने पर 'जश्न' मनाइए। साथ-साथ थोड़ी 'संवेदना' रजनीकांत से भी रखिए। आखिर उनका टि्वटर हैंडल हैक हुआ है भाई। यह मजाक नहीं।

मंगलवार, 2 अगस्त 2016

क्यों गिरा झुमका बरेली में!

झुमका बरेली में ही क्यों गिरा? दिल्ली, आगरा मथुरा, झांसी, कानपुर में भी तो गिर सकता था। बरेली में गिरकर झुमके ने हम बरेलीवासियों को 'दुविधा' में डाल दिया है। किसी अनजान बंदे को बताओ कि जी, मैं बरेली से हूं तो झट से पूछ बैठता है, आपको तो पता ही होगा साधना का झुमका बरेली के किस बाजार में गिरा था। दो पल इधर-उधर की बगलें झांककर बंदे को मना करना पड़ता है, न जी न मुझे न मालूम साधना का झुमका बरेली के किस बाजार में गिरा था।

यों, सुनाई में तो यही आया है कि खुद गीतकार राजा मेहंदी अली खां को नहीं मालूम था कि झुमका बरेली के किस बाजार में गिरा। न ही कभी वे बरेली आए, न उनका दूर-पास का कोई रिश्तेदार यहां का है। फिर भी उन्होंने झुमका बरेली में ही गिराया। यहां तक कि यह रहस्य साधना को भी नहीं मालूम।

भई, यह तो गीतकार का दिमाग है, कब कहां किधर दौड़ जाए। बख्शी साहब तो चोली के पीछे क्या है को ही लिखकर सुपरहिट हो गए। बड़ी सहजता से उन्होंने चोली के पीछे दिल को बैठा दिया।

लेकिन झुमके ने जो दुनियाभर में 'तहलका' मचाया उसने तमाम रहस्य एवं खोजवादियों को 'संशय' में डाल दिया। हालांकि एकाध दफा मैंने भी तलाशने की भरपूर कोशिशें कीं, शायद बरेली के बाजार में साधना का गिरा झुमका कहीं दिख जाए। तमाम पुराने लोगों से पूछा-पाछी भी की। मगर झुमका नहीं मिलना था नहीं ही मिला।

इस झुमके का न मिलना बतौर बरेलीवासी मुझे कई सालों से सला रहा है। वो तो राजा मेहंदी अली खां अब दुनिया में नहीं हैं, नहीं तो एक दफा उनसे जाकर जरूर पूछता- जनाब, आप ही बतला दो झुमका बरेली के बाजार में कहां और किधर गिरा था।

कहते हैं, खोजने पर भगवान भी मिल जाया करते हैं लेकिन यह झुमका तो भगवान से भी बड़ा वाला निकला आज तलक मिलके न दिया।

पिछले दिनों सुनने में आया था कि बीडीए (बरेली) ने कथित झुमके के गिरने की जगह ढूंढ ली है। उसी जगह पर झुमके की आर्टिफिशल कृति को लटकाया जाएगा। लेकिन अभी खबर पड़ी कि झुमका उस जगह पर न लटकाकर कहीं और लटकाया जाना तय हुआ। झुमके को भी उन्होंने सरकारी दफ्तर में टांगे जाने वाला केलैंडर बना दिया है, जब जहां मन करे टांग लो। झुमका अगर बरेली के बाजार में बीचों-बीच लटकता तो बात कुछ और ही होती।

यही वजह है कि मैंने पत्नी को झुमका पहनकर बाजार में जाने से मना कर रखा है। झुमका पहने का शौक है तो घर में पहनो। जित्ता मर्जी उत्ता पहनो। एक नहीं दस पहनो। खबरदार, जो बाजार में पहनके गईं तो।

वो तो साधना जी की 'सहनशीलता' थी कि उनका गिरा झुमका कभी मिल नहीं पाया। न ही उन्होंने इस बाबत ज्यादा हंगामा काटा। यहां तक कि पुलिस में भी यह बात नहीं पहुंची। अगर पत्नी का झुमका बाजार में कहीं गिर गया, तब मेरी तो सिर से लेकर पैर तक आफत हो लेगी। इत्ती भीड़ में भला मैं कैसे ढूंढकर दूंगा, उसका गुम हुआ झुमका। यहां तो भीड़-भाड़ में मोबाइल कहीं गिर जाए तो न मिलता फिर यह तो झुमका ठहरा। एक दफा किसी के हत्थे लग गया उसकी तो चांदी ही चांदी।

बेहतर हो, बरेली के बाजार में झुमके के गिरने को 'रहस्य' ही रहने दिया जाए।

सोमवार, 1 अगस्त 2016

टि्वटर पर कवि और कविता

वे हमारे मोहल्ले के वरिष्ठ कवि हैं। खुद को केवल कवि नहीं हमेशा वरिष्ठ कवि कहलाना ही पसंद करते हैं। भूलवश अगर कोई उन्हें कवि कह दे तो बुरा मान जाते हैं। दुआ-सलाम तक खत्म कर देते हैं। ऐसा एक दफा वे अपनी पत्नी के साथ कर चुके हैं।

बहरहाल। अभी दो-चार रोज पहले की बात है। वरिष्ठ कवि महोदय मुझे सब्जी मंडी में मिल गए। हल्के-फुल्के दुआ-सलाम के बाद। मैं पूछा- 'आजकल आप मोहल्ले में कम ही नजर आते हैं। क्या कहीं व्यस्त रहने लगे हैं?' सब्जी का झोला मेरे स्कूटर की गद्दी पर जमाकर बोले- 'हां प्यारे, मैंने मोहल्ले में निकलना लगभग बंद-सा कर दिया है। आजकल मैं केवल टि्वटर पर ही रहता-मिलता हूं। वहीं पर सबसे हाय-हैलो हो जाती है। कभी तुम भी मिलो वहां आकर मुझसे।'

मैंने थोड़ा चौंकते हुए कवि महोदय से प्रश्न किया- 'आप और टि्वटर पर? यकीन नहीं हो रहा। आप लंबी-लंबी कविता लिखने वाले कवि जबकि टि्वटर पर मात्र 140 कैरेक्टर से अधिक कुछ लिख ही नहीं सकते। फिर वहां कविता कैसे लिख पाते होंगे?'

इत्ता सुनते ही वे अपने सीने को गर्व से चौड़ा करते हुए बोले- 'प्यारे, बदलते ट्रेंड के साथ मैंने अपनी कविता के फॉरमेट को भी बदल दिया है। अब मैं लंबी नहीं सिर्फ 140 कैरेक्टर वाली कविताएं ही लिखता हूं। सुनो, यह ताजा लिखी है- डियर लव, मत घबराओ जमाने से। जमाना क्या बिगाड़ लेगा तेरा-मेरा। खुलकर टि्वटर पर मिला करो। आएगा खूब मजा।

'बताओ कैसी लिखी है', कवि महोदय ने पूछा। सांस भीतर की तरफ खींचकर बुद्धि पर अतिरिक्त बोझ न डालते हुए मैंने कह दिया- 'सर, बहुत उम्दा। बहुत खूब। गजब। मात्र 140 कैरेक्टर में भी कविता रची जा सकती है। यह कोई आपसे सीखे।'

एक जोर की हंसी वरिष्ठ कवि महोदय हंसे। और, तपाक से बोले- 'अभी मैंने 140 कैरेक्टर में कविता लिखी है। इत्ते ही कैरेक्टर में मेरा एक उपन्यास लिखने का विचार है।'

मेरी खोपड़ी वहीं झनझना कर गई। '140 कैरेक्टर में उपन्यास?' 'हां.. हां.. क्यों नहीं तुम देखते जाओ, टि्वटर को मैं क्या से क्या बना दूंगा। लेखन जगत में मैं 'तहलका' मचा देना चाहता हूं। बता देना चाहता हूं कि सिर्फ 140 कैरेक्टर में कित्ता कुछ लिखा जा सकता है।'

जो बंदा 140 कैरेक्टर में टि्वटर पर उपन्यास लिखने का मन बना सकता है, उसके सामने मेरी महानता जवाब दे गई और मैं तुरंत वहां से चंपत हो लिया। क्योंकि महान लोगों के आगे खड़ा होना मैं खुद की 'तौहिन' समझता हूं। कवि महोदय सचमूच 'ग्रेट' हैं।