रविवार, 31 जुलाई 2016

दाल और नाक

मैं हर रोज सुबह उठके अपनी नाक जरूर चैक कर लिया करता हूं। नाक अपने स्थान पर है भी या रातभर में गायब हो ली। नाक है तो इज्जत है वरना बिन नाक की जिंदगी कुत्ते से भी बदत्तर।

इधर जब से दाल के दामों ने आसमान छुआ है तब से मेरी फिकर अपनी नाक के प्रति और बढ़ गई है। चाहे दूध-ब्रैड-बटर में कमी कर दूं किंतु दाल में कतई कमी नहीं करना चाहता। मेरा प्रयास रहता है, दाल चाहे कित्ती ही महंगी क्यों न हो घर में किलो-दो किलो दाल अवश्य रहनी चाहिए। दाल रहेगी तो समाज व परिवार के बीच मेरी नाक भी बची रहेगी।

इन दिनों हमारे मोहल्ले में तो ऐसा सीन बना हुआ है कि लोग बाग अपनी गाड़ियां, फ्रिज, एसी, सोना-चांदी बेचकर दाल खरीद रहे हैं। दाल को वे मुश्किल दिनों का सहारा मान बैठे हैं। घर-परिवार, मोहल्ले में दाल को इत्ती इज्जत दी जाने लगी है, इत्ता तो कोई अपने दामाद को न दे रहा। चाहे सुबह हो या दोपहर, शाम हो या रात गली के नुक्कड़ पर पांच-दस बुर्जुग दाल पर चर्चे करते हुए मिल ही जाते हैं। बेचारों ने दाल को 'भगवान' बना लिया है।

मैंने पत्नी से साफ कह दिया है, घर में दाल की रत्तीभर कमी न होने पाए। घर में जब भी कोई मेहमान आए, उसे यह जरूर बताए कि हमारे यहां अभी दाल का इत्ता स्टॉक बकाया है। इससे अगले पर 'इम्प्रेशन' पड़ता है। कटोरी दो कटोरी अगर कोई पड़ोसी दाल मांगने आ जाए तो मना न करे तुरंत दे दे। जरूरतमंद को दाल को देना सबाब का काम है।

एक मैं ही नहीं किसी को भी अपनी नाक को खतरे में नहीं आने देना चाहिए। नाक की सलामती के साथ ही परिवार व समाज के बीच गर्दन ऊंची रहती है। नाक और दाल के बीच रिश्ता कुछ ऐसा है जैसा नेता और जुमले का रहता है। नेता जुमले गढ़ने के लिए किसी हद तक जा सकता है। उसी प्रकार अपनी नाक को बनाए-बचाए रखने के तईं मैं दाल की कीमत से जरा भी समझौता नहीं कर सकता।

लोग गलत कहते हैं कि दाल को महंगा सरकार और जमाखोर करते हैं। सरकार की जान को कोई एक काम थोड़े न है, जो वो रात-दिन दालों के उतार-चढाव पर ही नजरें गढ़ाए रहेगी। बेचारा जमाखोर मुफ्त में बदनाम हो लेता है। जबकि उससे बड़ा 'दानी' समाज में कोई नहीं! इत्ती टाइप की चीजें निरंतर महंगी होती रहती हैं, एक दाल जरा-सी क्या महंगी हो ली कि लोग बिलबिला उठे। अगर अंटी में नोट नहीं तो कुछ दिन दाल न खाओ। किसी पंडित या डॉक्टर ने थोड़े न बताया है कि दाल खानी ही खानी है।

मैं तो साफ-सीधी सी बात जानता हूं, जिन्हें अपनी नाक की रेप्यूटेशन बनाकर रखनी है वे दाल के दाम पर कोई समझौता न करें। जिन्हें दाल से ज्यादा नोट प्रिय हैं, उनकी वे जानें।

दाल के बहाने ही अगर समाज-परिवार के बीच इज्जत बढ़ रही है तो इसे मेनेटेन करके रखने में क्या बुराई है प्यारे।

गाड़ी-मोटर तो फिर भी पाया जा सकता है किंतु अगर एक दफा नाक कट गई फिर बड़ी मुश्किल हो जाती है। दाल और नाक के बीच रिश्ता कायम करके चलने में ही भलाई है। वरना तो जो है सो है ही।

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