मंगलवार, 26 जुलाई 2016

कबाली का कमाल

यों ही कोई रजनीकांत नहीं हो जाता। रजनीकांत होने के लिए रजनीकांत ही होना जरूरी है। फेक्ट है, जो करिश्में रजनीकांत कर सकता है, दुनिया में कोई नहीं कर सकता। एक्शन और रजनीकांत दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। इन लाइनों जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि को अब थोड़ा यों कर लें जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे रजनी। यही तो रजनीकांत का जलवा है। रजनी अन्ना जहां खड़े हो जाते हैं, वो रास्ता भी खुद को 'भाग्यशाली' समझने लगता है।

आजकल तो रजनीकांत की कबाली का कमाल लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा है। मोहल्ले की जिस गली में कदम रखता हूं, कबाली और रजनीकांत के चर्चे ही सुनने को मिलते हैं। कबाली लोग बतौर फिल्म नहीं बल्कि रजनीकांत के 'एवरग्रीन एक्शन' को देखने जा रहे हैं। उनके चलने, बोलने, हाथ घुमने, चशमा पहने के स्टाइल पर लोग फिदा हैं, फिदा। 65 साल की उम्र में जब लोग किस्म-किस्म की बीमारियों के शिकार हो जाते हैं रजनी सर 'एक्शन' कर रहे हैं। है न कमाल।

खबरें बता रही हैं, कबाली अब तलक 250 करोड़ से ज्यादा की कमाई कर चुकी है। क्यों नहीं करेगी। जहां और जिस फिल्म में रजनीकांत का 'स्टारडम' सिर चढ़कर बोलेगा, वहां तो करोड़ों के वारे न्यारे होने ही हैं। लोगों की रजनीकांत के प्रति 'दीवानगी' भी क्या खूब है। फिल्म रिलीज वाले दिन ऑफिसों की छुट्टी रही। चहाने वालों ने अपने रजनी अन्ना की तस्वीरों को दूध से नहलाया। वाह! इसे कहते हैं 'माइंडबिलोइंग पॉपुलेरटी'। इत्ती तो अपने यहां भी किसी हीरो-हीरोइन की न होगी।

इसे कहते हैं, रजनीकांत स्टाइल मार्केटिंग। बिना मार्केट के बीच जाए। बिना तेल-क्रीम-पाउडर, बिना बीमा पॉलिसी बेचे, बिना कोल्ड ड्रिंग को तूफानी बनाए, बिना पंखे-एसी की हवा खाए मार्केट खुद-ब-खुद रजनीकांत के पास हाथ जोड़कर खड़ा हो जाता है, लो सरजी मेरा यूज करो।

यहां तो हीरो को मार्केट में जगह पाने-बनाने के लिए तेल से लेकर च्यवनप्राश तक बेचना पड़ता है। परंतु रजनीकांत के मामले में ऐसा न है। मार्केट खुद चलकर रजनी सर के कदमों में बिछ जाता है। साफ शब्दों में- रजनीकांत मार्केट की वजह से नहीं। उल्टा मार्केट रजनीकांत की वजह से है।

कुछ भी कहो प्यारे, फेम हो तो रजनीकांत जैसा वरना हो ही न। ताकि जिंदगी जी कर लगे कि कुछ खास जी रहे हैं। क्यों है न..।

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