शनिवार, 30 जुलाई 2016

राजनीति, सोशल मीडिया और गालियां

पहले के जमाने और थे। तब न ऐसी राजनीति होती थी, न ही ऐसे नेता थे। समय बदला तो राजनीति के साथ-साथ नेताओं का व्यवहार और जुबान भी बदल गई। अब राजनीति दो ही चीजों से चला करती है; एक- वायदे और दूसरा- गालियां। ये दोनों ही अगर राजनीति में न हो तो कतई मजा न आए। या कहूं दोनों ही एक-दूसरे के पूरक बन चुके हैं।

हालांकि सभ्य समाज में गालियां स्वीकार्य नहीं फिर भी भला कौन मानता है दिए बिना। कम या ज्यादा सब देते हैं। आजकल तो गालियां राजनीति का जबरदस्त अखाड़ा बनी हुई हैं। हर कोई पिला पड़ा है बहती गंगा में हाथ धोने यानी एक-दूसरे को गरियाने में। कमाल यह है, गरियाने पर लेक्चर वे लोग भी दे रहे हैं, जिनकी सुबह गाली के साथ शुरू और रात भी गाली पर ही खत्म होती है।

सोशल मीडिया पर तो हर किसी के बीच होड़-सी लगी है खुद को गालियों के खिलाफ सबसे बड़ा 'नैतिकतावादी' घोषित करने की। ये वही सयाने हैं, जो जरा-सी राजनीतिक असहमति पर इत्ता उखड़ जाते हैं कि सेकेंड भर की देरी न लगाते गालियों के साथ आपकी ऐसी-तैसी करने में। आज वे सब के सब मिलकर सोशल मीडिया पर हमें नैतिकता और सभ्यता का पाठ पढ़ा रहे हैं। वाह! क्या कहने हैं जनाब।

बुरा न मानिएगा, यह हकीकत है कि हम बिना गाली दिए या सुने समाज में रह ही नहीं सकते। मैंने तो तमाम ऐसे लोग देखे-सुने हैं, जो बेजान चीजों को भी बिंदास गालियां बकते हैं। लोग बाइक तक को गाली दे मारते हैं अगर वो एक किक में स्टार्ट न हो। किसको क्या कहिएगा जनाब, अब तो दुनियादारी के साथ-साथ राजनीति भी गालियों पर आन टिकी है।

चुनावी मौसम में गालियां तो क्या जूते-चप्पलें भी अगर चल जाएं कोई बड़ी बात नहीं। नेताओं के साथ जनता को भी आदत पड़ चुकी है सबकुछ को एंजॉव्य करने की।

राजनीति और नेताओं के खेल निराले हैं दोस्त। यहां कौन किसका सगा है, कौन किसका दुश्मन कहना बहुत मुश्किल है। आज जिन्हें जो गालियों से नवाज रहे हैं, हो सकता है, कल को गलबहियां करने लग जाएं। उसी नेता में उन्हें सच्चाई-ईमानदारी नजर आ जाए।

प्यारे, मैं तो कहता हूं नेताओं और सोशल मीडिया की बातों पर ध्यान देकर एंवई दिमाग पर लोड न बढ़ाओ। ये सब बरसाती मेंढक टाइप हैं, जब तलक मौसम इनके फेवर में रहेगा ये यों ही टर्रे-टर्रोते रहेंगे।

1 टिप्पणी:

Kavita Rawat ने कहा…

हालांकि सभ्य समाज में गालियां स्वीकार्य नहीं फिर भी भला कौन मानता है दिए बिना।

.सभ्य समाज को बचे कहाँ रहने देते हैं लोग बाग़ ....

बहुत सटीक प्रस्तुति