गुरुवार, 21 जुलाई 2016

सोना गुनाह तो नहीं

बड़ा 'हंगामा' मचा है कि वो संसद के अंदर- वो भी एक गंभीर चर्चा के दौरान- सो रहे थे। तो क्या हुआ, जो सो रहे थे? क्या सोना- भले ही संसद क्यों न हो- गुनाह है? नींद और झपकी पर किसी का जोर नहीं चलता प्यारे। ये कभी भी, कहीं भी आ सकती है। ये तो संसद रही, मैंने तो लोगों को दफ्तरों और मीटिगों में मस्त सोते देखा है।

फिर, इस बात की क्या गारंटी है कि वो सो ही रहे थे? हो सकता है, किसी गंभीर मुद्दे पर आंख बंद किए महत्त्वपूर्ण चिंतन-मनन में व्यस्त हों! हो सकता है, नए आने वाले पोकेमॉन गो को खेलने के बारे में योजना बना रहे हों! हो सकता है, उत्तर प्रदेश के चुनाव में पार्टी की डूबती नैया को कैसे पार लगाया जाए, इस पर गंभीर विचार में मगन हों!

न सोचा, न समझा बस सोशल मीडिया और टीवी चैनलों पर 'हल्ला' मचा दिया कि वो संसद के भीतर सो रहे थे। सोशल मीडिया वालों को तो ट्रौलिंग के लिए मुद्दा चाहिए होता है। अब बंदा वास्तव में सो ही रहा है या किसी गहन चिंतन में बिजी है, उन्हें क्या मतलब। यहां तो जित्ते मुंह, उत्ती बातें होती हैं।

किसी सोते हुए नेता को मैंने कभी 'हिकारत' भरी नजरों से नहीं देखा। हमेशा 'सम्मान' ही दिया। दिमाग में यही रखा कि नेता सो नहीं रहा बल्कि देश, समाज, जनता की 'फिक्र' में डूबा हुआ है। देश को आगे कैसे ले जाना है, इस पर 'मंथन' कर रहा है। अरे, जिस नेता को जनता ने चुनकर भेजा है, भला वो सो सकता है, नहीं कभी नहीं! ध्यान रहे, नेता सोने के लिए राजनीति में नहीं बल्कि जन-सेवा की खातिर आता है। हां, ये बात अलग है कि बैठे-ठाले कभी उसे झपकी आ जाए। नेता भी आखिर इंसान ही है हमारे-आपके तरह।

आपको क्या मालूम कि नेता को देश और जनता की कित्ती चिंता रहती है। इस चिंता की खातिर न दिन, न रात में वो चैन से सो नहीं पाता! इत्ता बड़ा देश नेताओं के सोने से ही नहीं चल रहा। देश का प्रत्येक नेता 'जाग' रहा है। अपने-अपने काम में जी-जान से जुटा है। इधर चुनाव भी तो सिर पर है, ऐसे में सोने का तो क्या झपकी लेने का भी सवाल पैदा नहीं होता। और लोग कह रहे हैं कि वो संसद में सो रहे थे।

आज जो लोग उनके सोने पर तरह-तरह के सवाल उठा रहा है। जोक आदि बना रहे हैं। उनसे पूछना चाहता हूं कि क्या आप अपने दफ्तरों या मीटिंग में कभी नहीं सोए? कभी झपकी नहीं ली? अजी, आप तो फिर भी नौ-दस घंटे की नौकरी करके घर आकर सो लेते हो, बेचारे नेताओं से पूछो हर वक्त जागते हुए काम में बिजी ही मिलते हैं। केवल देश और जनता की खातिर।

मत भूलें हम एक लोकतांत्रिक मुल्क हैं। यहां खाने से लेकर सोने तक पर आदमी की अपनी 'स्वतंत्रता' चलती है। कभी-कभार अगर कोई नेता अपनी स्वतंत्रता का इस्तेमाल (भले ही सोने में) कर लेता है तो मियां आपके पेट में मरोड़ें क्यों उठने लगती हैं? आप भी सोइए न, किसने रोका है। नेता के झपकी लेने पर ही इत्ता हो-हंगामा किसलिए?

और हां उनका सोना अगर आपको इत्ता ही 'अखर' रहा है न तो एक दफा खुद नेता बनकर देखिए, मियां दो दिन में आटे-दाल का भाव पता चल जाएगा। फिर कभी यह कहने का मुंह न पड़ेगा कि वो संसद में सो रहे थे। क्या समझे...!

1 टिप्पणी:

Kavita Rawat ने कहा…

सवाल भी कुछ दिन बाद उछलते-कूदते सो जाते हैं। ... माननीयों सब अच्छा ही अच्छा करते हैं अब लोग समझे न तब। ..
बहुत खूब काटी चिकोटी