सोमवार, 25 जुलाई 2016

पोकेमॉन गो और अरहर की दाल

'भाई साहब, क्या आप अपने मोबाइल से मुझे पोकेमॉन गो शेयर कर सकते हैं?' मैं सुनकर थोड़ा चौंका। चौंका इसलिए क्योंकि यह सवाल किराने की दुकान चलाने वाले मेरे पड़ोसी ने किया था। मैंने उससे कहा- 'यार, तुम कब से पोकेमॉन गो के दीवाने हो गए? अभी तो यह गेम भारत में आया भी नहीं, फिर भला मेरे कने कैसे हो सकता है!'

'हां, वो मुझे मालूम है, यह गेम अभी इंडिया में लॉच नहीं हुआ फिर भी जुगाड़-सुगाड़ से कहीं मिल जाए तो। अगर एपीके फाइल ही मिल जाती तो भी काम बन सकता था।' दुकानदार ने अपना टेक्नो-संपन्न दिमाग दौड़ाया।

मन ही मन मैं सोचने लगा, वाह री टेक्नॉलिजी तेरा जवाब नहीं। एक किराने की दुकान चलाने वाला भी एपीके फाइल के बारे में जानता है। वाकई देश बदल रहा है। तभी दुकानदार ने मेरे कंधे पर हाथ जमाते हुए पूछा- 'भाई साहब, क्या हुआ? कहां खो गए? अगर गेम नहीं है, कोई बात नहीं। जब मिल जाए, तब दे दीजिएगा।'

मैं हां हां में सिर हिलाकर वहां से चलाने को हुआ कि पुनः दुकानदार ने मुझसे रिक्यूएस्ट की- 'सर, ध्यान रहेगा न।' मैंने कहा- 'हां, यार बिल्कुल ध्यान रहेगा। लेकिन इत्ता सुन लो, इस गेम को खेलने के बड़े 'खतरे' हैं। खबरें बता रही हैं कि गेम खेलते-खेलते दो-चार लोग खरच भी हो लिए हैं। गेम के प्रति लोगों में इत्ता पागलपन है कि नौकरी छोड़ने की खबरें भी सामने आने लगी हैं। जिद है, पोकेमॉन को पकड़ने की। कई देशों की सरकारें इस पर 'बैन' लगाने की मांग भी कर रही हैं।'

दुकानदार ने मुझे टोका- 'अरे साहब, कहने वालों का क्या है एंवई कुछ भी कहते रहते हैं। सच तो यह है कि लोग पोकेमॉन गो की कामयाबी से चिढ़ने लगे हैं। इसीलिए ऐसी भद्दी-भद्दी बातें कह-बोल रहे हैं।' बीच में मैं कुछ बोलने को हुआ तो दुकानदार ने मुझे पुनः टोक दिया- 'साहब, मैं तो पोकेमॉन गो की खातिर अरहर की दाल तक मुफ्त देने को तैयार हूं! बस एक दफा मुझे यह गेम खेलने को मिल जाए। अरहर की दाल की भी कोई बिसात नहीं पोकेमॉन के सामने।'

इत्ता सुनते ही मैं 'सकते' में आ गया। 'अमां यार, क्या बोल रहे हो? 200 रुपए किलो की अरहर की दाल तुम एक गेम की खातिर मुफ्त बांटने को तैयार हो? सठिया तो नहीं गए हो सबेरे-सबेरे। ऐसे तो तुम अपनी पूरी दुकान 'चौपट' कर लोगो। कुछ तो अपनी रोजी-रोटी का ख्याल करो।'

शायद मेरा कहा दुकानदार की भीतर तक सुलगा गया। बेहद नाराज होकर बोला- 'दुकान मेरी, अरहर की दाल मेरी, पेट मेरा, रोजी-रोटी मेरी आपको इससे क्या? पोकेमॉन गो मेरी 'जान' बन चुका है। उसके लिए अरहर की दाल तो क्या खुद तक को 'गिरवी' रखने को तैयार हूं। क्या समझे? बड़े आए मुझे ज्ञान देने वाले।'

बिगड़े मूड को देखकर मैंने उसे थोड़ा दुलराते-पुचकारते हुए समझाया- 'अरे नहीं.. नहीं.. वो मतलब नहीं था मेरा। तुम तो खामखां मुझ पर सीधे हुए जा रहे हो। मैंने तो तुम्हारे सामने वही बातें रखीं, जो मैंने यहां-वहां पढ़ी-सुनी थीं। तुम्हारी निगाह में पोकेमॉन की औकात अरहर की दाल से बड़ी है तो रखो बड़ी। इसमें भला मुझे क्या और क्यों 'आपत्ति' हो सकती है?'

इत्ता सुन दुकानदार का पारा थोड़ा नीचे को लुढ़का और बोला- 'सॉरी भाई साहब, गुस्से में कुछ अधिक बोल गया। वो क्या है न पोकेमॉन गो की 'बुराई' मुझसे 'बर्दाशत' नहीं होती। मैंने आपको भी यह ऑफर देने को तैयार हूं अगर आप मुझे पोकेमॉन गो लाकर देते हो तो जित्ती चाहो उत्ती अरहर की दाल मुझसे मुफ्त ले जा सकते हो। दे दूंगा।'

मैं मन ही मन सोचने लगा, वाह क्या कमाल का दुकानदार है। इत्ती महंगी अरहर की दाल को 'हल्के' में ले रहा है, वो भी एक गेम की खातिर। यहां तो कोशिश रहती है कि एक दफा बनी अरहर की दाल अगले दिन भी खींच जाए। हम जैसों के लिए तो आजकल अरहर की दाल 'सोने' समान है।

वाकई इंसान की 'दीवानगी' का कोई ठौर नहीं। कब, कहां, किस पर 'मेहरबान' हो जाए। एक तरफ लोगों में पोकेमॉन गो को लेकर क्रेज है तो दूसरी तरफ रजनीकांत की तस्वीरों को दूध से नहलाया जा रहा है।

फिलहाल, मैं पोकेमॉन गो के बदले मुफ्त अरहर की दाल पाने के इंतजार में हूं। देखना है, कब तक नसीब होती है।

4 टिप्‍पणियां:

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 27 जुलाई जुलाई 2016 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

Ravishankar Shrivastava ने कहा…

आपके पास पोकेमान गो गेम है? मेरे पास अरहर की दाल है. मैं पोकेमान गो के लिए मरा जा रहा हूँ. मुझे अरहर की दाल में पोकेमान गो के बगैर मजा ही नहीं आ रहा - तो वैसे भी दाल मेरे लिए बेकार है. तो मैं आपको अपनी अरहर की दाल देकर पोकेमान गो लेने के लिए तैयार हूँ.

Anshu Mali Rastogi ने कहा…

ठीक है सर। जैसे ही पोकोमॉन गो की व्यवस्था होती है आपको दे दिया जाएगा।

Madan Mohan Saxena ने कहा…

बहुत ही सुन्दर रचना.बहुत बधाई आपको . कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
https://www.facebook.com/MadanMohanSaxena