शनिवार, 30 जुलाई 2016

प्रेमचंद और फेसबुक

गनीमत रही कि प्रेमचंद के जमाने में फेसबुक नहीं था। अगर होता तो प्रेमचंद कथा-कहानी छोड़के दिन-रात फेसबुक पर ही डटे मिलते। वे भी लाइक-कमेंट और इन-बॉक्स की कहानियों में उलझे रहते। टैगिंग और पोकिंग से दुखी होकर न जाने कित्ती ही दफा फेसबुक छोड़ने की धमकी भी दे डालते। और हर रोज 'चेलैंज एक्सेपटेड' टाइप चेलैंजों को झेल-झेलकर उक्ता गए होते।

वाकई बहुत ही अच्छा रहा कि प्रेमचंद के जमाने में फेसबुक नहीं था।

लेकिन आज हमारे बीच फेसबुक है प्रेमचंद नहीं। फेसबुक के जमाने में प्रेमचंद का न होना कोई बड़ी या गंभीर बात नहीं। हम अपने-अपने तरीके से आज प्रेमचंद को फेसबुक पर याद कर तो रहे हैं। आज हर दूसरी वॉल पर प्रेमचंद की याद या कहानी का तंबू गढ़ा है। कोई प्रेमचंद को महान कहानीकार बता रहा है तो कोई प्रेमचंद की लाठी थामकर सेक्युलरवाद पर भाषण झाड़ रहा है। कोई हैशटैग लगाकर प्रेमचंद पर स्टेटस चिपकाए पड़ा है। सबके अपने-अपने प्रेमचंद हैं आज।

और तो और आज प्रेमचंद को वो लोग भी याद कर रहे हैं, जिनके दादा या बाबा का नाम कभी प्रेमचंद रहा था।

फेसबुक से इतर प्रेमचंद की याद में आज कुछ आयोजन धरती पर मौजूद सभागारों में भी अवश्य होंगे। कोई सम्मानीत होगा। किसी को सम्मानीत किया जाएगा। तो कोई सीट पर बैठा-बैठा यह सोच ही कुढाएमान होगा कि हाय! फलां प्रेमचंद सम्मान-पुरस्कार मुझे न मिला। कुछ देर प्रेमचंद के कथा-साहित्य पर जोर-शोर से बातें-चर्चाएं होंगी। फिर 'रंगीन पानी' का दौर चलेगा। तब न किसी को प्रेमचंद याद रहेंगे न उनका गरीब-बोझिल किसान।

चलिए खैर। ये सब तो आज सभागारों में चलता ही रहेगा। पुनः फेसबुक पर लौटते हैं।

मुझे लगता है, प्रेमचंद को फेसबुक पर याद करना ज्यादा मस्त कॉस्पेट है। दिनभर में चाहे जित्ते स्टेटस पेलो प्रेमचंद की बातों या कथा-साहित्य को लेकर। प्रेमचंद डे होने के नाते आज ऐसी पोस्टों-स्टेटस पर लाइक-कमेंट भी खूब बरसेंगे। फेसबुकिए का भी दिल बहला रहेगा।

गजब यह है, प्रेमचंद पर बने समस्त पेज बीती आधी रात के बाद से इत्ते एक्टिव इत्ते एक्टिव हो लिए हैं कि खुद प्रेमचंद कन्फ्यूजिया गए हैं। बारंबार जुबरबर्ग को फोन लगाकर अपने पेज पर आए लाइक-कमेंटों का हिसाब-किताब ले रहे हैं। क्यों न ले हिसाब-किताब। आखिर प्रेमचंद को भी तो अपनी इंर्पोरटेंस की चिंता है। क्या हुआ, जो वे सशरीर हमारे बीच नहीं, उन पर बने पेज तो हैं न। पेज का होना ही प्रेमचंद के सेलिब्रिटी लेखक होने की निशानी है।

मेरे विचार में प्रेमचंद डे पर फेसबुक को एक पुरस्कार की घोषण करनी चाहिए। यह पुरस्कार उस फेसबुकिए को मिले जिसने प्रेमचंद पर सबसे अधिक लाइक बटोरने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई हो। इससे दो फायदे होंगे- एक प्रेमचंद के कथा-साहित्य मार्केट शेयर उठेगा और दूसरा फेसबुकिया भी पुरस्कार पाके निहाल हो लेगा।

फेसबुक पर प्रेमचंद को सबसे धांसू श्रद्धांजलि यही होगी। क्या नहीं!

2 टिप्‍पणियां:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " महान रचनाकार मुंशी प्रेमचंद की १३६ वीं जयंती - ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

अच्छा व्यंग्य!