रविवार, 24 जुलाई 2016

बिन चड्डी चिंतन

मेरी चिंतन से परहेज वाली बात सुनकर हमारे मोहल्ले के एक वरिष्ठ सज्जन ने मुझे 'बिन चड्डी चिंतन' करने की सलाह दी।

'बिन चड्डी चिंतन, भला यह कैसे संभव है?' मैंने पूछा। उन्होंने फरमाया- 'दुनिया में असंभव कुछ भी नहीं प्यारे। सब संभव है। चिंतन बिन चड्डी के भी हो सकता है। जैसे- जीवन की नीरसता को दूर करने के लिए अक्सर हम कुछ न कुछ डिफरेंट करते रहते हैं। ठीक उसी तरह चिंतन को भी कभी-कभार बिन चड्डी के भी कर लिया जाना चाहिए। चिंतन और दिमाग दोनों का हाजमा दुरुस्त रहेगा।'

'चलिए, मानी आपकी बात। पर बिन चड्डी चिंतन हो कैसे सकता है, जरा विस्तार से समझाएं।' मैंने वरिष्ठ महोदय से आग्रह किया।

'ठीक है। जब तुम विस्तार से जानना ही चाहते हो, तो बता रहा हूं।' सुनो- 'तुम्हें ध्यान हो, सालों पहले गुलजार साहब ने चड्डी पहनके फूल खिलाया था। बस उसी दिन से मेरी खोपड़ी में यह बात घर कर गई थी, जब चड्डी पहनके फूल खिल सकता है तो बिन चड्डी चिंतन क्यों नहीं हो सकता? तब एकाध अपने करीबी मित्र लेखकों से मैंने इस बात का जिक्र भी किया किंतु उन्होंने मेरी बात को या तो हंसी में उड़ा दिया या फिर मुझे पागल करार दिया। मैं ठहरा सयाना। चिंतन तो मुझे करना ही था। वो भी बिन चड्डी। किया। बिन चड्डी चिंतन का प्रयोग खुद पर ही कर डाला। हालांकि शुरू में एकाध दफा बिन चड्डी चिंतन में दिक्कतें पेश आईं। मगर बाद में आदत पड़ गई।'

'देखो प्यारे, चड्डी में और बिन चड्डी चिंतन में बुनियादी फर्क 'खुलेपन' का है। जित्ता कंर्फ्टेबिल तुम बिन चड्डी फील कर सकते हो, चड्डी पहनकर नहीं कर सकते। यह फैक्ट है, आदमी जित्ता बिंदास और स्वतंत्र बिन चड्डी सोच लेता है, चड्डी पहनकर नहीं सोच पाता। हर वक्त कसा और भारीपन-सा महसूस होता रहता है। मेरे चिंतन को नए आयाम बिन चड्डी पहनकर ही मिले हैं। तुम यकीन नहीं करोगे- बिन चड्डी चिंतन कर मैंने अभी हाल एक बड़ा उपन्यास लिखा है। कसम से बड़ा आनंद आया इसे लिखने में।'

'बिन चड्डी चिंतन कोई शर्म-हया टाइप मसला नहीं है। आज का समय बहुत बदल गया है। दबा-छिपा अब कुछ नहीं रहा। जिसके दिल में जो है, वो खुलकर सोशल प्लेटफार्म पर एक्सप्रेस कर रहा है। लेखन में नवीनता और दम होना चाहिए बस। फिर देखो मार्केट में कैसे बिकता है। आदमी को मतलब पढ़ने से रह गया है। तुम उसे चड्डी पहनकर लिख रहे हो या बिन चड्डी उसकी बला से।'

'मैंने तो इत्ते बड़े-बड़े लेखकों-साहित्यकारों के बारे में सुना-पढ़ा है। हर किसी का अपने लेखन-चिंतन का कोई न कोई 'टर्निग प्वाइंट' रहा था। कोई सूट-बूट पहनकर लिखता था। तो कोई नहा-धोकर। तो कोई रजाई-कंबल में बैठकर। तो कोई सफर के दौरान। फिर मैंने अपने चिंतन-लेखन को बिन चड्डी के दायरे में ढालकर क्या गलत किया? यह भी एक 'डिफरेंट तरीका' है चिंतन का। क्यों प्यारे।'

अब तक वरिष्ठ महोदय अपने बिन चड्डी चिंतन के फलसफे को सविस्तार मुझे समझा-बतला चुके थे। उनकी बताईं बातें मेरी खोपड़ी में धीरे-धीरे घर भी करने लगीं थीं। फिर भी, मुझे थोड़ा-सा वक्त चाहिए था बिन चड्डी वाले चिंतन की पोजिशन में ढलने के लिए। पर मुझे विश्वास था मैं ऐसा कर पाऊंगा।

फिलहाल, वरिष्ठ महोदय को धन्यवाद कह उनसे विदा लेकर मैं घर आ गया। जिस चिंतन से मुझे भीषण एलर्जी थी, अब हौले-हौले मूड बना रहा हूं, उसे बिन चड्डी करने का। बस आप लोगों की 'नेक दुआएं' चाहिए।

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